विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
विष्णुपर्व ] एकोनत्रिंशोऽध्यायः ३१५ और भी बहुत-से मञ्च थे, जो लकड़ियोंके ढेरसे आवद्ध थे। उनपर भी अच्छे बिछावन डाले गये थे। इस तरहके सैकड़ों-हजारों मञ्च वहाँ शोभा पा रहे थे ॥१२॥ उत्तमागारिकाश्चैव सूक्ष्मजालावलोकिनः । स्त्रीणां प्रेक्षागृहा भान्ति राजहंसा इवाम्बरे ॥ १३ ॥ घरोंके ऊपर जो घर थे, उनमें स्त्रियोंके लिये प्रेक्षागृह बने थे। उनके दरवाजोंपर महीन जालीदार परदा पड़ा था, जिससे वहाँ बैठे हुए लोग बाहरकी सारी वस्तुएँ देख सकते थे। वे प्रेक्षाभवन आकाशमें राजहंसोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ १३ ॥ प्राङ्मुखश्चारुनिर्मुको मेरुशृङ्गसमप्रभः । रुक्मपत्रनिभस्तम्भश्चित्रनिर्यूहशोभितः ॥ १४ ॥ प्रेक्षागारः स कंसस्य प्रचकाशेऽधिकं श्रिया । शोभितो माल्यदामैश्च निवासकृतलक्षणः ॥ १५ ॥ कंसके लिये जो प्रेक्षागार (दृश्य देखनेका स्थान ) बना था, वह अधिक शोभासे प्रकाशित हो रहा था। उसका दरवाजा पूर्वकी ओर था। उसपर मनोहर जालीदार पर्दा पड़ा था। वह भवन मेरुपर्वतके शिखरके समान सुनहरी प्रभासे उद्भासित होता था। उसके खम्भे स्वर्णपत्रसे जटिल होनेके कारण विशेष शोभासे सम्पन्न थे तथा वह भवन चारु चित्रोंके संनिवेशसे सुशोभित था। मालाओंकी लड़ियोंसे भी उसे सजाया गया था। राजाकी बैठक या निवास-स्थानके लिये जो आवश्यक लक्षण होने चाहिये, उन सबसे वह सम्पन्न था ॥ १४-१५ ॥ तस्मिन् नानाजनाकीर्णे जनौघप्रतिनादिते । समाजवाटे संस्तब्धे कम्पमानाणर्वप्रभे ॥ १६ ॥ राजा कुवलयापीडः समाजद्वारि कुञ्जरः । तिष्ठत्विति समाज्ञाप्य प्रेक्षागारमुपाययौ ॥ १७ ॥ नाना प्रकारके मनुष्योंसे भरा-पूरा और जनसमुदायके शब्दोंसे प्रतिध्वनित होता हुआ वह समाजवाट या रङ्गस्थल चञ्चल लहरोंवाले विक्षुब्ध महासागरके समान प्रतीत होता था। थोड़ी ही देरमें वहाँ सन्नाटा छा गया और 'कुवलया- पीड नामक हाथी रङ्गशालाके द्वारपर खड़ा रहे'—यह आज्ञा देता हुआ राजा कंस अपने प्रेक्षागारमें आ पहुँचा ॥१६-१७॥ स शुक्ले वाससी बिभ्रच्छुक्लव्यजनचामरः । शुशुभे श्वेतमुकुटः श्वेताभ्र इव चन्द्रमाः ॥ १८ ॥ उसने दो श्वेत वस्त्र धारण कर रखे थे। उसपर श्वेत चँवर और व्यजन डुलाये जा रहे थे तथा उसके मस्तकपर श्वेत मुकुट प्रकाशित होता था, अतः वह श्वेत बादलोंसे युक्त चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था ॥ १८ ॥ तस्य सिंहासनस्थस्य सुखासीनस्य धीमतः । रूपमप्रतिमं दृष्ट्वा पौराः प्रोचुर्जयाशिषः ॥ १९ ॥ जब वह सिंहासनपर सुखपूर्वक विराजमान हुआ, उस समय उस बुद्धिमान् नरेशके अनुपम रूपको देखकर समस्त पुरवासी उसकी 'जय' बोलते हुए उसे आशीर्वाद देने लगे ॥ ततः प्रविविशुर्मल्ला रङ्गमावलिताम्बराः । तिस्रश्च भागशः कक्षाः प्राविशन् बलशालिनः ॥ २० ॥ तदनन्तर मल्लोंने रङ्गभूमिमें प्रवेश किया। उनके कपड़े फहरा रहे थे। वे बलशाली मल्ल अलग-अलग तीन कक्षाओं- में प्रविष्ट हुए ॥ २० ॥ ततस्तूर्यनिनादेन क्ष्वेदितास्फोटितेन च । वसुदेवसुतौ दृष्टौ रङ्गद्वारमुपस्थितौ ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् वाद्योंकी तुमुल ध्वनिके साथ मल्लोंके गर्जने और ताल ठोंकनेके शब्द सुनायी देने लगे। इसी समय हर्षमें भरे हुए दोनों वसुदेव-पुत्र रङ्गशालाके द्वारपर उपस्थित हुए ॥ २१ ॥ बल्लवौ वस्त्रसंवीतौ सुरचन्दनभूषितौ । ऊर्ध्वपीडौ स्रगापीडौ बाहुशस्त्रकृतौ यमौ ॥ २२ ॥ आस्फोटयन्तावन्योन्यं बाहू चैवार्गलोपमौ । वे दोनों बन्धु ग्वालवालोंके ही वेषमें थे। उनके अङ्ग सुन्दर वस्त्रोंसे आच्छादित एवं सुशोभित थे। वे दिव्य चन्दन (अङ्गराग) से विभूषित थे। सिरके ऊपर पुष्पमाला और गलेमें गजरे शोभा दे रहे थे। उन्होंने अपनी भुजाओंको ही आयुध बना रखा था। वे दोनों जुड़वें-से जान पड़ते थे और एक दूसरेकी अर्गलाके समान मोटी बाँहोंपर ताल ठोंक रहे थे ॥ २२ ॥ तावापतन्तौ त्वरितौ प्रतिषिद्धौ वराननौ । तेन मत्तेन नागेन चोद्यमानेन वै भृशम् ॥ २३ ॥ वे दोनों सुन्दर मुखवाले वीर बड़ी उतावलीके साथ रङ्गशालाकी ओर आ रहे थे, किंतु महावतके द्वारा अत्यन्त प्रेरित किये गये उस मतवाले गजराजने उन्हें सहसा रोक दिया ॥ २३ ॥ स मत्तहस्ती दुष्टात्मा कृत्वा कुण्डलिनं करम् । चकार चोदितो यत्नं निहन्तुं बलकेशवौ ॥ २४ ॥ वह मदमत्त हाथी बड़ा ही दुष्ट था। महावतके हाँकने- पर उसने अपनी सूँड़को सिकोड़कर श्रीकृष्ण और बलरामको मार डालनेका प्रयत्न किया ॥ २४ ॥ ततः प्रहसितः कृष्णस्त्रास्यमानो गजेन वै । कंसस्य तन्मतं चैव जगर्हे स दुरात्मनः ॥ २५ ॥ उस हाथीके त्रास देनेपर श्रीकृष्ण हँस पड़े और दुरात्मा कंसके उस मनसूबेकी निन्दा करने लगे ॥ २५ ॥
३१६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
त्वरते खलु कंसोऽयं गन्तुं वैवस्वतक्षयम्।
यो मामनेन नागेन प्रधर्षयितुमिच्छति ॥ २६ ॥
वे बोले—'निश्चय ही जान पड़ता है कि यह कंस यमलोक-में जानेके लिये उतावला हो उठा है, इसीलिये इस हाथीके द्वारा वह मुझे कुचल देना चाहता है' ॥ २६ ॥
संनिकृष्टे ततो नागे गर्जमाने यथा घने।
सहसोत्पत्य गोविन्दश्चक्रे तालस्वनं प्रभुः ॥ २७ ॥
तदनन्तर मेघके समान गम्भीर गर्जना करता हुआ वह हाथी जब बहुत निकट आ गया, तब भगवान् गोविन्द सहसा उछलकर ताली पीटने लगे ॥ २७ ॥
क्ष्वेडितास्फोटितरवं कृत्वा नागस्य चाग्रतः।
करं ससीकरं तस्य प्रतिजग्राह वक्षसा ॥ २८ ॥
हाथीके सामने ही गर्जने और ताल ठोंकनेकी आवाज करके उन्होंने जलके फुहारे छोड़नेवाली उसकी सूँड़को अपनी छातीपर दबा लिया ॥ २८ ॥
विषाणान्तरगो भूत्वा पुनश्चरणमध्यगः।
बबाधे तं गजं कृष्णः पवनस्तोयदं यथा ॥ २९ ॥
फिर श्रीकृष्ण उसके दोनों दाँतोंके बीचसे होकर पैरोंके मध्यभागमें आ गये और जैसे हवा बादलोंको इधर-उधर उड़ाती रहती है, उसी प्रकार वे उस हाथीको सताने और व्याकुल करने लगे ॥ २९ ॥
स हस्ताग्राद् विनिष्क्रान्तो विषाणाग्राच्च दन्तिनः।
विमुक्तः पदमध्याच्च कृष्णो द्विपमपोधयत् ॥३०॥
वे उस हाथीकी सूँड़के अग्रभागसे निकलकर, दाँतोंके भी अग्रभागसे बचकर तथा पैरोंके भी बीचसे छूटकर बाहर आ गये। फिर श्रीकृष्णने उस हाथीको पीछेसे ऊँचाईकी ओर खींचकर घसीटना आरम्भ किया ॥ ३० ॥
सोऽतिकायस्तु संमूढो हन्तुं कृष्णमशक्नुवन् ।
गजः स्वेष्वेव गात्रेषु मथ्यमानो ररास ह ॥३१॥
वह विशालकाय हाथी व्याकुल हो उठा और श्रीकृष्णको मारनेमें असफल हो अपने ही अङ्गोंमें मथित होता हुआ जोर-जोरसे चिग्घाड़ने लगा ॥ ३१ ॥
पपात भूमौ जानुभ्यां दशनाभ्यां तुतोद च।
मदं सुस्राव रोषाच्च घर्मापाये यथा घनः ॥ ३२ ॥
फिर तो वह दोनों घुटनोंके बल गिर पड़ा, दोनों दाँत भूमिसे टकरा जड़से हिल गये, जिससे उसको बड़ी व्यथा हुई। वह रोषसे मदकी धारा बहाने लगा, मानो पावसमें मेघ पानी बरसा रहा हो ॥ ३२ ॥
कृष्णस्तु तेन नागेन क्रीडित्वा शिशुलीलया।
निधनाय मतिं चक्रे कंसद्विष्टेन चेतसा ॥ ३३ ॥
श्रीकृष्णने उस हाथीके साथ बालकोंके समान खिलवाड़ करके कंसके प्रति मनमें द्वेष लेकर कुवलयापीडको मार डालने का विचार किया ॥ ३३ ॥
स तस्य प्रमुखे पादं कृत्वा कुम्भादनन्तरम्।
दोर्भ्यां विषाणमुत्पाट्य तेनैव प्राहरत् तदा ॥ ३४ ॥
उन्होंने उसके ललाटमें कुम्भस्थलसे नीचे पैर लगाकर दोनों हाथोंसे एक दाँत उखाड़ लिया और उस समय उसीसे उसको पीटना आरम्भ किया ॥ ३४ ॥
स तेन वज्रकल्पेन स्वेन दन्तेन कुञ्जरः।
हन्यमानः शकृन्मूत्रं सुमोचार्तो ररास ह ॥ ३५॥
उस वज्रतुल्य दाँतसे पीटा जाता हुआ वह हाथी मल-मूत्र त्यागने और आर्तभावसे चीत्कार करने लगा ॥ ३५ ॥
कृष्णजर्जरिताङ्गस्य कुञ्जरस्यार्तचेतसः।
कटाभ्यामति सुस्राव वेगवद् भूरि शोणितम् ॥ ३६ ॥
श्रीकृष्णने जिसके अङ्गोंको पीट-पीटकर जर्जर बना दिया था, उस आर्तचित्त हाथीके दोनों गालोंसे वेगपूर्वक भूरि-भूरि रक्तकी धारा बहने लगी ॥ ३६ ॥
लाङ्गूलं चास्य वेगेन निष्प्रकर्ष हलायुधः।
शैलपृष्ठार्धसंलीने वैनतेय इवोरगम् ॥ ३७ ॥
इधर बलरामजी उसकी पूँछ पकड़कर बड़े वेगसे खींचने लगे, मानो शिलापृष्ठमें आधे शरीरसे छिपे हुए किसी सर्पको गरुड़ खींच रहे हों ॥ ३७ ॥
तेनैव गजदन्तेन कृष्णो हत्वा तु दन्तिनम्।
जघानैकप्रहारेण गजारोहणमुल्बणम् ॥ ३८ ॥
हाथीको मारकर श्रीकृष्णने उसके उसी दाँतसे एक प्रहार करके मतवाले महावतको भी मौतके मुखमें डाल दिया ॥ ३८ ॥
सोऽऽर्तनादं महत् कृत्वा विदन्तो दन्तिनां वरः।
पपात सहमामात्रो वज्रभिन्न इवाचलः ॥ ३९ ॥
तदनन्तर दाँतवाले हाथियोंमें श्रेष्ठ वह कुवलयापीड दन्तहीन हो महान् आर्तनाद करके वज्रसे विदीर्ण हुए पर्वतके समान महावतसहित गिर पड़ा ॥ ३९ ॥
ततस्तौ तोरणाङ्गानि प्रगृह्य रणकर्कशौ।
गजस्य पादरक्षांश्च जघ्नतुः पुरुषर्षभौ ॥ ४० ॥
फिर उन दोनों पुरुषप्रवर रणकर्कश वीरोंने फाटकके खम्भे आदि लेकर हाथीके पादरक्षकोंको भी मार डाला ॥४०॥
तांश्च हत्वा विविशतुर्मध्यं रङ्गस्य तावुभौ।
नासत्यावश्विनौ स्वर्गादवतीर्णाविवેચ્છया ॥ ४१ ॥
उन सबका संहार करके वे दोनों भाई रङ्गस्थलमें प्रविष्ट हुए, मानो दोनों अश्विनीकुमार इच्छानुसार स्वर्गसे भूतलपर उतर आये हों ॥ ४१ ॥
विष्णुपर्व ] त्रिंशोऽध्यायः ३१७ वृष्ण्यन्धकाश्च भोजाश्च ददृशुर्वनमालिनौ । पौराणामनुरागं च हर्षं चालक्ष्य भारत ॥ ४३ ॥ क्ष्वेडितोत्कृष्टनादेन बाहोरास्फोटितेन च । भारत ! व्यर्थ बुद्धिवाला भोजराज कंस उन दोनों सिंहनादैश्च तालैश्च हर्षयामासुतूर्जनम् ॥ ४२ ॥ भाइयोंको उपस्थित देख, उनके प्रति पुरवासियोंके अनुराग उस समय वृष्णि, अन्धक तथा भोजकुलके यादवोंने और हर्षको लक्ष्य करके विषादमें डूब गया ॥ ४३ ॥ वनमालाधारी श्रीकृष्ण-बलरामको देखा । उन दोनों वीरोंने तं हत्वा पुण्डरीकाक्षो नदन्तं दन्तिनां वरम् । गर्जने, किलकारने, भुजाओंपर ताल ठोकने, सिंहोंके समान अवतीर्णोऽर्णवाकारं समाजं सहपूर्वजः ॥ ४४ ॥ दहाड़ने और ताली पीटने आदिके द्वारा वहाँके जनसमुदायको इस प्रकार कमलनयन श्रीकृष्णने गरजते हुए गजश्रेष्ठ हर्षसे उत्फुल्ल कर दिया ॥ ४२ ॥ कुवलयापीडको मारकर अपने पूर्वज बलरामजीके साथ तौ दृष्ट्वा भोजराजस्तु विषसाद वृथामतिः । उस समुद्रके समान विशाल जनसमुदायमें प्रवेश किया ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कुवलयापीडवधे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कुवलयापीड हाथीका वधविषयक उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥ त्रिंशोऽध्यायः रङ्गशालामें मल्लयुद्धके विषयमें श्रीकृष्णके विचार, श्रीकृष्ण और बलदेवके द्वारा चाणूर और मुष्टिक आदिका वध, कंसका संहार तथा पिता-माताके चरणोंमें प्रणाम करके दोनों भाइयोंका उनके घरमें जाना वैशम्पायन उवाच भुजासक्तेन शुशुभे गजदन्तेन केशवः । प्रविशन्तं तु वेगेन मारुतावलिताम्बरम् । चन्द्रार्धविम्बसंसक्तो यथैकशिखरो गिरिः ॥ ५ ॥ पूर्वजं पुरतः कृत्वा कृष्णं कमललोचनम् ॥ १ ॥ अपने हाथमें सटे हुए उस गजदन्तसे सुशोभित होने- गजदन्तकृतोल्लेखं सुभुजं देवकीसुतम् । वाले श्रीकृष्ण अर्धचन्द्रके विम्बसे संयुक्त हुए एक शिखर- लीलाकृताङ्गदं वीरं मदेन रुधिरेण च ॥ २ ॥ वाले पर्वतके समान जान पड़ते थे ॥ ५ ॥ वल्गमानं यथा सिंहं व्यूहमानं यथा घनम् । वल्गामाने तु गोविन्दे स कृत्स्नो रङ्गसागरः । बाहुशब्दप्रहारेण चालयन्तं वसुंधराम् ॥ ३ ॥ जनौघप्रतिनादेन पूर्यमाण इवावभौ ॥ ६ ॥ औग्रसेनिः समालोक्य दन्तिदन्तोद्यतायुधम् । श्रीकृष्णके उछलते-कूदते आते ही वह समुद्र-जैसा सम्पूर्ण कृष्णं भृशायस्तमुखः सरोषं समुदैक्षत ॥ ४ ॥ रंगस्थल जनसमुदायके हर्षनादसे परिपूर्ण हुआ-सा प्रतीत होने वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कमलनयन लगा ॥ ६ ॥ श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलरामको आगे करके बड़े वेगसे ततः क्रोधाभिताम्राक्षः कंसः परमकोपनः । रंगशालामें घुसे थे। उस समय उनके वस्त्र हवाके झोंकेसे चाणूरमादिशद् युद्धे कृष्णस्य सुमहाबलम् ॥ ७ ॥ फहरा उठे थे। हाथीका दाँत उनकी पहचान करानेवाला अन्ध्रं मल्लं च निकृतिं मुष्टिकं च महाबलम् । चिह्न या उपलक्षण बन गया था। उनकी भुजाएँ बड़ी सुन्दर बलदेवाय संक्रोधो दिदेशाद्रिच्योपमम् ॥ ८ ॥ थीं। देवकीनन्दन वीर श्रीकृष्णकी बाहोंमे हाथीके मद और तदनन्तर क्रोधसे लाल आँखें किये परम क्रोधी कंसने रुधिर इस तरह लिपटे थे कि उनमें लीलापूर्वक अङ्गद (बाजू- महाबली अन्ध्र मल्ल चाणूरको जो कपटयुद्ध करनेवाला था, बंद) की रचना हो गयी थी। वे सिंहकी तरह उछलते तथा श्रीकृष्णके साथ लड़नेका आदेश दिया और जिसका शरीर कंसवधकी युक्ति सोचते हुए आकाशमें बादलकी भाँति रंग- प्रस्तरसमूहके समान सुदृढ़ था, उस कपटी महाबली मुष्टिक- शालामें विचर रहे, थे। भुजाओपर ताल ठोककर जब वे को रोषमें भरे हुए कंसने बलदेवके साथ जूझनेकी उसकी ध्वनि फैलाते थे, तब पृथ्वीको भी हिला देते थे। उन्हे आज्ञा दी ॥ ७-८ ॥ हाथीके दाँतको ही आयुध रूपसे हाथमें लिये देख उग्रसेन- कंसेनापि समाजस्थाश्चाणूरः पूर्वमेव तु । कुमार कंस अत्यन्त मलिन हो गया और वह बड़े रोषमें योद्धव्यं सह कृष्णेन त्वया यत्नवतेति वै ॥ ९ ॥ भरकर उनकी ओर देखने लगा ॥ १-४ ॥
