विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
[ विष्णुपर्व ] \hfill एकत्रिंशोऽध्यायः \hfill ३२३
उस समय श्रीकृष्ण मञ्चसे निकलकर बाहर आ गये। कंस क्लेशयुक्त शोचनीय अवस्थामें पड़ गया था। श्रीकृष्ण पुनः बलपूर्वक उसके सिरके बाल पकड़कर उस महान् रंगस्थलमे उसे घसीटने लगे ॥ ८२ ॥
कृष्यमाणः स कृष्णेन भोजराजो महाद्युतिः ।
समाजवाटे परिखां देहक्षुण्णां चकार ह ॥ ८३ ॥
श्रीकृष्णके द्वारा घसीटे जाते हुए महातेजस्वी भोजराज कंसने उस रंगशालामें अपनी देहकी रगड़से खाई-सी बना दी ॥
समाजवाटे क्रीडित्वा विकृष्य च गतायुषम् ।
कृष्णो विसर्जयामास कंसदेहमदूरतः ॥ ८४ ॥
रंगशालामें खिलवाड़ करते हुए घसीटकर निर्जीव हुए कंसके शरीरको श्रीकृष्णने पास ही छोड़ दिया ॥ ८४ ॥
धरण्यां मृदितः शिष्ये तस्य देहः सुखोचितः ।
क्रमेण विपरीतेन पांसुभिः परुषीकृतः ॥ ८५ ॥
उसका जो शरीर सुख भोगनेके योग्य था, वह मर्दित होकर पृथ्वीपर सो गया। शूरवीरोंके लिये अयोग्य विपरीत विधिसे धूलमें सनकर वह कोमल अङ्ग कठोर हो गया ॥ ८५ ॥
तस्य तद् वदनं श्यामं सुप्ताक्षं मुकुटं विना ।
न विभ्राति विपर्यस्तं विपलाशं यथाम्बुजम् ॥ ८६ ॥
गर्दन टूट जानेसे उसका शरीर अस्त-व्यस्त हो गया था। उसके नेत्र बन्द हो गये थे तथा उसका श्याम मुख मुकुटके बिना दलरहित कमलके समान सुशोभित नहीं हो रहा था ॥ ८६ ॥
असंग्रामहतः कंसः स बाणैरपरिक्षतः ।
केशग्राहान्निरस्तासुर्वीरमार्गान्निराकृतः ॥ ८७ ॥
कंस बिना युद्धके मारा गया था। उसके शरीरपर बाणोंसे घाव नहीं होने पाया था। उसको केश पकड़कर घसीटा गया था, इस अवस्थामें उसके प्राण निकले और वह वीरोचित मार्गसे भ्रष्ट हो गया ॥ ८७ ॥
तस्य देहे प्रकाशन्ते सहसा केशवार्पिताः ।
मांसच्छेदघनाः सर्वे नखाग्रा जीवितच्छिदः ॥ ८८ ॥
उसके शरीरमें श्रीकृष्णद्वारा सहसा गड़ाये गये उनके सभी नखाग्र कंसके जीवनका उच्छेद करके प्रकाशित हो रहे थे। वे उसके मांसको छेद-छेदकर सघन रूपसे वहाँ अङ्कित हो गये थे ॥ ८८ ॥
तं हत्वा पुण्डरीकाक्षः प्रहर्षाद् द्विगुणप्रभः ।
ववन्दे वसुदेवस्य पादौ निहतकण्टकः ॥ ८९ ॥
उसका वध करके कमलनयन श्रीकृष्णको इतना अपार हर्ष हुआ कि उनके अङ्गोंकी प्रभा द्विगुण दीप्तिसे प्रकाशित हो उठी। उन्होंने जगत्के लिये कण्टकरूप कंसका विनाश करके पिता वसुदेवके दोनों चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ८९ ॥
मातुश्च शिरसा पादौ निपीड्य यदुनन्दनः ।
सास्रैश्चक्षुःप्रस्रवोत्पीडैः कृष्णमानन्दजैः स्स्रुतैः ॥ ९० ॥
तत्पश्चात् यदुनन्दन श्रीकृष्णने माताके दोनों चरणोंमें अपना मस्तक रखकर उनकी वन्दना की। उस समय देवकी आनन्दातिरेकसे निकले हुए अपने स्तनोंके दूधसे उन्हें सींचने लगी ॥ ९० ॥
यादवांश्चैव तान् सर्वान् यथास्थानं यथावयः ।
पप्रच्छ कुशलं कृष्णो दीप्यमानः स्वतेजसा ॥ ९१ ॥
तदनन्तर अपने तेजसे उद्दीप्त हुए श्रीकृष्णने वय और स्थितिके अनुसार उन समस्त यादवोंकी कुशल पूछी ॥ ९१ ॥
बलदेवोऽपि धर्मात्मा कंसभ्रातरमूर्जितम् ।
बाहुभ्यामेव तरसा सुनामानमपोथयत् ॥ ९२ ॥
इधर धर्मात्मा बलदेवने भी कंसके ओजस्वी भ्राता सुनामाको अपनी दोनों भुजाओं द्वारा ही वेगपूर्वक मार गिराया ॥ ९२ ॥
तौ जितारी जितक्रोधौ चिरविप्रोषितौ व्रजे ।
स्वपितुर्भवने वीरौ जग्मतुर्हृष्टमानसौ ॥ ९३ ॥
शत्रु और क्रोध दोनोंको जीतकर व्रजमे चिरकालतक रहे हुए वे दोनो वीर मन-ही-मन हर्ष और उल्लाससे भरकर अपने पिताके भवनमे गये ॥ ९३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कंसवधे त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कंसवधविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥
एकत्रिंशोऽध्यायः
कंसकी स्त्रियों और माताका विलाप
वैशम्पायन उवाच
भर्तारं पतितं दृष्ट्वा क्षीणपुण्यमिव ग्रहम् ।
कंसपत्न्यो हतं कंसं समन्तात् पर्यवारयन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! जिसका पुण्य क्षीण हो गया हो, उस ग्रहके समान भूमिपर गिरे हुए पतिको देखकर राजा कंसकी पत्नियाँ उसके मृतक शरीरको सब ओर-से घेरकर बैठ गयीं ॥ १ ॥
तं महीशयने सुप्तं क्षितिनाथं गतायुषम् ।
भार्याः स्म दृष्ट्वा शोचन्ति मृग्यो मृगपतिं यथा ॥ २ ॥
| ३२४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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जो कभी पृथ्वीके स्वामी और संरक्षक थे, वे ही पतिदेव आयु समाप्त होनेपर भूमिमयी शय्यापर सो रहे हैं, यह देख राजा कंसकी रानियाँ उसके लिये उसी तरह शोक करने लगीं, जैसे हरिणियाँ यूथपति हरिणके लिये शोकमग्न हो जाती हैं ॥
हा हताः स्म महाबाहो हताशा हतबान्धवाः ।
वीरपत्न्यो हते वीरे त्वयि वीरव्रतप्रिये ॥ ३ ॥
(वे विलाप करती हुई कहने लगीं—) 'हाय ! महाबाहु वीर ! आपको वीरव्रत प्रिय था। आपके मारे जानेपर हम सब वीर-पत्नियों मारी गयीं। हमारी आशाओंकी हत्या हो गयी। हमारे बन्धु-बान्धव भी (अनाथ होनेके कारण) मारे ही गये ! ॥ ३ ॥
इमामवस्थां पश्यन्त्यः पश्चिमां तव नैष्ठिकीम् ।
कृपणं राजशार्दूल विलपामः सबान्धवाः ॥ ४ ॥
'राजशिरोमणे ! आपकी मृत्युसम्बन्धिनी इस अन्तिम अवस्थाको देखती हुई हम सब (आपकी पत्नियाँ) अपने बान्धवोंसहित दीनतापूर्ण विलाप कर रही हैं ॥ ४ ॥
छिन्नमूलाः स्म संवृत्ताः परित्यक्तास्त्वया विभो ।
त्वयि पञ्चत्वमापन्ने नाथेऽस्माकं महाबले ॥ ५ ॥
'प्रभो ! आप हमारे महाबली प्राणनाथ थे, आपके मारे जानेसे हमारी तो जड़ कट गयी। हाय ! आपने हमें त्याग दिया ! ॥ ५ ॥
को नः कोपपरीताङ्गी रतिसंसर्गलालसाः ।
लता इव विचेष्टन्तीः शयनीयानि नेष्यति ॥ ६ ॥
'हा प्राणाधार ! हम मनमें रतिसंसर्गकी लालसा रखकर भी (मानावस्थामें) प्रणयकोपसे युक्त हो जब पृथ्वीपर लताओंकी भाँति लोटकर विपरीत चेष्टा करने लगतीं, उस समय आप हमें प्रेमपूर्वक मनाकर शय्याओंपर सुलाते थे। अब हमें कौन इस तरह उठाकर सेजोंतक ले जायगा ? ॥ ६ ॥
इदं तेऽसदृशं सौम्य हृद्यनिःश्वासमारुतम् ।
दहत्यर्को मुखं कान्तं निस्तोयमित्र पङ्कजम् ॥ ७ ॥
'सौम्य ! जिससे मनोरम निःश्वास वायु निकला करती थी, आपके उस कान्तिमान् मुखको सूर्य जलरहित (तालाबमें उगे हुए) कमलकी भाँति अपनी दुःसह किरणोंसे दग्ध कर रहे हैं। यह दुरवस्था आपके योग्य नहीं है ॥ ७ ॥
इमे ते श्रवणे शून्ये न शोभेते विकुण्डले ।
शिरोधरायां संलीने सततं कुण्डलप्रिये ॥ ८ ॥
'ये आपके कुण्डलरहित सूने कान, जिन्हें सदा ही कुण्डल धारण करना प्रिय रहा है, इस समय कण्ठमें विलीन होकर शोभा नहीं पा रहे हैं ॥ ८ ॥
क्व ते स मुकुटो वीर सर्वरत्नविभूषितः ।
अत्यर्थं शिरसो लक्ष्मीं यो दधारार्कसप्रभाम् ॥ ९ ॥
'वीर ! सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित आपका वह मुकुट कहाँ है, जो आपके मस्तकपर सूर्यकी प्रभाके समान अतिशय शोभाका आधान करता था ! ॥ ९ ॥
अनेन हि कलत्रेण त्वदन्तःपुरशोभिना ।
कथं दीनेन कर्तव्यं त्वयि लोकान्तरं गते ॥ १० ॥
'प्राणनाथ ! आपकी ये रानियाँ जो अन्तःपुरकी शोभा बढ़ाती थीं, आपके लोकान्तरमें चले जानेसे अब दीन और अनाथ होकर कैसे निर्वाह करेंगी ॥ १० ॥
ननु नाम स्त्रियः साध्व्यः प्रियभोगैश्चवञ्चिताः ।
पतीनामपरित्याज्याः स त्वं नस्त्यज्य गच्छसि ॥ ११ ॥
'नाथ ! सुना था, साध्वी स्त्रियाँ न तो प्रिय भोगोंसे कभी वञ्चित होती हैं और न उनके पति उनका परित्याग ही करते हैं; परंतु आप तो हमें छोड़कर चले जा रहे हैं (हाय ! अब हम कैसे रहेंगी ) ॥ ११ ॥
अहो कालो महावीर्यो येन पर्ययकर्मणा ।
कालतुल्यः सपत्नानां त्वं क्षिप्रमपनीयसे ॥ १२ ॥
'अहो ! काल महान् बलसे सम्पन्न है, जो अपनी उलट-फेरकी क्रियाद्वारा शत्रुओंके लिये कालके समान आपको भी शीघ्रतापूर्वक यहाँसे लिये जा रहा है ॥ १२ ॥
वयं दुःखेष्वनूचिताः सुखेष्वेव त्वयैधिताः ।
कथं वत्स्याम विधवा नाथ कार्पण्यमाश्रिताः ॥ १३ ॥
'नाथ ! आपने हमें सदा सुखोंमें ही रखकर पाला-पोसा और बड़ी किया है। हम दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं; किंतु आज आपसे बिछुड़कर विधवा होकर दयनीय दशाको पहुँच गयी हैं। अब हम कैसे यहाँ रह सकेंगी ? ॥ १३ ॥
स्त्रीणां चारित्रलुब्धानां पतिरेकः परा गतिः ।
त्वं हि नः सा गतिश्छिन्ना कृतान्तेन बलीयसा ॥ १४ ॥
'जिनके मनमें सदाचारके पालनका लोभ हो, उन साध्वी स्त्रियोंके लिये एकमात्र पति ही परम गति है—सबसे बड़ा सहारा है, किंतु महाबली कालने हमारे उस सहारेको काट डाला ॥ १४ ॥
वैधव्येनाभिभूताः स्मः शोकंसंतप्तमानसाः ।
रोदितव्यह्रदे मग्नाः क्व गच्छामस्त्वया विना ॥ १५ ॥
'हम वैधव्यसे अभिभूत हो गयी हैं। हमारा मन शोकसे संतप्त हो उठा है। हम विपत्तिके उस गहरे कुण्डमें डूब गयी हैं, जहाँ केवल रोना-ही-रोना रह जाता है। अब हम आपके बिना कहाँ जायँगी ? ॥ १५ ॥
सह त्वया गतः कालस्त्वदङ्के क्रीडितं कृतम् ।
क्षणेन तद्विहीनाः स्म अनित्या हि नृणां गतिः ॥ १६ ॥
'हमारा समय आपके साथ ही बीता है। हमने जबतक
विष्णुपर्व ] एकत्रिंशोऽध्यायः [ ३२५
आपके अङ्गमे ही क्रीड़ाएँ की हैं; किंतु एक ही क्षणमें हम उस सौभाग्यसे वञ्चित हो गयीं । सचमुच ही मनुष्योंकी गति अनित्य है—क्षणभङ्गुर है ॥ १६ ॥
अहो वलविहीनाः स्म विपन्ने त्वयि मानद ।
एकदुष्कृतकारिण्यः सर्वा वैधव्यलक्षणाः ॥ १७ ॥
'दूसरोंको मान देनेवाले महाराज ! आपके निधनसे हम सब-की-सब निर्बल हो गयीं । जान पड़ता है, हम सबने एक समान ही पाप किया था, जिससे सबको वैधव्यका चिह्न धारण करना पड़ा ॥ १७ ॥
त्वया स्वर्गप्रतिच्छन्दैर्लालिताः स्म रतिप्रियाः ।
त्वयि कामवशाः सर्वाः स नस्त्यक्त्वा क्व गच्छसि ॥ १८॥
'आपने हम रतिप्रिया रमणियोंको स्वर्गके समान सुख-भोग देकर सदा हमारा लालन-पालन किया था । हम सभी आपके प्रति कामासक्त रही हैं, फिर आप हमें छोड़कर कहाँ चले जा रहे हैं ॥ १८ ॥
अस्माकं त्वमनाथानां नाथो ह्यसि सुरोपम ।
आसां विलपमानानां कुररीणामिव प्रभो ।
प्रतिवाक्यं जगन्नाथ दातुमर्हसि मानद ॥ १९ ॥
'देवोपम प्रभो ! आप ही हम अनाथाओंके नाथ हैं । जगन्नाथ ! मानद ! कुररीके समान विलाप करनेवाली अपनी इन पत्नियोंको कुछ उत्तर देनेकी कृपा करें ॥ १९ ॥
एवमार्तकलत्रस्य शाम्यमानेषु बन्धुषु ।
गमनं ते महाभाग दारुणं प्रतिभाति नः ॥ २० ॥
'महाभाग ! जब कि आपके सभी बन्धु मारे जा रहे हैं और स्त्रियाँ शोकसे पीड़ित हैं, ऐसे अवसरपर आपका परलोक-गमन हमें बड़ा दारुण प्रतीत होता है ॥ २० ॥
नूनं कान्ततराः कान्त परलोके वरस्त्रियः ।
यतस्त्वं प्रस्थितो वीर विहायेमं गृहे जनम् ॥ २१ ॥
'प्रियतम ! वीर ! निश्चय ही परलोककी सुन्दरियाँ बड़ी ही कमनीय हैं, जिससे आप अपने घरकी इन रानियोंको छोड़कर उनके पास जानेके लिये प्रस्थित हो गये ॥ २१ ॥
किं नु ते कारणं वीर भार्यास्वेतासु भूरिद ।
आर्तनादं रुदन्तीषु यन्मोहान्नावबुध्यसे ॥ २२ ॥
'अधिक-से-अधिक (सुख-सुविधा) प्रदान करनेवाले महाराज ! क्या कारण है, जो अपनी इन पत्नियोंके रोने और आर्तनाद करनेपर भी आप मोहवश इनके दुःखको समझ नहीं पाते अथवा इस मोहनिद्रासे जाग नहीं उठते हैं ॥ २२॥
अहो निष्करुणा यात्रा नराणामौर्ध्वदेहिकी ।
यत् परित्यज्य दारान् स्वान् निरपेक्षा व्रजन्ति हि ॥ २३ ॥
'अहो ! पुरुषोंकी यह पारलौकिक यात्रा बड़ी ही निर्दय होती है; क्योंकि वे अपनी पत्नियोंको छोड़कर उनकी कोई अपेक्षा न रखते हुए चल देते हैं ॥ २३ ॥
अपतित्वं स्त्रियाः श्रेयो न तु शूरः पतिः स्त्रियाः ।
स्वर्गस्त्रीणां प्रियाः शूरास्तेषामपि च ताः प्रियाः ॥ २४॥
