भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 38

[ हरिवंशपर्व ] तृतीयोऽध्यायः १५


द्विमूर्धा शकुनिश्चैव तथा शङ्कुशिरा विभुः।
शङ्कुकर्णो विराघश्च गवेष्ठी दुन्दुभिस्तथा।
अयोमुखः शम्बरश्च कपिलो वामनस्तथा ॥ ८१ ॥
मरीचिर्मघवांश्चैव इरा शङ्कुशिरा वृकः।
विक्षोभणश्च केतुश्च केतुवीर्यशतह्रदौ ॥ ८२ ॥
इन्द्रजित् सत्यजिच्चैव वज्रनाभस्तथैव च।
महानाभश्च विक्रान्तः कालनाभस्तथैव च ॥ ८३ ॥
एकचक्रो महाबाहुस्तारकश्च महाबलः।
वैश्वानरः पुलोमा च विद्रावणमहासुरौ ॥ ८४ ॥
स्वर्भानुर्वृषपर्वा च तुहुण्डश्च महासुरः।
सूक्ष्मश्चैवातिचन्द्रश्च ऊर्णनाभो महागिरिः ॥ ८५ ॥
असिलोमा च केशी च शठश्च बलको मदः।
तथा गगनमूर्धा च कुम्भनाभो महासुरः ॥ ८६ ॥
प्रमदो मयश्च कुपथो हयग्रीवश्च वीर्यवान्।
वैसृपः सविरूपाक्षः सुपथोऽथ हराहरौ ॥ ८७ ॥
हिरण्यकशिपुश्चैव शतमायश्च शम्बरः।
शरभः शलभश्चैव विप्रचित्तिश्च वीर्यवान् ॥ ८८ ॥
एते सर्वे दनोः पुत्राः कश्यपादभिजज्ञिरे।
विप्रचित्तिप्रधानास्ते दानवाः सुमहाबलाः ॥ ८९ ॥

द्विमूर्धा, शकुनि तथा विभु, शङ्कुशिरा, शङ्कुकर्ण, विराध और गवेष्ठी, दुन्दुभि तथा अयोमुख, शम्बर और कपिल, वामन तथा मरीचि, मघवान् और इरा, शङ्कुशिरा, वृक; विक्षोभण और केतु तथा केतुवीर्य, शतह्रद, इन्द्रजित्, सत्यजित् और वज्रनाभ तथा महानाम और विक्रान्त, कालनाम, महाभुज एकचक्र और महाबली तारक, वैश्वानर, पुलोमा, विद्रावण और महासुर, स्वर्भानु, वृषपर्वा और महान् असुर तुहुण्ड, सूक्ष्म और अतिचन्द्र तथा ऊर्णनाभ, महागिरि, असिलोमा और केशी एवं शठ तथा बलक, मद तथा गगनमूर्धा और महान् असुर कुम्भनाभ, प्रमद, मय और कुपथ, हयग्रीव और वीर्यवान् वैसृप, विरूपाक्षसहित सुपथ और हर, अहर, हिरण्यकशिपु तथा सैकड़ों प्रकारकी माया जाननेवाला शम्बर, शरभ, शलभ और वीर्यवान् विप्रचित्ति—ये सब दनुके पुत्र कश्यपजीसे उत्पन्न हुए थे। इनमें विप्रचित्ति प्रधान था। ये सब दानव बड़े बलवान् थे॥८१-८९॥

एतेषां यदपत्यं तु तन्न शक्यं नराधिप।
प्रसंख्यातुं महीपाल पुत्रपौत्रायनन्तकम् ॥ ९० ॥

नराधिप ! इनकी जो संतानें हुईं, उनकी गिनती नहीं की जा सकती। महीपाल ! इनके अनन्त पुत्र-पौत्र उत्पन्न हुए ॥ ९० ॥

स्वर्भानोस्तु प्रभा कन्या पुलोम्नश्च सुतात्रयम्।
उपदानवी हयशिराः शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥ ९१ ॥

