विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 37, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| २५ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश |
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और जो सुन्दर व्रत धारण करनेवाली चन्द्रमाकी सत्ताईस पत्नियाँ कही गयी हैं, उन अमित तेजस्विनी पत्नियोंकी ज्योतिर्मयी संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ६३ ॥
अरिष्टनेमिपत्नीनामपत्यानीह षोडश ।
बहुपुत्रस्य विदुषस्तस्रो विद्युत: स्मृताः ॥ ६४ ॥
अनेक पुत्रवाले विद्वान् अरिष्टनेमिकी विद्युत् नामवाली चार पत्नियाँ थीं । उनसे सोलह संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ६४ ॥
प्रत्यङ्गिरसजाः श्रेष्ठा ऋचो ब्रह्मर्षिसत्कृताः।
कृशाश्वस्य तु राजर्षेर्देवप्रहरणानि च ॥ ६५ ॥
राजर्षि कृशाश्वके ब्रह्मर्षियोंसे सत्कृत श्रेष्ठ प्रत्यङ्गिरसजा ऋचाएँ और देवताओंके आयुध प्रकट हुए ॥ ६५ ॥
एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि ।
सर्वैदेवगणास्तात त्रयस्त्रिंशत् तु कामजाः ॥ ६६ ॥
तात ! ईश्वरकी कामनासे उत्पन्न होनेवाले तैंतीस देवता सत्ययुग आदि चारों युगोंके एक हजार बार बीतनेपर (प्रत्येक कल्पमें) पुनः उत्पन्न हुआ करते हैं ॥ ६६ ॥
तेषामपि च राजेन्द्र निरोधोत्पत्तिरुच्यते ॥ ६७ ॥
राजेन्द्र ! उन देवताओंकी भी उत्पत्ति और नाशका वर्णन उपलब्ध होता है ॥ ६७ ॥
यथा सूर्यस्य गगने उदयास्तमने इह।
एवं देवनिकायास्ते सम्भवन्ति युगे युगे ॥ ६८ ॥
जैसे आकाशमें सूर्यका उदय और अस्त बारंबार होता रहता है, इसी प्रकार ये देवताओंके समूह प्रत्येक युगमें उत्पन्न ( तथा नष्ट ) होते हैं ॥ ६८ ॥
दित्याः पुत्रद्वयं जज्ञे कश्यपादिति नः श्रुतम् ।
हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षश्च वीर्यवान् ॥ ६९ ॥
(इस प्रकार आदित्योंका वर्णन करके अब दैत्योंका वर्णन करते हैं—) हमने सुना है, कश्यप ऋषिसे दितिके दो पुत्र उत्पन्न हुए थे, (उनमेंसे एक) हिरण्यकशिपु और (दूसरा) वीर्यवान् हिरण्याक्ष था ॥ ६९ ॥
सिंहिका चाभवत् कन्या विप्रचित्तेः परिग्रहः।
सैंहिकेया इति ख्यातास्तस्याः पुत्रा महाबलाः।
गणैश्च सह राजेन्द्र दशसाहस्रमुच्यते ॥ ७० ॥
(इन कश्यप और दितिकी) एक सिंहिका नामवाली कन्या भी थी, वह विप्रचित्तिको विवाही गयी थी। उसके महाबली पुत्र सैंहिकेय नामसे प्रसिद्ध हैं। राजेन्द्र ! वे अपने गणोंसहित दस हजार हैं ॥ ७० ॥
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ।
असंख्याता महाबाहो हिरण्यकशिपोः श्रृणु ॥ ७१ ॥
और उनके सैकड़ों पुत्र और हजारों पौत्र हैं, उनकी गिनती नहीं की जा सकती । महाबाहो ! अब हिरण्यकशिपु-की (संतानोंका वर्णन) सुनो ॥ ७१ ॥
हिरण्यकशिपोः पुत्राश्चत्वारः प्रथितौजसः ।
अनुह्लादश्च ह्लादश्च प्रह्लादश्चैव वीर्यवान् ॥ ७२ ॥
संह्लादश्च चतुर्थोऽभूद्ध्लादपुत्रो हृदस्तथा ।
संह्लादपुत्रः सुन्दश्च निसुन्दस्तावुभौ स्मृतौ ॥ ७३ ॥
हिरण्यकशिपुके अनुह्लाद, ह्लाद, वीर्यवान् प्रह्लाद और चौथा संह्लाद—ये चार प्रसिद्ध पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए। ह्लादका पुत्र हृद हुआ। सुन्द और निसुन्द—ये दोनों संह्लादके पुत्र कहलाते हैं ॥ ७२-७३ ॥
अनुह्लादसुतौ ह्यायुः शिविकालस्तथैव च ।
विरोचनश्च प्राह्लादिर्बलिर्जज्ञे विरोचनात् ॥ ७४ ॥
अनुह्लादके आयु और शिविकाल नामक दो पुत्र थे। प्रह्लादके विरोचन नामक पुत्र हुआ और विरोचनसे बलि नामवाला पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ७४ ॥
बलेः पुत्रशतं त्वासीद् बाणज्येष्ठं नराधिप ।
धृतराष्ट्रश्च सूर्यश्च चन्द्रमाश्चेन्द्रतापनः ॥ ७५ ॥
कुम्भनाभो गर्दभाक्षः कुक्षिरित्येवमादयः ।
बाणस्तेषामतिबलो ज्येष्ठः पशुपतेः प्रियः ॥ ७६ ॥
बलिके सौ पुत्र थे। उनमें बाण (सबसे) बड़ा था। राजन् ! धृतराष्ट्र, सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्रतापन, कुम्भनाभ, गर्दभाक्ष और कुक्षि आदि (बलिके सौ पुत्र थे)। इनमें अतिबली बाण बड़ा था और वह शिवका प्रिय भक्त था ॥ ७५-७६ ॥
पुराकल्पे हि बाणेन प्रसाद्योमापतिं प्रभुम् ।
पार्श्वतो विहरिष्यामि इत्येवं याचितो वरः ॥ ७७ ॥
पहले कल्पमें बाणासुरने उमापति शंकरको प्रसन्न करके यह वर माँगा था कि 'मैं आपके पास विहार करूँ' ॥ ७७ ॥
बाणस्य चेन्द्रदमनो लोहित्यामुपपद्यत ।
गणस्तस्यासुरा राजञ्छतसाहस्रसम्मिताः ॥ ७८ ॥
बाणके लोहिती नामकी पत्नीमें इन्द्रदमन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। राजन् ! लाखों असुर उसके गण थे ॥ ७८ ॥
हिरण्याक्षसुताः पञ्च विद्वांसः सुमहावलाः।
झर्झरः शकुनिश्चैव भूतसंतापनस्तथा ।
महानाभश्च विक्रान्तः कालनाभस्तथैव च ॥ ७९ ॥
हिरण्याक्षके झर्झर, शकुनि, भूतसंतापन, महानाभ और पराक्रमी कालनाभ नामक पाँच पुत्र हुए, वे विद्वान् और परम पराक्रमी थे ॥ ७९ ॥
अभवन् दनुपुत्राश्च शतं तीव्रपराक्रमाः ।
तपस्विनो महावीर्याः प्राधान्येन निबोध तान् ॥ ८० ॥
(अब दनुके वंशका वर्णन करते हैं—) दनुके सौ पुत्र हुए। वे सब परम पराक्रमी, तपस्वी और महावीर्यवान् थे। उनमेंसे मुख्य-मुख्य असुरोंका वर्णन सुनिये ॥ ८० ॥