'स्त्रियोंका बिना पतिके ही रह जाना अच्छा, किंतु उनके लिये शूरवीर पतिका होना अच्छा नहीं है; क्योंकि वे शूरवीर स्वर्गलोककी सुन्दरियोंको प्रिय होते हैं और वे सुन्दरियाँ भी उन शूरवीरोंको प्रिय होती हैं ॥ २४ ॥
अहो क्षिप्रमदृश्येन नयता त्वां रणप्रियम् ।
प्रहृतं नः कृतान्तेन सर्वासामन्तरात्मसु ॥ २५ ॥
'अहो ! जिन्हें युद्ध ही प्रिय था, उन आपको अदृश्य-भावसे शीघ्रतापूर्वक ले जानेवाले कालने हम सबकी अन्त-रात्माओंपर एक साथ ही प्रहार किया है ॥ २५ ॥
हत्वा जरासंधबलं जित्वा यक्षांश्च संयुगे ।
कथं मानुषमात्रेण हतस्त्वं जगतीतले ॥ २६ ॥
'वीरवर ! आप युद्धमें जरासंधकी सेनाका विनाश करके यक्षोंको भी हराकर इस भूतलपर एक मनुष्यमात्रके हाथसे किस तरह मार डाले गये ? ॥ २६ ॥
इन्द्रेण सह संग्रामं कृत्वा सायकविग्रहम् ।
अमर्त्यैरजितो युद्धे मर्त्येनासि कथं हतः ॥ २७ ॥
'इन्द्रके साथ बाणोंद्वारा युद्ध करके जो समराङ्गणमें अमरोंसे भी पराजित न हो सके, वे ही आप एक मरणधर्मा मनुष्यके हाथसे कैसे मारे गये ? ॥ २७ ॥
त्वया सागरमक्षोभ्यं विक्षोभ्य शरवृष्टिभिः ।
रत्नसर्वस्वहरणं जित्वा पाशधरं कृतम् ॥ २८ ॥
'आपने अपने बाणोंकी वर्षासे पाशधारी वरुणको परास्त करके अक्षोभ्य महासागरको भी विक्षुब्ध करते हुए उसके रत्नरूपी सर्वस्वका अपहरण कर लिया था ॥ २८ ॥
त्वया पौरजनस्यार्थे मन्दं वर्षति वासवे ।
सायकैर्जलदाञ्जित्वा बलाद् वर्षं प्रवर्तितम् ॥ २९ ॥
'एक बार इन्द्रने जब वर्षांमें कमी कर दी थी, तब आपने अपने सायकोंसे बादलोंको जीतकर पुरवासियोंके हितके लिये बलपूर्वक वर्षा करवायी थी ॥ २९ ॥
प्रतापावनताः सर्वे तव तिष्ठन्ति पार्थिवाः ।
प्रेषयन्तो वरार्हाणि रत्नान्युपच्छादनानि च ॥ ३० ॥
'भूमण्डलके समस्त भूपाल आपके प्रतापसे नतमस्तक रहा करते थे और उपहारके रूपमें आपके पास बहुमूल्य रत्न एवं वस्त्र भेजते रहते थे ॥ ३० ॥
तथैवं देवकल्पस्य दृष्टवीर्यस्य शत्रुभिः ।
कथं प्राणान्तकं घोरमीदृशं भयमागतम् ॥ ३१ ॥
| ३२६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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'इस प्रकार आप देवताओंके समान तेजस्वी थे। शत्रुओंने आपके बल-पराक्रमको प्रत्यक्ष देखा था तो भी आपके ऊपर ऐसा प्राणान्तकारी घोर भय कैसे आया ॥ ३१ ॥
प्राप्ताः स्मो विधवाशब्दं त्वयि नाथे निपातिते।
अप्रमत्ताः प्रमत्तेन कृतान्तेन निराकृताः ॥ ३२ ॥
'हा नाथ! आपके मारे जानेसे आज हमें विधवाकी पदवी प्राप्त हुई है। हम सदा प्रमादसे दूर रहती थीं; परंतु मतवाले कृतान्तने हमको भी मिट्टीमें मिला दिया ॥ ३२ ॥
यद्येवं नाथ गन्तव्यं यदि वा विस्मृता वयम्।
वाङ्मात्रेणापि यामीति वक्तव्ये कः परिश्रमः ॥ ३३ ॥
'नाथ ! यदि इस प्रकार आपको जाना ही था अथवा यदि हमें भुला ही देना था तो वाणीमात्रसे भी 'मैं जा रहा हूँ'—ऐसा कहकर विदा ले लेनेमें आपके लिये क्या परिश्रम था ॥ ३३ ॥
प्रसीद नाथ भीताः स्म पादौ ते याम मूर्द्धभिः।
अलं दूरप्रवासेन निवर्तस्व नराधिप ॥ ३४ ॥
'प्राणनाथ ! प्रसन्न होइये। हम भयभीत हैं। आपके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रार्थना करती हैं। नरेश्वर ! दूर देशमें जाने और रहनेसे कोई लाभ नहीं। आप घरको ही लौट चलिये ॥ ३४ ॥
अहो वीर कथं शेषे निषण्णस्तृणपांसुषु ।
शयानस्य हि ते भूमौ कस्मान्नोद्विजते वपुः ॥ ३५ ॥
'वीर ! हमें आश्चर्य है, आप तिनकों और धूलोंमें लोटकर कैसे सो रहे हैं? इस तरह पृथ्वीपर सोये हुए आपके शरीरको उद्वेग क्यों नहीं प्राप्त होता है ? ॥ ३५ ॥
केन सुप्तप्रहारोऽयं दत्तोऽस्माकमकर्कितः।
प्रहृतं केन सर्वासु नारीष्वेवं सुदारुणम् ॥ ३६ ॥
'जैसे किसीपर सोते समय आघात किया जाय, उस प्रकार किसने हमलोगोंको यह अप्रत्याशित (जिसकी हमें कोई आशा नहीं थी, ऐसा) घोर दण्ड दिया है? किस निष्ठुरने हम सब नारियोंपर इस तरह अत्यन्त दारुण प्रहार किया है? ॥ ३६ ॥
रुदितानुशयो नार्या जीवन्त्याः परिदेवनम्।
किं वयं सति गन्तव्ये सह भर्त्रा रुदामहे ॥ ३७ ॥
'अहो ! विधवा नारी जबतक जीवित रहती है, उसे विलाप ही करना पड़ता है। उसका अन्तःकरण रोता रहता है। हमें तो पतिके साथ ही चलना है, ऐसे अवसरपर हम रो क्यों रही हैं?' ॥ ३७ ॥
एतस्मिन्नन्तरे दीना कंसमाता प्रवेपती।
क्व मे वत्सः क्व मे पुत्र इति रोरूयती भृशम् ॥ ३८ ॥
इसी बीचमें कंसकी दुखिया माता काँपती हुई वहाँ आयी और 'कहाँ है मेरा बच्चा ? कहाँ है मेरा बेटा ?' ऐसा कहकर जोर-जोरसे रोने लगी ॥ ३८ ॥
सापश्यन्निहतं पुत्रं निष्प्रभं शशिनं यथा।
हृदयेन विदीर्णेन भ्राम्यमाणा पुनः पुनः ॥ ३९ ॥
उसने अपने मरे हुए पुत्रको देखा। वह कान्तिहीन चन्द्रमाके समान प्रतीत होता था। उसकी ऐसी दशा देखकर माताका हृदय विदीर्ण हो गया। उसे बार-बार चक्कर आने लगा ॥ ३९ ॥
पुत्रं समभिवीक्षन्ती हा हतास्मीति वाशती।
स्नुषाणामार्तनादेन विललाप रुरोद च ॥ ४० ॥
वह पुत्रके मुखकी ओर देखती हुई चीखने लगी—'हाय ! मैं मारी गयी!' पुत्रवधुओंके आर्तनादके साथ रोने-बिलखने लगी ॥ ४० ॥
सा तस्य वदनं दीनमुत्सङ्गे पुत्रगृद्धिनी।
कृत्वा पुत्रेति कारुण्यं विललापार्तया गिरा ॥ ४१ ॥
पुत्रके जीवनकी इच्छा रखनेवाली राजमाता उसके दीन मुखको अपनी गोदमें रखकर आर्त वाणीमें 'हा पुत्र' कहकर करुणाजनक विलाप करने लगी— ॥ ४१ ॥
पुत्र शूरव्रते युक्त ज्ञातीनां नन्दिवर्द्धन ।
किमिदं त्वरितं वत्स प्रस्थानं कृतवानसि ॥ ४२ ॥
'बेटा ! तुम तो वीर-व्रतमें तत्पर रहते थे और अपने बन्धु-बान्धवोंका आनन्द बढ़ाते थे। वत्स ! तुमने क्यों इतनी जल्दी यहाँसे प्रस्थान किया है ? ॥ ४२ ॥
प्रसुप्तश्चातिविवृते किं पुत्र नियमं विना।
वत्स नैवंविधा भूमौ शेरते कृतलक्षणाः ॥ ४३ ॥
'पुत्र ! तुम बिना किसी नियम (नियन्त्रण) के इस अत्यन्त खुले हुए स्थानमें क्यों सो रहे हो ? वत्स ! तुम्हारे-जैसे शुभ-लक्षण-सम्पन्न नरेश इस तरह भूमिपर नहीं सोते हैं ॥ ४३ ॥
रावणेन पुरा गीतः श्लोकोऽयं साधुसम्मतः ।
बलज्येष्ठेन लोकेषु राक्षसानां समागमे ॥ ४४ ॥
'तीनों लोकोंमें जो बलमें सबसे बढ़ा-चढ़ा था, उस रावणने प्राचीनकालमें राक्षसोंके समुदायमे इस सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित श्लोकका गान किया था ॥ ४४ ॥
एवमूर्जितवीर्यस्य मम देवनिघातिनः।
बान्धवेभ्यो भयं घोरं दुर्निवार्यं भविष्यति ॥ ४५ ॥
'मैं इस प्रकार बल और पराक्रममे बढ़ा हुआ हूँ तथा देवताओंका वध करनेमें समर्थ हूँ तो भी मुझे अपने ही भाई-बन्धुओंसे घोर एवं अनिवार्य भय प्राप्त होगा ॥ ४५ ॥
| विष्णुपर्व ] | एकत्रिंशोऽध्यायः | ३२७ |
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तथैव ज्ञातिलुब्धस्य मम पुत्रस्य धीमतः ।
ज्ञातिभ्यो भयमुत्पन्नं शरीरान्तकरं महत् ॥ ४६ ॥
'उसी प्रकार मेरा बुद्धिमान् पुत्र अपने सजातीय बन्धुओंपर लुभाया रहता था तो भी इसे भाई-बन्धुओंसे ही यह देह-विनाशक महान् भय प्राप्त हुआ है' ॥ ४६ ॥
सा पतिं भूपतिं वृद्धमुग्रसेनं विचेतसम् ।
उवाच रुदती वाक्यं विवत्सा हरिणी यथा ॥ ४७ ॥
एह्येहि राजन्शुद्धात्मन् पश्य पुत्रं जनेश्वरम् ।
शयानं वीरशयने वज्राहतमिवाचलम् ॥ ४८ ॥
वह अपने पति बूढ़े राजा उग्रसेनसे, जो उस समय अचेत-से हो रहे थे, बछड़ेसे बिछुड़ी हुई हरिणीके समान रोती हुई बोली—'शुद्ध अन्तःकरणवाले महाराज ! आइये, आइये ! अपने पुत्र राजा कंसको देखिये, जो वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति वीरशय्यापर सो रहा है ॥ ४७-४८ ॥
अस्य कुर्मो महाराज निर्याणसदृशीं क्रियाम् ।
प्रेतत्वमुपपन्नस्य गतस्य यमसादनम् ॥ ४९ ॥
'महाराज ! अब हमलोग इसके लिये मृत्युकालोचित कर्म करें; क्योंकि यह यमलोकमें जाकर प्रेतत्वको प्राप्त हुआ है ॥ ४९ ॥
वीरभोग्यानि राज्यानि वयं चापि पराजिताः ।
गच्छ विज्ञाप्यतां कृष्णः कंससत्कारकारणात् ॥ ५० ॥
'राज्यका उपभोग तो वीर पुरुष ही करते हैं। हमलोग तो अब पराजित हो गये; अतः जाइये, कृष्णको यह सूचित कीजिये कि कंसके अन्त्येष्टि-संस्कारकी व्यवस्था होनी चाहिये ॥ ५० ॥
मरणान्तानि वैराणि शान्ते शान्तिर्भविष्यति ।
प्रेतकार्याणि कार्याणि मृतः किमपराध्यते ॥ ५१ ॥
'शत्रुके मरनेतक ही वैर रहता है। उसके शान्त हो जानेपर अब वैरकी भी शान्ति हो ही जायगी। इसके प्रेत-कार्य तो करने ही चाहिये। मरा हुआ क्या अपराध करता है' ॥
एवमुक्त्वा पतिं भोजं केशानालुप्य दुःखिता ।
पुत्रस्य मुखमीक्षन्ती विललापैव सा भृशम् ॥ ५२ ॥
अपने पति भोजराजसे ऐसा कहकर दुःखिनी राजमाता पुत्रका मुख निहारती हुई अपने केश खींच-खींचकर अत्यन्त विलाप करने लगी ॥ ५२ ॥
इमास्ते किं करिष्यन्ति भार्या राजन् सुखोषिताः ।
त्वां पतिं सुपतिं प्राप्य या विपन्नमनोरथाः ॥ ५३ ॥
'राजन् ! ये सुखमें पली हुई तुम्हारी रानियाँ अब क्या करेंगी। तुम्हारे-जैसे श्रेष्ठ पतिको पाकर भी इन बेचारी बहुओंका सारा मनोरथ नष्ट हो गया ॥ ५३ ॥
इमं ते पितरं वृद्धं कृष्णस्य वशवर्तिनम् ।
कथं द्रक्ष्यामि शुष्यन्तं कासारसलिलं यथा ॥ ५४ ॥
'ये तुम्हारे बूढ़े पिता अब श्रीकृष्णके अधीन हो गये। सूखते हुए पोखरेके जलकी भाँति अब मैं इन्हें परतन्त्र दशामें कैसे देख सकूँगी ॥ ५४ ॥
अहं ते जननी पुत्र किमर्थं नाभिभाषसे ।
प्रस्थितो दीर्घमध्वानं परित्यज्य प्रियं जनम् ॥ ५५ ॥
'बेटा ! मैं तुम्हारी जननी हूँ। मुझसे क्यों नहीं बोलते हो ? क्यों आज अपने प्रियजनोंका परित्याग करके तुमने परलोकके विशाल पथको प्रस्थान किया है ? ॥ ५५ ॥
अहो वीराल्पभाग्यायाः कृतान्तेनाभिचर्तिना ।
आच्छिद्य मम संदायो नीयसे नयकोविदः ॥ ५६ ॥
'अहो वीर ! तुम नीतिकुशल नरेश थे, मेरी सम्पत्ति थे; किंतु सदा समीप रहनेवाला काल आज तुम्हें मुझ अभागिनीकी गोदसे छीनकर लिये जा रहा है ॥ ५६ ॥
दानमानगृहीतानि तृप्तान्येतानि तैर्गुणैः ।
रुदन्ति तव भृत्यानां कुलानि कुलयूथप ॥ ५७ ॥
'कितने ही कुलों (परिवारों) के समुदायका पालन करनेवाले मेरे वीर पुत्र ! तुमने जिन्हें दान और मानसे अनुगृहीत कर रखा था, जो तुम्हारे उन गुणोंसे अत्यन्त संतुष्ट थे, वे ही ये तुम्हारे भृत्योंके कुलोंके लोग आज तुम्हारे लिये रो रहे हैं ॥ ५७ ॥
उत्तिष्ठ नरशार्दूल दीर्घबाहो महाबल ।
त्राहि दीनं जनं सर्वं पुरमन्तःपुरं यथा ॥ ५८ ॥
'नरश्रेष्ठ ! उठो ! महाबाहो ! महाबली वीर ! इन दीन-दुखी लोगोंकी और समस्त नगरकी अन्तःपुरके समान ही रक्षा करो' ॥ ५८ ॥
रुदतीनां भृशार्तानां कंसस्त्रीणां सुविस्तरम् ।
जगामास्तं दिनकरः संध्यरागेण रञ्जितः ॥ ५९ ॥
अत्यन्त आर्त होकर उसके विस्तृत गुणोंको याद करके कंसकी स्त्रियों और माताके रोते-रोते संध्या हो गयी और संध्याकालीन अरुण-रागसे रंजित हुए दिवाकर (सूर्य) अस्ताचलको चले गये ॥ ५९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कंसस्त्रीविलापे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कंसकी स्त्रियोंका विलापविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
३३८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
द्वात्रिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्णका कंसवधके लिये पश्चात्तापपूर्वक उसके औचित्यका समर्थन, उग्रसेनका श्रीकृष्णको सर्वस्व-समर्पणके पश्चात् कंसका अन्त्येष्टि-संस्कार करनेके लिये अनुरोध, श्रीकृष्णका उन्हें समझा-बुझाकर राज्यपर अभिषिक्त करना और समस्त यादवोंके साथ जाकर कंस आदिका अन्त्येष्टि-संस्कार कराना
वैशम्पायन उवाच
उग्रसेनस्तु कृष्णस्य समीपं दुःखितो ययौ।