उपदानवी, हयशिरा ( तथा शची ) तीन कन्याएँ उत्पन्न हुईं। वृषपर्वाके शर्मिष्ठा नामकी पुत्री उत्पन्न हुई ॥ ९१ ॥

पुलोमा कालिका चैव वैश्वानरसुते उभे।
बह्वपत्ये महावीर्ये मारीचेस्तु परिग्रहः ॥ ९२ ॥

वैश्वानर दानवकी पुलोमा और कालिका नामकी दो पुत्रियाँ हुईं। ये दोनों मरीचिनन्दन कश्यपको विवाही गयीं, ये बड़ी शक्तिशालिनी थीं। इन कन्याओंके बहुत-सी संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ९२ ॥

तयोः पुत्रसहस्राणि षष्टि दानवनन्दनान्।
चतुर्दशशतान्यान्य हिरण्यपुरवासिनः ॥ ९३ ॥
मारीचिर्जनयामास महता तपसान्वितः।
पौलोमाः कालकेयाश्च दानवास्ते महाबलाः ॥ ९४ ॥
अवध्या देवतानां च हिरण्यपुरवासिनः।
कृताः पितामहेनाजौ निहताः सव्यसाचिना ॥ ९५ ॥

परम तपस्वी मारीचि ( कश्यप ) ने उन दोनों स्त्रियोंमें दानवोंको आनन्द देनेवाले साठ हजार पुत्रोंको जन्म दिया। फिर चौदह सौ पुत्र और उत्पन्न किये। ये सब हिरण्यपुरमें रहते थे। इन हिरण्यपुरमें रहनेवाले महाबली पौलोम और कालकेय दानवोंको ब्रह्माजीने ( वर देकर ) देवताओंसे भी अवध्य ( न मारे जानेयोग्य ) कर दिया था। अर्जुनने इनको रणमें मार डाला था ॥९३-९५॥

प्रभाया नहुषः पुत्रः संजयश्च शचीसुतः।
पूरूं जज्ञेऽथ शर्मिष्ठा दुष्मन्तमपदानवी ॥ ९६ ॥

प्रभाके नहुष नामक पुत्र हुआ और शचीके संजय। शर्मिष्ठाने पूरुको उत्पन्न किया और उपदानवीने दुष्मन्तको ॥

ततोऽपरे महावीर्या दानवास्त्वतिदारुणाः।
सिंहिकायामथोत्पन्ना विप्रचित्तेः सुतास्तदा॥ ९७ ॥
दैत्यदानवसंयोगाज्जातास्तीव्रपराक्रमाः।
सैंहिकेया इति ख्यातास्त्रयोदश महाबलाः ॥ ९८ ॥

तदनन्तर और भी बहुत-से महावीर्यवान् अतिदारुण दानव सिंहिकामें विप्रचित्तिसे उत्पन्न हुए, फिर दैत्य-दानवोंके संयोगसे विप्रचित्तिके बहुत-से तीव्र पराक्रमी पुत्र हुए। इनमें तेरह महाबली दानव 'सैंहिकेय' नामसे प्रसिद्ध हैं ॥९७-९८॥

व्यंशः शल्यश्च बलिनौ नभश्चैव महाबलः।
वातापिर्नमुचिश्चैव इल्वलः खसृमस्तथा ॥ ९९ ॥
आञ्जिको नरकश्चैव कालनाभस्तथैव च।
शुकः पोतरणश्चैव वज्रनाभश्च वीर्यवान् ॥ १०० ॥

( उनके नाम इस प्रकार हैं—) बलवान् व्यंश और शल्य, महाबली नभ, वातापि और नमुचि, इल्वल तथा खसृम, आञ्जिक और नरक तथा कालनाभ, शुक और पोतरण तथा वीर्यवान् वज्रनाभ ॥ ९९-१०० ॥