भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 41

१८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

शत्रुओंको नष्ट करनेवाले इन्द्र फिर क्रोधमें भरकर वज्रद्वारा उस प्रत्येक टुकड़ेके भी सात-सात टुकड़े कर डाले। भरतर्षभ ! वे मरुत् नामक (उनचास) देवता हुए ॥

यथोक्तं मघवता तथैव मरुतोऽभवन्।
देवा एकोनपञ्चाशत् सहाया वज्रपाणिना ॥ १३६॥

इन्द्रने चूँकि (मा रोदीः) कहा था, इसलिये वे मरुत् नामक देवता हो गये। वे उनचास हैं और वज्रपाणि इन्द्रकी सहायता करते हैं ॥ १३६ ॥

तेषामेवं प्रवृद्धानां भूतानां जनमेजय।
रोचयन् वै गणश्रेष्ठं देवानामितौजसाम् ॥ १३७॥
निकायेषु निकायेषु हरिः प्रादात् प्रजापतीन्।
क्रमशस्तानि राज्यानि पृथुपूर्वाणि भारत ॥ १३८॥

जनमेजय ! जब वे प्राणी इस प्रकार बढ़ गये, तब अमितपराक्रमी देवताओंकी श्रेष्ठ मण्डलीको प्रकाशित करनेवाले हरिने उनकी टोलियोंमें प्रजापति नियुक्त कर दिये। भारत ! फिर उन्होंने पृथुको पहले राज्य अर्पण किया, तबसे ये राज्य क्रमशः चले आ रहे हैं॥ १३७-१३८॥

स हरिः पुरुषो वीरः कृष्णो जिष्णुः प्रजापतिः।
पर्जन्यस्तपनोऽव्यक्तस्तस्य सर्वमिदं जगत् ॥ १३९॥

वे हरि पुरुष, वीर, कृष्ण, जिष्णु और प्रजापति हैं तथा वे ही मेघ, सूर्य और अव्यक्त हैं एवं यह सब जगत् उन्हींका है ॥ १३९ ॥

भूतसर्गमिमं सम्यग्जानतो भरतर्षभ।
मरुतां च शुभं जन्म शृण्वतः पठतोऽपि वा।
नावृत्तिभयमस्तीह परलोकभयं कुतः ॥ १४०॥

भरतर्षभ ! इस भूतसृष्टिको पूर्णरूपसे जाननेवाले और मरुतोंके शुभ जन्मको सुनने या पढ़नेवालेको जन्म-मरणका भय नहीं रहता, फिर परलोकका भय तो होगा ही कहाँसे ? ॥ १४० ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि मरुदुत्पत्तिकथने तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें मरुतोंकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥


चतुर्थोऽध्यायः

पृथुका उपाख्यान, राज्यवितरण और दिक्पालोंकी प्रतिष्ठा

वैशम्पायन उवाच

अभिषिच्याधिराज्ये तु पृथुं वैन्यं पितामहः।
ततः क्रमेण राज्यानि व्यादेष्टुमुपचक्रमे ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! पितामह (में विराजमान हरि) ने राजाओंके ऊपर भी अधिराजारूपसे वेनके पुत्र पृथुका अभिषेक किया, फिर (उन प्रजापतिने) क्रमशः राज्यका वितरण आरम्भ किया ॥ १ ॥

द्विजानां वीरुधां चैव नक्षत्रग्रहयोस्तथा।
यज्ञानां तपसां चैव सोमं राज्येऽभ्यषेचयत् ॥ २ ॥

(प्रजापतिने) द्विज, लता, नक्षत्र, ग्रह, यज्ञ और तपके राज्यपर चन्द्रमाका अभिषेक किया ॥ २ ॥

अपां तु वरुणं राज्ये राज्ञां वैश्रवणं प्रभुम्।
बृहस्पतिं तु विश्वेषां ददावाङ्गिरसं पतिम् ॥ ३ ॥

जलके राज्यपर वरुणका तथा राजाओं (और यक्षों) के राज्यपर विश्रवाके पुत्र कुबेरका अभिषेक कर दिया। विश्वेदेवोंपर अङ्गिरागोत्री वृहस्पतिको राजा बना दिया ॥ ३ ॥

भृगूणामधिपं चैव काव्यं राज्येऽभ्यषेचयत्।
आदित्यानां तथा विष्णुं वसूनामथ पावकम् ॥ ४ ॥

भृगुवंशियोंके स्वामीरूपसे शुक्राचार्यका राज्याभिषेक कर दिया। आदित्योंके ऊपर विष्णुको और वसुओंके ऊपर अग्नि-को (राजा बना दिया) ॥ ४ ॥

प्रजापतीनां दक्षं तु मरुतामथ वासवम्।
दैत्यानां दानवानां च प्रह्लादममितौजसम् ॥ ५ ॥
वैवस्वतं च पितॄणां यमं राज्येऽभ्यषेचयत्।

दक्षको प्रजापतियोंका, इन्द्रको मरुतोंका तथा अमित पराक्रमी प्रह्लादको दैत्य और दानवोंका राजा बना दिया एवं पितरोंके राज्यपर विवस्वान् (सूर्य) के पुत्र यमका अभिषेक कर दिया ॥ ५ १/२ ॥

मातृणां च व्रतानां च मन्त्राणां च तथा गवाम् ॥ ६ ॥
यक्षाणां राक्षसानां च पार्थिवानां तथैव च।
नारायणं तु साध्यानां रुद्राणां वृषभध्वजम् ॥ ७ ॥

षोडशमातृका, व्रत, मन्त्र, गौ, यक्ष, राक्षस, पार्थिव पदार्थ और साध्य देवताओंके राज्यपर नारायणका अभिषेक कर दिया और रुद्रोंके राज्यपर वृषभध्वज (शंकरजी) अभिषिक्त हुए ॥ ६-७॥

विप्रचित्तिं तु राजानं दानवानांमथादिशत्।
सर्वभूतपिशाचानां गिरिशं शूलपाणिनम् ॥ ८ ॥

विप्रचित्तिको दानवोंका राजा बननेका आदेश दे