पुत्रशोकाभिसंतप्तो विषपीत इव श्वसन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजा उग्रसेन पुत्रशोकसे संतप्त एवं दुखी होकर श्रीकृष्णके समीप गये। उस समय वे इस प्रकार लंबी साँस खींच रहे थे, मानो उन्होंने विष पी लिया हो ॥ १ ॥
स ददर्श गृहे कृष्णं यादवैः परिवारितम्।
पश्चात्तापाद् ध्यायन्तं कंसस्य निधनाविलम् ॥ २ ॥
उन्होंने देखा, पिताके घरमें श्रीकृष्ण यादवोंसे घिरे हुए बैठे हैं और कंसके निधनसे मलिन-मुख हो पश्चात्ताप करते हुए चिन्तामग्न हो रहे हैं ॥ २ ॥
कंसनारीविलापांश्च श्रुत्वा स करुणान् बहून् ।
गर्हमाणस्तथाऽऽत्मानं तस्मिन् यादवसंसदि ॥ ३ ॥
वे कंसकी पत्नियोंके बहुतेरे करुण विलाप सुनकर उस यादव-समाजमें अपनी निन्दा करते हुए बोले—॥ ३ ॥
अहो मयातिबाल्येन रोषाद् दोषानुवर्तिना।
वैधव्यं स्त्रीसहस्राणां कंसस्यास्य वधे कृतम् ॥ ४ ॥
'अहो ! मैंने अत्यन्त अविवेकके कारण रोषवश दोषका ही अनुसरण किया और इस कंसका वध करके हजारों स्त्रियोंको विधवा बना दिया है ॥ ४ ॥
कारुण्यं खलु नारीषु प्राकृतस्यापि जायते।
एवमार्तं रुदन्तीषु मया भर्तरि पातिते ॥ ५ ॥
परिदेवितमात्रेण शोकः खलु विधीयते।
'साधारण मनुष्योंको भी स्त्रियोंपर दया हो आती है; परंतु मेरे द्वारा अपने पतिके मारे जानेपर जो इस प्रकार आर्त होकर रो रही हैं, उन रानियोंके प्रति केवल पश्चात्ताप प्रकट करके मैं अपना शोक प्रकाशित कर रहा हूँ ॥ ५½ ॥
कृतान्तस्यानभिज्ञानां स्त्रीणां कारुण्यसम्भवः ॥ ६ ॥
'इन भोली-भाली स्त्रियोंके विलापको सुनकर तो यमराजके हृदयमें भी करुणाका संचार हो सकता है ॥ ६ ॥
कंसस्य हि वधः श्रेयान् प्रागेवाभिमतो मम।
सतामुद्वेजनीयस्य पापेष्वभिरतस्य च ॥ ७ ॥
लोके पतितवृत्तस्य परुषस्याल्पमेधसः।
अक्लिष्टं मरणं श्रेयो न विद्दिष्टस्य जीवितम् ॥ ८ ॥
'मैंने तो पहले ही यह निश्चय कर लिया था कि कंसका वध ही श्रेष्ठ है। जो सदा पापोंमें तत्पर रहनेके कारण साधु पुरुषोंकी दृष्टिमें भी उद्वेजनीय (उद्वेगमें डालने योग्य ) हो गया हो, संसारमें सदाचारसे गिर गया हो तथा सब लोग जिससे विद्वेष रखने लगे हों, ऐसे मन्दबुद्धि पुरुषका मर जाना ही श्रेयस्कर है। वही उसे क्लेशसे छुटकारा दिलानेवाला है, जीवित रहना नहीं ॥ ७-८ ॥
कंसः पापपरश्चैव साधूनामप्यसम्मतः।
धिक्छब्दपतितश्चैव जीविते चास्य का दया ॥ ९ ॥
'कंस सदा पापोंमें ही लगा रहता था, साधु पुरुष भी (उसे दुष्ट समझकर) उसका आदर नहीं करते थे तथा वह सबका धिक्कार पाकर पतित हो गया था, अतः उसके जीवनपर क्या दया हो सकती है ? ॥ ९ ॥
स्वर्गे तपोभृतां वासः फलं पुण्यस्य कर्मणः।
इहापि यशसा युक्तः स्वर्गस्थैरवधार्यते ॥ १० ॥
'तपस्वी पुरुषोंको जो स्वर्गलोकमें निवास प्राप्त होता है, वह उनके पुण्यकर्मका ही फल है। पुण्यात्मा पुरुष इस जगत्में भी यशस्वी होता है और स्वर्गवासी देवता भी उसे सादर ग्रहण करते हैं ॥ १० ॥
यदि स्युर्निर्वृता लोकाः स्युश्च धर्मपराः प्रजाः।
नरा धर्मप्रवृत्ताश्च न राजानमयः स्पृशेत् ॥ ११ ॥
'यदि सब लोग संतुष्ट हों, सारी प्रजा धर्ममें तत्पर रहे और मनुष्योंकी केवल धर्ममें ही प्रवृत्ति हो तो राजाओंको अन्याय छू भी नहीं सकता ॥ ११ ॥
निग्रहे दुष्टवृत्तीनां कृतान्तः कुरुते फलम्।
इष्टधर्मेषु लोकेषु कर्तव्यं पारलौकिकम् ॥ १२ ॥
'यदि राजा इस लोकमें दुष्ट वृत्तिवाले पुरुषोंका दमन करे तो परलोकमें धर्मराज उसे उसका फल देते हैं। सम्पूर्ण लोकोंको धर्म (उसके फलस्वरूप सुखकी प्राप्ति ) ही अभीष्ट है, इसलिये उनमें रहनेवाले पुरुषोंको परलोकमें सुख देनेवाले पुण्यकर्मोंका ही अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १२ ॥
अतीव देवा रक्षन्ति नरं धर्मपरायणम्।
कर्तारः सुलभा लोके दुष्कृतस्य हि कर्मणः ॥ १३ ॥
'देवता धर्मपरायण मनुष्यकी विशेषरूपसे रक्षा करते हैं, क्योंकि लोकमें अधिकतर पाप कर्म करनेवाले ही सुलभ होते हैं ॥ १३ ॥
विष्णुपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः ३२९
हतः सोऽयं मया कंसः साध्वेतदवगम्यताम्।
मूलच्छेदः कृतस्तस्य विपरीतस्य कर्मणः॥ १४॥
'अतः मैंने जो इस कंसका वध किया है, इसे आपलोग ठीक समझें, क्योकि ऐसा करके मैंने उसके पाप-कर्मका मूलोच्छेद कर डाला है ॥ १४ ॥
तदेष सान्त्व्यतां सर्वः शोकार्तः प्रमदाजनः।
पौराश्च पुर्यां श्रेण्यश्च सान्त्व्यन्तां सर्व एव हि॥ १५॥
'इसलिये इन समस्त शोकाकुल नारियोंको आपलोग सान्त्वना प्रदान करें और मथुरापुरीके नागरिकों एवं शिल्पियो- तथा व्यवसायियोंको भी समझा-बुझाकर धीरज बँधायें' ॥१५॥
एवं ब्रुवति गोविन्दे विवेशावनताननः।
उग्रसेनो यदून् गृह्य पुत्रकिल्बिषशङ्कितः ॥ १६ ॥
जब श्रीकृष्ण इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय राजा उग्रसेन अपना मुँह नीचे किये कुछ यादवोंको साथ ले उस घरमें प्रविष्ट हुए। वे मन-ही-मन अपने पुत्र कंसके अपराधसे डरे हुए थे ॥ १६ ॥
स कृष्णं पुण्डरीकाक्षमुवाच यदुसंसदि।
बाष्पसंदिग्धया वाचा दीनया सज्जमानया॥ १७॥
उन्होंने उस यादव-सभामे कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णसे आँसूभरी दीन, गद्गद तथा लड़खड़ाती हुई वाणीमें इस प्रकार कहा-॥ १७ ॥
पुत्रो निर्यातितः क्रोधान्नीतो याम्यां दिशं रिपुः।
स्वधर्माधिगता कीर्तिर्नाम विश्रावितं भुवि ॥१८॥
'श्रीकृष्ण ! तुमने मेरे पुत्रसे उसके अपराधका बदला ले लिया, अपने उस शत्रुको क्रोधपूर्वक यमलोक पहुँचा दिया, धर्मके अनुसार कीर्ति प्राप्त कर ली और भूमण्डलमें अपने नामका डंका पीट दिया ॥ १८ ॥
स्थापितं सत्सु माहात्म्यं शङ्किता रिपवः कृताः।
स्थापितो यादवो वंशो गर्विताः सुहृदः कृताः ॥१९॥
'सत्पुरुषोंके हृदयमें अपनी महत्ता स्थापित कर दी और शत्रुओंको भयभीत कर दिया, यदुवंशकी जड़ जमा दी और सुहृदोंको अपने ऊपर गर्व करनेका अवसर दिया ॥ १९ ॥
सामन्तेषु नरेन्द्रेषु प्रतापस्ते प्रकाशितः।
मित्राणि त्वां भजिष्यन्ति संश्रयिष्यन्ति पार्थिवाः ॥२०॥
'सामन्त राजाओमे तुम्हारा प्रताप प्रकाशित हो गया, मित्रगण तुम्हे अपनायेंगे और भूमण्डलके राजा तुम्हारा आश्रय लेगे ॥ २० ॥
प्रकृतयोऽनुयास्यन्ति स्तोष्यन्ति त्वां द्विजातयः।
संधिविग्रहमुख्यास्त्वां प्रणमिष्यन्ति मन्त्रिणः ॥२१॥
'प्रकृतियाँ (प्रजा, मन्त्री आदि) तुम्हारा अनुसरण करेंगी, ब्राह्मणलोग तुम्हारी स्तुति करेंगे-तुम्हारे गुण गायेंगे और संधि-विग्रहके कार्योंमें प्रमुखरूपसे भाग लेनेवाले मन्त्री तुम्हें प्रणाम करेंगे ॥ २१ ॥
हस्त्यश्वरथसम्पूर्ण पदातिगणसंकुलम्।
प्रतिगृहाण कृष्णेदं कंसस्य बलमव्ययम् ॥ २२ ॥
'श्रीकृष्ण ! हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंसे भरी हुई कंसकी यह अक्षय सेना ग्रहण करो ॥ २२ ॥
धनं धान्यं च यत् किंचिद् रत्नान्यप्याच्छादनानि च।
प्रतीच्छन्तु नियुक्ता वै त्वदीयाः कृष्ण पूरुषाः ॥२३॥
स्त्रियो हिरण्यं यानानि यदन्यद् वसु किंचन।
'श्रीकृष्ण ! जो कुछ भी धन, धान्य, रत्न और वस्त्र आदि कंसके अधिकारमें थे, उन सबको तुम्हारे आदमी सँभाल लें। स्त्रियाँ, सुवर्ण, वाहन तथा अन्य जो कुछ भी धन, रत्न आदि हैं, उनपर भी वे अधिकार कर लें ॥ २३$\frac{१}{२}$ ॥
एवं हि विहिते योगे पर्याप्ते कृष्ण विग्रहे ॥ २४॥
प्रतिष्ठितायां मेदिन्यां यदूनां शत्रुसूदन।
त्वं गतिश्चागतिश्चैव यदूनां यदुनन्दन ॥ २५॥
'यदुवंशियोंके शत्रुओंका संहार करनेवाले यदुनन्दन श्रीकृष्ण ! जब इस प्रकार प्राप्त वस्तुकी प्राप्तिरूप योग सम्पन्न हो गया, विग्रहकी समाप्ति हो गयी और इस पृथ्वीपर तुम्हारा पूर्णरूपसे अधिकार हो गया, तब हम सभी यादवोंकी गति और अगति एकमात्र तुम्ही हो ॥ २४-२५ ॥
शृणुष्व वदतां वीर कृपणानामिदं वचः।
अस्य त्वत्कोपदिग्धस्य कंसस्याशुभकर्मणः ॥ २६ ॥
तव प्रसादाद् गोविन्द प्रेतकार्यं क्रियेत ह।
'वीर ! हम दीनजन तुम्हारे सामने जो कुछ कह रहे हैं-हमारी यह प्रार्थना स्वीकार करो। गोविन्द ! यह पापकमी कंस तुम्हारे कोपसे दग्ध हो गया। हम चाहते हैं कि तुम्हारी ही कृपासे अब इसका प्रेतकार्य सम्पन्न कर दिया जाय ॥२६$\frac{१}{२}$॥
तस्य कृत्वा नरेन्द्रस्य विपन्नस्योर्ध्वदेहिकम् ॥ २७॥
सस्नुषोऽहं सभार्यश्च चरिष्यामि मृगैः सह ।
'उस मरे हुए नरेशका और्ध्वदैहिक सत्कार पूर्ण करके मैं अपनी पत्नी और पुत्रवधुओंको साथ ले वनमें मृगोंके साथ विचरूँगा ॥ २७$\frac{१}{२}$ ॥
प्रेतसत्कारमात्रेण कृते बान्धवकर्मणि।
आनृण्यं लौकिकं कृष्ण गताः किल भवन्ति हि ॥ २८ ॥
'श्रीकृष्ण ! कहते हैं कि मरे हुए मनुष्यका प्रेत-संस्कार मात्र कर देनेसे उसके बान्धवोंका कर्तव्य पूरा हो जाता है और फिर वे उसके लौकिक ऋणसे उऋण हो जाते हैं ॥
तस्याग्निं पश्चिमं कृत्वा चितिस्थाने विधानतः।
तोयप्रदानमात्रेण कंसस्यानृण्यमाप्नुयाम् ॥ २९॥
३३० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'अतः मैं चिता-स्थानपर विधिपूर्वक कंसका अन्तिम अग्नि-संस्कार करके उसको जलाञ्जलिमात्र देकर उसके ऋणसे उऋण हो जाऊँ; यही मेरी इच्छा है ॥ २९ ॥
एतत्ते कृष्ण विज्ञाप्यं स्नेहोऽत्र मयि युज्यताम् ।
प्राप्नोति सुगतिं तत्र कृपणः पश्चिमां क्रियाम् ॥ ३० ॥
'श्रीकृष्ण ! यही तुमसे मेरा निवेदन है, इस विषयमें मुझपर अपना स्नेहभाव प्रकट करो। सुना है, चितापर अन्तिम संस्कार कर देनेसे बेचारा मृतक प्राणी उत्तम गति प्राप्त कर लेता है' ॥ ३० ॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य कृष्णः परमविस्मितः ।
प्रत्युवाचोग्रसेनं वै सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥ ३१ ॥
उग्रसेनका यह वचन सुनकर श्रीकृष्णको बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने सान्त्वनापूर्वक उग्रसेनको समझाते हुए उनकी बातका इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ३१ ॥
कालयुक्तमिदं तात तथैतत् यत् प्रभाषितम् ।
सदृशं राजशार्दूल वृत्तस्य च कुलस्य च ॥ ३२ ॥
'तात ! आपने यह जो कुछ कहा है, यह सब इस समय-के अनुरूप है। राजसिंह ! आपकी बात आपके उत्तम आचार-विचार और श्रेष्ठ कुलके अनुरूप है ॥ ३२ ॥
यत् त्वमेवंविधं ब्रूषे गतेऽर्थे दुरतिक्रमे ।
प्राप्स्यते नृपसत्कारं कंसः प्रेतगतोऽपि सन् ॥ ३३ ॥
'जो बात बीत गयी, वह वैसी ही होनेवाली थी। दैवके उस विधानको लाँघना किसीके लिये भी दुष्कर था; फिर भी उससे प्रभावित होकर जो आप ऐसी बातें कह रहे हैं (इससे मुझे दुःख हुआ), कंस मर जानेपर भी मेरे द्वारा राजोचित सत्कार प्राप्त करेगा (इस बातके लिये मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ) ॥ ३३ ॥
कुले महति ते जन्म वेदान् विदितवानसि ।
कथं न ज्ञायते तात नियतिर्दुरतिक्रमा ॥ ३४ ॥
'तात ! आपका महान् कुलमें जन्म हुआ है। आपने वेदोंका ज्ञान प्राप्त किया है, फिर आप कैसे नहीं समझ पा रहे हैं कि नियति (दैवके विधान) का उल्लङ्घन करना बहुत ही कठिन है ॥ ३४ ॥
स्थावराणां च भूतानां जङ्गमानां च पार्थिव ।
पूर्वजन्मकृतं कर्म कालेन परिपच्यते ॥ ३५ ॥
'पृथ्वीनाथ ! स्थावर और जङ्गम सभी प्राणियोंके पूर्व-जन्मोंमें किये हुए कर्म समयपर परिपक्व होते (और उन्हें शुभाशुभ फलकी प्राप्ति कराते) हैं ॥ ३५ ॥
श्रुतवन्तोऽर्थवन्तश्च दातारः प्रियदर्शनाः ।
ब्राह्मण्या नयसम्पन्ना दीनानुग्रहकारिणः ॥ ३६ ॥
लोकपालसमास्तात महेन्द्रसमविक्रमाः ।
क्षितिपालाः कृतान्तेन नीयन्ते नृपसत्तम ॥ ३७ ॥
'तात ! नृपश्रेष्ठ ! जो वेद-शास्त्रोंके विद्वान्, धनवान्, दाता, प्रियदर्शन (सुन्दर), ब्राह्मणभक्त, नीतिसम्पन्न, दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले, लोकपालोंके समान यशस्वी और महेन्द्र-तुल्य पराक्रमी राजा हैं, उन्हें भी काल उठा ले जाता है ॥ ३६-३७ ॥