३१८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे कंसने चाणूरको तो पहलेसे ही यह आज्ञा दे रखी थी, कि तुम्हें श्रीकृष्णके साथ यत्नपूर्वक युद्ध करना चाहिये ॥९॥ स रोषेण तु चाणूरः कषायीकृतलोचनः । अभ्यावर्तत युद्धार्थमपां पूर्णो यथा घनः ॥ १० ॥ अतः रोषसे लाल आँखें किये चाणूर युद्ध करनेके लिये श्रीकृष्णके निकट आया। उस समय वह जलसे भरे-पूरे मेघके समान जान पड़ता था ॥ १० ॥ अवघुष्टे समाजे तु निश्शब्दस्तिमिते जने । यादवाः सहितास्तत्र इदं वचनमब्रुवन् ॥ ११ ॥ राजाकी ओरसे शान्त रहनेकी घोषणा होते ही वहाँ- का सारा जनसमुदाय नीरव तथा निश्चल हो गया, तब वहाँ एक साथ बैठे हुए यादव इस प्रकार कहने लगे - ॥११॥ बाहुयुद्धमिदं रंगे सप्राश्निकमकातरम् । क्रियावलसमाज्ञातमशस्त्रं निर्मितं पुरा ॥ १२ ॥ 'पूर्वकालमें विधाताने मल्लयुद्धके विषयमें यह नियम बनाया था कि यह युद्ध रङ्गस्थलके अखाड़ेमें केवल भुजाओं द्वारा हो । इसमें किसी प्रकारके अस्त्र-शस्त्रका प्रयोग न किया जाय। इसमे (दो व्यक्तियोंका जोड़ निश्चित करनेके लिये ) कोई-न-कोई परीक्षक रहना चाहिये। इसमें कायर या डरपोकको सम्मिलित नहीं करना चाहिये। इसमें क्रिया ( दाँव-पेंच आदि ) और बल (शारीरिक शक्ति ) के द्वारा ही विपक्षीको परास्त करनेकी आज्ञा दी गयी है ॥ अद्भिश्चातिश्रमो नित्यं विनेयः कालदर्शिभिः । करीषेण च मल्लस्य सततं सक्रिया स्मृता ॥ १३ ॥ 'समयोचित कर्तव्यको देखने और समझनेवाले पुरुषोंको उचित है कि वे सदा योद्धाओंके लिये जल प्रस्तुत करके उनकी भारी थकावट दूर करें और गोबरका चूर्ण सुलभ करके पहलवानका सदा सत्कार करना चाहिये ॥ १३ ॥ स्थितो भूमिगतेनैव यो यथा मार्गतः स्थितः । संयुज्यतश्च पर्यायः प्राश्निकैः समुदाहृतः ॥ १४ ॥ 'युद्धपरीक्षकोंने यह बताया है कि जो जिस मार्ग (दाँव-पेंच) से लड़े, उसके साथ उसीके अनुरूप दाँव लगाकर भूमिपर खड़े हुएके साथ खड़ा होकर ही लड़ना चाहिये और एक-एक योद्धाको क्रमशः एक-एकके साथ ही लड़ाना चाहिये॥ १४ ॥ बालो वा यदि वा वृद्धो मध्यो वापि कृशोऽपि वा । बलस्थो वा स्थितो रंगे ज्ञेयः कक्षान्तरेण वै ॥१५॥ 'कोई बालक हो, वृद्ध हो, मध्य अवस्थाका हो, दुर्बल हो, अथवा बलवान् हो, वह यदि अखाड़ेमें उतरे तो उसके जोड़का विचार उसीकी कक्षाके लोगोंमेंसे ही करना चाहिये ॥ १५ ॥ वलतश्च क्रियातश्च बाहुयुद्धविधिर्भुवि । • निपातानन्तरं किंचिन्न कर्तव्यं विजानता ॥ १६ ॥ 'शारीरिक बल और क्रिया ( दाँव-पेंच ) से ही बाहुयुद्ध करनेका विधान है। विज्ञ पुरुषको चाहिये कि प्रतिद्वन्द्वीको गिरा देनेके बाद उसके साथ और कुछ न करे ॥ १६ ॥ तदिदं प्रस्तुतं रंगे युद्धं कृष्णान्ध्रमल्लयोः । बालः कृष्णो महानन्ध्रः कथं न स्याद् विचारणा ॥ १७ ॥ 'इस समय रंगस्थलमे श्रीकृष्ण और अन्ध्र मल्ल चाणूर- का युद्ध प्रस्तुत है, परंतु इनमें श्रीकृष्ण तो अभी बालक हैं और यह चाणूर विशालकाय पहलवान है, इस विषमतापर विचार क्यों नहीं किया जाता ?' ॥ १७ ॥ ततः किलकिलाशब्दः समाजे समजायत । प्रावल्गत च गोविन्दो वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ १८ ॥ यह सुनकर उस जनसमाजमे कोलाहल मच गया। तब भगवान् श्रीकृष्ण उछल पड़े और इस प्रकार बोले- ॥१८॥ अहं बालो महानन्ध्रो वपुषा पर्वतोपमः । युद्धं ममानेन सह रोचते बाहुशालिना ॥ १९ ॥ 'मैं बालक हूँ और यह महामल्ल अन्ध्र शरीरसे पर्वत- जैसा दिखायी देता है, तथापि इस बाहुशाली वीरके साथ मेरा युद्ध हो, यह मुझे पसंद है ॥ १९ ॥ युद्धव्यतिक्रमः कश्चिन्न भविष्यति मत्कृतः । न ह्यहं बाहुयोधानां दूषयिष्यामि यन्मतम् ॥ २० ॥ 'मेरी ओरसे युद्धसम्बन्धी नियमका कोई उल्लङ्घन नहीं होगा। बाहुयुद्ध करनेवाले योद्धाओंका जो मत है, उसे मैं कलंकित नहीं करूँगा ॥ २० ॥ योऽयं करीषधर्मश्च तोयधर्मश्च रंगजः । कषायस्य च संसर्गः समयो ह्येष कल्पितः ॥ २१ ॥ 'गोवरके चूर्णको उबटनके समान शरीरमें मलना, जल- से धोना और गेरूके रंगका लेपन करना रंगस्थल (अखाड़ेमें. उतरनेवालों) का धर्म है, यह मह्लोंका बनाया हुआ आचार है ॥ २१ ॥ संयमः स्थिरता शौर्यं व्यायामः सक्रिया बलम् । रंगे च नियता सिद्धिरेतद् युद्धविदां मतम् ॥२२॥ 'संयम ( एक दूसरेको पीछे हटाना ), स्थिरता ( अपने स्थानसे न हटना ), शौर्य, व्यायाम ( स्थिर रहते हुए भी हाथ-पैर चलाना ), सक्रिया ( सद् बर्ताव - मर्मस्थानोंमें चोट न पहुँचाना), असद् व्यवहारसे बचते हुए भी अधिक-से-अधिक बल प्रकट करना, इन छः साधनोंके द्वारा रङ्गभूमिमे विजय- रूप सिद्धिका प्राप्त होना निश्चित है; यह मल्लयुद्धके विद्वानों- का मत है ॥ २२ ॥
[ विष्णुपर्व ] त्रिंशोऽध्यायः ३१९
अवैरेमेवं यदयं सवैरं कर्तुमुद्यतः।
अत्र वै निग्रहः कार्यस्तोपयिष्याम्यहं जगत् ॥ २३ ॥
‘यह (चाणूर अथवा कंस) इस वैररहित युद्धको भी वैरयुक्त कर देनेपर तुला हुआ है, अतः यहाँ इसका निग्रह करना आवश्यक है, ऐसा करके मैं सम्पूर्ण जगत्को संतुष्ट करूँगा ॥ २३॥
करूषेषु प्रसूतोऽयं चाणूरो नाम नामतः।
बाहुयोधी शरीरेण कर्मभिश्चात्र चिन्त्यताम् ॥ २४ ॥
‘यह चाणूर नामक बाहुयोधी मल्ल करूष देशमें उत्पन्न हुआ है। इसके शरीर और कर्मसे जो घटनाएँ घटित हुई हैं, उनपर भी आपलोग विचार कर लें ॥ २४ ॥
एतेन बहवो मल्ला निपातानन्तरं हताः।
रङ्गप्रतापकामेन मल्लमार्गश्च दूषितः ॥ २५ ॥
‘इसने रंगभूमिमें अपना प्रताप प्रकट करने या दबदबा जमानेकी इच्छासे बहुतेरे पहलवानोंको भूमिपर गिरानेके बाद मार डाला और इस प्रकार मल्ल-मार्गको कलंकित किया है ॥ २५॥
शस्त्रसिद्धिस्तु योधानां संग्रामे शस्त्रयोधिनाम्।
रङ्गसिद्धिस्तु मल्लानां प्रतिमल्लनिपातजा ॥ २६ ॥
‘शस्त्रद्वारा युद्ध करनेवाले योद्धाओंके लिये संग्राममें शत्रुको विदीर्ण कर देना ही सिद्धि है, परंतु मल्लोंकी प्रतिद्वन्द्वी मल्लको गिरा देनेमात्रसे ही रंगस्थलमे विजयरूप सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥ २६ ॥
रणे विजयमानस्य कीर्तिर्भवति शाश्वती।
हतस्यापि रणे शस्त्रैर्नाकपृष्ठं विधीयते ॥ २७ ॥
‘शस्त्रयुद्धमे विजय पानेवालेको अक्षय कीर्ति प्राप्त होती है। यदि वह रणक्षेत्रमे शस्त्रोंद्वारा मारा गया तो भी उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है ॥ २७ ॥
रणे ह्युभयतः सिद्धिर्हतस्येह मृतोऽपि वा।
सा हि प्राणान्तिकी यात्रा महद्भिः साधुपूजिता ॥ २८ ॥
‘शस्त्रयुद्धमें मारे जानेवालेकी तथा मारनेवाले दोनोंकी ही सिद्धि प्राप्त होती है, क्योंकि वह प्राणान्तक यात्रा है, जिसकी महान् पुरुषोंने भलीभाँति पूजा (प्रशंसा) की है ॥ २८ ॥
अयं तु मार्गो बलतः क्रियातश्च विनिःसृतः।
मृतस्य रङ्गे क्व स्वर्गो जयतो वा कुतो रतिः ॥ २९ ॥
‘परंतु यह मल्ल-युद्धका मार्ग शारीरिक बल और दाँव-पेंचके कौशलसे प्रकट हुआ है। अखाड़ेमे मरनेवालेको कहाँ स्वर्ग मिलता है ? अथवा जीतनेवालेको कहाँका सुख प्राप्त होता है ? ॥ २९ ॥
ये तु केचित् स्वदोषेण राज्ञः पण्डितमानिनः।
प्रतापार्थे हता मल्ला मल्लहन्तुर्वधो हि सः ॥ ३० ॥
‘किसी पण्डितमानी राजाका प्रताप बढ़ानेके लिये जो कोई भी मल्ल किसी पहलवानके द्वारा अपने अपराधसे मारे गये हैं, वहाँ उस मल्ल-हत्यारेको हत्याजनित पाप ही लगता है'॥ ३०॥
एवं संजल्पतस्तस्य ताभ्यां युद्धं सुदारुणम्।
उभाभ्यामभवद् घोरं वारणाभ्यां यथा वने ॥ ३१ ॥
जब श्रीकृष्ण ऐसा कह रहे थे, उसी समय उनमें और चाणूरमें—दोनोंमें ही अत्यन्त दारुण एवं भयानक युद्ध होने लगा, जैसे वनमें दो हाथी लड़ पड़ें ॥ ३१ ॥
कृतप्रतिकृतैश्चित्रैर्बाहुभिश्च सकण्ठकैः।
सन्निपातादवधूतैश्च प्रमाथोन्मंथनैस्तथा ॥ ३२ ॥
उनमेसे जब एक-दूसरेका कोई अङ्ग जोरसे दबाता, तब दूसरा तुरंत उसका प्रतीकार करता—उस अङ्गको उसकी पकड़से छुड़ा लेता था। दोनों एक-दूसरेके हाथोंको मुष्टीसे पकड़कर विवश कर देते और विचित्र ढंगसे परस्पर प्रहार करते थे। दोनों ही एक-दूसरेको अपनी भुजाओंमे बाँधकर रोक लेते, कभी दोनों आपसमें गुँथ जाते और फिर, धक्के देकर दूर हटा देते थे। कभी एक दूसरेको जमीनपर पटककर रगड़ता तो दूसरा नीचेसे ही कुलँचकर ऊपरवालेको दूर फेंक देता, या लिये-दिये खड़ा हो अपने शरीरसे दबाकर उसके अङ्गोंको भी मथ डालता था ॥ ३२ ॥
तावुभावपि संश्लिष्टौ यथा शैलमयौ तथा।
क्षेपणैर्मुष्टिभिश्चैव वराहोद्धर्तनैःस्वनैः ॥ ३३ ॥
वे दोनों ही एक-दूसरेसे सटकर ऐसे जान पड़ते थे, मानो दो पर्वत परस्पर भिड़ गये हों। कभी दोनों दोनोंको बलपूर्वक पीछे हटाते और मुक्कोसे एक-दूसरेकी छातीपर चोट करते थे, कभी एकको दूसरा अपने कंधेपर उठा लेता और उसका मुँह नीचे कर घुमाकर पटक देता था, जिससे ऐसा शब्द होता, मानो किसी शूकरने चोट की हो ॥ ३३ ॥
कीलैर्वज्रनिपातैश्च प्रसृष्टाभिस्तथैव च।
शलाकानखपातैश्च पादोद्धूतैश्च दारुणैः ॥ ३४ ॥
१. प्रमाथ तथा उन्मथन आदि मल्ल-युद्धके दाँव-पेंचोंके नाम हैं। मल्ल-शास्त्रके अनुसार इनके लक्षण नीचे दिये जाते हैं। इनका भाव मूलश्लोकके अनुवादमें आ गया है—
निपात्य पेषणं भूमौ प्रमाथ इति कथ्यते।
यत् त्वायाताङ्गमथनं तदुन्मथनमुच्यते ॥
२. क्षेपणं कथ्यते यत् तु स्थानात् प्रच्यावनं हठात् ॥
३. उभयोर्भुजयोर्मुष्टिरुरोमध्ये निपात्यते ।
मुष्टिरित्युच्यते तज्ज्ञैर्मल्लविद्याविशारदैः ॥
४. अवाङ्मुखं स्कन्धगतं भ्रामयित्वा तदैव यः।
क्षिप्तस्य शब्दः स भवेद् वराहोद्धूतिःस्वनः ॥
५. अङ्गुल्यः प्रसृतायास्तु ताः प्रसृष्टा उदीरिताः ॥
| ३२० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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कभी वे दोनों योद्धा एक-दूसरेके शरीरपर कोहनियों और घुटनोंसे चोट करते थे, कभी हाथकी अँगुलियोंको फैलाकर एक दूसरेको पीटते थे, कभी आपसमें पंजे लड़ाते थे, कभी रोषपूर्वक अँगुलियोंके नखोंसे बकोट लेते थे, कभी पैरोंमें उलझाकर दोनों दोनोंको गिरा देते। इस प्रकार भयंकर दाँव-पेंचका प्रयोग करते थे॥ ३४॥
