भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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हरिवंशपर्व ] तृतीयोऽध्यायः १७


[ बायाँ स्तम्भ ]

इराने वृक्ष, लता, बेल तथा सर्व प्रकारकी घासोंको उत्पन्न किया। खशाने यक्षों और राक्षसोंको तथा मुनिने अप्सराओंको जन्म दिया॥ ११८॥

अरिष्टा तु महासत्त्वान् गन्धर्वानमितौजसः।
एते कश्यपदायादाः कीर्तिताः स्थाणुजंगमाः ॥११९॥

अरिष्टाने महासत्त्ववाले अमित पराक्रमी गन्धर्वोंको उत्पन्न किया। यह कश्यप ऋषिकी स्थावर और जंगम संतानोंका वर्णन हुआ॥ ११९॥

तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः।
एष मन्वन्तरे तात सर्गः स्वारोचिषे स्मृतः ॥१२०॥

इनके सैकड़ों पुत्र और हजारों पौत्र हुए। तात! यह स्वारोचिष मन्वन्तरकी सृष्टिका वर्णन है॥ १२०॥

वैवस्वते तु महति वारुणे वितते क्रतौ।
जुह्वानस्य ब्रह्मणो वै प्रजासर्ग इहोच्यते ॥१२१॥

जब वैवस्वत मन्वन्तरमें वरुणदेवतासम्बन्धी बड़ा भारी यज्ञ चल रहा था, तब ब्रह्माजीके आहुति देते समय प्रजाओंको रचनेका जो क्रम चला था, उसका यहाँ वर्णन किया जाता है॥ १२१॥

पूर्वं यत्र तु ब्रह्मर्षीनुत्पन्नान् सप्त मानसान्।
पुत्रत्वे कल्पयामास स्वयमेव पितामहः ॥१२२॥

उस समय पितामह ब्रह्माजीने पहले अपने मनके संकल्पसे उत्पन्न हुए सात ब्रह्मर्षियोंको स्वयं ही अपने औरस पुत्रके रूपमें स्वीकार किया॥ १२२॥

ततो विरोधे देवानां दानवानां च भारत।
दितिर्विंनष्टपुत्रा वै तोषयामास कश्यपम् ॥१२३॥

भारत! तदनन्तर जब देवता और दैत्योंमें विरोध होनेपर दितिके पुत्र नष्ट हो गये, तब उसने (महर्षि) कश्यपको (फिर) प्रसन्न किया॥ १२३॥

तां कश्यपः प्रसन्नात्मा सम्यगाराधितस्तया।
वरेण च्छन्दयामास सा च वव्रे वरं ततः ॥१२४॥
पुत्रमिन्द्रवधार्थाय समर्थममितौजसम्।
स च तस्यै वरं प्रादात् प्रार्थितं सुमहातपाः ॥१२५॥

उसके भलीभाँति आराधना करनेपर कश्यपजीका चित्त प्रसन्न हो गया और उन्होंने उससे वर माँगनेके लिये कहा। तब उस दितिने वर माँगा कि 'मुझे इन्द्रका वध करनेके लिये अमित पराक्रमी पुत्र दीजिये।' यह सुनकर उन महातपस्वी कश्यपने उसका माँगा हुआ वर उसको दे दिया॥ १२४-१२५॥

दत्त्वा च वरमव्यग्रो मारीचस्तामभाषत।
भविष्यति सुतस्तेऽयं यद्येवं धारयिष्यसि ॥१२६॥
इन्द्रं सुतो निहन्ता ते गर्भं वै शरदां शतम्।
यदि धारयसे शौचं तत्परा व्रतमास्थिता ॥१२७॥


[ दायाँ स्तम्भ ]

वह वर देकर कश्यप मुनि उससे शान्तभावसे बोले—'यदि तुम इस (गर्भ) को मेरी बतायी हुई विधिसे धारण कर सकोगी तो तुम्हारा पुत्र इन्द्रको मारनेवाला होगा। तुम्हें पवित्रतापूर्वक रहनेका व्रत लेकर सौ वर्षतक अपने उदरमें इस गर्भको धारण करना पड़ेगा। यदि तुम ऐसा कर सकोगी तो वह पुत्र इन्द्रको मारनेवाला होगा'॥ १२६-१२७॥

तथेत्यभिहितो भर्त्रा तया देव्या महातपाः।
धारयामास गर्भं तु शुचिः सा वसुधाधिप ॥१२८॥

तब उस देवीने अपने महातपस्वी स्वामीसे कहा कि 'अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगी।' राजन्! फिर वह गर्भको धारण कर पवित्रतापूर्वक रहने लगी॥ १२८॥

ततोऽभ्युपागमद् दित्यां गर्भमाधाय कश्यपः।
रोचयन् वै गणश्रेष्ठं देवानामितौजसाम् ॥१२९॥
तेजः सम्भृत्य दुर्धर्षमवध्यममरैरपि।
जगाम पर्वतायैव तपसे शंसितव्रतः ॥१३०॥

अमितपराक्रमी देवताओंके श्रेष्ठ गणको प्रकाशित करनेवाले कश्यपजी इस प्रकार दितिमें गर्भको स्थापित कर वहाँसे चल दिये। वे प्रशंसित तपवाले (महर्षि दितिमें) देवताओंसे भी अवध्य अपने दुर्धर्ष तेजको स्थापित करके तप करनेके लिये पर्वतपर चले गये॥ १२९-१३०॥

तस्याश्चैवान्तरप्रेप्सुरभवत् पाकशासनः।
ऊने वर्षशते चास्या ददर्शान्तरमच्युतः ॥१३१॥

(इधर) इन्द्र उसके छिद्रको ढूँढ़ने लगे और अच्युत इन्द्रने सौ वर्ष पूर्ण होनेसे पहले ही उसका दोष देख लिया॥ १३१॥

अकृत्वा पादयोः शौचं दितिः शयनमाविशत्।
निद्रां च कारयामास तस्याः कुक्षिं प्रविश्य सः॥१३२॥

(एक बार) दिति बिना पैर धोये ही शयन करनेके लिये चली गयी। इसी समय इन्द्रने उसकी कोखमें घुसकर उसे (अपनी मायासे) निद्राके अधीन कर दिया॥ १३२॥

वज्रपाणिस्ततो गर्भं सप्तधा तं न्यकृन्तत।
स पाट्यमानो वज्रेण गर्भस्तु प्ररुरोद ह ॥१३३॥

फिर वज्रपाणि इन्द्रने उस गर्भके सात टुकड़े कर डाले, वज्रसे काटे जानेपर वह गर्भ जोर-जोरसे रोने लगा॥ १३३॥

मा रोदीरिति तं शक्रः पुनः पुनरथाब्रवीत्।
सोऽभवत् सप्तधा गर्भस्तमिन्द्रो रुषितः पुनः॥१३४॥
एकैकं सप्तधा चक्रे वज्रेणैवारिकर्शनः।
मरुतो नाम देवास्ते बभूवुर्भरतर्षभ ॥१३५॥

तब उस गर्भसे इन्द्रने बार-बार 'मा रोदीः-मत रो' इस प्रकार कहा और उस गर्भके सात टुकड़े हो गये, तब