धार्मिकाः सर्वभावज्ञाः प्रजापालनतत्पराः ।
क्षत्रधर्मपरा दान्ताः कालेन निधनं गताः ॥ ३८ ॥
'जो धर्मात्मा, सम्पूर्ण भावोंके ज्ञाता, प्रजापालनमें तत्पर, क्षत्रियधर्मपरायण तथा जितेन्द्रिय थे, वे भी कालके गालमें चले गये ॥ ३८ ॥
स्वयमात्मकृतं कर्म शुभं वा यदि वाशुभम् ।
प्राप्ते काले तु तत्कर्म दृश्यते सर्वदेहिनाम् ॥ ३९ ॥
'स्वयं अपना किया हुआ जो शुभ या अशुभ कर्म है, वही समय आनेपर समस्त देहधारियोंके समक्ष सुख-दुःखके रूपमें दिखायी देता है ॥ ३९ ॥
एषा ह्यन्तर्हिता माया दुर्विज्ञेया सुरैरपि ।
यथायं मुह्यते लोको ह्यत्र कर्मैव कारणम् ॥ ४० ॥
'यह भगवान्की अदृश्यरूपसे रहनेवाली माया ही है, जिससे यह जगत् मोहित हो जाता है, उसके स्वरूपको जानना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन है। वास्तवमें सुख और दुःखकी प्राप्तिमें कर्म ही कारण है (मनुष्य जो चिन्तित एवं व्यथित होता है, यह मायाजनित मोह ही है) ॥ ४० ॥
कालेनाभिहतः कंसः पूर्वकर्मप्रचोदितः ।
न ह्यहं कारणं तत्र कालः कर्म च कारणम् ॥ ४१ ॥
'कंस अपने पूर्व कर्मोंसे प्रेरित होकर ही कालके द्वारा मारा गया है। मैं उसमें कारण नहीं हूँ, काल और कर्म ही कारण हैं ॥ ४१ ॥
सूर्यसोममयं तात कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम् ।
कालेन निधनं गत्वा कालेनैव च जायते ॥ ४२ ॥
'तात ! सारा चराचर जगत् सूर्य और सोममय (अग्नी-षोमात्मक) है। वह कालसे मृत्युको प्राप्त होकर फिर कालसे ही जन्म ग्रहण करता है ॥ ४२ ॥
स कालः सर्वभूतानां निग्रहानुग्रहे रतः ।
तस्मात् सर्वाणि भूतानि कालस्य वशगानि वै ॥ ४३ ॥
'काल ही समस्त प्राणियोंके निग्रह और अनुग्रहमें तत्पर है, इसलिये सम्पूर्ण भूत कालके ही अधीन हैं ॥ ४३ ॥
खद्योपेनैव दग्धस्य सूनोस्त्व नराधिप ।
नाहं वै कारणं तत्र कालस्तत्र च कारणम् ॥ ४४ ॥
विष्णुपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः ३३१
| ‘नरेश्वर ! आपका पुत्र अपने ही दोषोंसे दग्ध हुआ है। उसकी मृत्युका कारण मैं नहीं, काल है ॥ ४४ ॥<br><br>अथवाहं भविष्यामि कारणं नात्र संशयः।<br>परायणपरः कालः किं करिष्यत्यकारणः ॥ ४५ ॥<br><br>‘अथवा मैं इसमें निमित्तकारण हो सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि दूसरे निमित्तोंका सहारा लेनेवाला कालअकेला ही क्या करेगा ॥ ४५ ॥<br><br>कालस्तु बलवान् राजन् दुर्विज्ञेया हि सा गतिः।<br>परावरविशेषज्ञा यां यान्ति समदर्शिनः ॥ ४६ ॥<br>गतिः कालस्य सा येन सर्वं कालस्य गोचरम् ।<br><br>‘राजन् ! काल सबसे अधिक बलवान् है। कालसे परे जो मोक्षरूप्रा गति है, वह दुर्विज्ञेय है । उसे पर और अपर ( पुरुष और प्रकृति ) के अन्तरको जाननेवाले समदर्शी पुरुष ही प्राप्त होते हैं। वही कालकी परम गति है, जिससे सब कुछ कालके अधीन प्रतीत होता है ॥ ४६½॥<br><br>ब्रवीमि यदहं तात तदनुष्ठीयतां वचः ॥ ४७ ॥<br>न हि राज्येन मे कार्यं नाप्यहं नृप काङ्क्षितः।<br>न चापि राज्यलुब्धेन मया कंसो निपातितः ॥ ४८ ॥<br><br>‘तात ! अब मैं जो कुछ कहता हूँ, मेरे बताये हुए उस कार्यको आप करें। नरेश्वर ! मुझे राज्यसे कोई प्रयोजन नहीं है। न तो मैं राज्यका अभिलाषी हूँ और न राज्यके लोभसे मैंने कंसको मारा ही है ॥ ४७-४८ ॥<br><br>किं तु लोकहितार्थाय कीर्त्यर्थं च सुतस्तव ।<br>व्यङ्गभूतः कुलस्यास्य सानुजो विनिपातितः ॥ ४९ ॥<br><br>‘मैंने तो केवल लोकहितके लिये और कीर्तिके लिये भाई-सहित तुम्हारे पुत्रको मार गिराया है, जो इस कुलका विकृत ( सड़ा हुआ ) अङ्ग था ॥ ४९ ॥<br><br>अहं स एव गोमध्ये गोपैः सह वनेचरः।<br>प्रीतिमान् विचरिष्यामि कामचारी यथा गजः ॥ ५० ॥<br><br>‘मैं वही वनेचर होकर गोपोंके साथ गौओंके बीच प्रसन्नतापूर्वक विचरूँगा, जैसे इच्छानुसार विचरनेवाला हाथी वनमें स्वच्छन्द घूमता है ॥ ५० ॥<br><br>एतावच्छतशोऽप्येवं सत्येनैतद् ब्रवीमि ते ।<br>न मे कार्यं नृपत्वेन विज्ञाप्यं क्रियतामिदम् ॥ ५१ ॥<br><br>‘मैं सत्यकी शपथ खाकर इन बातोंको सौ-सौ बार दुहराकर आपसे कहता हूँ, मुझे राज्यसे कोई काम नहीं है; आप इसका विज्ञापन कर दीजिये ॥ ५१ ॥<br><br>भवान् राजास्तु मान्यो मे यदूनामग्रणीः प्रभुः।<br>विजयायाभिषिञ्चस्व स्वराज्ये नृपसत्तम ॥ ५२ ॥<br><br>‘आप यदुवंशियोंके अग्रगण्य स्वामी तथा मेरे लिये भी | माननीय हैं, अतः आप ही राजा हों । नृपश्रेष्ठ ! आप अपने राज्यपर अपना अभिषेक कराइये, आपकी विजय हो ॥५२ ॥<br><br>यदि ते मत्प्रियं कार्यं यदि वा नास्ति ते व्यथा।<br>मया निसृष्टं राज्यं स्वं चिराय प्रतिगृह्यताम् ॥ ५३ ॥<br><br>‘यदि आपको मेरा प्रिय कार्य करना हो अथवा यदि आपके मनमे मेरी ओरसे कोई व्यथा न हो तो मेरे द्वारा लौटाये गये इस राज्यको दीर्घकालके लिये ग्रहण करें’ ॥५३॥<br><br>वैशम्पायन उवाच<br><br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं नोत्तरं प्रत्यभाषत ।<br>व्रीडिताधोमुखं तं तु राजानं यदुसंसदि ।<br>अभिषेकेन गोविन्दो योजयामास धर्मवित् ॥ ५४ ॥<br><br>वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर उग्रसेनने कोई उत्तर नहीं दिया। वे लज्जित होकर सिर झुकाये चुपचाप खड़े रह गये । उस समय धर्मके ज्ञाता गोविन्दने राजा उग्रसेनको यादवोंके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ५४ ॥<br><br>स बद्धमुकुटः श्रीमानुग्रसेनो महाद्युतिः ।<br>चकार सह कृष्णेन कंसस्य निधनक्रियाम् ॥ ५५ ॥<br><br>सिरपर मुकुट बाँधे महातेजस्वी श्रीमान् राजा उग्रसेनने श्रीकृष्णके साथ रहकर कंसका अन्त्येष्टि-संस्कार किया था ॥<br><br>तं सर्वे यादवा मुख्या राजानं कृष्णशासनात् ।<br>अनुजग्मुः पुरीमार्गे देवा इव शतक्रतुम् ॥ ५६ ॥<br><br>श्रीकृष्णके आदेशसे समस्त मुख्य-मुख्य यादवोंने मथुरा-पुरीके राजमार्गपर राजा उग्रसेनका उसी प्रकार अनुसरण किया था, जैसे देवता देवराज इन्द्रका अनुगमन करते हैं ५६<br><br>रजन्यां तु निवृत्तायां ततः सूर्ये विराजिते ।<br>पश्चिमं कंससंस्कारं चक्रुस्ते यदुपुङ्गवाः ॥ ५७ ॥<br><br>जब रात बीती और सूर्योदय हुआ, उस समय श्रेष्ठ यादवोंने मिलकर कंसके अन्त्येष्टि-संस्कारकी तैयारी की ॥५७॥<br><br>शिविकायामथारोप्य कंसदेहं यथाक्रमम् ।<br>नैष्टिकेन विधानेन चक्रुस्ते कंससत्क्रियाम् ॥ ५८ ॥<br><br>उन सबने कंसके शरीरको शिविकामें रखकर क्रमशः अन्त्येष्टि-कर्मके विधानसे उसका दाह-संस्कार किया था ॥५८॥<br><br>स नीतो यमुनातीरमुत्तमं नृपतेः सुतः ।<br>सत्कृतश्च यथान्यायं नैधनेन चिताग्निना ॥ ५९ ॥<br><br>राजकुमार कंसका शव पहले यमुनाजीके उत्तम तटपर लाया गया, फिर यथोचित रीतिसे मृत्युकालिक चिताग्निके द्वारा उसका सादर अन्त्येष्टि-संस्कार किया गया ॥ ५९ ॥<br><br>तथैव भ्रातरं चास्य सुनामानं महाभुजम् ।<br>संस्कारं लम्भयामासुः सह कृष्णेन यादवाः ॥ ६० ॥ |
| ३३२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
| उसी प्रकार श्रीकृष्णसहित यादवोंने उसके भाई महाबाहु सुनामाका भी दाह-संस्कार किया ॥ ६० ॥<br><br>ताभ्यां ते सलिलं चक्रुर्वृष्ण्यन्धकपुरोगमाः ।<br>अक्षयं चास्तु प्रेतेभ्यो भाषमाणाः पुनः पुनः ॥ ६१ ॥<br>वृष्णि और अन्धक आदि कुलोंके लोगोंने उन दोनोंके लिये जलदान किया और बारंबार यह कहा कि 'यह जल प्रेतोंके लिये अक्षय हो' ॥ ६१ ॥<br><br>हिरण्यस्य सुवर्णस्य दश कोटीस्तथा हरिः ।<br>गावो रत्नानि वासांसि ग्रामान् नगरसम्मतान् ॥ ६२ ॥<br>ददौ कंसं समुद्दिश्य ब्राह्मणेभ्यो नृपोत्तमः ।<br>अक्षयं चापि विप्रेभ्यो भाषमाणाः पुनः पुनः ॥ ६३ ॥ | श्रीहरि तथा नृपश्रेष्ठ उग्रसेनने श्राद्धमें कंसके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको दस करोड़ स्वर्णमुद्राएँ, बहुत-सी गौएँ, रत्न, वस्त्र तथा नगरों-जैसे सम्मानित ग्राम दिये और बारंबार विप्रोंसे यह कहा—हमारा दिया हुआ यह दान उस दिवंगंत आत्माके लिये अक्षय हो ॥ ६२-६३ ॥<br><br>तयोस्ते सलिलं दत्त्वा यादवा दीनमानसाः ।<br>पुरस्कृत्योग्रसेनं वै विविशुर्मथुरां पुरीम् ॥ ६४ ॥<br>इस प्रकार कंस और सुनामाके लिये जलदान करके दीनचित्त यादव राजा उग्रसेनको आगे किये मथुरापुरीमें प्रविष्ट हुए ॥ ६४ ॥ |
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि उग्रसेनाभिषेककंससंस्कारकथने द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें उग्रसेनका अभिषेक तथा कंसके अन्त्येष्टि-संस्कारकथनविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
बलराम और श्रीकृष्णका गुरु सान्दीपतिके यहाँ जाकर विद्या पढ़ना और गुरुदक्षिणामें उनके मरे हुए पुत्रको उन्हें देकर मथुरापुरीको लौट आना
| वैशम्पायन उवाच<br>स कृष्णस्तत्र बलवान् रौहिणेयेन संगतः ।<br>मथुरां यादवाकीर्णां पुरीं तां सुखमावसत् ॥ १ ॥<br>वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बलवान् श्रीकृष्ण वहाँ रोहिणीकुमार बलरामजीके साथ यादवोंसे भरी हुई उस मथुरापुरीमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १ ॥<br><br>प्राप्तयौवनदेहस्तु युक्तो राजश्रिया ज्वलन् ।<br>चचार मथुरां वीरः स रत्नाकरभूषणम् ॥ २ ॥<br>उनके शरीरको युवावस्था प्राप्त हुई। वे वीर श्रीकृष्ण राजश्रीसे प्रकाशित होते हुए रत्नराशिरूप आभूषणोंसे विभूषित मथुरापुरीमें विचरण करने लगे ॥ २ ॥<br><br>कस्यचित् त्वथ कालस्य सहितौ रामकेशवौ ।<br>गुरुं सान्दीपनिं काश्यमवन्तिपुरवासिनम् ॥ ३ ॥<br>कुछ कालके अनन्तर बलराम और श्रीकृष्ण एक साथ अवन्तिपुर (उज्जयिनी) के निवासी गुरु सान्दीपतिके यहाँ गये, जो काशिदेशमें उत्पन्न हुए थे ॥ ३ ॥<br><br>धनुर्वेदचिकीर्षार्थमुभौ तावभिजग्मतुः ।<br>निवेद्य गोत्रं स्वाध्यायामाचारेणाभ्यलंकृतौ ॥ ४ ॥<br>वे दोनों भाई वहाँ धनुर्वेदकी शिक्षा ग्रहण करनेके लिये गये थे। अपना गोत्र बताकर गुरुकुलके आचारसे अपनेको अलंकृत करके दोनों ही स्वाध्याय करने लगे ॥ ४ ॥ | शुश्रूषू निरहंकारावुभौ रामजनार्दनौ ।<br>प्रतिजग्राह तौ काश्यो विद्याः प्रादाच्च केवलाः ॥ ५ ॥<br>बलराम और श्रीकृष्ण दोनों गुरुकी सेवामें तत्पर रहते थे। अहंकार तो उन्हें छू भी नहीं सका था। काशिदेशीय गुरुने उन दोनोंको शिष्यरूपसे ग्रहण किया और उन्हें विशुद्ध विद्याएँ प्रदान कीं ॥ ५ ॥<br><br>तौ च श्रुतिधरौ वीरौ यथावत् प्रतिपद्यताम् ।<br>अहोरात्रैश्चतुःषष्ट्या साङ्गवेदमधीयताम् ॥ ६ ॥<br>वे दोनों वीर श्रुतिधर थे—किसी भी बातको एक बार सुन लेनेमात्रसे ही ग्रहण कर लेते थे, अतः उन्होंने यथावत् रूपसे विद्याओंको प्राप्त किया। चौंसठ दिन-रातमें ही छहों अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदका अध्ययन कर लिया ॥ ६ ॥<br><br>चतुष्पादं धनुर्वेदं शस्त्राग्रामं ससंग्रहम् ।<br>अचिरेणैव कालेन गुरुस्तावभ्यशिक्षयत् ॥ ७ ॥<br>गुरुजीने उन्हें थोड़े ही समयमें दीक्षा, संग्रह, सिद्धि और प्रयोग—इन चार पादोंसे युक्त धनुर्वेदकी तथा रहस्यसहित शस्त्रसमूहोंकी शिक्षा दे दी ॥ ७ ॥<br><br>अतीवामानुषीं मेधां चिन्तयित्वा तयोर्गुरुः ।<br>मेने तावागतौ वीरौ देवौ चन्द्रदिवाकरौ ॥ ८ ॥<br>उनकी अत्यन्त अलौकिक बुद्धिका विचार करके गुरुने यही माना कि इन दोनों वीरोंके रूपमें मेरे यहाँ साक्षात् चन्द्रदेव और सूर्यदेव पधारे हैं ॥ ८ ॥ |
विष्णुगोपर्व ] त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ३३३