जानुभिश्वाश्मनिर्घोषैः शिरोभ्यां चावघट्टितैः।
तद् युद्धमभवद् घोरमशस्त्रं बाहुतेजसा॥ ३५॥
बलप्राणेन शूराणां समाजोत्सवसंनिधौ।
अरज्यत जनः सर्वः सोत्कृष्टनिनदोत्थितः॥ ३६॥
कभी घुटनों और सिरसे टक्कर मारते थे, जिससे पत्थरोंके टकरानेके समान शब्द होता था। जनसमुदायके समक्ष किये जानेवाले उस उत्सवमें शूरवीरोंके निकट उन दोनोंमें केवल बाहुबल, शारीरिक बल तथा प्राणबलसे किसी अस्त्र-शस्त्रके बिना ही बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्धके रंगमें सब लोग रँग गये। सभी दर्शक विजेताका उत्साह बढ़ानेके लिये जोर-जोरसे हर्षनाद कर उठते थे॥ ३५-३६॥
साधुवादांश्च मञ्चेषु घोषयन्त्यपरे जनाः।
ततः प्रस्विन्नवदनः कृष्णप्रणिहितेक्षणः।
न्यवारयत् तूर्याणि कंसः सव्येन पाणिना॥ ३७॥
दूसरे लोग मञ्चोंपर बैठे-बैठे ही 'साधु-साधु' (बहुत अच्छा, बहुत अच्छा) की घोषणा करते थे। यह सब देख-सुनकर कंसके वदनसे पसीना छूटने लगा। उसकी आँखें श्रीकृष्णकी ओर ही लगी थीं। उसने बायें हाथसे संकेत करके बाजे बंद करा दिये॥ ३७॥
प्रतिषिद्धेषु तूर्येषु मृदङ्गादिषु तेषु वै।
खे संगतान्यवाद्यन्त देवतूर्याण्यनेकणः॥ ३८॥
कंसने जब मृदङ्ग आदि वाद्योंका बजाना रोक दिया, तब आकाशमें देवताओंके अनेक प्रकारके वाद्य स्वतः एक साथ बज उठे॥ ३८॥
युद्ध्यमाने हृषीकेशे पुण्डरीकनिभेक्षणे।
स्वयमेव प्रवाद्यन्त तूर्यघोषास्तु सर्वशः॥ ३९॥
कमलनयन श्रीकृष्णके युद्ध करते समय सब प्रकारके वाद्य स्वयं ही बजने लगे और उनकी ध्वनि सब ओर छा गयी॥
अन्तर्धानगता देवा विमानैः कामरूपिभिः।
चेरुर्विद्याधरैः सार्द्धं कृष्णस्य जयकाङ्क्षिणः॥ ४०॥
देवता अदृश्य होकर श्रीकृष्णकी विजय चाहते हुए अपने कामरूपी विमानोंद्वारा विद्याधरगणोंके साथ वहाँ आकाशमें विचर रहे थे॥ ४०॥
जयस्व कृष्ण चाणूरं दानवं मल्लरूपिणम्।
इति सप्तर्षयः सर्वे ऊचुश्चैव नभोगताः॥ ४१॥
समस्त सप्तर्षि यहाँके आकाशमें स्थित हो कहने लगे— 'श्रीकृष्ण! तुम्हें इस मल्लरूपधारी दानव चाणूरपर विजय प्राप्त हो'॥ ४१॥
चाणूरेण चिरं कालं क्रीडित्वा देवकीसुतः।
बलमाहारयामास कंसस्याभावदर्शिवान्॥ ४२॥
कंसकी मृत्युको समीप देखनेवाले देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने चाणूरके साथ चिरकालतक युद्धकी लीला करके अपनेमें अनन्त बलका समावेश किया॥ ४२॥
ततश्चचाल वसुधा मञ्चाश्चैव जुघूर्णरे।
मुकुटाच्चापि कंसस्य पपात मणिरुत्तमः॥ ४३॥
फिर तो धरती डोलने लगी। वहाँ बिछे हुए मञ्च झूमने लगे और कंसके मुकुटसे भी उत्तम मणि गिर पड़ी॥ ४३॥
दोर्भ्यामानम्य कृष्णस्तु चाणूरं शीर्णजीवितम्।
प्राहरन्मुष्टिना मूर्ध्नि वक्षस्याहत्य जानुना॥ ४४॥
चाणूरकी जीवनीशक्ति अथवा आयुक्षीण हो चुकी थी। श्रीकृष्णने अपनी दोनों भुजाओंसे चाणूरको झुकाकर उसकी छातीमें घुटनेसे चोट करके उसके मस्तकपर मुक्केसे प्रहार किया॥ ४४॥
निःसृते साश्रुरुधिरे तस्य नेत्रे सबन्धने।
तापनीये यथा घण्टे कक्षोपरि विलम्बिते॥ ४५॥
इससे स्नायु-बन्धन तथा आँसू और रक्तके साथ उसकी दोनों आँखें बाहर निकल आयीं और ऐसी दिखायी देने लगीं मानो हाथीको कसनेवाली रस्सी या जंजीरमें दो सोनेकी घंटियाँ लटक रही हों॥ ४५॥
पपात स तु रङ्गस्य मध्ये निःसृतलोचनः।
चाणूरो विगतप्राणो जीवितान्ते महीतले॥ ४६॥
आँखें निकल जानेपर जीवनके अन्तमें प्राणशून्य हुआ चाणूर अखाड़ेके बीचमे गिर पड़ा॥ ४६॥
देहेन तस्य मल्लस्य चाणूरस्य गतायुषः।
संनिरुद्धो महारङ्गः स शैलेनेव लक्ष्यते॥ ४७॥
जिसकी आयु समाप्त हो गयी थी, उस चाणूर मल्लके शरीरसे वह विशाल रंगस्थल इस प्रकार अवरुद्ध दिखायी देता था, मानो किसी पर्वतसे रुँध गया हो॥ ४७॥
रौहिणेयो हते तस्मिंश्चाणूरे बलदर्पिते।
जग्राह मुष्टिकं रङ्गे कृष्णस्तोशलकं पुनः॥ ४८॥
बलाभिमानी चाणूरके मारे जानेपर रोहिणीनन्दन बलरामने उस रंगभूमिमें मुष्टिकको पकड़ लिया तथा श्रीकृष्णने पुनः तोशलकको धर दबाया॥ ४८॥
सन्निपाते तु तौ मल्लौ प्रथमे क्रोधमूर्च्छितौ।
समेयातां रामकृष्णौ कालस्य वशवर्तिनौ।
निर्घातावनतौ भूत्वा रङ्गमध्ये चवल्गतुः॥ ४९॥
विष्णुपर्व ] त्रिंशोऽध्यायः ३२१
युद्ध आरम्भ होनेपर पहले तो कालके अधीन हुए वे दोनों असुर मल्ल क्रोधसे मूर्च्छित हो बलराम और श्रीकृष्णसे भिड़ गये, परंतु जब उन दोनों वीरोंकी मार पड़ी, तब वे सिर झुकाकर अखाड़ेमें इधर-उधर उछल-कूद मचाने लगे ॥
कृष्णस्तोशलमुद्यम्य गिरिशृङ्गोपमं बली।
भ्रामयित्वा शतगुणं निष्पिपेष महीतले ॥ ५० ॥
बलवान् श्रीकृष्णने पर्वतशिखरके समान विशालकाय तोशलको दोनों हाथोंसे उठा लिया और सौ बार घुमानेके बाद पृथ्वीपर पटककर उसे पीस डाला ॥ ५० ॥
तस्य कृष्णाभिपन्नस्य पीडितस्य बलीयसः।
मुखाद् रुधिरमत्यर्थमुज्जगाम मुमूर्षतः ॥ ५१ ॥
श्रीकृष्णके द्वारा आक्रान्त एवं पीड़ित होकर मरणासन्न हुए उस महाबली मल्लके मुखसे बहुत अधिक रक्त निकलने लगा ॥ ५१ ॥
संकर्षणस्तु सुचिरं योधयित्वा महाबलः।
आन्ध्रमल्लं महामल्लो मण्डलानि व्यदर्शयत् ॥ ५२ ॥
इधर महाबली महामल्ल संकर्षण आन्ध्रदेशीय मल्ल मुष्टिकके साथ देरतक युद्ध करके उसे कुश्तीके अनेक पैंतरे दिखाने लगे ॥ ५२ ॥
मुष्टिनैकेन तेजस्वी साशानिस्तनयित्नुना।
शिरस्यभ्यहनद् धीरो वज्रेणेव महागिरिम् ॥ ५३ ॥
फिर उन तेजस्वी वीरने उसके मस्तकपर एक मुक्का मारा। उससे वज्रपातके समान शब्द हुआ। मानो किसी महान् पर्वतपर वज्रसे आघात किया गया हो ॥ ५३ ॥
स निष्पतितमस्तिष्को विस्रस्तनयनो भुवि।
पपात निहतस्तेन ततो नादो महानभूत् ॥ ५४ ॥
इससे उसका मस्तक फटकर गिर पड़ा, आँखें निकल आयीं और बलरामजीके द्वारा मारा गया वह मल्ल पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय बड़े जोरसे धमाकेका शब्द हुआ ॥
आन्ध्रतोशलकौ हत्वा कृष्णसंकर्षणावुभौ।
क्रोधसंरक्तनयनौ रंगमध्ये ववल्गतुः ॥ ५५ ॥
आन्ध्र-देशीय मुष्टिक और तोशल इन दोनोंको मारकर श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाई क्रोधसे लाल आँखें किये अखाड़ेमें उछलने-कूदने लगे ॥ ५५ ॥
समाजवाटो निर्मल्लः सोऽभवद् भीमदर्शनः।
आन्ध्रे तदा महामल्ले मुष्टिके च निपातिते ॥ ५६ ॥
उस समय महामल्ल चाणूर और मुष्टिकके मारे जानेपर वह समाजवाट (रंगभवन) मल्लोंसे सूना हो गया और अत्यन्त भयंकर दिखायी देने लगा ॥ ५६ ॥
ये च सम्प्रेक्षका गोपा नन्दगोपपुरोगमाः।
भयक्षोभितसर्वाङ्गाः सर्वे तत्रावतस्थिरे ॥ ५७ ॥
नन्द आदि जो-जो गोप यह सब देख रहे थे, उनके सारे अङ्ग भयसे क्षुब्ध हो उठे थे। वे सब लोग वहाँ चुपचाप बैठे रहे ॥ ५७ ॥
हर्षजं वारि नेत्राभ्यां वर्षमाणा प्रवेपती।
प्रस्रुवोत्पीडिता कृष्णं देवकी समुदैक्षत ॥ ५८ ॥
उधर देवकी थर-थर काँपती और दोनों नेत्रोंसे हर्षजनित आँसुओंकी वर्षा करती हुई स्तनोंमें दूधकी बाढ़ आ जानेसे पीड़ित हो श्रीकृष्णकी ओर देख रही थी ॥ ५८ ॥
कृष्णदर्शनजातेन बाष्पेणाकुलितेक्षणः।
वसुदेवो जरां त्यक्त्वा स्नेहेन तरुणायते ॥ ५९ ॥
श्रीकृष्ण-दर्शनजनित आँसुओंसे भरे हुए नेत्रोंवाले वसुदेवजी मानो अपनी वृद्धावस्था त्यागकर वात्सल्य-स्नेहसे परिपुष्ट हो तरुण हो रहे थे ॥ ५९ ॥
वारमुख्याश्च ताः सर्वाः कृष्णस्य मुखपङ्कजम्।
पपुर्हि नेत्रभ्रमरैर्निमेषान्तरगामिभिः ॥ ६० ॥
वहाँ जो मुख्य-मुख्य वाराङ्गनाएँ उपस्थित थीं, वे सब-की-सब निमेषके भीतर चलनेवाले नेत्ररूपी भ्रमरोंद्वारा श्रीकृष्णके मुखारविन्दका रस पान करने लगीं ॥ ६० ॥
कंसस्याथ मुखे स्वेदो भ्रूभेदान्तरगोचरः।
अभवद् रोषनिर्यासः कृष्णसंदर्शनेरितः ॥ ६१ ॥
तदनन्तर श्रीकृष्णको देखनेसे कंसके मुखमें दोनों भौंहोंके बीच रोषवश पसीना निकल आया ॥ ६१ ॥
केशवाय सधूमेन रोषनिश्वासवायुना।
दीप्तमन्तर्गतं तस्य हृदयं मानसाग्निना ॥ ६२ ॥
श्रीकृष्णके प्रति कंस जो कठोरता प्रकट करता था, वही जिसका धुआँ था तथा रोषरूपी उच्छ्वास-वायु जिसे प्रज्वलित कर रही थी, उस मानसिक चिन्तारूपी आगने कंसके आन्तरिक हृदयको जलाना आरम्भ किया ॥ ६२ ॥
तस्य प्रस्फुरितौष्ठस्य स्विन्नालिकतलस्य वै।
कंसवक्त्रस्य रोषेण रक्तसूर्यायते वपुः ॥ ६३ ॥
जिसके ओठ फड़क रहे थे और ललाटमे पसीना निकल आया था, कंसके उस मुखमण्डलका स्वरूप रोषके कारण लाल सूर्यके समान प्रतीत होता था ॥ ६३ ॥
क्रोधरक्ताननस्यास्य निःसृताः स्वेदबिन्दवः।
यथा रविकरस्पृष्टा वृक्षावश्यायबिन्दवः ॥ ६४ ॥
क्रोधसे लाल हुए कंसके मुखसे जो पसीनेकी बूँदें निकली थीं, वे वृक्षोंके पत्तोंपर पड़े हुए उन ओसकणोंके समान सुशोभित होती थीं, जिन्हें सूर्यकी किरणोंका स्पर्श प्राप्त हुआ हो॥
सोऽज्ञापयत संक्रुद्धः पुरुषान् व्यायतान् बहून्।
गोपावेतौ समाजाद्वान्निष्क्राम्येतां वनेचरौ ॥ ६५ ॥
म० ह० ११
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३२२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे उसने अत्यन्त कुपित होकर बहुत-से व्यायामशाली पुरुषोंको आज्ञा दी कि 'इन दोनों वनेचर गोपोंको इस जन- समुदायसे बाहर निकाल दो ॥ ६५ ॥ न चैतौ द्रष्टुमिच्छामि विकृतौ पापदर्शनौ । गोपानामपि मे राज्ये न कश्चित्स्थातुमर्हति ॥ ६६ ॥ 'ये दोनों विकृत हो गये हैं। इन्हें देखना भी पाप है। मैं इनकी ओर दृष्टिपात करना नहीं चाहता। गोपोंमेंसे भी कोई मेरे इस राज्यमें नहीं रह सकता ॥ ६६ ॥ नन्दगोपश्च दुर्मेधाः पापेष्वभिरतो मम । आयसैर्निगडत्कारैर्लोहपाशैर्निगृह्यताम् ॥ ६७ ॥ 'खोटी बुद्धिवाला नन्दगोप सदा मेरे प्रति कपटपूर्ण बर्तावोंमें ही तत्पर रहा है, अतः इसे लोहेकी बेड़ियों और हथकड़ियोंमें बाँधकर कैद कर लो ॥ ६७ ॥ वसुदेवश्च दुर्बुत्तो नित्यं द्वेषपरो मम । अवृद्धार्हेण दण्डेन क्षिप्रमद्यैव शास्यताम् ॥ ६८ ॥ 'दुराचारी वसुदेव सदा मुझसे द्वेष रखता है। इसे आज ही शीघ्र-से-शीघ्र ऐसा कठोर दण्ड दो, जो अवृद्ध ( नौजवान ) पुरुषोंके योग्य हो ॥ ६८ ॥ ये चेमे प्राकृता गोपा दामोदरपरायणाः । ह्रियन्तां गाव एतेषां यच्चास्ति वसु किंचन ॥ ६९ ॥ 'ये जो दामोदरका आश्रय लेकर रहनेवाले गँवार गोप हैं, इन सबकी गौओंको तथा इनके पास जो कुछ धन हो, उसको भी छीन लो' ॥ ६९ ॥ एवमाज्ञापयानं तं कंसं परुषभाषिणम् । ददर्शात्यन्तनयनः कृष्णः सत्यपराक्रमः ॥ ७० ॥ इस तरह आज्ञा देते और कठोर बातें कहते हुए उस कंसकी ओर सत्यपराक्रमी श्रीकृष्णने आँखें फाड़कर देखा ॥ क्षिप्ते पितरि चुक्रोध नन्दगोपे च केशवः । ज्ञातीनां च व्यथां दृष्ट्वा विसंज्ञां चैव देवकीम् ॥ ७१ ॥ स सिंह इव वेगेन केशवो जातविक्रमः । आरुरुक्षुर्महाबाहुः कंसनाशार्थमच्युतः ॥ ७२ ॥ रङ्गमध्यादुत्पपात कृष्णः कंसासनान्तिकम् । असज्जद्वायुनाऽऽक्षिप्तो यथा खस्थो घनाघनः॥ ७३ ॥ पिता वसुदेव तथा नन्दगोपपर आक्षेप होते ही केशव कुपित हो उठे। उन्होंने बन्धु-बान्धवोंकी व्यथा और माता देवकीकी अचेत अवस्था देखकर कंसका विनाश करनेके लिये उसके मञ्चपर चढ़नेका विचार किया। उस समय केशवका पराक्रम जाग उठा और अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण उस रंगस्थलसे सिंहके समान वेगपूर्वक उछले और कंसके सिंहासनके पास जा पहुँचे, ठीक उसी तरह जैसे आकाशवर्ती महामेघ वायुसे फेंका जाकर दूर पहुँच जाता है ॥ ७१-७३ ॥ ददृशुर्न हि तं सर्वे रङ्गमध्यादवप्लुतम् । केवलं कंसपार्श्वस्थं ददृशुः पुरवासिनः ॥ ७४ ॥ वे कब अखाड़ेसे कूदे हैं, इसको सब लोगोंने नहीं देखा। पुरवासियोंको वे केवल कंसके पास खड़े दिखायी दिये ॥७४॥ सोऽपि कंसस्तथाऽऽव्यस्तः परीतः कालधर्मणा । आकाशादिव गोविन्दं मेने तत्रागतं प्रभुम् ॥ ७५ ॥ कालधर्म ( मौत ) से घिरा हुआ कंस भी व्याकुल हो उठा और उसने यही समझा कि भगवान् गोविन्द आकाशसे ही मेरे पास उतर आये हैं ॥ ७५ ॥ स कृष्णेनायतं कृत्वा बाहुं परिघसंनिभम् । मूर्धजेषु परामृष्टः कंसो वै रङ्गसंसदि ॥ ७६ ॥ श्रीकृष्णने अपनी परिघ-जैसी मोटी एक बाँह बढ़ाकर रंगशालामें कंसकी चोटी पकड़ ली ॥ ७६ ॥ मुकुटश्चापतत् तस्य काञ्चनो वज्रभूषितः । शिरसस्तस्य कृष्णेन परामृष्टस्य पाणिना ॥ ७७ ॥ उस समय श्रीकृष्णके हाथसे पकड़े गये कंसके सिरसे उसका वज्रमणिसे विभूषित सुवर्णमय मुकुट खिसककर गिर पड़ा ॥ ७७ ॥ स ग्रहग्रस्तकेशश्च कंसो निर्यत्नतां गतः । तथैव च विसम्मूढो वैकल्यं समपद्यत ॥ ७८ ॥ जैसे किसी ग्रहने केश पकड़ लिये हों, उस अवस्थामे पड़ा हुआ कंस निश्चेष्ट हो गया तथा किंकर्तव्यविमूढ़ हो व्याकुलतामें पड़ गया ॥ ७८ ॥ निगृहीतश्च केशेषु गतासुरिव निःश्वसन् । न शशाक मुखं द्रष्टुं कंसः कृष्णस्य वै तदा ॥ ७९ ॥ केश पकड़ लिये जानेपर कंस मुर्दा-सा हो गया। वह लंबी साँस लेता हुआ उस समय कृष्णके मुखकी ओर दृष्टि न डाल सका ॥ ७९ ॥ विकुण्डलाभ्यां कर्णाभ्यां छिन्नहारेण वक्षसा । प्रलम्बाभ्यां च बाहुभ्यां गात्रैर्विस्तृतभूषणैः ॥ ८० ॥ भ्रंशितेनोत्तरीयेण सहसावलिताननः । चेष्टमानः समाक्षिप्तः कंसः कार्ष्णेन तेजसा ॥ ८१ ॥ उसके कानोंसे कुण्डल खिसक गये। वक्षःस्थलका हार छिन्न-भिन्न हो गया। दोनों भुजाएँ लटक गयीं। सारे अङ्गोंके आभूषण गिर गये। चादर खिसक गयी और उसने सहसा उसके कण्ठको आवेष्टित कर लिया। श्रीकृष्णके अनुपम तेजसे झटकेके साथ नीचे डाला गया कंस पृथ्वीपर गिरकर छटपटाने लगा ॥ ८०-८१ ॥ चकर्ष च महारङ्गे मञ्चान्निष्क्रम्य केशवः । केशेषु तं वलाद् गृह्य कंसं क्लेशार्हतां गतम् ॥ ८२ ॥
[ विष्णुपर्व ] \hfill एकत्रिंशोऽध्यायः \hfill ३२३
उस समय श्रीकृष्ण मञ्चसे निकलकर बाहर आ गये। कंस क्लेशयुक्त शोचनीय अवस्थामें पड़ गया था। श्रीकृष्ण पुनः बलपूर्वक उसके सिरके बाल पकड़कर उस महान् रंगस्थलमे उसे घसीटने लगे ॥ ८२ ॥
कृष्यमाणः स कृष्णेन भोजराजो महाद्युतिः ।
समाजवाटे परिखां देहक्षुण्णां चकार ह ॥ ८३ ॥
श्रीकृष्णके द्वारा घसीटे जाते हुए महातेजस्वी भोजराज कंसने उस रंगशालामें अपनी देहकी रगड़से खाई-सी बना दी ॥
समाजवाटे क्रीडित्वा विकृष्य च गतायुषम् ।
कृष्णो विसर्जयामास कंसदेहमदूरतः ॥ ८४ ॥
रंगशालामें खिलवाड़ करते हुए घसीटकर निर्जीव हुए कंसके शरीरको श्रीकृष्णने पास ही छोड़ दिया ॥ ८४ ॥
धरण्यां मृदितः शिष्ये तस्य देहः सुखोचितः ।
क्रमेण विपरीतेन पांसुभिः परुषीकृतः ॥ ८५ ॥
उसका जो शरीर सुख भोगनेके योग्य था, वह मर्दित होकर पृथ्वीपर सो गया। शूरवीरोंके लिये अयोग्य विपरीत विधिसे धूलमें सनकर वह कोमल अङ्ग कठोर हो गया ॥ ८५ ॥
तस्य तद् वदनं श्यामं सुप्ताक्षं मुकुटं विना ।
न विभ्राति विपर्यस्तं विपलाशं यथाम्बुजम् ॥ ८६ ॥
गर्दन टूट जानेसे उसका शरीर अस्त-व्यस्त हो गया था। उसके नेत्र बन्द हो गये थे तथा उसका श्याम मुख मुकुटके बिना दलरहित कमलके समान सुशोभित नहीं हो रहा था ॥ ८६ ॥
असंग्रामहतः कंसः स बाणैरपरिक्षतः ।
केशग्राहान्निरस्तासुर्वीरमार्गान्निराकृतः ॥ ८७ ॥
कंस बिना युद्धके मारा गया था। उसके शरीरपर बाणोंसे घाव नहीं होने पाया था। उसको केश पकड़कर घसीटा गया था, इस अवस्थामें उसके प्राण निकले और वह वीरोचित मार्गसे भ्रष्ट हो गया ॥ ८७ ॥
तस्य देहे प्रकाशन्ते सहसा केशवार्पिताः ।
मांसच्छेदघनाः सर्वे नखाग्रा जीवितच्छिदः ॥ ८८ ॥
उसके शरीरमें श्रीकृष्णद्वारा सहसा गड़ाये गये उनके सभी नखाग्र कंसके जीवनका उच्छेद करके प्रकाशित हो रहे थे। वे उसके मांसको छेद-छेदकर सघन रूपसे वहाँ अङ्कित हो गये थे ॥ ८८ ॥
तं हत्वा पुण्डरीकाक्षः प्रहर्षाद् द्विगुणप्रभः ।
ववन्दे वसुदेवस्य पादौ निहतकण्टकः ॥ ८९ ॥
उसका वध करके कमलनयन श्रीकृष्णको इतना अपार हर्ष हुआ कि उनके अङ्गोंकी प्रभा द्विगुण दीप्तिसे प्रकाशित हो उठी। उन्होंने जगत्के लिये कण्टकरूप कंसका विनाश करके पिता वसुदेवके दोनों चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ८९ ॥
मातुश्च शिरसा पादौ निपीड्य यदुनन्दनः ।
सास्रैश्चक्षुःप्रस्रवोत्पीडैः कृष्णमानन्दजैः स्स्रुतैः ॥ ९० ॥
तत्पश्चात् यदुनन्दन श्रीकृष्णने माताके दोनों चरणोंमें अपना मस्तक रखकर उनकी वन्दना की। उस समय देवकी आनन्दातिरेकसे निकले हुए अपने स्तनोंके दूधसे उन्हें सींचने लगी ॥ ९० ॥
यादवांश्चैव तान् सर्वान् यथास्थानं यथावयः ।
पप्रच्छ कुशलं कृष्णो दीप्यमानः स्वतेजसा ॥ ९१ ॥
तदनन्तर अपने तेजसे उद्दीप्त हुए श्रीकृष्णने वय और स्थितिके अनुसार उन समस्त यादवोंकी कुशल पूछी ॥ ९१ ॥
बलदेवोऽपि धर्मात्मा कंसभ्रातरमूर्जितम् ।
बाहुभ्यामेव तरसा सुनामानमपोथयत् ॥ ९२ ॥
इधर धर्मात्मा बलदेवने भी कंसके ओजस्वी भ्राता सुनामाको अपनी दोनों भुजाओं द्वारा ही वेगपूर्वक मार गिराया ॥ ९२ ॥
तौ जितारी जितक्रोधौ चिरविप्रोषितौ व्रजे ।
स्वपितुर्भवने वीरौ जग्मतुर्हृष्टमानसौ ॥ ९३ ॥
शत्रु और क्रोध दोनोंको जीतकर व्रजमे चिरकालतक रहे हुए वे दोनो वीर मन-ही-मन हर्ष और उल्लाससे भरकर अपने पिताके भवनमे गये ॥ ९३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कंसवधे त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कंसवधविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥
एकत्रिंशोऽध्यायः
कंसकी स्त्रियों और माताका विलाप
वैशम्पायन उवाच
भर्तारं पतितं दृष्ट्वा क्षीणपुण्यमिव ग्रहम् ।
कंसपत्न्यो हतं कंसं समन्तात् पर्यवारयन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! जिसका पुण्य क्षीण हो गया हो, उस ग्रहके समान भूमिपर गिरे हुए पतिको देखकर राजा कंसकी पत्नियाँ उसके मृतक शरीरको सब ओर-से घेरकर बैठ गयीं ॥ १ ॥
तं महीशयने सुप्तं क्षितिनाथं गतायुषम् ।
भार्याः स्म दृष्ट्वा शोचन्ति मृग्यो मृगपतिं यथा ॥ २ ॥
| ३२४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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जो कभी पृथ्वीके स्वामी और संरक्षक थे, वे ही पतिदेव आयु समाप्त होनेपर भूमिमयी शय्यापर सो रहे हैं, यह देख राजा कंसकी रानियाँ उसके लिये उसी तरह शोक करने लगीं, जैसे हरिणियाँ यूथपति हरिणके लिये शोकमग्न हो जाती हैं ॥
हा हताः स्म महाबाहो हताशा हतबान्धवाः ।
वीरपत्न्यो हते वीरे त्वयि वीरव्रतप्रिये ॥ ३ ॥
(वे विलाप करती हुई कहने लगीं—) 'हाय ! महाबाहु वीर ! आपको वीरव्रत प्रिय था। आपके मारे जानेपर हम सब वीर-पत्नियों मारी गयीं। हमारी आशाओंकी हत्या हो गयी। हमारे बन्धु-बान्धव भी (अनाथ होनेके कारण) मारे ही गये ! ॥ ३ ॥
इमामवस्थां पश्यन्त्यः पश्चिमां तव नैष्ठिकीम् ।
कृपणं राजशार्दूल विलपामः सबान्धवाः ॥ ४ ॥
'राजशिरोमणे ! आपकी मृत्युसम्बन्धिनी इस अन्तिम अवस्थाको देखती हुई हम सब (आपकी पत्नियाँ) अपने बान्धवोंसहित दीनतापूर्ण विलाप कर रही हैं ॥ ४ ॥
छिन्नमूलाः स्म संवृत्ताः परित्यक्तास्त्वया विभो ।
त्वयि पञ्चत्वमापन्ने नाथेऽस्माकं महाबले ॥ ५ ॥
'प्रभो ! आप हमारे महाबली प्राणनाथ थे, आपके मारे जानेसे हमारी तो जड़ कट गयी। हाय ! आपने हमें त्याग दिया ! ॥ ५ ॥
को नः कोपपरीताङ्गी रतिसंसर्गलालसाः ।
लता इव विचेष्टन्तीः शयनीयानि नेष्यति ॥ ६ ॥
'हा प्राणाधार ! हम मनमें रतिसंसर्गकी लालसा रखकर भी (मानावस्थामें) प्रणयकोपसे युक्त हो जब पृथ्वीपर लताओंकी भाँति लोटकर विपरीत चेष्टा करने लगतीं, उस समय आप हमें प्रेमपूर्वक मनाकर शय्याओंपर सुलाते थे। अब हमें कौन इस तरह उठाकर सेजोंतक ले जायगा ? ॥ ६ ॥
इदं तेऽसदृशं सौम्य हृद्यनिःश्वासमारुतम् ।
दहत्यर्को मुखं कान्तं निस्तोयमित्र पङ्कजम् ॥ ७ ॥
'सौम्य ! जिससे मनोरम निःश्वास वायु निकला करती थी, आपके उस कान्तिमान् मुखको सूर्य जलरहित (तालाबमें उगे हुए) कमलकी भाँति अपनी दुःसह किरणोंसे दग्ध कर रहे हैं। यह दुरवस्था आपके योग्य नहीं है ॥ ७ ॥
इमे ते श्रवणे शून्ये न शोभेते विकुण्डले ।
शिरोधरायां संलीने सततं कुण्डलप्रिये ॥ ८ ॥
'ये आपके कुण्डलरहित सूने कान, जिन्हें सदा ही कुण्डल धारण करना प्रिय रहा है, इस समय कण्ठमें विलीन होकर शोभा नहीं पा रहे हैं ॥ ८ ॥
क्व ते स मुकुटो वीर सर्वरत्नविभूषितः ।
अत्यर्थं शिरसो लक्ष्मीं यो दधारार्कसप्रभाम् ॥ ९ ॥
'वीर ! सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित आपका वह मुकुट कहाँ है, जो आपके मस्तकपर सूर्यकी प्रभाके समान अतिशय शोभाका आधान करता था ! ॥ ९ ॥
अनेन हि कलत्रेण त्वदन्तःपुरशोभिना ।
कथं दीनेन कर्तव्यं त्वयि लोकान्तरं गते ॥ १० ॥
'प्राणनाथ ! आपकी ये रानियाँ जो अन्तःपुरकी शोभा बढ़ाती थीं, आपके लोकान्तरमें चले जानेसे अब दीन और अनाथ होकर कैसे निर्वाह करेंगी ॥ १० ॥
ननु नाम स्त्रियः साध्व्यः प्रियभोगैश्चवञ्चिताः ।
पतीनामपरित्याज्याः स त्वं नस्त्यज्य गच्छसि ॥ ११ ॥
'नाथ ! सुना था, साध्वी स्त्रियाँ न तो प्रिय भोगोंसे कभी वञ्चित होती हैं और न उनके पति उनका परित्याग ही करते हैं; परंतु आप तो हमें छोड़कर चले जा रहे हैं (हाय ! अब हम कैसे रहेंगी ) ॥ ११ ॥
अहो कालो महावीर्यो येन पर्ययकर्मणा ।
कालतुल्यः सपत्नानां त्वं क्षिप्रमपनीयसे ॥ १२ ॥
'अहो ! काल महान् बलसे सम्पन्न है, जो अपनी उलट-फेरकी क्रियाद्वारा शत्रुओंके लिये कालके समान आपको भी शीघ्रतापूर्वक यहाँसे लिये जा रहा है ॥ १२ ॥
वयं दुःखेष्वनूचिताः सुखेष्वेव त्वयैधिताः ।
कथं वत्स्याम विधवा नाथ कार्पण्यमाश्रिताः ॥ १३ ॥
'नाथ ! आपने हमें सदा सुखोंमें ही रखकर पाला-पोसा और बड़ी किया है। हम दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं; किंतु आज आपसे बिछुड़कर विधवा होकर दयनीय दशाको पहुँच गयी हैं। अब हम कैसे यहाँ रह सकेंगी ? ॥ १३ ॥
स्त्रीणां चारित्रलुब्धानां पतिरेकः परा गतिः ।
त्वं हि नः सा गतिश्छिन्ना कृतान्तेन बलीयसा ॥ १४ ॥
'जिनके मनमें सदाचारके पालनका लोभ हो, उन साध्वी स्त्रियोंके लिये एकमात्र पति ही परम गति है—सबसे बड़ा सहारा है, किंतु महाबली कालने हमारे उस सहारेको काट डाला ॥ १४ ॥
वैधव्येनाभिभूताः स्मः शोकंसंतप्तमानसाः ।
रोदितव्यह्रदे मग्नाः क्व गच्छामस्त्वया विना ॥ १५ ॥
'हम वैधव्यसे अभिभूत हो गयी हैं। हमारा मन शोकसे संतप्त हो उठा है। हम विपत्तिके उस गहरे कुण्डमें डूब गयी हैं, जहाँ केवल रोना-ही-रोना रह जाता है। अब हम आपके बिना कहाँ जायँगी ? ॥ १५ ॥
सह त्वया गतः कालस्त्वदङ्के क्रीडितं कृतम् ।
क्षणेन तद्विहीनाः स्म अनित्या हि नृणां गतिः ॥ १६ ॥
'हमारा समय आपके साथ ही बीता है। हमने जबतक
विष्णुपर्व ] एकत्रिंशोऽध्यायः [ ३२५
आपके अङ्गमे ही क्रीड़ाएँ की हैं; किंतु एक ही क्षणमें हम उस सौभाग्यसे वञ्चित हो गयीं । सचमुच ही मनुष्योंकी गति अनित्य है—क्षणभङ्गुर है ॥ १६ ॥
अहो वलविहीनाः स्म विपन्ने त्वयि मानद ।
एकदुष्कृतकारिण्यः सर्वा वैधव्यलक्षणाः ॥ १७ ॥
'दूसरोंको मान देनेवाले महाराज ! आपके निधनसे हम सब-की-सब निर्बल हो गयीं । जान पड़ता है, हम सबने एक समान ही पाप किया था, जिससे सबको वैधव्यका चिह्न धारण करना पड़ा ॥ १७ ॥
त्वया स्वर्गप्रतिच्छन्दैर्लालिताः स्म रतिप्रियाः ।
त्वयि कामवशाः सर्वाः स नस्त्यक्त्वा क्व गच्छसि ॥ १८॥
