विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 44, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] पञ्चमोऽध्यायः २१
वेदधर्मानतिक्रम्य सोऽधर्मनिरतोऽभवत् ॥ ४ ॥
वह राजा धर्मविहीन मर्यादाको स्थापित करने लगा और वेदोक्त धर्मोंका उल्लङ्घन कर अधर्ममें फँस गया ॥ ४ ॥
निःस्वाध्यायवषट्कारास्तस्मिन् राजनि शासति।
प्रवृत्तं न पपुः सोमं हुतं यज्ञेषु देवताः ॥ ५ ॥
उस राजाके शासनकालमे देवतालोग (उनकी तृप्तिके लिये किये जानेवाले) स्वाध्याय और वषट्कारसे वञ्चित हो गये थे; इसलिये अपने उद्देश्यसे अर्पित तथा यज्ञकुण्डोंमें होमे गये सोमका भी वे पान नहीं करते थे ॥ ५ ॥
न यष्टव्यं न होतव्यमिति तस्य प्रजापतेः।
आसीत् प्रतिज्ञा क्रूरेयं विनाशे प्रत्युपस्थिते ॥ ६ ॥
उसका विनाशकाल समीप आ गया था, अतः उस प्रजापतिने यह क्रूर प्रतिज्ञा घोषित की कि 'मेरे राज्यमें कोई यज्ञ और हवन न करे' ॥ ६ ॥
अहमिज्यश्च यष्टा च यज्ञश्चेति कुरुद्वह।
मयि यज्ञो विधातव्यो मयि होतव्यमित्यपि ॥ ७ ॥
कुरुश्रेष्ठ ! (वह कहता था कि) 'मैं ही यज्ञोंद्वारा आराध्य और मैं ही यज्ञ करनेवाला हूँ तथा यज्ञ भी मैं ही हूँ। मेरे लिये ही यज्ञ और हवन करना चाहिये' ॥ ७ ॥
तमतिक्रान्तमर्यादमाददानमसाम्प्रतम्।
ऊचुर्महर्षयः सर्वे मरीचिप्रमुखास्तदा ॥ ८ ॥
जब वह इस प्रकार मर्यादाको तोड़ने लगा और अनुचितरूपसे (कर आदि लगाकर) सब कुछ लूटने लगा, तब जो मरीचि आदि बड़े-बड़े ऋषि थे, उन्होंने उससे कहा—॥८॥
वयं दीक्षां प्रवेक्ष्यामः संवत्सरगणान् बहून्।
अधर्मं कुरु मा वेन नैष धर्मः सनातनः ॥ ९ ॥
'हम बहुत वर्षोंमें पूर्ण होनेवाली दीक्षामें प्रवेश करेंगे। वेन ! अब तुम अधर्म न करो; क्योंकि यह सनातन धर्म नहीं है ॥ ९ ॥
निधनेऽत्र प्रसूतस्त्वं प्रजापतिरसंशयम्।
प्रजाश्च पालयिष्येऽहमिति ते समयः कृतः ॥ १० ॥
'निःसंदेह तुम इस वंशमें प्रजापतिके रूपमें उत्पन्न हुए हो और तुमने प्रतिज्ञा की थी कि 'मैं प्रजाका पालन करूँगा' ॥१०॥
तांस्तदा ब्रुवतः सर्वान् महर्षीनब्रवीत् तदा।
वेनः प्रहस्य दुर्बुद्धिरिममर्थमनर्थवित् ॥ ११ ॥
जब महर्षि इस प्रकार कह रहे थे, उस समय अनर्थको अपनानेवाले दुर्बुद्धि वेनने हँसकर उन लोगोंसे ये बातें कहीँ ॥
वेन उवाच
स्रष्टा धर्मस्य कश्चान्यः श्रोतव्यं कस्य वै मया।
श्रुतवीर्यतपःसत्यैर्मया वा कः समो भुवि ॥ १२ ॥
वेनने कहा—धर्मका रचनेवाला मेरे सिवा और कौन है ? मैं किसकी बात सुनूँ ? इस पृथ्वीपर वेद, वीर्य, तप और सत्यमें मेरे समान दूसरा कौन है ? ॥ १२ ॥
प्रभवं सर्वभूतानां धर्माणां च विशेषतः।
सम्मूढा न विदुर्नूनं भवन्तो मामचेतसः ॥ १३ ॥
आपलोग मूर्ख हैं और अचेत हो रहे हैं, अतः सब भूतोंके और विशेषतः धर्मोंके उत्पत्तिस्थान मुझ वेनको नहीं जानते ॥ १३ ॥
इच्छन् दहेयं पृथिवीं प्लावयेयं तथा जलैः।
खं भुवं चैव रुन्धेयं नात्र कार्या विचारणा ॥ १४ ॥
मैं चाहूँ तो पृथ्वीको भस्म कर दूँ अथवा इसको जलमें डुबो दूँ और पृथ्वी तथा आकाशको भी (अपने तेजसे) ढक दूँ; इसमें विचार करनेकी कोई बात नहीं है ॥ १४ ॥
यदा न शक्यते मोहादवलेपाच्च पार्थिवः।
अनुनेतुं तदा वेनस्ततः क्रुद्धा महर्षयः ॥ १५ ॥
गर्व और मोहके वशमें पड़े हुए उस राजा वेनको जब वे ऋषि अधर्म करनेसे न रोक सके, तब वे क्रोधमें भर गये ॥
निगृह्य तं महात्मानो विस्फुरन्तं महाबलम्।
ततोऽस्य सव्यमूरुं ते ममन्थुर्जातमन्यवः ॥ १६ ॥
फिर तो वे महात्मा उस उछल-कूद मचाते हुए महाबली राजाको बलपूर्वक पकड़कर क्रोधमें भर उसकी दाहिनी जाँघको मथने लगे ॥ १६ ॥
तस्मिंस्तु मथ्यमाने वै राज्ञ ऊरौ प्रजज्ञिवान्।
ह्रस्वाऽतिमात्रः पुरुषः कृष्णाभ्रश्चाति बभूव ह ॥ १७ ॥
राजाकी उस जङ्घाके मथे जानेपर उसमेंसे बहुत ठिगना और बहुत ही काला एक पुरुष निकला ॥ १७ ॥
स भीतः प्राञ्जलिर्भूत्वा स्थित्वाञ्जनमेजय।
तमत्रिर्विह्वलं दृष्ट्वा निषीदेत्यब्रवीत् तदां ॥ १८ ॥
जनमेजय ! वह डरा हुआ था, अतः हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तब अत्रिने उसे भयसे विह्वल देखकर उससे कहा 'निषीद—बैठ जा' ॥ १८ ॥
निषादवंशकर्तासौ बभूव वदतां वर।
धीवरानसृजच्चाथ वेनकल्मषसम्भवान् ॥ १९ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ जनमेजय ! वह निषादोंके वंशका चलानेवाला हुआ और उसने धीवरोंको जन्म दिया। ये सभी वेनके पापसे उत्पन्न हुए थे ॥ १९ ॥
ये चान्ये विन्ध्यनिलयास्तुषारास्तुम्बुरास्तथा।
अधर्मरुचयो ये च विद्धि तान् वेनसम्भवान् ॥ २० ॥