ददर्श च महात्मानौ तावपि पर्वसु।
पूजयन्तौ महादेवं साक्षाद् विष्णुं व्यवस्थितम् ॥ ९ ॥
उन्होंने पर्वके अवसरोंपर उन दोनों महात्माओंको अर्चाविग्रहमें प्रतिष्ठित महान् देवता साक्षात् भगवान् विष्णु-की आराधना करते हुए भी देखा था ॥ ९ ॥
गुरुं सान्दीपनिं कृष्णः कृतकृत्योऽभ्यभाषत।
गुर्वर्थं किं ददानीति रामेण सह भारत ॥ १० ॥
भारत! विद्या पढ़कर कृतकृत्य हो बलरामसहित श्रीकृष्ण-ने अपने गुरु सान्दीपनिसे पूछा—'भगवन्! आपको गुरु-दक्षिणाके रूपमें मैं क्या दूँ ?' ॥ १० ॥
तयोः प्रभावं स ज्ञात्वा गुरुः प्रोवाच हृष्टवान्।
पुत्रमिच्छाम्यहं दत्तं यो मृतो लवणाम्भसि ॥ ११ ॥
उन दोनोंका प्रभाव जानकर हर्षमें भरे हुए गुरुने कहा—'मेरा जो पुत्र खारे पानीके समुद्रमें डूबकर मर गया था, उसे ही तुम ले आकर दे दो, यही मेरी इच्छा है ॥ ११ ॥
पुत्र एकोऽपि मे जातः स चापि तिमिना हतः।
प्रभासे तीर्थयात्रायां तं मे त्वं पुनरानय ॥ १२ ॥
'मेरे एक ही पुत्र हुआ था। वह भी तीर्थयात्राके अवसर-पर प्रभासक्षेत्रमें तिमि नामक मत्स्यद्वारा मार डाला गया, उसीको तुम फिर ले आओ' ॥ १२ ॥
तथेत्येवाब्रवीत् कृष्णो रामस्यानुमते स्थितः।
गत्वा समुद्रं तेजस्वी विवेशान्तर्जलं हरिः ॥ १३ ॥
तब बलरामजीकी अनुमति लेकर श्रीकृष्णने उनसे कहा, 'बहुत अच्छा'; फिर वे तेजस्वी श्रीहरि समुद्रतटपर जाकर उसके जलके भीतर घुस गये ॥ १३ ॥
समुद्रः प्राञ्जलिर्भूत्वा दर्शयामास स्वं तदा।
तमाह कृष्णः क्वासौ भोः पुत्रः सान्दीपनेरिति ॥ १४ ॥
उस समय समुद्रने हाथ जोड़कर उन्हें दर्शन दिया। श्रीकृष्णने उससे पूछा—'अजी, सान्दीपनि मुनिका पुत्र कहाँ है ?' ॥ १४ ॥
समुद्रः प्रत्युवाचेदं दैत्यः पञ्चजनो महान्।
तिमिरूपेण तं बालं ग्रस्तवानिति माधव ॥ १५ ॥
समुद्रने उत्तर दिया—'माधव ! पञ्चजन नामक महान् दैत्यने तिमिरूपसे उस बालकको अपना ग्रास बना लिया था' ॥ १५ ॥
स पञ्चजनमासाद्य जघान पुरुषोत्तमः।
न चाससाद तं बालं गुरुपुत्रं तदाच्युतः ॥ १६ ॥
तब अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् पुरुषोत्तमने पञ्चजनके पास जाकर उसे मार डाला, परंतु उन्हें वहाँ उनके गुरुका पुत्र नहीं प्राप्त हुआ ॥ १६ ॥
स तु पञ्चजनं हत्वा शङ्खं लेभे जनार्दनः।
यस्तु देवमनुष्येषु पाञ्चजन्य इति श्रुतः ॥ १७ ॥
पञ्चजनको मारकर भगवान् जनार्दनने एक शङ्ख हस्त-गत किया, जो देवताओं और मनुष्योंमें पाञ्चजन्य नामसे विख्यात है ॥ १७ ॥
ततो वैवस्वतपुरं जगाम पुरुषोत्तमः।
ततो यमोऽभ्युपागम्य ववन्दे तं गदाधरम् ॥ १८ ॥
तदनन्तर भगवान् पुरुषोत्तम वैवस्वत यमकी पुरीमें गये। यमने आकर उन भगवान् गदाधरको प्रणाम किया ॥
तमुवाचाथ वै कृष्णो गुरुपुत्रः प्रदीयताम्।
तयोस्तत्र तदा युद्धमासीद् घोरतरं महत् ॥ १९ ॥
तब श्रीकृष्णने उनसे कहा—'मुझे मेरे गुरुका पुत्र दे दो (परंतु यमने उसे देनेसे इनकार किया)। तब उन दोनोंमें वहाँ महान् घोरतर युद्ध हुआ ॥ १९ ॥
ततो वैवस्वतं घोरं निर्जित्य पुरुषोत्तमः।
आससाद च तं बालं गुरुपुत्रं तदाच्युतः ॥ २० ॥
भयानक यमराजको जीतकर पुरुषोत्तम अच्युतने अपने बालक गुरुपुत्रको प्राप्त कर लिया ॥ २० ॥
आनिनाय गुरोः पुत्रं चिरं नष्टं यमक्षयात्।
ततः सान्दीपनेः पुत्रः प्रभावदमितौजसः ॥ २१ ॥
दीर्घकालगतः प्रेतः पुनरासीच्छरीरवान्।
जो दीर्घकालसे नष्ट हो चुका था, उस गुरुपुत्रको भगवान् यमलोकसे यहाँ उठा ले आये। उन अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णके प्रभावसे दीर्घकालका मरा हुआ सान्दी-पनिका पुत्र पुनः पूर्ववत् शरीर धारण करके जी उठा २१३
तदशक्यमचिन्त्यं च दृष्ट्वा सुमहदद्भुतम् ॥ २२ ॥
सर्वेषामेव भूतानां विस्मयः समजायत।
वह अशक्य, अचिन्त्य और अत्यन्त अद्भुत कार्य देखकर सभी प्राणियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ २२३ ॥
स गुरोः पुत्रमादाय पाञ्चजन्यं च माधवः।
रत्नानि च महार्हाणि पुनरायाज्जगत्प्रभुः ॥ २३ ॥
जगत्के स्वामी लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण गुरुपुत्रको साथ ले पाञ्चजन्य शङ्ख तथा बहुत-से बहुमूल्य रत्न लेकर पुनः लौट आये ॥ २३ ॥
राक्षसैस्तस्य रत्नानि महार्हाणि बहूनि च।
आनाय्यावेदयामास गुरवे वासवानुजः ॥ २४ ॥
इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णने उन बहुसंख्यक एवं बहु-मूल्य रत्नोंको राक्षसोंद्वारा (जो यमके किंकर थे) मँगवाकर गुरुको निवेदन किया ॥ २४ ॥
गदापरिघयुद्धेषु सर्वस्त्रेषु च तावुभौ।
अचिराम्मुख्यतं प्राप्तौ सर्वलोके धनुर्धृताम् ॥ २५ ॥
३३४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णने गदा और परिवके युद्धोंमें तथा सम्पूर्ण अस्त्रोंमें शीघ्र ही प्रमुखता प्राप्त कर ली। वे समस्त संसारके धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ माने जाने लगे ॥ २५ ॥
ततः सान्दीपनेः पुत्रं तद्रूपवयसं तदा । प्रादात् कृष्णः प्रतीतात्मा सह रत्नैरुदारधीः ॥ २६ ॥
उदारबुद्धिवाले श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्त होकर सान्दीपानिके पुत्रको उसी रूप और अवस्थामें रत्नोंके साथ उन्हें लौटा दिया॥ २६ ॥
चिरनष्टेन पुत्रेण काश्यः सान्दीपनिस्तदा । समेत्य मुमुदे राजन् पूजयन् रामकेशवौ ॥ २७ ॥
राजन् ! काशिदेशमें उत्पन्न हुए सान्दीपनिने चिरकालसे नष्ट हुए अपने पुत्रसे मिलकर बलराम और श्रीकृष्णकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए बड़े प्रसन्न हुए ॥ २७ ॥
कृतार्थौ तावुभौ वीरौ गुरुमामन्त्र्य सुव्रतौ । आयातौ मथुरां भूयो वसुदेवसुतावुभौ ॥ २८ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे दोनों वीर वसुदेवपुत्र अस्त्र-विद्याकी शिक्षा पाकर गुरुकी आज्ञा ले पुनः मथुरापुरीको लौट आये ॥ २८ ॥
ततः प्रत्युद्ययुः सर्वे यादवा यदुनन्दनौ । सबला हृष्टमनस उग्रसेनपुरोगमाः ॥ २९ ॥
उस समय उग्रसेन आदि समस्त यादवोंने प्रसन्नचित्त होकर सेनासहित आगे जा उन दोनों यदुनन्दन वीरोंकी अगवानी की ॥ २९ ॥
श्रेण्यः प्रकृतयश्चैव मन्त्रिणः सपुरोहिताः । सबालवृद्धा सा चैव पुरी समभिवर्तत ॥ ३० ॥
व्यवसायीवर्ग, प्रजावर्ग अथवा प्रकृतिमण्डल, मन्त्री, पुरोहित तथा बालकों और वृद्धोंसहित वह सारी पुरी (श्रीकृष्ण-बलरामके दर्शनके लिये) उमड़ पड़ी ॥ ३० ॥
नन्दितूर्याण्यवाद्यन्त तुष्टुवुश्च जनार्दनम् । रथ्याः पताकामालिन्यो भ्राजन्ते स्म समन्ततः ॥ ३१ ॥
आनन्दसूचक बाजे बजने लगे। सब लोग श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे। मथुरापुरीकी गलियाँ और सड़कें ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत हो सब ओरसे सुशोभित होने लगीं ॥ ३१ ॥
प्रहृष्टमुदितं सर्वमन्तःपुरमशोभत । गोविन्दागमनेऽत्यर्थं यथैवेन्द्रमहे तथा ॥ ३२ ॥
गोविन्दके आगमनसे इन्द्रोत्सवके समान सारे नगर और अन्तःपुरमें अत्यन्त हर्ष एवं आनन्द छा गया। उसकी शोभा बढ़ गयी ॥ ३२ ॥
मुदिताश्चाथ गायन्ति राजमार्गेषु गायकाः । तत्रासीत् प्रथिता गाथा यादवानां प्रियङ्करा ॥ ३३ ॥
गोविन्दरामौ सम्प्राप्तौ भ्रातरौ लोकविश्रुतौ । स्वे पुरे निर्भयाः सर्वे क्रीडध्वं सह बान्धवैः ॥ ३४ ॥
राजमार्गोंपर बहुतेरे गायक आनन्दित होकर गीत गाने लगे। उस समय यादवोंको प्रिय लगनेवाली यह गाथा वहाँ सब ओर कही-सुनी जाने लगी—'नागरिको ! विश्वविख्यात वीर श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाई मथुरामें आ पहुँचे हैं। अब तुम सब लोग निर्भय हो अपने नगरमें बन्धु-बान्धवोंके साथ क्रीड़ा करो' ॥ ३३-३४ ॥
न तत्र कश्चिद् दीनो वा मलिनो वा विचेतनः । मथुरायामभूद् राजन् गोविन्दे समुपस्थिते ॥ ३५ ॥
राजन् ! गोविन्दके मथुरामे उपस्थित होनेपर वहाँ न तो कोई दीन था, न मलिन था और न चेतनासे शून्य ही था ॥ ३५ ॥
वयांसि साधुवाक्यानि प्रहृष्टा गोहयद्विपाः । नरनारीगणाः सर्वे भेजिरे मनसः सुखम् ॥ ३६ ॥
पक्षी मीठी-मीठी बोली बोलते थे। गाय, बैल, घोड़े, हाथी हृष्ट-पुष्ट रहते थे और पुरुषों तथा स्त्रियोंके सभी समुदाय मनमें सुखका अनुभव करते थे ॥ ३६ ॥
शिवाश्च वाताः प्रववुरिवरजस्का दिशो दश । दैवतानि च हृष्टानि सर्वेष्वायतनेषु च ॥ ३७ ॥
शीतल सुखद हवा चलती थी। दसों दिशाओंमें धूल नहीं उड़ती थी और सभी मन्दिरोंमे हर्षपूर्वक देवता निवास करते थे ॥ ३७ ॥
यानि लिङ्गानि लोकस्य चासन् कृतयुगे पुरा । तानि सर्वाण्यदृश्यन्त पुरीं प्राप्ते जनार्दने ॥ ३८ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके मथुरापुरीको लौट आनेपर वहाँ सारे चिह्न वैसे ही दिखायी देने लगे, जो सत्ययुगके समय पहले जगत्में प्रकट होते थे ॥ ३८ ॥
ततः काले शिवे पुण्ये स्यन्दनेनारिमर्दनः । हरियुक्तेन गोविन्दो विवेश मथुरां पुरीम् ॥ ३९ ॥
तदनन्तर मङ्गलमयी पुण्यवेलामें शत्रुमर्दैन भगवान् गोविन्दने घोड़े जुते हुए रथपर बैठकर मथुरापुरीमें प्रवेश किया ॥ ३९ ॥
विशन्तं मथुरां रम्यां तमुपेन्द्रमरिंदमम् । अनुजग्मुर्यदुगणाः शक्रं देवगणा इव ॥ ४० ॥
रमणीय मथुरापुरीमे प्रवेश करते समय समस्त यादव उन शत्रुदमन उपेन्द्र श्रीकृष्णके पीछे-पीछे उसी प्रकार चले, जैसे देवता देवेन्द्रका अनुसरण करते हैं ॥ ४० ॥
वसुदेवस्य भवनं ततस्तौ यदुनन्दनौ । प्रविष्टौ हृष्टवदनौ चन्द्रादित्याविवाचलम् ॥ ४१ ॥ परेण तेजसोपेतौ सुरेन्द्राविव रूपिणौ । तावायुधानि विन्यस्य गृहे स्वे स्वैरचारिणौ ॥ ४२ ॥
तदनन्तर यदुकुलको आनन्दित करनेवाले वे दोनों बन्धु वसुदेवके भवनमें प्रविष्ट हुए। उस समय उनके मुखपर हर्षो-
विष्णुपर्व ] चतुस्त्रिंशोऽध्यायः [ ३३५
ल्लास छा रहा था और वे मेरु पर्वतपर जानेवाले चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रतीत होते थे। वे महान् तेजसे सम्पन्न तथा देवेश्वरोंके समान मनोहर रूपधारी श्रीकृष्ण बलराम आयुधोंको अपने घरमें रखकर उस पुरीमे स्वेच्छानुसार विचरने लगे ॥४१-४२॥
मुमुदाते यदुवरौ वसुदेवसुतावुभौ।
उद्यानेषु विचित्रेषु फलपुष्पावनामिषु ॥ ४३ ॥
वसुदेवके वे दोनों पुत्र यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण-बलराम फल और फूलोंके भारसे झुके हुए वृक्षोंवाले विचित्र उद्यानोंमें सानन्द विचरते थे ॥ ४३ ॥
चेरतुः सुमहात्मानौ यादवैः परिवारितौ।
रैवतस्य समीपेपु सरित्सु विमलासु च ॥ ४४ ॥
पद्मपत्रविवृद्धासु कारण्डवयुतासु च।
यादवोंसे घिरे हुए वे दोनों महात्मा रैवतक पर्वतके समीपवर्ती प्रदेशोंमें तथा बढ़े हुए पद्म-पत्रोंसे युक्त एवं कारण्डव पक्षियोंके कलरवोंसे मुखरित निर्मल सरिताओंके तटोंपर भ्रमण करते थे ॥ ४४॥
एवं तावेकनिर्माणौ मथुरायां शुभाननौ।
उग्रसेनानुगौ भूत्वा कंचित् कालं मुमोदतुः ॥ ४५ ॥
वे दोनों भाई एक तत्त्वके बने हुए थे (एक ही सच्चिदानन्दघन परमात्मा इन दोनोंके रूपोंमे प्रकट हुए थे)। उन दोनोंके मुख बड़े ही सुन्दर एवं मङ्गलकारी थे। वे कुछ कालतक उग्रसेनका अनुसरण करते हुए मथुरामें बड़े सुखसे रहे ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रामकृष्णप्रत्यागमने त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीबलराम और कृष्णका मथुरामें प्रत्यागमनविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
जरासंधका अपनी विशाल सेनाके द्वारा आकर मथुरापुरीपर घेरा डालना
वैशम्पायन उवाच
स कृष्णस्तत्र सहितो रौहिणेयेन संगतः।
मथुरां यादवाकीर्णां पुरीं तां सुखमावसत् ॥ १ ॥
प्राप्तयौवनदेहस्तु युक्तो राजश्रिया विभुः।