'आपने हम रतिप्रिया रमणियोंको स्वर्गके समान सुख-भोग देकर सदा हमारा लालन-पालन किया था । हम सभी आपके प्रति कामासक्त रही हैं, फिर आप हमें छोड़कर कहाँ चले जा रहे हैं ॥ १८ ॥
अस्माकं त्वमनाथानां नाथो ह्यसि सुरोपम ।
आसां विलपमानानां कुररीणामिव प्रभो ।
प्रतिवाक्यं जगन्नाथ दातुमर्हसि मानद ॥ १९ ॥
'देवोपम प्रभो ! आप ही हम अनाथाओंके नाथ हैं । जगन्नाथ ! मानद ! कुररीके समान विलाप करनेवाली अपनी इन पत्नियोंको कुछ उत्तर देनेकी कृपा करें ॥ १९ ॥
एवमार्तकलत्रस्य शाम्यमानेषु बन्धुषु ।
गमनं ते महाभाग दारुणं प्रतिभाति नः ॥ २० ॥
'महाभाग ! जब कि आपके सभी बन्धु मारे जा रहे हैं और स्त्रियाँ शोकसे पीड़ित हैं, ऐसे अवसरपर आपका परलोक-गमन हमें बड़ा दारुण प्रतीत होता है ॥ २० ॥
नूनं कान्ततराः कान्त परलोके वरस्त्रियः ।
यतस्त्वं प्रस्थितो वीर विहायेमं गृहे जनम् ॥ २१ ॥
'प्रियतम ! वीर ! निश्चय ही परलोककी सुन्दरियाँ बड़ी ही कमनीय हैं, जिससे आप अपने घरकी इन रानियोंको छोड़कर उनके पास जानेके लिये प्रस्थित हो गये ॥ २१ ॥
किं नु ते कारणं वीर भार्यास्वेतासु भूरिद ।
आर्तनादं रुदन्तीषु यन्मोहान्नावबुध्यसे ॥ २२ ॥
'अधिक-से-अधिक (सुख-सुविधा) प्रदान करनेवाले महाराज ! क्या कारण है, जो अपनी इन पत्नियोंके रोने और आर्तनाद करनेपर भी आप मोहवश इनके दुःखको समझ नहीं पाते अथवा इस मोहनिद्रासे जाग नहीं उठते हैं ॥ २२॥
अहो निष्करुणा यात्रा नराणामौर्ध्वदेहिकी ।
यत् परित्यज्य दारान् स्वान् निरपेक्षा व्रजन्ति हि ॥ २३ ॥
'अहो ! पुरुषोंकी यह पारलौकिक यात्रा बड़ी ही निर्दय होती है; क्योंकि वे अपनी पत्नियोंको छोड़कर उनकी कोई अपेक्षा न रखते हुए चल देते हैं ॥ २३ ॥
अपतित्वं स्त्रियाः श्रेयो न तु शूरः पतिः स्त्रियाः ।
स्वर्गस्त्रीणां प्रियाः शूरास्तेषामपि च ताः प्रियाः ॥ २४॥
'स्त्रियोंका बिना पतिके ही रह जाना अच्छा, किंतु उनके लिये शूरवीर पतिका होना अच्छा नहीं है; क्योंकि वे शूरवीर स्वर्गलोककी सुन्दरियोंको प्रिय होते हैं और वे सुन्दरियाँ भी उन शूरवीरोंको प्रिय होती हैं ॥ २४ ॥
अहो क्षिप्रमदृश्येन नयता त्वां रणप्रियम् ।
प्रहृतं नः कृतान्तेन सर्वासामन्तरात्मसु ॥ २५ ॥
'अहो ! जिन्हें युद्ध ही प्रिय था, उन आपको अदृश्य-भावसे शीघ्रतापूर्वक ले जानेवाले कालने हम सबकी अन्त-रात्माओंपर एक साथ ही प्रहार किया है ॥ २५ ॥
हत्वा जरासंधबलं जित्वा यक्षांश्च संयुगे ।
कथं मानुषमात्रेण हतस्त्वं जगतीतले ॥ २६ ॥
'वीरवर ! आप युद्धमें जरासंधकी सेनाका विनाश करके यक्षोंको भी हराकर इस भूतलपर एक मनुष्यमात्रके हाथसे किस तरह मार डाले गये ? ॥ २६ ॥
इन्द्रेण सह संग्रामं कृत्वा सायकविग्रहम् ।
अमर्त्यैरजितो युद्धे मर्त्येनासि कथं हतः ॥ २७ ॥
'इन्द्रके साथ बाणोंद्वारा युद्ध करके जो समराङ्गणमें अमरोंसे भी पराजित न हो सके, वे ही आप एक मरणधर्मा मनुष्यके हाथसे कैसे मारे गये ? ॥ २७ ॥
त्वया सागरमक्षोभ्यं विक्षोभ्य शरवृष्टिभिः ।
रत्नसर्वस्वहरणं जित्वा पाशधरं कृतम् ॥ २८ ॥
'आपने अपने बाणोंकी वर्षासे पाशधारी वरुणको परास्त करके अक्षोभ्य महासागरको भी विक्षुब्ध करते हुए उसके रत्नरूपी सर्वस्वका अपहरण कर लिया था ॥ २८ ॥
त्वया पौरजनस्यार्थे मन्दं वर्षति वासवे ।
सायकैर्जलदाञ्जित्वा बलाद् वर्षं प्रवर्तितम् ॥ २९ ॥
'एक बार इन्द्रने जब वर्षांमें कमी कर दी थी, तब आपने अपने सायकोंसे बादलोंको जीतकर पुरवासियोंके हितके लिये बलपूर्वक वर्षा करवायी थी ॥ २९ ॥
प्रतापावनताः सर्वे तव तिष्ठन्ति पार्थिवाः ।
प्रेषयन्तो वरार्हाणि रत्नान्युपच्छादनानि च ॥ ३० ॥
'भूमण्डलके समस्त भूपाल आपके प्रतापसे नतमस्तक रहा करते थे और उपहारके रूपमें आपके पास बहुमूल्य रत्न एवं वस्त्र भेजते रहते थे ॥ ३० ॥
तथैवं देवकल्पस्य दृष्टवीर्यस्य शत्रुभिः ।
कथं प्राणान्तकं घोरमीदृशं भयमागतम् ॥ ३१ ॥
| ३२६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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'इस प्रकार आप देवताओंके समान तेजस्वी थे। शत्रुओंने आपके बल-पराक्रमको प्रत्यक्ष देखा था तो भी आपके ऊपर ऐसा प्राणान्तकारी घोर भय कैसे आया ॥ ३१ ॥
प्राप्ताः स्मो विधवाशब्दं त्वयि नाथे निपातिते।
अप्रमत्ताः प्रमत्तेन कृतान्तेन निराकृताः ॥ ३२ ॥
'हा नाथ! आपके मारे जानेसे आज हमें विधवाकी पदवी प्राप्त हुई है। हम सदा प्रमादसे दूर रहती थीं; परंतु मतवाले कृतान्तने हमको भी मिट्टीमें मिला दिया ॥ ३२ ॥
यद्येवं नाथ गन्तव्यं यदि वा विस्मृता वयम्।
वाङ्मात्रेणापि यामीति वक्तव्ये कः परिश्रमः ॥ ३३ ॥
'नाथ ! यदि इस प्रकार आपको जाना ही था अथवा यदि हमें भुला ही देना था तो वाणीमात्रसे भी 'मैं जा रहा हूँ'—ऐसा कहकर विदा ले लेनेमें आपके लिये क्या परिश्रम था ॥ ३३ ॥
प्रसीद नाथ भीताः स्म पादौ ते याम मूर्द्धभिः।
अलं दूरप्रवासेन निवर्तस्व नराधिप ॥ ३४ ॥
'प्राणनाथ ! प्रसन्न होइये। हम भयभीत हैं। आपके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रार्थना करती हैं। नरेश्वर ! दूर देशमें जाने और रहनेसे कोई लाभ नहीं। आप घरको ही लौट चलिये ॥ ३४ ॥
अहो वीर कथं शेषे निषण्णस्तृणपांसुषु ।
शयानस्य हि ते भूमौ कस्मान्नोद्विजते वपुः ॥ ३५ ॥
'वीर ! हमें आश्चर्य है, आप तिनकों और धूलोंमें लोटकर कैसे सो रहे हैं? इस तरह पृथ्वीपर सोये हुए आपके शरीरको उद्वेग क्यों नहीं प्राप्त होता है ? ॥ ३५ ॥
केन सुप्तप्रहारोऽयं दत्तोऽस्माकमकर्कितः।
प्रहृतं केन सर्वासु नारीष्वेवं सुदारुणम् ॥ ३६ ॥
'जैसे किसीपर सोते समय आघात किया जाय, उस प्रकार किसने हमलोगोंको यह अप्रत्याशित (जिसकी हमें कोई आशा नहीं थी, ऐसा) घोर दण्ड दिया है? किस निष्ठुरने हम सब नारियोंपर इस तरह अत्यन्त दारुण प्रहार किया है? ॥ ३६ ॥
रुदितानुशयो नार्या जीवन्त्याः परिदेवनम्।
किं वयं सति गन्तव्ये सह भर्त्रा रुदामहे ॥ ३७ ॥
'अहो ! विधवा नारी जबतक जीवित रहती है, उसे विलाप ही करना पड़ता है। उसका अन्तःकरण रोता रहता है। हमें तो पतिके साथ ही चलना है, ऐसे अवसरपर हम रो क्यों रही हैं?' ॥ ३७ ॥
एतस्मिन्नन्तरे दीना कंसमाता प्रवेपती।
क्व मे वत्सः क्व मे पुत्र इति रोरूयती भृशम् ॥ ३८ ॥
इसी बीचमें कंसकी दुखिया माता काँपती हुई वहाँ आयी और 'कहाँ है मेरा बच्चा ? कहाँ है मेरा बेटा ?' ऐसा कहकर जोर-जोरसे रोने लगी ॥ ३८ ॥
सापश्यन्निहतं पुत्रं निष्प्रभं शशिनं यथा।
हृदयेन विदीर्णेन भ्राम्यमाणा पुनः पुनः ॥ ३९ ॥
उसने अपने मरे हुए पुत्रको देखा। वह कान्तिहीन चन्द्रमाके समान प्रतीत होता था। उसकी ऐसी दशा देखकर माताका हृदय विदीर्ण हो गया। उसे बार-बार चक्कर आने लगा ॥ ३९ ॥
पुत्रं समभिवीक्षन्ती हा हतास्मीति वाशती।
स्नुषाणामार्तनादेन विललाप रुरोद च ॥ ४० ॥
वह पुत्रके मुखकी ओर देखती हुई चीखने लगी—'हाय ! मैं मारी गयी!' पुत्रवधुओंके आर्तनादके साथ रोने-बिलखने लगी ॥ ४० ॥
सा तस्य वदनं दीनमुत्सङ्गे पुत्रगृद्धिनी।
कृत्वा पुत्रेति कारुण्यं विललापार्तया गिरा ॥ ४१ ॥
पुत्रके जीवनकी इच्छा रखनेवाली राजमाता उसके दीन मुखको अपनी गोदमें रखकर आर्त वाणीमें 'हा पुत्र' कहकर करुणाजनक विलाप करने लगी— ॥ ४१ ॥
पुत्र शूरव्रते युक्त ज्ञातीनां नन्दिवर्द्धन ।
किमिदं त्वरितं वत्स प्रस्थानं कृतवानसि ॥ ४२ ॥
'बेटा ! तुम तो वीर-व्रतमें तत्पर रहते थे और अपने बन्धु-बान्धवोंका आनन्द बढ़ाते थे। वत्स ! तुमने क्यों इतनी जल्दी यहाँसे प्रस्थान किया है ? ॥ ४२ ॥
प्रसुप्तश्चातिविवृते किं पुत्र नियमं विना।
वत्स नैवंविधा भूमौ शेरते कृतलक्षणाः ॥ ४३ ॥
'पुत्र ! तुम बिना किसी नियम (नियन्त्रण) के इस अत्यन्त खुले हुए स्थानमें क्यों सो रहे हो ? वत्स ! तुम्हारे-जैसे शुभ-लक्षण-सम्पन्न नरेश इस तरह भूमिपर नहीं सोते हैं ॥ ४३ ॥
रावणेन पुरा गीतः श्लोकोऽयं साधुसम्मतः ।
बलज्येष्ठेन लोकेषु राक्षसानां समागमे ॥ ४४ ॥
'तीनों लोकोंमें जो बलमें सबसे बढ़ा-चढ़ा था, उस रावणने प्राचीनकालमें राक्षसोंके समुदायमे इस सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित श्लोकका गान किया था ॥ ४४ ॥
एवमूर्जितवीर्यस्य मम देवनिघातिनः।
बान्धवेभ्यो भयं घोरं दुर्निवार्यं भविष्यति ॥ ४५ ॥
'मैं इस प्रकार बल और पराक्रममे बढ़ा हुआ हूँ तथा देवताओंका वध करनेमें समर्थ हूँ तो भी मुझे अपने ही भाई-बन्धुओंसे घोर एवं अनिवार्य भय प्राप्त होगा ॥ ४५ ॥
| विष्णुपर्व ] | एकत्रिंशोऽध्यायः | ३२७ |
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तथैव ज्ञातिलुब्धस्य मम पुत्रस्य धीमतः ।
ज्ञातिभ्यो भयमुत्पन्नं शरीरान्तकरं महत् ॥ ४६ ॥
'उसी प्रकार मेरा बुद्धिमान् पुत्र अपने सजातीय बन्धुओंपर लुभाया रहता था तो भी इसे भाई-बन्धुओंसे ही यह देह-विनाशक महान् भय प्राप्त हुआ है' ॥ ४६ ॥
सा पतिं भूपतिं वृद्धमुग्रसेनं विचेतसम् ।
उवाच रुदती वाक्यं विवत्सा हरिणी यथा ॥ ४७ ॥
एह्येहि राजन्शुद्धात्मन् पश्य पुत्रं जनेश्वरम् ।
शयानं वीरशयने वज्राहतमिवाचलम् ॥ ४८ ॥
वह अपने पति बूढ़े राजा उग्रसेनसे, जो उस समय अचेत-से हो रहे थे, बछड़ेसे बिछुड़ी हुई हरिणीके समान रोती हुई बोली—'शुद्ध अन्तःकरणवाले महाराज ! आइये, आइये ! अपने पुत्र राजा कंसको देखिये, जो वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति वीरशय्यापर सो रहा है ॥ ४७-४८ ॥
अस्य कुर्मो महाराज निर्याणसदृशीं क्रियाम् ।
प्रेतत्वमुपपन्नस्य गतस्य यमसादनम् ॥ ४९ ॥
'महाराज ! अब हमलोग इसके लिये मृत्युकालोचित कर्म करें; क्योंकि यह यमलोकमें जाकर प्रेतत्वको प्राप्त हुआ है ॥ ४९ ॥
वीरभोग्यानि राज्यानि वयं चापि पराजिताः ।
गच्छ विज्ञाप्यतां कृष्णः कंससत्कारकारणात् ॥ ५० ॥
'राज्यका उपभोग तो वीर पुरुष ही करते हैं। हमलोग तो अब पराजित हो गये; अतः जाइये, कृष्णको यह सूचित कीजिये कि कंसके अन्त्येष्टि-संस्कारकी व्यवस्था होनी चाहिये ॥ ५० ॥
मरणान्तानि वैराणि शान्ते शान्तिर्भविष्यति ।
प्रेतकार्याणि कार्याणि मृतः किमपराध्यते ॥ ५१ ॥
'शत्रुके मरनेतक ही वैर रहता है। उसके शान्त हो जानेपर अब वैरकी भी शान्ति हो ही जायगी। इसके प्रेत-कार्य तो करने ही चाहिये। मरा हुआ क्या अपराध करता है' ॥
एवमुक्त्वा पतिं भोजं केशानालुप्य दुःखिता ।
पुत्रस्य मुखमीक्षन्ती विललापैव सा भृशम् ॥ ५२ ॥
अपने पति भोजराजसे ऐसा कहकर दुःखिनी राजमाता पुत्रका मुख निहारती हुई अपने केश खींच-खींचकर अत्यन्त विलाप करने लगी ॥ ५२ ॥
इमास्ते किं करिष्यन्ति भार्या राजन् सुखोषिताः ।
त्वां पतिं सुपतिं प्राप्य या विपन्नमनोरथाः ॥ ५३ ॥
'राजन् ! ये सुखमें पली हुई तुम्हारी रानियाँ अब क्या करेंगी। तुम्हारे-जैसे श्रेष्ठ पतिको पाकर भी इन बेचारी बहुओंका सारा मनोरथ नष्ट हो गया ॥ ५३ ॥
इमं ते पितरं वृद्धं कृष्णस्य वशवर्तिनम् ।
कथं द्रक्ष्यामि शुष्यन्तं कासारसलिलं यथा ॥ ५४ ॥
'ये तुम्हारे बूढ़े पिता अब श्रीकृष्णके अधीन हो गये। सूखते हुए पोखरेके जलकी भाँति अब मैं इन्हें परतन्त्र दशामें कैसे देख सकूँगी ॥ ५४ ॥
अहं ते जननी पुत्र किमर्थं नाभिभाषसे ।
प्रस्थितो दीर्घमध्वानं परित्यज्य प्रियं जनम् ॥ ५५ ॥
'बेटा ! मैं तुम्हारी जननी हूँ। मुझसे क्यों नहीं बोलते हो ? क्यों आज अपने प्रियजनोंका परित्याग करके तुमने परलोकके विशाल पथको प्रस्थान किया है ? ॥ ५५ ॥
अहो वीराल्पभाग्यायाः कृतान्तेनाभिचर्तिना ।
आच्छिद्य मम संदायो नीयसे नयकोविदः ॥ ५६ ॥
'अहो वीर ! तुम नीतिकुशल नरेश थे, मेरी सम्पत्ति थे; किंतु सदा समीप रहनेवाला काल आज तुम्हें मुझ अभागिनीकी गोदसे छीनकर लिये जा रहा है ॥ ५६ ॥
दानमानगृहीतानि तृप्तान्येतानि तैर्गुणैः ।
रुदन्ति तव भृत्यानां कुलानि कुलयूथप ॥ ५७ ॥
'कितने ही कुलों (परिवारों) के समुदायका पालन करनेवाले मेरे वीर पुत्र ! तुमने जिन्हें दान और मानसे अनुगृहीत कर रखा था, जो तुम्हारे उन गुणोंसे अत्यन्त संतुष्ट थे, वे ही ये तुम्हारे भृत्योंके कुलोंके लोग आज तुम्हारे लिये रो रहे हैं ॥ ५७ ॥
उत्तिष्ठ नरशार्दूल दीर्घबाहो महाबल ।
त्राहि दीनं जनं सर्वं पुरमन्तःपुरं यथा ॥ ५८ ॥
'नरश्रेष्ठ ! उठो ! महाबाहो ! महाबली वीर ! इन दीन-दुखी लोगोंकी और समस्त नगरकी अन्तःपुरके समान ही रक्षा करो' ॥ ५८ ॥
रुदतीनां भृशार्तानां कंसस्त्रीणां सुविस्तरम् ।
जगामास्तं दिनकरः संध्यरागेण रञ्जितः ॥ ५९ ॥
अत्यन्त आर्त होकर उसके विस्तृत गुणोंको याद करके कंसकी स्त्रियों और माताके रोते-रोते संध्या हो गयी और संध्याकालीन अरुण-रागसे रंजित हुए दिवाकर (सूर्य) अस्ताचलको चले गये ॥ ५९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कंसस्त्रीविलापे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कंसकी स्त्रियोंका विलापविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
३३८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
द्वात्रिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्णका कंसवधके लिये पश्चात्तापपूर्वक उसके औचित्यका समर्थन, उग्रसेनका श्रीकृष्णको सर्वस्व-समर्पणके पश्चात् कंसका अन्त्येष्टि-संस्कार करनेके लिये अनुरोध, श्रीकृष्णका उन्हें समझा-बुझाकर राज्यपर अभिषिक्त करना और समस्त यादवोंके साथ जाकर कंस आदिका अन्त्येष्टि-संस्कार कराना
वैशम्पायन उवाच
उग्रसेनस्तु कृष्णस्य समीपं दुःखितो ययौ।
पुत्रशोकाभिसंतप्तो विषपीत इव श्वसन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजा उग्रसेन पुत्रशोकसे संतप्त एवं दुखी होकर श्रीकृष्णके समीप गये। उस समय वे इस प्रकार लंबी साँस खींच रहे थे, मानो उन्होंने विष पी लिया हो ॥ १ ॥
स ददर्श गृहे कृष्णं यादवैः परिवारितम्।
पश्चात्तापाद् ध्यायन्तं कंसस्य निधनाविलम् ॥ २ ॥
उन्होंने देखा, पिताके घरमें श्रीकृष्ण यादवोंसे घिरे हुए बैठे हैं और कंसके निधनसे मलिन-मुख हो पश्चात्ताप करते हुए चिन्तामग्न हो रहे हैं ॥ २ ॥
कंसनारीविलापांश्च श्रुत्वा स करुणान् बहून् ।
गर्हमाणस्तथाऽऽत्मानं तस्मिन् यादवसंसदि ॥ ३ ॥
वे कंसकी पत्नियोंके बहुतेरे करुण विलाप सुनकर उस यादव-समाजमें अपनी निन्दा करते हुए बोले—॥ ३ ॥
अहो मयातिबाल्येन रोषाद् दोषानुवर्तिना।
वैधव्यं स्त्रीसहस्राणां कंसस्यास्य वधे कृतम् ॥ ४ ॥
'अहो ! मैंने अत्यन्त अविवेकके कारण रोषवश दोषका ही अनुसरण किया और इस कंसका वध करके हजारों स्त्रियोंको विधवा बना दिया है ॥ ४ ॥
कारुण्यं खलु नारीषु प्राकृतस्यापि जायते।
एवमार्तं रुदन्तीषु मया भर्तरि पातिते ॥ ५ ॥
परिदेवितमात्रेण शोकः खलु विधीयते।
'साधारण मनुष्योंको भी स्त्रियोंपर दया हो आती है; परंतु मेरे द्वारा अपने पतिके मारे जानेपर जो इस प्रकार आर्त होकर रो रही हैं, उन रानियोंके प्रति केवल पश्चात्ताप प्रकट करके मैं अपना शोक प्रकाशित कर रहा हूँ ॥ ५½ ॥
कृतान्तस्यानभिज्ञानां स्त्रीणां कारुण्यसम्भवः ॥ ६ ॥
'इन भोली-भाली स्त्रियोंके विलापको सुनकर तो यमराजके हृदयमें भी करुणाका संचार हो सकता है ॥ ६ ॥
कंसस्य हि वधः श्रेयान् प्रागेवाभिमतो मम।
सतामुद्वेजनीयस्य पापेष्वभिरतस्य च ॥ ७ ॥
लोके पतितवृत्तस्य परुषस्याल्पमेधसः।
अक्लिष्टं मरणं श्रेयो न विद्दिष्टस्य जीवितम् ॥ ८ ॥
'मैंने तो पहले ही यह निश्चय कर लिया था कि कंसका वध ही श्रेष्ठ है। जो सदा पापोंमें तत्पर रहनेके कारण साधु पुरुषोंकी दृष्टिमें भी उद्वेजनीय (उद्वेगमें डालने योग्य ) हो गया हो, संसारमें सदाचारसे गिर गया हो तथा सब लोग जिससे विद्वेष रखने लगे हों, ऐसे मन्दबुद्धि पुरुषका मर जाना ही श्रेयस्कर है। वही उसे क्लेशसे छुटकारा दिलानेवाला है, जीवित रहना नहीं ॥ ७-८ ॥
कंसः पापपरश्चैव साधूनामप्यसम्मतः।
धिक्छब्दपतितश्चैव जीविते चास्य का दया ॥ ९ ॥
'कंस सदा पापोंमें ही लगा रहता था, साधु पुरुष भी (उसे दुष्ट समझकर) उसका आदर नहीं करते थे तथा वह सबका धिक्कार पाकर पतित हो गया था, अतः उसके जीवनपर क्या दया हो सकती है ? ॥ ९ ॥
स्वर्गे तपोभृतां वासः फलं पुण्यस्य कर्मणः।
इहापि यशसा युक्तः स्वर्गस्थैरवधार्यते ॥ १० ॥
'तपस्वी पुरुषोंको जो स्वर्गलोकमें निवास प्राप्त होता है, वह उनके पुण्यकर्मका ही फल है। पुण्यात्मा पुरुष इस जगत्में भी यशस्वी होता है और स्वर्गवासी देवता भी उसे सादर ग्रहण करते हैं ॥ १० ॥
यदि स्युर्निर्वृता लोकाः स्युश्च धर्मपराः प्रजाः।
नरा धर्मप्रवृत्ताश्च न राजानमयः स्पृशेत् ॥ ११ ॥
'यदि सब लोग संतुष्ट हों, सारी प्रजा धर्ममें तत्पर रहे और मनुष्योंकी केवल धर्ममें ही प्रवृत्ति हो तो राजाओंको अन्याय छू भी नहीं सकता ॥ ११ ॥
निग्रहे दुष्टवृत्तीनां कृतान्तः कुरुते फलम्।
इष्टधर्मेषु लोकेषु कर्तव्यं पारलौकिकम् ॥ १२ ॥
'यदि राजा इस लोकमें दुष्ट वृत्तिवाले पुरुषोंका दमन करे तो परलोकमें धर्मराज उसे उसका फल देते हैं। सम्पूर्ण लोकोंको धर्म (उसके फलस्वरूप सुखकी प्राप्ति ) ही अभीष्ट है, इसलिये उनमें रहनेवाले पुरुषोंको परलोकमें सुख देनेवाले पुण्यकर्मोंका ही अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १२ ॥
अतीव देवा रक्षन्ति नरं धर्मपरायणम्।
कर्तारः सुलभा लोके दुष्कृतस्य हि कर्मणः ॥ १३ ॥
'देवता धर्मपरायण मनुष्यकी विशेषरूपसे रक्षा करते हैं, क्योंकि लोकमें अधिकतर पाप कर्म करनेवाले ही सुलभ होते हैं ॥ १३ ॥
विष्णुपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः ३२९
हतः सोऽयं मया कंसः साध्वेतदवगम्यताम्।
मूलच्छेदः कृतस्तस्य विपरीतस्य कर्मणः॥ १४॥
'अतः मैंने जो इस कंसका वध किया है, इसे आपलोग ठीक समझें, क्योकि ऐसा करके मैंने उसके पाप-कर्मका मूलोच्छेद कर डाला है ॥ १४ ॥
तदेष सान्त्व्यतां सर्वः शोकार्तः प्रमदाजनः।
पौराश्च पुर्यां श्रेण्यश्च सान्त्व्यन्तां सर्व एव हि॥ १५॥
'इसलिये इन समस्त शोकाकुल नारियोंको आपलोग सान्त्वना प्रदान करें और मथुरापुरीके नागरिकों एवं शिल्पियो- तथा व्यवसायियोंको भी समझा-बुझाकर धीरज बँधायें' ॥१५॥
एवं ब्रुवति गोविन्दे विवेशावनताननः।
उग्रसेनो यदून् गृह्य पुत्रकिल्बिषशङ्कितः ॥ १६ ॥
जब श्रीकृष्ण इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय राजा उग्रसेन अपना मुँह नीचे किये कुछ यादवोंको साथ ले उस घरमें प्रविष्ट हुए। वे मन-ही-मन अपने पुत्र कंसके अपराधसे डरे हुए थे ॥ १६ ॥
स कृष्णं पुण्डरीकाक्षमुवाच यदुसंसदि।
बाष्पसंदिग्धया वाचा दीनया सज्जमानया॥ १७॥
उन्होंने उस यादव-सभामे कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णसे आँसूभरी दीन, गद्गद तथा लड़खड़ाती हुई वाणीमें इस प्रकार कहा-॥ १७ ॥
पुत्रो निर्यातितः क्रोधान्नीतो याम्यां दिशं रिपुः।
स्वधर्माधिगता कीर्तिर्नाम विश्रावितं भुवि ॥१८॥
'श्रीकृष्ण ! तुमने मेरे पुत्रसे उसके अपराधका बदला ले लिया, अपने उस शत्रुको क्रोधपूर्वक यमलोक पहुँचा दिया, धर्मके अनुसार कीर्ति प्राप्त कर ली और भूमण्डलमें अपने नामका डंका पीट दिया ॥ १८ ॥
स्थापितं सत्सु माहात्म्यं शङ्किता रिपवः कृताः।
स्थापितो यादवो वंशो गर्विताः सुहृदः कृताः ॥१९॥
'सत्पुरुषोंके हृदयमें अपनी महत्ता स्थापित कर दी और शत्रुओंको भयभीत कर दिया, यदुवंशकी जड़ जमा दी और सुहृदोंको अपने ऊपर गर्व करनेका अवसर दिया ॥ १९ ॥
सामन्तेषु नरेन्द्रेषु प्रतापस्ते प्रकाशितः।
मित्राणि त्वां भजिष्यन्ति संश्रयिष्यन्ति पार्थिवाः ॥२०॥
'सामन्त राजाओमे तुम्हारा प्रताप प्रकाशित हो गया, मित्रगण तुम्हे अपनायेंगे और भूमण्डलके राजा तुम्हारा आश्रय लेगे ॥ २० ॥
प्रकृतयोऽनुयास्यन्ति स्तोष्यन्ति त्वां द्विजातयः।
संधिविग्रहमुख्यास्त्वां प्रणमिष्यन्ति मन्त्रिणः ॥२१॥
'प्रकृतियाँ (प्रजा, मन्त्री आदि) तुम्हारा अनुसरण करेंगी, ब्राह्मणलोग तुम्हारी स्तुति करेंगे-तुम्हारे गुण गायेंगे और संधि-विग्रहके कार्योंमें प्रमुखरूपसे भाग लेनेवाले मन्त्री तुम्हें प्रणाम करेंगे ॥ २१ ॥
हस्त्यश्वरथसम्पूर्ण पदातिगणसंकुलम्।
प्रतिगृहाण कृष्णेदं कंसस्य बलमव्ययम् ॥ २२ ॥
'श्रीकृष्ण ! हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंसे भरी हुई कंसकी यह अक्षय सेना ग्रहण करो ॥ २२ ॥
धनं धान्यं च यत् किंचिद् रत्नान्यप्याच्छादनानि च।
प्रतीच्छन्तु नियुक्ता वै त्वदीयाः कृष्ण पूरुषाः ॥२३॥
स्त्रियो हिरण्यं यानानि यदन्यद् वसु किंचन।
'श्रीकृष्ण ! जो कुछ भी धन, धान्य, रत्न और वस्त्र आदि कंसके अधिकारमें थे, उन सबको तुम्हारे आदमी सँभाल लें। स्त्रियाँ, सुवर्ण, वाहन तथा अन्य जो कुछ भी धन, रत्न आदि हैं, उनपर भी वे अधिकार कर लें ॥ २३$\frac{१}{२}$ ॥
एवं हि विहिते योगे पर्याप्ते कृष्ण विग्रहे ॥ २४॥
प्रतिष्ठितायां मेदिन्यां यदूनां शत्रुसूदन।
त्वं गतिश्चागतिश्चैव यदूनां यदुनन्दन ॥ २५॥
'यदुवंशियोंके शत्रुओंका संहार करनेवाले यदुनन्दन श्रीकृष्ण ! जब इस प्रकार प्राप्त वस्तुकी प्राप्तिरूप योग सम्पन्न हो गया, विग्रहकी समाप्ति हो गयी और इस पृथ्वीपर तुम्हारा पूर्णरूपसे अधिकार हो गया, तब हम सभी यादवोंकी गति और अगति एकमात्र तुम्ही हो ॥ २४-२५ ॥
शृणुष्व वदतां वीर कृपणानामिदं वचः।
अस्य त्वत्कोपदिग्धस्य कंसस्याशुभकर्मणः ॥ २६ ॥
तव प्रसादाद् गोविन्द प्रेतकार्यं क्रियेत ह।
'वीर ! हम दीनजन तुम्हारे सामने जो कुछ कह रहे हैं-हमारी यह प्रार्थना स्वीकार करो। गोविन्द ! यह पापकमी कंस तुम्हारे कोपसे दग्ध हो गया। हम चाहते हैं कि तुम्हारी ही कृपासे अब इसका प्रेतकार्य सम्पन्न कर दिया जाय ॥२६$\frac{१}{२}$॥
तस्य कृत्वा नरेन्द्रस्य विपन्नस्योर्ध्वदेहिकम् ॥ २७॥
सस्नुषोऽहं सभार्यश्च चरिष्यामि मृगैः सह ।
'उस मरे हुए नरेशका और्ध्वदैहिक सत्कार पूर्ण करके मैं अपनी पत्नी और पुत्रवधुओंको साथ ले वनमें मृगोंके साथ विचरूँगा ॥ २७$\frac{१}{२}$ ॥
प्रेतसत्कारमात्रेण कृते बान्धवकर्मणि।
आनृण्यं लौकिकं कृष्ण गताः किल भवन्ति हि ॥ २८ ॥
'श्रीकृष्ण ! कहते हैं कि मरे हुए मनुष्यका प्रेत-संस्कार मात्र कर देनेसे उसके बान्धवोंका कर्तव्य पूरा हो जाता है और फिर वे उसके लौकिक ऋणसे उऋण हो जाते हैं ॥
तस्याग्निं पश्चिमं कृत्वा चितिस्थाने विधानतः।
तोयप्रदानमात्रेण कंसस्यानृण्यमाप्नुयाम् ॥ २९॥
३३० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'अतः मैं चिता-स्थानपर विधिपूर्वक कंसका अन्तिम अग्नि-संस्कार करके उसको जलाञ्जलिमात्र देकर उसके ऋणसे उऋण हो जाऊँ; यही मेरी इच्छा है ॥ २९ ॥
एतत्ते कृष्ण विज्ञाप्यं स्नेहोऽत्र मयि युज्यताम् ।
प्राप्नोति सुगतिं तत्र कृपणः पश्चिमां क्रियाम् ॥ ३० ॥
'श्रीकृष्ण ! यही तुमसे मेरा निवेदन है, इस विषयमें मुझपर अपना स्नेहभाव प्रकट करो। सुना है, चितापर अन्तिम संस्कार कर देनेसे बेचारा मृतक प्राणी उत्तम गति प्राप्त कर लेता है' ॥ ३० ॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य कृष्णः परमविस्मितः ।
प्रत्युवाचोग्रसेनं वै सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥ ३१ ॥