चचार मथुरां प्रीतः स वनाकरभूषनाम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बलरामसहित श्रीकृष्ण यादवोंसे भरी हुई मथुरापुरीमें सुखपूर्वक रहने लगे। उनके श्रीअङ्गोंको युवावस्था प्राप्त हुई थी। वे भगवान् राजोचित शोभासे सुशोभित हो वन-प्रान्तोंसे विभूषित मथुरापुरीमे प्रसन्नतापूर्वक विचरते थे ॥ १-२ ॥
कस्यचित्त्वथ कालस्य राजा राजगृहेश्वरः।
शुश्राव निहतं कंसं दुहितृभ्यां महीपतिः ॥ ३ ॥
कुछ कालके अनन्तर राजगृहके स्वामी पृथ्वीपति राजा जरासंधने अपनी दोनों पुत्रियोंसे सुना कि 'कंस मारा गया'।
ततो नातिचिरात् कालाज्जरासंधः प्रतापवान्।
आजगाम षडङ्गेन बलेन महता वृतः ॥ ४ ॥
जिघांसुर्हि यदून् क्रुद्धः कंसस्यापचितिं स्मरन्।
यह दुःखद समाचार सुनकर प्रतापी जरासंध थोड़े ही दिनोंमे छः अङ्गोंसे युक्त अपनी विशाल सेनासे घिरा हुआ मथुरापुरीपर चढ़ आया। वह कंससे उऋण होनेकी बातका ध्यान रखकर कुपित हो समस्त यादवोंका विनाश कर डालना चाहता था ॥ ४॥
अस्तिः प्राप्तिश्च नाम्ना ते मागधस्य सुते नृप ॥ ५ ॥
जरासंधस्य कल्याण्यौ पीनश्रोणिपयोधरे।
उभे कंसस्य ते भार्ये प्रादाद् बार्हद्रथो नृपः ॥ ६ ॥
नरेश्वर ! मगधराज जरासंधके दो कल्याणमयी कन्याएँ थीं, जिनके नाम थे अस्ति और प्राप्ति। इन दोनोंके कटिप्रदेशके पिछले भाग स्थूल तथा उरोज पीन थे। बृहद्रथपुत्र जरासंधने अपनी वे दोनों कन्याएँ कंसको दे दी थीं। वे दोनों कंसकी पत्नियाँ थीं ॥ ५-६ ॥
स ताभ्यां मुमुदे राजा बद्ध्वा पितरमाहुकम्।
समाश्रित्य जरासंधमनादृत्य च यादवान्।
शूरसेनेश्वरो राजा यथा ते बहुशः श्रुतः ॥ ७ ॥
शूरसेनदेशका स्वामी कंस जरासंधका आश्रय ले यादवोंका अनादर करके अपने पिता उग्रसेनको कैद कर स्वयं ही राजा बन बैठा था और अपनी उन दोनों पत्नियोंके साथ आनन्द भोगने लगा था; जैसा कि तुमने बहुत बार सुना होगा ॥ ७॥
ज्ञातिकार्यार्थसिद्धयर्थमुग्रसेनहिते रतः।
वसुदेवोऽभवन्नित्यं कंसो न ममृषे च तम् ॥ ८ ॥
भाई-बन्धुओंके कार्य और प्रयोजनकी सिद्धिके लिये
- १. रथ, हाथी, घोडे, पैदल, पण्य धान्य (बिकाऊ अन्न) तथा आपणिक (विक्रेता व्यापारी)—ये सेनाके छः अङ्ग हैं।
३३६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे वसुदेवजी सदा उग्रसेनके हितमें तत्पर रहते थे; किंतु कंस सांकृति, केशिक, राजा भीष्मक तथा धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ उनके इस बर्तावको सहन नहीं कर पाता था ॥ ८ ॥ भीष्मकपुत्र रुक्मी, जो महासमरमें श्रीकृष्ण और अर्जुनके साथ रामकृष्णौ समाश्रित्य हते कंसे दुरात्मनि । लड़नेका हौसला रखता था ॥ १३-१५ ॥ उग्रसेनोऽभवद् राजा भोजवृष्ण्यन्धकैर्वृतः ॥ ९ ॥ वेणुदारिः श्रुतर्वा च क्रथश्चैवांशुमानपि । बलराम और श्रीकृष्णसे भिड़कर जब दुरात्मा कंस मारा अङ्गराजश्च बलवान् वङ्गानामधिपस्तथा ॥ १६ ॥ गया, तब भोज, वृष्णि और अन्धकवंशी यादवोंसे घिरे हुए कौसल्यः काशिराजश्च दशार्णाधिपतिस्तथा । उग्रसेन स्वयं राजा हुए ॥ ९ ॥ सुखेश्वरश्च विक्रान्तो विदेहाधिपतिस्तथा ॥ १७ ॥ दुहितृभ्यां जरासंधः प्रियाभ्यां बलवान् नृपः । मद्रराजश्च बलवांस्त्रिगर्तानामथेश्वरः । नोदितो वीरपत्नीभ्यामुपायान्मथुरां ततः ॥ १० ॥ शाल्वराजश्च विक्रान्तो दरदश्च महाबलः ॥ १८ ॥ तदनन्तर अपनी दोनों प्रिय पुत्रियोंसे, जो वीर कंसकी यवनाधिपतिश्चैव भगदत्तश्च वीर्यवान् । पत्नियां थीं, प्रेरित होकर बलवान् राजा जरासंधने मथुरापर सौवीरराजः शैव्यश्च पाण्ड्यश्च वलिनां वरः ॥ १९ ॥ आक्रमण किया ॥ १० ॥ गान्धारराजः सुबलो नग्नजिच्च महाबलः । कृत्वा सर्वं समुद्योगं क्रोधादग्निसमो ज्वलन् । काश्मीरराजो गोनर्दो दरदाधिपतिर्नृपः । प्रतापावन्तो ये च जरासंधस्य पार्थिवाः ॥ ११ ॥ दुर्योधनादयश्चैव धार्तराष्ट्रा महाबलाः ॥ २० ॥ मित्राणि ज्ञातयश्चैव संयुक्ताः सुहृदस्तथा । एते चान्ये च राजानो बलवन्तो महारथाः । तमेवानुययुः सर्वैः सैन्यैः समुदितैर्वृताः ॥ १२ ॥ तमन्वयुर्जरासंधं विद्धिषन्तो जनार्दनम् ॥ २१ ॥ वह क्रोधसे अग्निके समान जल रहा था। उसने सब वेणुदारि, श्रुतर्वा, क्रथ, अंशुमान्, बलवान् अङ्गराज, प्रकारसे पूरा उद्योग करके चढ़ाई की थी। जरासंधके प्रतापसे वङ्गनरेश, कोसलनरेश, काशिराज, दशार्णदेशके अधिपति, नतमस्तक हुए जो-जो राजा थे तथा जो उसके मित्र, भाई- पराक्रमी सुखेश्वर, विदेहराज, बलवान् मद्रराज (शल्य), बन्धु, मिलने-जुलनेवाले और सुहृद् थे, उन सबने अपनी त्रिगर्तदेशका शासक सुशर्मा, पराक्रमी शाल्वराज, महाबली सारी सेनाओंके साथ जरासंधका ही अनुसरण किया ॥११-१२॥ दरद, यवनोंका राजा पराक्रमी भगदत्त, सौवीरदेशका राजा, महेष्वासा महावीर्या जरासंधप्रियैषिणः । शैव्य, बलवानोंमें श्रेष्ठ पाण्ड्य, गान्धारराज सुबल, महाबली कारूषो दन्तवक्त्रश्च चेदिराजश्च वीर्यवान् ॥ १३ ॥ नग्नजित्, काश्मीरराज गोनर्द, दरददेशके अधिपति, कलिङ्गाधिपतिश्चैव पौण्ड्रश्च बलिनां वरः । धृतराष्ट्रके महाबली पुत्र दुर्योधन आदि—ये तथा और भी सांकृतिः कैशिकश्चैव भीष्मकश्च नराधिपः ॥ १४ ॥ बलवान् महारथी राजा श्रीकृष्णसे द्वेष रखते हुए जरासंधके पुत्रश्च भीष्मकस्यापि रुक्मी मुख्यो धनुर्भृताम् । साथ आये थे ॥ १६–२१ ॥ वासुदेवार्जुनाभ्यां यः स्पर्धते स महाहवे ॥ १५ ॥ ते शूरसेनानाविश्य प्रभूतयवसेन्धनान् । वे महाधनुर्धर तथा महापराक्रमी नरेशगण जरासंधका ऊषुः संरुध्य मथुरां पुरस्कृत्य बलं तदा ॥ २२ ॥ ही प्रिय चाहनेवाले थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—करूष वे शूरसेनदेशमें, जहाँ दाना-घास और लकड़ीकी देशका राजा दन्तवक्त्र, पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल, कलिङ्ग- बहुतायत थी, आकर अपनी-अपनी सेनाओंको आगे करके देशका राजा श्रुतायु, बलवानोंमें श्रेष्ठ पौण्ड्रक (वासुदेव), मथुरापर घेरा डालकर रहने लगे ॥ २२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि मथुरोपरोधे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥ इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें जरासंधकी सेनाद्वारा मथुरापर घेराविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः जरासंधकी सेनाका वर्णन, उसकी चारों दिशाओंसे मथुरापुरीपर आक्रमणकी योजना, यादवोंके साथ जरासंधकी सेनाका युद्ध, श्रीकृष्ण और बलरामके पराक्रमसे उसकी सेनाका पलायन, जरासंधद्वारा अपने सैनिकोंको प्रोत्साहन तथा उभय-पक्षके वीरोंमें घमासान युद्ध वैशम्पायन उवाच वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वे सब नरेश मथुरोपवने गत्वा निविष्टांस्तान् नराधिपान् । मथुराके उपवनमे पहुँचकर छावनी डाले हुए थे। वहाँ समस्त अपश्यन् वृष्णयः सर्वे पुरस्कृत्य जनार्दनम् ॥ १ ॥ वृष्णिवंशियोंने श्रीकृष्णको आगे करके उन्हें देखा ॥ १ ॥
विष्णुपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ३३७
ततो हृष्टमनाः कृष्णो रामं वचनमब्रवीत् ।
त्वरते खलु कार्यार्थो देवतानां न संशयः ॥ २ ॥
तब श्रीकृष्णने मन-ही-मन प्रसन्न होकर बलरामजीसे कहा—'आर्य ! देवताओंका कार्य एवं प्रयोजन शीघ्र ही सिद्ध होना चाहता है—इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥
यथायं संनिकृष्टो हि जरासंधो नराधिपः ।
लक्ष्यन्ते हि ध्वजाग्राणि रथानां वातरंहसाम् ॥ ३ ॥
'तभी तो यह राजा जरासंध स्वयं ही हमारे निकट आ पहुँचा । यह वायुके समान वेगशाली रथोंकी ध्वजाओंके अग्रभाग दिखायी दे रहे हैं ॥ ३ ॥
एतानि शशिकल्पानि नृपाणां विजिगीषताम् ।
छत्राण्यार्य विराजन्ते प्रोच्छ्रितानि सितानि च ॥ ४ ॥
'भैया ! विजयकी इच्छासे आये हुए राजाओंके ये चन्द्रमा-जैसे श्वेत एवं ऊँचे-ऊँचे छत्र शोभा पा रहे हैं ॥४॥
अहो नृपरथोदग्रा विमलाश्छत्रपङ्क्तयः ।
अभिवर्तन्ति नः शुभ्रा यथा खे हंसपङ्क्तयः ॥ ५ ॥
'अहो ! राजाओके रथोंपर ऊँची-ऊँची निर्मल एवं शुभ्र छत्र-पंक्तियाँ आकाशमे हंसकी पाँतोके समान शोभा पाती हुई हमारे निकट आ रही है ॥ ५ ॥
काले खलु नृपः प्राप्तो जरासंधो महीपतिः ।
आवयोर्युद्धनिकषः प्रथमः समरातिथिः ॥ ६ ॥
'पृथ्वीपति जरासंध ठीक समयपर आ पहुँचा है। यह हम दोनोंके युद्धकी कसौटी तथा समराङ्गणका पहला अतिथि है ॥ ६ ॥
आर्य तिष्ठाव सहितावनुप्राप्ते महीपतौ ।
युद्धारम्भः प्रयोक्तव्यो बलं तावद्विमृश्यताम् ॥ ७ ॥
'आर्य ! उस राजाके आ जानेपर हम दोनो साथ ही रहे। युद्धका आरम्भ पीछे होगा । पहले उसकी सेना कितनी है, इसका विचार कर ले' ॥ ७ ॥
एवमुक्त्वा ततः कृष्णः स्वस्थः संग्रामलालसः ।
जरासंधबलं प्रेप्सुश्चकार बलदर्शनम् ॥ ८ ॥
ऐसा कहकर श्रीकृष्ण स्वस्थ-चित्तसे संग्रामकी लालसा रखकर जरासंधकी शक्तिका पता लगानेके लिये उसकी सेनाका निरीक्षण करने लगे ॥ ८ ॥
वीक्षमाणश्च तान् सर्वान् नृपान् यदुवरोऽव्ययः ।
आत्मनैवात्मनो वाक्यमुवाच हृदि मन्त्रवित् ॥ ९ ॥
अविनाशी यदुकुलतिलक मन्त्रवेत्ता श्रीकृष्ण उन सब राजाओंको देखकर अपने-आप ही मनमें इस प्रकार कहने लगे—॥ ९ ॥
इमे ते पृथिवीपालाः पार्थिवे वर्त्मनि स्थिताः ।
ये विनाशं गमिष्यन्ति शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ १० ॥
'ये हैं वे भूपाल, जो राजोचित मार्गपर स्थित हैं और शास्त्रोक्त विधिमे विनाशको प्राप्त होनेवाले हैं ॥ १० ॥
प्रोक्षितान् खल्विमान् मन्ये मृत्युना नृपपुङ्गवान् ।
स्वर्गगामीनि चाप्येषां वपूंषि प्रचकाशिरे ॥ ११॥
'मैं समझता हूँ कि मृत्युने रण-यज्ञकी आहुति बनानेके लिये इन श्रेष्ठ नरेशोंका प्रोक्षण किया है। इनके स्वर्गगामी शरीर भी प्रकाशित हो उठे हैं ॥ ११ ॥
स्थाने भारपरिश्रान्ता वसुधेयं दिवं गता ।
एषां नृपाणां मुख्यानां बलौघैरभिपीडिता ॥ १२ ॥
'यह पृथ्वी इन मुख्य-मुख्य नरेशोंके सैन्य-समुदायसे पीड़ित हो महान् भारसे थककर जो देवलोकमे गयी थी, वह इसका जाना उचित ही था ॥ १२ ॥
मही निरन्तरा चेयं बलराश्राभिसंवृता ।
स्वल्पेन खलु कालेन विविक्तं पृथिवीतलम् ॥ १३ ॥
भविष्यति नरेन्द्रौघैः शतशो विनिपातितैः ।
'इन राजाओके सैन्य-समुदायसे आवृत होकर यहाँकी भूमि ठसाठस भर गयी है। कहीं थोड़ा सा भी अवकाश नहीं रह गया है; परंतु थोड़े ही समयमें जब ये सैकड़ो नरेश सैन्यसहित मार गिराये जायेंगे, तब यह भूतल निर्जन-सा हो जायगा' ॥
वैशम्पायन उवाच
जरासंधस्ततः क्रुद्धः प्रभुः सर्वमहीक्षिताम् ॥ १४ ॥
नरधिपसहस्रौघैरनुयातो महाद्युतिः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर समस्त राजाओंका स्वामी महातेजस्वी जरासंध कुपित हो सहस्रों नरेश-समुदायोके साथ आगे बढ़ा ॥ १४ ½ ॥
व्यायतोद्रथतुरगैः सुयानैः सुसमाहितैः ॥ १५ ॥
रथैः सांग्रामिकैर्युक्तैरसङ्गतिभिः क्वचित् ।
कहीं सुन्दर ढंगसे सुसज्जित सुन्दर वाहन, रथ युद्धोपयोगी सामग्रियोंसे सम्पन्न थे। उनमें विशाल एवं प्रचण्ड वेगवाले अश्व जुते हुए थे। उन रथोंकी गति कहीं भी अवरुद्ध नहीं होती थी ( ऐसे रथोंद्वारा रथी योद्धा युद्धके लिये आगे बढ़ रहे थे ) ॥ १५ ½ ॥
हेमकक्षैर्महाघण्टैर्वारणैर्वारिदोपमैः ॥ १६ ॥
महामात्रोत्तमारूढैः कल्पितै रणकोविदैः ।
कहीं बहुसंख्यक हाथी चल रहे थे, जिन्हें सोनेकी जंजीरों-से कसा गया था। उनके दोनो ओर बड़े-बड़े घण्टे लटक रहे थे। वे हाथी काले मेघोंके समान प्रतीत होते थे। उनके ऊपर अच्छे महावत बैठे थे तथा रणकुशल योद्धाओंद्वारा उन्हे सुसज्जित किया गया था ( उन हाथियोंद्वारा गजारोही योद्धा आगे बढ़ रहे थे ) ॥ १६ ½ ॥
स्वारूढैः सादिभिर्युक्तैः प्रेङ्खमाणैः प्रवलिगतैः ॥ १७ ॥
३३८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
वाजिभिर्वायुसंकाशैः प्लवद्भिरिव पत्रिभिः।
कुछ घुड़सवार योद्धा घोड़ोंपर अच्छी तरहसे सवार थे। उनके वे घोड़े वायुके समान वेगशाली थे और उछलते-कूदते हुए आगे बढ़ते समय आकाशमें उड़ते हुए पक्षियोंके समान प्रतीत होते थे॥ १७३ ॥
खड्गचर्मधरोदग्रैः पत्तिभिर्बलिनां वरैः ॥ १८॥
सहस्रसंख्यासंयुक्तैरुत्पतद्भिरिवोरगैः ।
बलवानोंमें श्रेष्ठ पैदल सैनिक भी ढाल और तलवार लिये प्रचण्ड रूप धारण करके आगे बढ़ते थे। वे हजार-हजारकी टोलियोंमें एक साथ चलते थे और उछलते हुए सर्पोंके समान दिखायी देते थे ॥ १८३ ॥
एवं चतुर्विधैः सैन्यैः कम्पमानैरिवाम्बुदैः ॥ १९ ॥
नृपः प्रयातो बलवाञ्जरासंधो धृतव्रतः ।
इस प्रकार मँडराते हुए बादलोंके समान चतुरङ्गिणी सेनाएँ साथ लेकर वीरव्रतको धारण करनेवाला बलवान् राजा जरासंध युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था ॥ १९३ ॥
स रथैर्मेघनिर्घोषैर्गजैश्च मदसंयुतैः ॥ २० ॥
हेषमाणैश्च तुरगैः क्ष्वेडमानैश्च पत्तिभिः ।
नादयन्तो दिशः सर्वास्तस्याः पुर्या वनानि च ॥ २१ ॥
वह मेघके समान गम्भीर घर्घर घोष करनेवाले रथों, चिग्घाड़ते हुए मतवाले हाथियों, हिनहिनाते हुए घोड़ों तथा गर्जते हुए पैदल सैनिकोंद्वारा उस पुरीकी सम्पूर्ण दिशाओं तथा वनोंको कोलाहलपूर्ण बनाता हुआ आ रहा था ॥२०-२१॥
स राजा सागराकारः ससैन्यः प्रत्यदृश्यत ।
तद्वलं पृथिवीशानां हृष्टयोधजनाकुलम् ॥ २२ ॥
सेनाके साथ आता हुआ राजा जरासंध विशाल समुद्रके समान दिखायी देता था। भूमिपालोंकी वह सेना हृष्ट-पुष्ट योद्धाओंसे परिपूर्ण थी ॥ २२ ॥
क्ष्वेडितास्फोटितरवं मेघसैन्यमिवावभौ ।
रथैः पवनसम्पातैर्गजैश्च जलदोपमैः ।
तुरगैश्च जवोपेतैः पत्तिभिः खगमोपमैः ॥ २३ ॥
विमिश्रं सर्वतो भाति मत्तद्विपसमाकुलम् ।
घर्मान्ते सागरगतं यथाभ्रपटलं तथा ॥ २४ ॥
गर्जने और ताल ठोंकनेकी गम्भीर ध्वनिसे वह मेघोंकी गर्जती हुई घटाके समान प्रतीत होती थी। वायुके समान शीघ्रगामी रथों, मेघोंके सदृश दिखायी देनेवाले हाथियों, वेगशाली घोड़ों तथा आकाशचारी पक्षियोंके समान जान पड़नेवाले पैदल सैनिकोंसे मिश्रित हुई उस सेनाकी सब ओरसे बड़ी शोभा हो रही थी। मतवाले हाथियोंसे व्याप्त हुई वह विशाल वाहिनी वर्षा-ऋतुमे समुद्रके भीतर लक्षित होनेवाले मेघोंके समूहकी शोभा धारण करती थी ॥ २३-२४ ॥
सबलास्ते महीपाला जरासंधपुरोगमाः ।
परिवार्य पुरीं सर्वे निवेशायोपचक्रिरे ॥ २५ ॥
वे जरासंध आदि समस्त भूपाल अपनी सेनाके साथ मथुरापुरीको चारों ओरसे घेरकर छावनी डालनेकी तैयारी करने लगे ॥ २५ ॥
वभौ तस्य निविष्टस्य बलश्रीः शिविरस्य वै ।
शुक्लपर्यन्तपूर्णस्य यथा रूपं महोदधेः ॥ २६ ॥
वहाँ डेरा डाले हुए जरासंधके सैनिक-शिविरोंकी शोभा वैसी ही प्रतीत होती थी, जैसा कि शुक्लपक्षकी पूर्णिमाको अपनी उत्ताल तरङ्गोंसे परिपूर्ण हुए महासागरका रूप देखनेमें आता है ॥ २६ ॥
वीतरात्रे ततः काले समुत्तस्थुर्महीक्षितः ।
आरोहणार्थं पुर्यास्ते समीयुर्युद्धलालसाः ॥ २७ ॥
तदनन्तर रात बीतनेपर प्रातःकाल सब राजा उठे और युद्धकी लालसासे मथुरापुरीपर चढ़ाई करनेके लिये एकत्र होने लगे ॥ २७ ॥
समवायीकृताः सर्वे यमुनामनु ते नृपाः ।
निविष्टा मन्त्रयामासुर्युद्धकालकुतूहलाः ॥ २८ ॥
यमुनाके किनारे एकत्र होकर वे सभी नरेश बैठे और युद्धके शुभ अवसरके लिये उत्सुक हो आपसमें मन्त्रणा करने लगे ॥ २८ ॥
तेषां सुतुमुलः शब्दः शुश्रुवे पृथिवीक्षिताम् ।
युगान्ते भिद्यमानानां सागराणामिव स्वनः ॥ २९ ॥
सेनासहित उन नरेशोंकी तुमुल ध्वनि प्रलयकालमें मर्यादाको तोड़कर बहनेवाले समुद्रोंकी भयंकर गर्जनाके समान सुनायी देती थी ॥ २९ ॥
तेषां सकञ्चुकोष्णीषाः स्थविरा वेत्रपाणयः ।
चेरुर्मा शब्द इत्येवं वदन्तो राजशासनात् ॥ ३० ॥
उन राजाओंके छड़ीदार बूढ़े सिपाही चोगा और पगड़ी धारण किये तथा हाथमें बेंत लिये राजाज्ञासे यह कहते हुए विचरने लगे कि 'सब लोग मौन रहें। कोई एक शब्द भी न बोले' ॥ ३० ॥
तस्य रूपं बलस्यासीन्निःशब्दस्तिमितस्य वै ।
लीनमीनग्रहस्येव निःशब्दस्य यथोदधेः ॥ ३१ ॥
उस समय नीरव और निश्चल हुए उस सैन्यसमूहका रूप जिसके मत्स्य और ग्राह विलीन हो गये हों उस शब्दहीन शान्त महासागरके समान प्रतीत होता था ॥ ३१ ॥
निःशब्दस्तिमिते तस्मिन् योगादिव महार्णवे ।
जरासंधो वृहद् वाक्यं वृहस्पतिरिवाददे ॥ ३२ ॥
उस सैन्य-समुद्रके मानो योगबलसे सहसा नीरव तथा
विष्णुपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः [ ३३९
निश्चल हो जानेपर बृहस्पतिके समान नीतिमान् जरासंधने यह महत्त्वपूर्ण बात कही—॥ ३२ ॥
शीघ्रं समभिवर्तन्तां बलानि पृथिवीक्षिताम्।
सर्वतो नगरी चेयं जनौघैः परिवार्यताम् ॥ ३३ ॥
‘राजाओंकी सेनाएँ शीघ्र आक्रमण करें और इस मथुरानागरीको सब ओरसे सैनिक-समूहोंद्वारा घेर लें ॥ ३३॥
अश्मयन्त्राणि युज्यन्तां क्षेपणीयाश्च मुद्गराः।
कार्या भूमिः समा सर्वा जलौघैश्च परिप्लुता।
ऊर्ध्वं चापा निवाह्यन्तां प्रासा वै तोमरास्तथा ॥ ३४ ॥
‘पत्थरोंके गोले बरसानेवाले यन्त्र लगा दिये जायें। क्षेपणीय (गोफना या ढेलवाँस) तथा मुद्गर सँभाल लिये जायें। सारी भूमि समतल कर दी जाय और उसे जल-राशियोंसे आप्लावित किया जाय। धनुषोंको ऊपर उठा लेना चाहिये; प्रासों और तोमरोंको भी हाथमें ले लिया जाय ॥ ३४ ॥
दार्यतां चैव टङ्काद्यैः खनित्रैश्च पुरी द्रुतम्।
नृपाश्च युद्धमार्गज्ञा विन्यस्यन्तामदूरतः ॥ ३५ ॥
‘टंक आदिके द्वारा तथा खनित्रोंसे इस पुरीको तुरंत ही विदीर्ण कर दिया जाय। युद्धकी प्रणालीको जाननेवाले नरेशोंको उसके समीप ही यथास्थान खड़ा किया जाय ॥ ३५॥
अद्यप्रभृति सैन्यैर्मे पुरीरोधः प्रवर्त्यताम्।
यावदेतौ रणे गोपौ वसुदेवसुतावुभौ ॥ ३६ ॥
संकर्षणं च कृष्णं च घातयामि शितैः शरैः।
आकाशमपि बाणौघैर्निःसम्पातं यथा भवेत् ॥ ३७ ॥
‘आजसे मेरे सैनिकोंद्वारा मथुरापुरीपर घेरा डाल दिया जाय और उसे तबतक चालू रखा जाय, जबतक कि मैं युद्धमें इन दोनों ग्वालों वसुदेवपुत्र संकर्षण और कृष्णको अपने तीखे बाणोंद्वारा मार न डालूँ। उस समयतक आकाशको भी बाणसमूहोंसे इस तरह रूँध दिया जाय, जिससे पक्षी भी उड़कर बाहर न जा सके ॥ ३६-३७ ॥
मयानुशिष्टास्तिष्ठन्तु पुरीभूमिषु भूमिपाः।
तेषु तेष्ववकाशेषु शीघ्रमारुह्यतां पुरी ॥ ३८ ॥
‘मेरा अनुशासन मानकर समस्त भूपाल मथुरापुरीके निकटवर्ती भूभागोंमें खड़े रहें और जब जहाँ अवकाश मिल जाय, तब तहाँ शीघ्र ही पुरीपर चढ़ाई कर दें ॥ ३८ ॥
मद्रः कलिङ्गाधिपतिश्चेकितानः सबाह्लिकः।
काश्मीरराजो गोनर्दः करूषाधिपतिस्तथा ॥ ३९ ॥
द्रुमः किम्पुरुषश्चैव पर्वतीयो ह्यनामयः।
नगर्याः पश्चिमं द्वारं शीघ्रमारोधयन्त्विति ॥ ४० ॥
‘मद्रराज (शल्य), कलिङ्गराज श्रुतायु, चेकितान, बाह्लिक, काश्मीरराज गोनर्द, करूषराज दन्तवक्त्र तथा पर्वतीय प्रदेशके रोगरहित किन्नरराज द्रुम—ये शीघ्र ही मथुरापुरीके पश्चिम द्वारको रोक लें ॥ ३९-४० ॥
पौरवो वेणुदारिश्च वैदर्भः सोमदस्तथा।
रुक्मी च भोजाधिपतिः सूर्याक्षश्चैव मालवः ॥ ४१ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दन्तवक्त्रश्च वीर्यवान्।
छागलिः पुरमित्रश्च विराटश्च महीपतिः ॥ ४२ ॥
कौरव्यो मालवश्चैव शतधन्वा विदूरथः।
भूरिश्रवास्त्रिगर्तश्च वाणः पञ्चनदस्तथा ॥ ४३ ॥
उत्तरं नगरद्वारमेते दुर्गसहा नृपाः।
आरुह्य चाभिमर्दन्तां वज्रप्रतिमगौरवाः ॥ ४४ ॥
‘पूरुवंशी वेणुदारि, विदर्भदेशीय सोमक, भोजोंके अधिपति रुक्मी, मालवाके राजा सूर्याक्ष, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द, पराक्रमी दन्तवक्त्र, छागलि, पुरमित्र, राजा विराट, कुरुवंशी मालव, शतधन्वा, विदूरथ, भूरिश्रवा, त्रिगर्त, बाण और पञ्चनद—ये दुर्गका आक्रमण सह सकने-वाले नरेश मथुरा नगरके उत्तर द्वारपर चढ़ाई करके शत्रुओंको कुचल डालें। इनका गौरव वज्रके तुल्य है ॥ ४१-४४ ॥
उलूकः कैतवश्चैव वीरश्चांशुमतः सुतः।
एकलव्यो बृहत्क्षत्रः क्षत्रधर्मा जयद्रथः ॥ ४५ ॥
उत्तमौजाश्च शल्यश्च कौरवाः कैकयास्तथा।
वैदिशो वामदेवश्च सांकृतिश्च सिनीपतिः ॥ ४६ ॥
पूर्वं नगरनिर्व्यूहमेतेष्वायत्तमस्तु नः।
दारयन्तो विधावन्तु वाता इव वलाहकान् ॥ ४७ ॥
‘शकुनिपुत्र उलूक, अंशुमान्के पुत्र वीर एकलव्य, बृहत्क्षत्र, क्षत्रधर्मा, जयद्रथ, उत्तमौजा, शल्य, कुरुवंशी, केकयराजकुमार, विदिशाके राजा वामदेव तथा सिनीपति सांकृति—इन सबके अधीन मथुरापुरीका पूर्व द्वार कर दिया जाय। ये लोग जैसे वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार शत्रुओंको विदीर्ण करनेके लिये उनपर धावा बोल दें ॥ ४५-४७ ॥
अहं च दरदश्चैव चेदिराजश्च वीर्यवान्।
दक्षिणं नगरद्वारं पाल्यामः सुदंशिताः ॥ ४८ ॥
‘मैं, दरद तथा पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल कवच धारण करके नगरके दक्षिण द्वारका मोरचा सँभालेंगे ॥ ४८ ॥
एवमेषा पुरी क्षिप्रं समन्ताद् वेष्टिता बलैः।
वज्रावपातविभ्रमं प्राप्नोतु तुमुलं भयम् ॥ ४९ ॥
‘इस प्रकार हमारी सेनाओं द्वारा चारों ओरसे घिरी हुई यह नगरी मानो इसपर वज्रपात हो गया हो’ इस प्रकार विभ्रम एवं घोर भय प्राप्त करे ॥ ४९ ॥
गदिनो ये गदाभिस्ते परिघैः परिघायुधाः।
अपरे विविधैः शस्त्रैर्दारयन्तु पुरीमिमाम् ॥ ५० ॥
‘गदाधारी वीर गदाओंसे, परिघ चलानेवाले परिघोंसे
| ३४० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
तथा अन्य वीर नाना प्रकारके दूसरे शस्त्रोंसे इस पुरीको विदीर्ण कर डालें ॥ ५० ॥
अद्यैव नगरी ह्येषा विषमोच्छ्रायसंकटा ।
कार्या भूमिसमा सर्वा भवद्भिर्वसुधाधिपैः ॥ ५१ ॥
'आज ही आप सब भूपाल मिलकर ऊँचे-नीचे महलोंके समूहोंसे भरी हुई इस सारी नगरीको गर्दमें मिलाकर समतल भूमिके समान कर दें' ॥ ५१ ॥
चतुरङ्गबलैर्व्यूह्य जरासंधो व्यवस्थितः ।
अथाभ्ययाद् यदून् क्रुद्धैः सह सर्वैर्नराधिपैः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार आदेश दे चतुरङ्गिणी सेनाओंका व्यूह बनाकर जरासंध युद्धके लिये डट गया और क्रोधमें भरे हुए समस्त नरेशोंके साथ यादवोंपर चढ़ आया ॥ ५२ ॥
प्रतिजग्मुर्दशार्हास्तं व्यूढानीकाः प्रहारिणः ।
तद् युद्धमभवद् घोरं तेषां देवासुरोपमम् ।
अल्पानां बहुभिः सार्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् ॥ ५३ ॥
उस समय अपनी सेनाका व्यूह बनाकर प्रहारकुशल यादवोंने जरासंधका सामना किया। उनका वह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर प्रतीत होता था। यह थोड़ेसे योद्धाओंका बहुसंख्यक शत्रुओंके साथ युद्ध हुआ, जिसमें उभय पक्षके रथ और हाथी एक दूसरेसे सटकर जूझ रहे थे ॥ ५३ ॥
नगरान्निस्सृतौ दृष्ट्वा वसुदेवसुतावुभौ ।
क्षुभितं नृवरानीकं त्रस्तसम्मूढवाहनम् ॥ ५४ ॥
इसी समय वसुदेवके दोनों पुत्र श्रीकृष्ण और बलराम नगरसे बाहर निकले। उन्हें देखते ही उन श्रेष्ठ राजाओंकी विशाल वाहिनी क्षुब्ध हो उठी। उसके वाहन भयभीत और मोहाच्छन्न-से हो गये ॥ ५४ ॥
रथस्थौ दंशितौ चैव चेरतुस्तत्र यादवौ ।
मकराविव संरब्धौ समुद्रक्षोभणावुभौ ॥ ५५ ॥
कवच धारण करके रथपर बैठे हुए वे दोनों यादव-वीर वहाँ विचरने लगे, मानो क्रोधमें भरे हुए दो मगर समुद्रमें हलचल मचा रहे हों ॥ ५५ ॥
तयोः प्रयुध्यतोः संख्ये मतिरासीन्महात्मनोः ।
आयुधानां पुराणानामादानकृतलक्षणा ॥ ५६ ॥
उस संग्राममें जूझते हुए उन दोनों महात्मा वीरोंके मनमें यह संकल्प उठा, यदि हमारे पुरातन अस्त्र आ जाते तो हम उन्हें ही लेकर युद्ध करते ॥ ५६ ॥
ततः खान्निपतन्ति स्म दिव्यान्याहवसंप्लवे ।
लेलिहानानि दीप्तानि महान्ति सुदृढानि च ॥ ५७ ॥