उग्रसेनका यह वचन सुनकर श्रीकृष्णको बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने सान्त्वनापूर्वक उग्रसेनको समझाते हुए उनकी बातका इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ३१ ॥
कालयुक्तमिदं तात तथैतत् यत् प्रभाषितम् ।
सदृशं राजशार्दूल वृत्तस्य च कुलस्य च ॥ ३२ ॥
'तात ! आपने यह जो कुछ कहा है, यह सब इस समय-के अनुरूप है। राजसिंह ! आपकी बात आपके उत्तम आचार-विचार और श्रेष्ठ कुलके अनुरूप है ॥ ३२ ॥
यत् त्वमेवंविधं ब्रूषे गतेऽर्थे दुरतिक्रमे ।
प्राप्स्यते नृपसत्कारं कंसः प्रेतगतोऽपि सन् ॥ ३३ ॥
'जो बात बीत गयी, वह वैसी ही होनेवाली थी। दैवके उस विधानको लाँघना किसीके लिये भी दुष्कर था; फिर भी उससे प्रभावित होकर जो आप ऐसी बातें कह रहे हैं (इससे मुझे दुःख हुआ), कंस मर जानेपर भी मेरे द्वारा राजोचित सत्कार प्राप्त करेगा (इस बातके लिये मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ) ॥ ३३ ॥
कुले महति ते जन्म वेदान् विदितवानसि ।
कथं न ज्ञायते तात नियतिर्दुरतिक्रमा ॥ ३४ ॥
'तात ! आपका महान् कुलमें जन्म हुआ है। आपने वेदोंका ज्ञान प्राप्त किया है, फिर आप कैसे नहीं समझ पा रहे हैं कि नियति (दैवके विधान) का उल्लङ्घन करना बहुत ही कठिन है ॥ ३४ ॥
स्थावराणां च भूतानां जङ्गमानां च पार्थिव ।
पूर्वजन्मकृतं कर्म कालेन परिपच्यते ॥ ३५ ॥
'पृथ्वीनाथ ! स्थावर और जङ्गम सभी प्राणियोंके पूर्व-जन्मोंमें किये हुए कर्म समयपर परिपक्व होते (और उन्हें शुभाशुभ फलकी प्राप्ति कराते) हैं ॥ ३५ ॥
श्रुतवन्तोऽर्थवन्तश्च दातारः प्रियदर्शनाः ।
ब्राह्मण्या नयसम्पन्ना दीनानुग्रहकारिणः ॥ ३६ ॥
लोकपालसमास्तात महेन्द्रसमविक्रमाः ।
क्षितिपालाः कृतान्तेन नीयन्ते नृपसत्तम ॥ ३७ ॥
'तात ! नृपश्रेष्ठ ! जो वेद-शास्त्रोंके विद्वान्, धनवान्, दाता, प्रियदर्शन (सुन्दर), ब्राह्मणभक्त, नीतिसम्पन्न, दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले, लोकपालोंके समान यशस्वी और महेन्द्र-तुल्य पराक्रमी राजा हैं, उन्हें भी काल उठा ले जाता है ॥ ३६-३७ ॥
धार्मिकाः सर्वभावज्ञाः प्रजापालनतत्पराः ।
क्षत्रधर्मपरा दान्ताः कालेन निधनं गताः ॥ ३८ ॥
'जो धर्मात्मा, सम्पूर्ण भावोंके ज्ञाता, प्रजापालनमें तत्पर, क्षत्रियधर्मपरायण तथा जितेन्द्रिय थे, वे भी कालके गालमें चले गये ॥ ३८ ॥
स्वयमात्मकृतं कर्म शुभं वा यदि वाशुभम् ।
प्राप्ते काले तु तत्कर्म दृश्यते सर्वदेहिनाम् ॥ ३९ ॥
'स्वयं अपना किया हुआ जो शुभ या अशुभ कर्म है, वही समय आनेपर समस्त देहधारियोंके समक्ष सुख-दुःखके रूपमें दिखायी देता है ॥ ३९ ॥
एषा ह्यन्तर्हिता माया दुर्विज्ञेया सुरैरपि ।
यथायं मुह्यते लोको ह्यत्र कर्मैव कारणम् ॥ ४० ॥
'यह भगवान्की अदृश्यरूपसे रहनेवाली माया ही है, जिससे यह जगत् मोहित हो जाता है, उसके स्वरूपको जानना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन है। वास्तवमें सुख और दुःखकी प्राप्तिमें कर्म ही कारण है (मनुष्य जो चिन्तित एवं व्यथित होता है, यह मायाजनित मोह ही है) ॥ ४० ॥
कालेनाभिहतः कंसः पूर्वकर्मप्रचोदितः ।
न ह्यहं कारणं तत्र कालः कर्म च कारणम् ॥ ४१ ॥
'कंस अपने पूर्व कर्मोंसे प्रेरित होकर ही कालके द्वारा मारा गया है। मैं उसमें कारण नहीं हूँ, काल और कर्म ही कारण हैं ॥ ४१ ॥
सूर्यसोममयं तात कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम् ।
कालेन निधनं गत्वा कालेनैव च जायते ॥ ४२ ॥
'तात ! सारा चराचर जगत् सूर्य और सोममय (अग्नी-षोमात्मक) है। वह कालसे मृत्युको प्राप्त होकर फिर कालसे ही जन्म ग्रहण करता है ॥ ४२ ॥
स कालः सर्वभूतानां निग्रहानुग्रहे रतः ।
तस्मात् सर्वाणि भूतानि कालस्य वशगानि वै ॥ ४३ ॥
'काल ही समस्त प्राणियोंके निग्रह और अनुग्रहमें तत्पर है, इसलिये सम्पूर्ण भूत कालके ही अधीन हैं ॥ ४३ ॥
खद्योपेनैव दग्धस्य सूनोस्त्व नराधिप ।
नाहं वै कारणं तत्र कालस्तत्र च कारणम् ॥ ४४ ॥
विष्णुपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः ३३१
| ‘नरेश्वर ! आपका पुत्र अपने ही दोषोंसे दग्ध हुआ है। उसकी मृत्युका कारण मैं नहीं, काल है ॥ ४४ ॥<br><br>अथवाहं भविष्यामि कारणं नात्र संशयः।<br>परायणपरः कालः किं करिष्यत्यकारणः ॥ ४५ ॥<br><br>‘अथवा मैं इसमें निमित्तकारण हो सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि दूसरे निमित्तोंका सहारा लेनेवाला कालअकेला ही क्या करेगा ॥ ४५ ॥<br><br>कालस्तु बलवान् राजन् दुर्विज्ञेया हि सा गतिः।<br>परावरविशेषज्ञा यां यान्ति समदर्शिनः ॥ ४६ ॥<br>गतिः कालस्य सा येन सर्वं कालस्य गोचरम् ।<br><br>‘राजन् ! काल सबसे अधिक बलवान् है। कालसे परे जो मोक्षरूप्रा गति है, वह दुर्विज्ञेय है । उसे पर और अपर ( पुरुष और प्रकृति ) के अन्तरको जाननेवाले समदर्शी पुरुष ही प्राप्त होते हैं। वही कालकी परम गति है, जिससे सब कुछ कालके अधीन प्रतीत होता है ॥ ४६½॥<br><br>ब्रवीमि यदहं तात तदनुष्ठीयतां वचः ॥ ४७ ॥<br>न हि राज्येन मे कार्यं नाप्यहं नृप काङ्क्षितः।<br>न चापि राज्यलुब्धेन मया कंसो निपातितः ॥ ४८ ॥<br><br>‘तात ! अब मैं जो कुछ कहता हूँ, मेरे बताये हुए उस कार्यको आप करें। नरेश्वर ! मुझे राज्यसे कोई प्रयोजन नहीं है। न तो मैं राज्यका अभिलाषी हूँ और न राज्यके लोभसे मैंने कंसको मारा ही है ॥ ४७-४८ ॥<br><br>किं तु लोकहितार्थाय कीर्त्यर्थं च सुतस्तव ।<br>व्यङ्गभूतः कुलस्यास्य सानुजो विनिपातितः ॥ ४९ ॥<br><br>‘मैंने तो केवल लोकहितके लिये और कीर्तिके लिये भाई-सहित तुम्हारे पुत्रको मार गिराया है, जो इस कुलका विकृत ( सड़ा हुआ ) अङ्ग था ॥ ४९ ॥<br><br>अहं स एव गोमध्ये गोपैः सह वनेचरः।<br>प्रीतिमान् विचरिष्यामि कामचारी यथा गजः ॥ ५० ॥<br><br>‘मैं वही वनेचर होकर गोपोंके साथ गौओंके बीच प्रसन्नतापूर्वक विचरूँगा, जैसे इच्छानुसार विचरनेवाला हाथी वनमें स्वच्छन्द घूमता है ॥ ५० ॥<br><br>एतावच्छतशोऽप्येवं सत्येनैतद् ब्रवीमि ते ।<br>न मे कार्यं नृपत्वेन विज्ञाप्यं क्रियतामिदम् ॥ ५१ ॥<br><br>‘मैं सत्यकी शपथ खाकर इन बातोंको सौ-सौ बार दुहराकर आपसे कहता हूँ, मुझे राज्यसे कोई काम नहीं है; आप इसका विज्ञापन कर दीजिये ॥ ५१ ॥<br><br>भवान् राजास्तु मान्यो मे यदूनामग्रणीः प्रभुः।<br>विजयायाभिषिञ्चस्व स्वराज्ये नृपसत्तम ॥ ५२ ॥<br><br>‘आप यदुवंशियोंके अग्रगण्य स्वामी तथा मेरे लिये भी | माननीय हैं, अतः आप ही राजा हों । नृपश्रेष्ठ ! आप अपने राज्यपर अपना अभिषेक कराइये, आपकी विजय हो ॥५२ ॥<br><br>यदि ते मत्प्रियं कार्यं यदि वा नास्ति ते व्यथा।<br>मया निसृष्टं राज्यं स्वं चिराय प्रतिगृह्यताम् ॥ ५३ ॥<br><br>‘यदि आपको मेरा प्रिय कार्य करना हो अथवा यदि आपके मनमे मेरी ओरसे कोई व्यथा न हो तो मेरे द्वारा लौटाये गये इस राज्यको दीर्घकालके लिये ग्रहण करें’ ॥५३॥<br><br>वैशम्पायन उवाच<br><br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं नोत्तरं प्रत्यभाषत ।<br>व्रीडिताधोमुखं तं तु राजानं यदुसंसदि ।<br>अभिषेकेन गोविन्दो योजयामास धर्मवित् ॥ ५४ ॥<br><br>वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर उग्रसेनने कोई उत्तर नहीं दिया। वे लज्जित होकर सिर झुकाये चुपचाप खड़े रह गये । उस समय धर्मके ज्ञाता गोविन्दने राजा उग्रसेनको यादवोंके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ५४ ॥<br><br>स बद्धमुकुटः श्रीमानुग्रसेनो महाद्युतिः ।<br>चकार सह कृष्णेन कंसस्य निधनक्रियाम् ॥ ५५ ॥<br><br>सिरपर मुकुट बाँधे महातेजस्वी श्रीमान् राजा उग्रसेनने श्रीकृष्णके साथ रहकर कंसका अन्त्येष्टि-संस्कार किया था ॥<br><br>तं सर्वे यादवा मुख्या राजानं कृष्णशासनात् ।<br>अनुजग्मुः पुरीमार्गे देवा इव शतक्रतुम् ॥ ५६ ॥<br><br>श्रीकृष्णके आदेशसे समस्त मुख्य-मुख्य यादवोंने मथुरा-पुरीके राजमार्गपर राजा उग्रसेनका उसी प्रकार अनुसरण किया था, जैसे देवता देवराज इन्द्रका अनुगमन करते हैं ५६<br><br>रजन्यां तु निवृत्तायां ततः सूर्ये विराजिते ।<br>पश्चिमं कंससंस्कारं चक्रुस्ते यदुपुङ्गवाः ॥ ५७ ॥<br><br>जब रात बीती और सूर्योदय हुआ, उस समय श्रेष्ठ यादवोंने मिलकर कंसके अन्त्येष्टि-संस्कारकी तैयारी की ॥५७॥<br><br>शिविकायामथारोप्य कंसदेहं यथाक्रमम् ।<br>नैष्टिकेन विधानेन चक्रुस्ते कंससत्क्रियाम् ॥ ५८ ॥<br><br>उन सबने कंसके शरीरको शिविकामें रखकर क्रमशः अन्त्येष्टि-कर्मके विधानसे उसका दाह-संस्कार किया था ॥५८॥<br><br>स नीतो यमुनातीरमुत्तमं नृपतेः सुतः ।<br>सत्कृतश्च यथान्यायं नैधनेन चिताग्निना ॥ ५९ ॥<br><br>राजकुमार कंसका शव पहले यमुनाजीके उत्तम तटपर लाया गया, फिर यथोचित रीतिसे मृत्युकालिक चिताग्निके द्वारा उसका सादर अन्त्येष्टि-संस्कार किया गया ॥ ५९ ॥<br><br>तथैव भ्रातरं चास्य सुनामानं महाभुजम् ।<br>संस्कारं लम्भयामासुः सह कृष्णेन यादवाः ॥ ६० ॥ |
| ३३२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
| उसी प्रकार श्रीकृष्णसहित यादवोंने उसके भाई महाबाहु सुनामाका भी दाह-संस्कार किया ॥ ६० ॥<br><br>ताभ्यां ते सलिलं चक्रुर्वृष्ण्यन्धकपुरोगमाः ।<br>अक्षयं चास्तु प्रेतेभ्यो भाषमाणाः पुनः पुनः ॥ ६१ ॥<br>वृष्णि और अन्धक आदि कुलोंके लोगोंने उन दोनोंके लिये जलदान किया और बारंबार यह कहा कि 'यह जल प्रेतोंके लिये अक्षय हो' ॥ ६१ ॥<br><br>हिरण्यस्य सुवर्णस्य दश कोटीस्तथा हरिः ।<br>गावो रत्नानि वासांसि ग्रामान् नगरसम्मतान् ॥ ६२ ॥<br>ददौ कंसं समुद्दिश्य ब्राह्मणेभ्यो नृपोत्तमः ।<br>अक्षयं चापि विप्रेभ्यो भाषमाणाः पुनः पुनः ॥ ६३ ॥ | श्रीहरि तथा नृपश्रेष्ठ उग्रसेनने श्राद्धमें कंसके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको दस करोड़ स्वर्णमुद्राएँ, बहुत-सी गौएँ, रत्न, वस्त्र तथा नगरों-जैसे सम्मानित ग्राम दिये और बारंबार विप्रोंसे यह कहा—हमारा दिया हुआ यह दान उस दिवंगंत आत्माके लिये अक्षय हो ॥ ६२-६३ ॥<br><br>तयोस्ते सलिलं दत्त्वा यादवा दीनमानसाः ।<br>पुरस्कृत्योग्रसेनं वै विविशुर्मथुरां पुरीम् ॥ ६४ ॥<br>इस प्रकार कंस और सुनामाके लिये जलदान करके दीनचित्त यादव राजा उग्रसेनको आगे किये मथुरापुरीमें प्रविष्ट हुए ॥ ६४ ॥ |
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि उग्रसेनाभिषेककंससंस्कारकथने द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें उग्रसेनका अभिषेक तथा कंसके अन्त्येष्टि-संस्कारकथनविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
बलराम और श्रीकृष्णका गुरु सान्दीपतिके यहाँ जाकर विद्या पढ़ना और गुरुदक्षिणामें उनके मरे हुए पुत्रको उन्हें देकर मथुरापुरीको लौट आना