उनके इतना सोचते ही उस युद्धमें आकाशसे वे दिव्य आयुध नीचे आने लगे। वे सब-के-सब सुदृढ़, महान् और देदीप्यमान थे तथा शत्रुओंको चाट जानेके लिये उद्यत दिखायी देते थे ॥ ५७ ॥
क्रव्यादाैरनुयातानि मूर्तिमन्ति बृहन्ति च ।
तृपितान्याहवे भोक्तुं नृपमांसानि वै भृशम् ॥ ५८ ॥
उनके पीछे मांसभक्षी भूत-प्रेत आदि भी आ रहे थे। वे दिव्य अस्त्र मूर्तिमान् एवं विशाल थे तथा युद्धमें आये हुए राजाओंके रक्त-मांसका उपभोग करनेके लिये मानो अत्यन्त भूखे-प्यासे थे ॥ ५८ ॥
दिव्यस्रग्दामधारीणि त्रासयन्ति च खेचरान् ।
प्रभया भासमानानि पतमानानि चाम्बरात् ॥ ५९ ॥
उन्होंने दिव्य फूलोंके हार धारण किये थे। अपनी प्रभासे प्रकाशित हो आकाशसे गिरते हुए ये दिव्यास्त्र आकाशचारी प्राणियोंके मनमें भय उत्पन्न करते थे ॥ ५९ ॥
हलं संवर्तकं नाम सौनन्दं मुसलं तथा ।
धनुषां प्रवरं शार्ङ्गं गदा कौमोदकी तथा ॥ ६० ॥
चत्वार्येतानि तेजांसि विष्णुप्रहरणानि च ।
ताभ्यां समवतीर्णानि यादवाभ्यां महामृधे ॥ ६१ ॥
संवर्तक नामक हल, सौनन्द नामक मूसल, धनुषोंमें श्रेष्ठ शार्ङ्ग तथा कौमोदकी गदा—भगवान् विष्णुके ये चार तेजस्वी आयुध उन दोनों भाइयोंके लिये यादवोंके उस महासमरमें उतर आये ॥ ६०-६१ ॥
जग्राह प्रथमं रामो ललामप्रतिमं हलम् ।
सर्पन्तमिव सर्पेन्द्रं दिव्यमालाकुलं मृधे ॥ ६२ ॥
बलरामजीने उस युद्धस्थलमें पहले सर्पराजके समान सर्पणशील (गतिमान्) तथा दिव्य मालाओंसे अलंकृत सुन्दर आकृतिवाले हलको (दाहिने हाथमें) ग्रहण किया ॥
सौनन्दं च ततः श्रीमान् निरानन्दकरं द्विषाम् ।
सव्येन सात्वतां श्रेष्ठो जग्राह मुसलोत्तमम् ॥ ६३ ॥
तदनन्तर यादवोंमें श्रेष्ठ श्रीमान् संकर्षणने शत्रुओंके आनन्दको हर लेनेवाले सौनन्द नामक श्रेष्ठ मूसलको बायें हाथसे ग्रहण किया ॥ ६३ ॥
दर्शनीयं च लोकेषु धनुर्जलदनिःस्वनम् ।
नाम्ना शार्ङ्गमिति ख्यातं कृष्णो जग्राह वीर्यवान् ॥ ६४ ॥
इसके बाद पराक्रमी श्रीकृष्णने मेघोंके समान गम्भीर घोष करनेवाले शार्ङ्ग नामक धनुषको ग्रहण किया, जो समस्त लोकोंमें दर्शनीय है ॥ ६४ ॥
देवैर्निगदितार्थस्य गदा तस्यापरे करे ।
निशिसा कुमुदाक्षस्य नाम्ना कौमोदकीति सा ॥ ६५ ॥
देवताओंग्रहने जिन्हें अपना प्रयोजन बताया था और जिनके नेत्र खिले हुए कुमुदके समान शोभा पाते हैं, उन भगवान्
विष्णुपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ३४१
श्रीकृष्णके दूसरे हाथमे वह सुप्रसिद्ध कौमोदकी गदा स्वतः आ गयी ॥ ६५ ॥
तौ सप्रहरणौ वीरौ साक्षाद् विष्णुतनुपमौ ।
समरे रामगोविन्दौ रिपूंस्तान् प्रत्ययुध्यताम् ॥ ६६ ॥
उन आयुधोंसे युक्त हो साक्षात् विष्णु-विग्रहके समान शरीरवाले दोनों वीर बलराम और श्रीकृष्ण समराङ्गणमें उन शत्रुओंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ६६ ॥
सायुधप्रग्रहौ वीरौ तावन्योन्याश्रयावुभौ ।
पूर्वजानुजसंज्ञौ तौ रामगोविन्दलक्षणौ ॥ ६७ ॥
द्विषत्सु प्रतिकुर्वाणौ पराक्रान्तौ यथेश्वरौ ।
विचेरतुर्यथा देवौ वसुदेवसुतावुभौ ॥ ६८ ॥
उन दिव्य आयुधोंको ग्रहण करके एक दूसरेको सहारा देनेवाले वे अग्रज और अनुजरूप दोनों वीर बन्धु श्रीबलराम और श्रीकृष्ण शत्रुओंका सामना करते हुए ईश्वरकोटिक महापुरुषोंके समान पराक्रम दिखाने लगे। वसुदेवके वे दोनों पुत्र रणभूमिमें देवताओंके समान विचरते थे ॥ ६७-६८ ॥
हलमुद्यम्य रामस्तु सर्पेन्द्रमिव कोपितः।
चचार समरे वीरो द्विषियामन्तको यथा ॥ ६९ ॥
वीर बलराम क्रोधमें भरकर सर्पराजके समान हल उठाये शत्रुओंके लिये कालरूप होकर समरभूमिमे विचर रहे थे ॥ ६९ ॥
विक्षिपन् रथवृन्दानि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।
चकार रोषं सफलं नागेषु च हयेषु च ॥ ७० ॥
वे महामनस्वी क्षत्रियोंके रथसमूहोंको पीछे ढकेलते हुए हाथियों और घोड़ोंपर अपना रोष सफल करने लगे ॥ ७० ॥
कुञ्जराल्लाङ्गलक्षितान् मुसलाक्षेपताडितान् ।
रामो विराजन् समरे निर्ममन्थ यथाचलान् ॥ ७१ ॥
बलरामजी गजराजोंको हलसे खींचकर उन्हें मूसलकी मारसे घायल करते हुए समराङ्गणमे अद्भुत शोभा पा रहे थे। उन्होंने पर्वतोंके समान हाथियोंको मथ डाला ॥ ७१ ॥
ते वध्यमाना रामेण रणे क्षत्रियपुङ्गवाः ।
जरासंधान्तिकं भीताः समरोत् प्रतिजग्मिरे ॥ ७२ ॥
रणभूमिमे बलरामजीके द्वारा मारे जाते हुए वे क्षत्रियशिरोमणि भयभीत हो समरसे पीछे हटकर जरासंधके पास भाग गये ॥ ७२ ॥
तानुवाच जरासंधः क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः ।
धिगेतां क्षत्रवृत्तिं वः समरे कातरात्मनाम् ॥ ७३ ॥
उस समय क्षत्रिय-धर्ममे स्थिर रहनेवाले जरासंधने उन क्षत्रियोंसे कहा—'अरे समराङ्गणमे कातर-हृदय होकर पीछे भागनेवाले तुम सब लोगोंकी इस क्षत्रिय-वृत्तिको धिक्कार है! ॥
परावृत्तस्य समरे विरथस्य पलायतः ।
भ्रूणहत्यामिवासह्यां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ७४ ॥
'जो क्षत्रिय संग्रामभूमिमें रथहीन होनेपर पीठ दिखाकर भागने लगता है, उसकी इस भीरुताको मनीषी पुरुष भ्रूण-हत्याके समान असह्य बताते हैं ॥ ७४ ॥'
भीताः कस्मान्निवर्तध्वं धिगेतां क्षत्रवृत्तित्ताम् ।
क्षिप्रं सर्वे निवर्तध्वं मम वाक्येन चोदिताः ॥ ७५ ॥
'योद्धाओ ! तुम भयभीत होकर युद्धसे पीछे क्यों हटते हो? तुम्हारी ऐसी क्षत्रियवृत्तिको धिक्कार है! मेरी वाणीसे प्रेरित हो तुम सब लोग शीघ्र ही युद्धभूमिको लौट जाओ ॥
अथवा तिष्ठत रथैः प्रेक्षकाः समवस्थिताः ।
यावदेतौ रणे गोपौ प्रेषयामि यमक्षयम् ॥ ७६ ॥
'अथवा रथोंके द्वारा दर्शक बनकर तटस्थ खड़े रहो, जबतक कि मैं रणभूमिमें इन ग्वालोंको मारकर यमलोक नहीं भेज देता हूँ' ॥ ७६ ॥
ततस्ते क्षत्रियाः सर्वे जरासंधेन नोदिताः ।
सृजन्तः शरजालानि हृष्टा योद्धुं व्यवस्थिताः ॥ ७७ ॥
तत्र जरासंधसे प्रेरित हो वे समस्त क्षत्रिय बाण-समूहोंकी वृष्टि करते हुए बड़े हर्षके साथ युद्धके लिये डट गये ॥७७॥
ते हयैः काञ्चनापीडै रथैश्चाम्बुदनादिभिः ।
नागैश्चाम्बुदसङ्काशैर्महामात्रप्रचोदितैः ॥ ७८ ॥
वे सोनेके आभूषणोंसे विभूषित हुए घोड़ों, मेघकी गर्जनाके समान घरघर ध्वनि फैलानेवाले रथों और महावतोंद्वारा हाँके गये मेघोंके समान काले गजराजोंद्वारा आगे बढ़कर युद्ध करने लगे ॥ ७८ ॥
सतनुत्राः सनिस्त्रिंशाः सपताकायुधध्वजाः ।
त्वारोपितधनुष्मन्तः सतूणीराः सतोमराः ॥ ७९ ॥
उन सबके शरीरमे कवच बँधे थे, सबने तलवारें ले रखी थीं, सभी ध्वजा-पताका और आयुधोंसे सम्पन्न थे, सभीके धनुष चढ़े हुए थे तथा सबने तरकस और तोमर ले रखे थे ॥ ७९ ॥
सच्छत्राः सादिनश्चैव चारुचामरवीजिताः ।
रणे तेऽधिगता रेजुः स्यन्दनस्था महीक्षितः ॥ ८० ॥
रथपर बैठे हुए उन राजाओंके ऊपर छत्र तने हुए थे, मनोहर चँवर डुलाये जाते थे। उनके साथ घुड़सवार भी थे। युद्धभूमिमें स्थित हुए वे सभी नरेश बड़ी शोभा पा रहे थे ॥
ते युद्धरागा रथिनो व्यगाहन्त युधां वराः ।
गदाभिश्चैव गुर्वीभिः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः ॥ ८१ ॥
योद्धाओंमे श्रेष्ठ उन रथी वीरोंका युद्धमें अनुराग था, इसलिये वे भारी गदाओं, क्षेपणीयों (गोफनों) तथा मुद्गरों- से विपक्षियोंको घायल करते हुए उनकी सेनाओंमे घुस गये।
३४२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश
एतस्मिन्नन्तरे तत्र देवानां नन्दिवर्धनः ।
सुपर्णध्वजमास्थाय कृष्णस्तु रथमुत्तमम् ॥ ८२ ॥
समभ्ययाज्जरासंधं शरैर्विव्याध चाष्टभिः ।
सारथिं चास्य विव्याध पञ्चभिर्निशितैः शरैः ॥ ८३ ॥
इसी बीचमें देवताओंका आनन्द बढ़ानेवाले भगवान् श्रीकृष्ण उत्तम गरुड़ध्वज रथपर आरूढ़ हो जरासंधपर चढ़ आये। उन्होंने आठ बाणोंसे उसको घायल कर दिया और पाँच पैने बाणोंद्वारा उसके सारथिको भी बींध डाला ॥
जघान तुरगांश्चाजौ यतमानस्य वीर्यवान् ।
तं कृच्छ्रगतमाज्ञाय चित्रसेनो महारथः ॥ ८४ ॥
सेनानीः कैशिकश्चैव कृष्णं विविध्यतुः शरैः ।
जरासंध बचनेका प्रयत्न करता ही रह गया, किंतु पराक्रमी श्रीकृष्णने रणभूमिमें उसके घोड़ोंको भी मार डाला। उसे संकटमें पड़ा जान महारथी चित्रसेन तथा सेनापति कैशिक दोनों आ पहुँचे और श्रीकृष्णको अपने बाणोंद्वारा घायल करने लगे ॥ ८४ ॥
त्रिभिर्विव्याध संसक्तं बलदेवं च कैशिकः ॥ ८५ ॥
बलदेवो धनुश्चास्य भल्लेनाजौ द्विधाकरोत् ।
जवेनाभ्यर्दयच्चापि तानरीञ्छरवृष्टिभिः ॥ ८६ ॥
कैशिकने लगातार तीन बाणोंसे बलरामजीको बींध दिया। तब बलरामने भी एक भल्ल मारकर युद्धमें उसके धनुषके दो टुकड़े कर डाले। साथ ही वेगपूर्वक बाणोंकी वर्षा करके उन तीनों शत्रुओंको पीड़ित कर दिया ॥ ८५-८६ ॥
बहुभिर्बहुधा वीरान् समन्तात् स्वर्णभूषणैः ।
तं चित्रसेनः संरब्धो विव्याध नवभिः शरैः ॥ ८७ ॥
कैशिकः पञ्चभिश्चापि जरासंधश्च सप्तभिः ।
उन्होंने बहुतसे स्वर्णभूषित बाणोंद्वारा उन वीरोंको सब ओरसे बारंबार घायल किया। तब क्रोधमें भरे हुए चित्रसेनने नौ, कैशिकने पाँच तथा जरासंधने सात बाणोंसे उनको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ८७ ॥
त्रिभिस्त्रिभिश्च नाराचैस्तान् विभेद जनार्दनः ॥ ८८ ॥
पञ्चभिः पञ्चभिश्चैव बलदेवः शितैः शरैः ।
यह देख श्रीकृष्णने तीन-तीन नाराचोंसे उन तीनोंको वेध डाला। फिर बलदेवने भी पाँच-पाँच पैने बाणोंसे उन सबको घायल कर दिया ॥ ८८ ॥
रथं चैवास्य चिच्छेद चित्रसेनस्य वीर्यवान् ॥ ८९ ॥
बलदेवो धनुश्चास्य भल्लेनाजौ द्विधाकरोत् ।
इसके बाद पराक्रमी बलरामने चित्रसेनके रथके टुकड़े-टुकड़े कर दिये तथा एक भल्ल मारकर युद्धस्थलमें उसके धनुषके भी दो खण्ड कर डाले ॥ ८९ ॥
स च्छिन्नधन्वा विरथो गदामादाय वीर्यवान् ॥ ९० ॥
अभ्यधावत् सुसंरब्धो जिघांसुर्मुसलायुधम् ।
धनुष और रथके नष्ट हो जानेपर रोषमें भरा हुआ पराक्रमी चित्रसेन मूसलधारी बलरामको मार डालनेकी इच्छा से हाथमें गदा लेकर उनकी ओर दौड़ा ॥ ९० ॥
सिखृक्षतस्तु नाराचांश्चित्रसेनवधैषिणः ।
धनुश्चिच्छेद रामस्य जरासंधो महाबलः ॥ ९१ ॥
यह देख बलराम चित्रसेनके वधकी इच्छासे उसपर नाराचोंकी वृष्टि करने लगे। इतनेहीमें महाबली जरासंधने बलरामजीके धनुषको काट दिया ॥ ९१ ॥
गदया च जघानाश्वान् क्रोधात् स मगधेश्वरः ।
रामं चाभ्यद्रवद् वीरो जरासंधो महाबलः ॥ ९२ ॥
साथ ही क्रोधपूर्वक गदाका प्रहार करके महाबली वीर मगधराज जरासंधने उनके घोड़ोंको कालके गालमें भेज दिया, फिर बलरामपर भी धावा किया ॥ ९२ ॥
आदाय मुसलं रामो जरासंधमुपाद्रवत् ।
तयोस्तद् युद्धमभवत् परस्परवधैषिणोः ॥ ९३ ॥
बलरामजी भी मूसल लेकर जरासंधपर टूट पड़े। एक दूसरेके वधकी इच्छावाले उन दोनों वीरोंमें घोर युद्ध होने लगा ॥ ९३ ॥
चित्रसेनस्तु संसक्तं दृष्ट्वा रामेण मागधम् ।
रथमन्यं समारुह्य जरासंधमवारयत् ॥ ९४ ॥
उधर चित्रसेन मगधराजको बलरामजीके साथ उलझा हुआ देख दूसरे रथपर चढ़कर आ गया और जरासंधको लड़नेसे रोकने लगा ॥ ९४ ॥
ततो बलेन महता गजानीकेन चाप्यथ ।
उभयोरन्तरे ताभ्यां संकुलं समपद्यत ॥ ९५ ॥
तदनन्तर वह विशाल गजसेनाके साथ जरासंध और बलरामके बीचमें आ गया और उन दोनों भाइयोंके साथ घोर युद्ध करने लगा ॥ ९५ ॥
ततः सैन्येन महता जरासंधोऽभिसंवृतः ।
रामकृष्णाग्रगान् भोजानाससाद महाबलः ॥ ९६ ॥
तब विशाल सेनासे घिरा हुआ महाबली जरासंध बलराम और श्रीकृष्णके अग्रगामी भोजोंपर जा चढ़ा ॥ ९६ ॥
तत्र प्रक्षुभितस्येव सागरस्य महास्वनः ।
प्रादुर्बभूव तुमुलः सेनयोरुभयोरपि ॥ ९७ ॥
फिर तो वहाँ उभय पक्षकी सेनाओंमें विक्षुब्ध महासागरके समान बड़ी भयंकर एवं भारी गर्जना सुनायी देने लगी ॥ ९७ ॥
वेणुभेरीमृदङ्गानां शङ्खानां च सहस्रशः ।
उभयोः सेनयो राजन् प्रादुरासीन्महास्वनः ॥ ९८ ॥