| वैशम्पायन उवाच<br>स कृष्णस्तत्र बलवान् रौहिणेयेन संगतः ।<br>मथुरां यादवाकीर्णां पुरीं तां सुखमावसत् ॥ १ ॥<br>वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बलवान् श्रीकृष्ण वहाँ रोहिणीकुमार बलरामजीके साथ यादवोंसे भरी हुई उस मथुरापुरीमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १ ॥<br><br>प्राप्तयौवनदेहस्तु युक्तो राजश्रिया ज्वलन् ।<br>चचार मथुरां वीरः स रत्नाकरभूषणम् ॥ २ ॥<br>उनके शरीरको युवावस्था प्राप्त हुई। वे वीर श्रीकृष्ण राजश्रीसे प्रकाशित होते हुए रत्नराशिरूप आभूषणोंसे विभूषित मथुरापुरीमें विचरण करने लगे ॥ २ ॥<br><br>कस्यचित् त्वथ कालस्य सहितौ रामकेशवौ ।<br>गुरुं सान्दीपनिं काश्यमवन्तिपुरवासिनम् ॥ ३ ॥<br>कुछ कालके अनन्तर बलराम और श्रीकृष्ण एक साथ अवन्तिपुर (उज्जयिनी) के निवासी गुरु सान्दीपतिके यहाँ गये, जो काशिदेशमें उत्पन्न हुए थे ॥ ३ ॥<br><br>धनुर्वेदचिकीर्षार्थमुभौ तावभिजग्मतुः ।<br>निवेद्य गोत्रं स्वाध्यायामाचारेणाभ्यलंकृतौ ॥ ४ ॥<br>वे दोनों भाई वहाँ धनुर्वेदकी शिक्षा ग्रहण करनेके लिये गये थे। अपना गोत्र बताकर गुरुकुलके आचारसे अपनेको अलंकृत करके दोनों ही स्वाध्याय करने लगे ॥ ४ ॥ | शुश्रूषू निरहंकारावुभौ रामजनार्दनौ ।<br>प्रतिजग्राह तौ काश्यो विद्याः प्रादाच्च केवलाः ॥ ५ ॥<br>बलराम और श्रीकृष्ण दोनों गुरुकी सेवामें तत्पर रहते थे। अहंकार तो उन्हें छू भी नहीं सका था। काशिदेशीय गुरुने उन दोनोंको शिष्यरूपसे ग्रहण किया और उन्हें विशुद्ध विद्याएँ प्रदान कीं ॥ ५ ॥<br><br>तौ च श्रुतिधरौ वीरौ यथावत् प्रतिपद्यताम् ।<br>अहोरात्रैश्चतुःषष्ट्या साङ्गवेदमधीयताम् ॥ ६ ॥<br>वे दोनों वीर श्रुतिधर थे—किसी भी बातको एक बार सुन लेनेमात्रसे ही ग्रहण कर लेते थे, अतः उन्होंने यथावत् रूपसे विद्याओंको प्राप्त किया। चौंसठ दिन-रातमें ही छहों अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदका अध्ययन कर लिया ॥ ६ ॥<br><br>चतुष्पादं धनुर्वेदं शस्त्राग्रामं ससंग्रहम् ।<br>अचिरेणैव कालेन गुरुस्तावभ्यशिक्षयत् ॥ ७ ॥<br>गुरुजीने उन्हें थोड़े ही समयमें दीक्षा, संग्रह, सिद्धि और प्रयोग—इन चार पादोंसे युक्त धनुर्वेदकी तथा रहस्यसहित शस्त्रसमूहोंकी शिक्षा दे दी ॥ ७ ॥<br><br>अतीवामानुषीं मेधां चिन्तयित्वा तयोर्गुरुः ।<br>मेने तावागतौ वीरौ देवौ चन्द्रदिवाकरौ ॥ ८ ॥<br>उनकी अत्यन्त अलौकिक बुद्धिका विचार करके गुरुने यही माना कि इन दोनों वीरोंके रूपमें मेरे यहाँ साक्षात् चन्द्रदेव और सूर्यदेव पधारे हैं ॥ ८ ॥ |
विष्णुगोपर्व ] त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ३३३
ददर्श च महात्मानौ तावपि पर्वसु।
पूजयन्तौ महादेवं साक्षाद् विष्णुं व्यवस्थितम् ॥ ९ ॥
उन्होंने पर्वके अवसरोंपर उन दोनों महात्माओंको अर्चाविग्रहमें प्रतिष्ठित महान् देवता साक्षात् भगवान् विष्णु-की आराधना करते हुए भी देखा था ॥ ९ ॥
गुरुं सान्दीपनिं कृष्णः कृतकृत्योऽभ्यभाषत।
गुर्वर्थं किं ददानीति रामेण सह भारत ॥ १० ॥
भारत! विद्या पढ़कर कृतकृत्य हो बलरामसहित श्रीकृष्ण-ने अपने गुरु सान्दीपनिसे पूछा—'भगवन्! आपको गुरु-दक्षिणाके रूपमें मैं क्या दूँ ?' ॥ १० ॥
तयोः प्रभावं स ज्ञात्वा गुरुः प्रोवाच हृष्टवान्।
पुत्रमिच्छाम्यहं दत्तं यो मृतो लवणाम्भसि ॥ ११ ॥
उन दोनोंका प्रभाव जानकर हर्षमें भरे हुए गुरुने कहा—'मेरा जो पुत्र खारे पानीके समुद्रमें डूबकर मर गया था, उसे ही तुम ले आकर दे दो, यही मेरी इच्छा है ॥ ११ ॥
पुत्र एकोऽपि मे जातः स चापि तिमिना हतः।
प्रभासे तीर्थयात्रायां तं मे त्वं पुनरानय ॥ १२ ॥
'मेरे एक ही पुत्र हुआ था। वह भी तीर्थयात्राके अवसर-पर प्रभासक्षेत्रमें तिमि नामक मत्स्यद्वारा मार डाला गया, उसीको तुम फिर ले आओ' ॥ १२ ॥
तथेत्येवाब्रवीत् कृष्णो रामस्यानुमते स्थितः।
गत्वा समुद्रं तेजस्वी विवेशान्तर्जलं हरिः ॥ १३ ॥
तब बलरामजीकी अनुमति लेकर श्रीकृष्णने उनसे कहा, 'बहुत अच्छा'; फिर वे तेजस्वी श्रीहरि समुद्रतटपर जाकर उसके जलके भीतर घुस गये ॥ १३ ॥
समुद्रः प्राञ्जलिर्भूत्वा दर्शयामास स्वं तदा।
तमाह कृष्णः क्वासौ भोः पुत्रः सान्दीपनेरिति ॥ १४ ॥
उस समय समुद्रने हाथ जोड़कर उन्हें दर्शन दिया। श्रीकृष्णने उससे पूछा—'अजी, सान्दीपनि मुनिका पुत्र कहाँ है ?' ॥ १४ ॥
समुद्रः प्रत्युवाचेदं दैत्यः पञ्चजनो महान्।
तिमिरूपेण तं बालं ग्रस्तवानिति माधव ॥ १५ ॥
समुद्रने उत्तर दिया—'माधव ! पञ्चजन नामक महान् दैत्यने तिमिरूपसे उस बालकको अपना ग्रास बना लिया था' ॥ १५ ॥
स पञ्चजनमासाद्य जघान पुरुषोत्तमः।
न चाससाद तं बालं गुरुपुत्रं तदाच्युतः ॥ १६ ॥
तब अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् पुरुषोत्तमने पञ्चजनके पास जाकर उसे मार डाला, परंतु उन्हें वहाँ उनके गुरुका पुत्र नहीं प्राप्त हुआ ॥ १६ ॥
स तु पञ्चजनं हत्वा शङ्खं लेभे जनार्दनः।
यस्तु देवमनुष्येषु पाञ्चजन्य इति श्रुतः ॥ १७ ॥
पञ्चजनको मारकर भगवान् जनार्दनने एक शङ्ख हस्त-गत किया, जो देवताओं और मनुष्योंमें पाञ्चजन्य नामसे विख्यात है ॥ १७ ॥
ततो वैवस्वतपुरं जगाम पुरुषोत्तमः।
ततो यमोऽभ्युपागम्य ववन्दे तं गदाधरम् ॥ १८ ॥
तदनन्तर भगवान् पुरुषोत्तम वैवस्वत यमकी पुरीमें गये। यमने आकर उन भगवान् गदाधरको प्रणाम किया ॥
तमुवाचाथ वै कृष्णो गुरुपुत्रः प्रदीयताम्।
तयोस्तत्र तदा युद्धमासीद् घोरतरं महत् ॥ १९ ॥
तब श्रीकृष्णने उनसे कहा—'मुझे मेरे गुरुका पुत्र दे दो (परंतु यमने उसे देनेसे इनकार किया)। तब उन दोनोंमें वहाँ महान् घोरतर युद्ध हुआ ॥ १९ ॥
ततो वैवस्वतं घोरं निर्जित्य पुरुषोत्तमः।
आससाद च तं बालं गुरुपुत्रं तदाच्युतः ॥ २० ॥
भयानक यमराजको जीतकर पुरुषोत्तम अच्युतने अपने बालक गुरुपुत्रको प्राप्त कर लिया ॥ २० ॥
आनिनाय गुरोः पुत्रं चिरं नष्टं यमक्षयात्।
ततः सान्दीपनेः पुत्रः प्रभावदमितौजसः ॥ २१ ॥
दीर्घकालगतः प्रेतः पुनरासीच्छरीरवान्।
जो दीर्घकालसे नष्ट हो चुका था, उस गुरुपुत्रको भगवान् यमलोकसे यहाँ उठा ले आये। उन अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णके प्रभावसे दीर्घकालका मरा हुआ सान्दी-पनिका पुत्र पुनः पूर्ववत् शरीर धारण करके जी उठा २१३
तदशक्यमचिन्त्यं च दृष्ट्वा सुमहदद्भुतम् ॥ २२ ॥
सर्वेषामेव भूतानां विस्मयः समजायत।
वह अशक्य, अचिन्त्य और अत्यन्त अद्भुत कार्य देखकर सभी प्राणियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ २२३ ॥
स गुरोः पुत्रमादाय पाञ्चजन्यं च माधवः।
रत्नानि च महार्हाणि पुनरायाज्जगत्प्रभुः ॥ २३ ॥
जगत्के स्वामी लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण गुरुपुत्रको साथ ले पाञ्चजन्य शङ्ख तथा बहुत-से बहुमूल्य रत्न लेकर पुनः लौट आये ॥ २३ ॥
राक्षसैस्तस्य रत्नानि महार्हाणि बहूनि च।
आनाय्यावेदयामास गुरवे वासवानुजः ॥ २४ ॥
इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णने उन बहुसंख्यक एवं बहु-मूल्य रत्नोंको राक्षसोंद्वारा (जो यमके किंकर थे) मँगवाकर गुरुको निवेदन किया ॥ २४ ॥
गदापरिघयुद्धेषु सर्वस्त्रेषु च तावुभौ।
अचिराम्मुख्यतं प्राप्तौ सर्वलोके धनुर्धृताम् ॥ २५ ॥
३३४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णने गदा और परिवके युद्धोंमें तथा सम्पूर्ण अस्त्रोंमें शीघ्र ही प्रमुखता प्राप्त कर ली। वे समस्त संसारके धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ माने जाने लगे ॥ २५ ॥
ततः सान्दीपनेः पुत्रं तद्रूपवयसं तदा । प्रादात् कृष्णः प्रतीतात्मा सह रत्नैरुदारधीः ॥ २६ ॥
उदारबुद्धिवाले श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्त होकर सान्दीपानिके पुत्रको उसी रूप और अवस्थामें रत्नोंके साथ उन्हें लौटा दिया॥ २६ ॥
चिरनष्टेन पुत्रेण काश्यः सान्दीपनिस्तदा । समेत्य मुमुदे राजन् पूजयन् रामकेशवौ ॥ २७ ॥
राजन् ! काशिदेशमें उत्पन्न हुए सान्दीपनिने चिरकालसे नष्ट हुए अपने पुत्रसे मिलकर बलराम और श्रीकृष्णकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए बड़े प्रसन्न हुए ॥ २७ ॥
कृतार्थौ तावुभौ वीरौ गुरुमामन्त्र्य सुव्रतौ । आयातौ मथुरां भूयो वसुदेवसुतावुभौ ॥ २८ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे दोनों वीर वसुदेवपुत्र अस्त्र-विद्याकी शिक्षा पाकर गुरुकी आज्ञा ले पुनः मथुरापुरीको लौट आये ॥ २८ ॥
ततः प्रत्युद्ययुः सर्वे यादवा यदुनन्दनौ । सबला हृष्टमनस उग्रसेनपुरोगमाः ॥ २९ ॥
उस समय उग्रसेन आदि समस्त यादवोंने प्रसन्नचित्त होकर सेनासहित आगे जा उन दोनों यदुनन्दन वीरोंकी अगवानी की ॥ २९ ॥
श्रेण्यः प्रकृतयश्चैव मन्त्रिणः सपुरोहिताः । सबालवृद्धा सा चैव पुरी समभिवर्तत ॥ ३० ॥
व्यवसायीवर्ग, प्रजावर्ग अथवा प्रकृतिमण्डल, मन्त्री, पुरोहित तथा बालकों और वृद्धोंसहित वह सारी पुरी (श्रीकृष्ण-बलरामके दर्शनके लिये) उमड़ पड़ी ॥ ३० ॥
नन्दितूर्याण्यवाद्यन्त तुष्टुवुश्च जनार्दनम् । रथ्याः पताकामालिन्यो भ्राजन्ते स्म समन्ततः ॥ ३१ ॥
आनन्दसूचक बाजे बजने लगे। सब लोग श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे। मथुरापुरीकी गलियाँ और सड़कें ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत हो सब ओरसे सुशोभित होने लगीं ॥ ३१ ॥
प्रहृष्टमुदितं सर्वमन्तःपुरमशोभत । गोविन्दागमनेऽत्यर्थं यथैवेन्द्रमहे तथा ॥ ३२ ॥
गोविन्दके आगमनसे इन्द्रोत्सवके समान सारे नगर और अन्तःपुरमें अत्यन्त हर्ष एवं आनन्द छा गया। उसकी शोभा बढ़ गयी ॥ ३२ ॥
मुदिताश्चाथ गायन्ति राजमार्गेषु गायकाः । तत्रासीत् प्रथिता गाथा यादवानां प्रियङ्करा ॥ ३३ ॥
गोविन्दरामौ सम्प्राप्तौ भ्रातरौ लोकविश्रुतौ । स्वे पुरे निर्भयाः सर्वे क्रीडध्वं सह बान्धवैः ॥ ३४ ॥
राजमार्गोंपर बहुतेरे गायक आनन्दित होकर गीत गाने लगे। उस समय यादवोंको प्रिय लगनेवाली यह गाथा वहाँ सब ओर कही-सुनी जाने लगी—'नागरिको ! विश्वविख्यात वीर श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाई मथुरामें आ पहुँचे हैं। अब तुम सब लोग निर्भय हो अपने नगरमें बन्धु-बान्धवोंके साथ क्रीड़ा करो' ॥ ३३-३४ ॥
न तत्र कश्चिद् दीनो वा मलिनो वा विचेतनः । मथुरायामभूद् राजन् गोविन्दे समुपस्थिते ॥ ३५ ॥
राजन् ! गोविन्दके मथुरामे उपस्थित होनेपर वहाँ न तो कोई दीन था, न मलिन था और न चेतनासे शून्य ही था ॥ ३५ ॥
वयांसि साधुवाक्यानि प्रहृष्टा गोहयद्विपाः । नरनारीगणाः सर्वे भेजिरे मनसः सुखम् ॥ ३६ ॥
पक्षी मीठी-मीठी बोली बोलते थे। गाय, बैल, घोड़े, हाथी हृष्ट-पुष्ट रहते थे और पुरुषों तथा स्त्रियोंके सभी समुदाय मनमें सुखका अनुभव करते थे ॥ ३६ ॥
शिवाश्च वाताः प्रववुरिवरजस्का दिशो दश । दैवतानि च हृष्टानि सर्वेष्वायतनेषु च ॥ ३७ ॥
शीतल सुखद हवा चलती थी। दसों दिशाओंमें धूल नहीं उड़ती थी और सभी मन्दिरोंमे हर्षपूर्वक देवता निवास करते थे ॥ ३७ ॥
यानि लिङ्गानि लोकस्य चासन् कृतयुगे पुरा । तानि सर्वाण्यदृश्यन्त पुरीं प्राप्ते जनार्दने ॥ ३८ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके मथुरापुरीको लौट आनेपर वहाँ सारे चिह्न वैसे ही दिखायी देने लगे, जो सत्ययुगके समय पहले जगत्में प्रकट होते थे ॥ ३८ ॥
ततः काले शिवे पुण्ये स्यन्दनेनारिमर्दनः । हरियुक्तेन गोविन्दो विवेश मथुरां पुरीम् ॥ ३९ ॥
तदनन्तर मङ्गलमयी पुण्यवेलामें शत्रुमर्दैन भगवान् गोविन्दने घोड़े जुते हुए रथपर बैठकर मथुरापुरीमें प्रवेश किया ॥ ३९ ॥
विशन्तं मथुरां रम्यां तमुपेन्द्रमरिंदमम् । अनुजग्मुर्यदुगणाः शक्रं देवगणा इव ॥ ४० ॥
रमणीय मथुरापुरीमे प्रवेश करते समय समस्त यादव उन शत्रुदमन उपेन्द्र श्रीकृष्णके पीछे-पीछे उसी प्रकार चले, जैसे देवता देवेन्द्रका अनुसरण करते हैं ॥ ४० ॥
वसुदेवस्य भवनं ततस्तौ यदुनन्दनौ । प्रविष्टौ हृष्टवदनौ चन्द्रादित्याविवाचलम् ॥ ४१ ॥ परेण तेजसोपेतौ सुरेन्द्राविव रूपिणौ । तावायुधानि विन्यस्य गृहे स्वे स्वैरचारिणौ ॥ ४२ ॥
तदनन्तर यदुकुलको आनन्दित करनेवाले वे दोनों बन्धु वसुदेवके भवनमें प्रविष्ट हुए। उस समय उनके मुखपर हर्षो-