विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 45, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| २२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
इन धीवरोंके अतिरिक्त और भी जो विन्ध्यमें रहनेवाले तुषार, तुम्बर तथा अधर्मसे प्रेम करनेवाले वनवासी ( गोण्ड-कोल आदि ) हैं, इन सबको तुम वेन ( के पाप ) से उत्पन्न हुआ समझो ॥ २० ॥
ततः पुनर्महात्मानः पाणिं वेनस्य दक्षिणम्।
अरणीमिव संरुद्धा ममन्थुस्ते महर्षयः ॥ २१ ॥
तदनन्तर वे क्रोधमें भरे हुए महात्मा महर्षि वेनके दाहिने हाथको अरणीके समान मथने लगे ॥ २१ ॥
पृथुस्तस्मात् समुत्तस्थौ कराज्ज्वलनसंनिभः ।
दीप्यमानः स्ववपुषा साक्षादग्निरिव ज्वलन् ॥ २२ ॥
तब उस हाथसे अग्निके समान पृथु उत्पन्न हुए, वे अपने शरीरसे साक्षात् प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २२ ॥
स धन्वी कवची जातः पृथुरेव महायशाः ।
आद्यमाजगवं नाम धनुर्गृह्य महारवम् ।
शरांश्र्च दिव्यान् रक्षार्थं कवचं च महाप्रभम् ॥ २३ ॥
महायशस्वी पृथु हाथमें धनुष और बाणको धारण किये हुए और रक्षाके लिये महाकान्तिमान् कवच और दिव्य बाणोंको धारण किये हुए ही उत्पन्न हुए। वे हाथमें महान् शब्द करनेवाले प्राचीन आजगव नामक धनुषको धारण किये हुए थे ॥ २३ ॥
तस्मिञ्जातेऽथ भूतानि सम्प्रहृष्टानि सर्वशः ।
समापेतुर्महाराज वेनश्च त्रिदिवं गतः ॥ २४ ॥
महाराज ! उनके उत्पन्न होनेपर सब प्राणी प्रसन्न होकर उनके पास दौड़ आये और वेन स्वर्गको चला गया ॥ २४ ॥
समुत्पन्नेन कौरव्य सत्पुत्रेण महात्मना ।
त्रातः स पुरुषव्याघ्र पुन्नाम्नो नरकात् तदा ॥ २५ ॥
पुरुषव्याघ्र कौरव ! उस महात्मा सत्पुत्रके उत्पन्न होनेपर उस वेनकी 'पुं' नामक नरकसे रक्षा हो गयी ॥ २५ ॥
तं समुद्राश्च नद्यश्च रत्नान्यादाय सर्वशः ।
तोयानि चाभिषेकार्थं सर्व एवोपतिष्ठिरे ॥ २६ ॥
उन पृथुका अभिषेक करनेके लिये सब समुद्र और नदियाँ चारों ओरसे जल और रत्न लेकर वहाँ उपस्थित हुईं ॥
पितामहश्च भगवान् देवैराङ्गिरसैः सह ।
स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि तथैव च ॥ २७ ॥
समागम्य तदा वैन्यमभ्यषिञ्चन्नराधिपम् ।
महता राजराज्येन प्रजापालं महाद्युतिम् ॥ २८ ॥
भगवान् पितामह भी अङ्गिराके पुत्र, पौत्रों तथा सभी देवताओंके साथ वहाँ आये और स्थावर-जङ्गम प्राणियोंने भी वहाँ आकर महाकान्तिमान् वेनके प्रजापालक पुत्र पृथुका बड़े भारी राजाधिराज-पदपर अभिषेक कर दिया ॥ २७-२८ ॥
सोऽभिषिक्तो महातेजा विधिवद्धर्मकोविदैः ।
आदिराज्ये तदा राज्ञां पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ॥ २९ ॥
पित्रापरञ्जितास्तस्य प्रजास्तेनानुरञ्जिताः ।
अनुरागात् ततस्तस्य नाम राजेत्यजायत ॥ ३० ॥
जब धर्मके जाननेवालोंने महातेजस्वी और प्रतापी वेनके पुत्र पृथुका राजाओंके आदिराज्य ( साम्राज्य )-पदपर विधिवत् अभिषेक कर दिया, तब उन्होंने पिताद्वारा पीड़ित की हुई प्रजाको अपनी सेवाओंसे खूब प्रसन्न किया। इस प्रकार प्रजासे अनुराग करनेके कारण उनका नाम राजा पड़ गया ॥
आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः ।
पर्वताश्च ददुर्मार्गं ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥ ३१ ॥
जब ये समुद्रपर चलते थे, तब जल स्तम्भित हो जाता था ( अर्थात् समुद्रका जल स्थलकी तरह कड़ा हो जाता था ) और जब ये आकाशमें चलते थे, तब पर्वत इनके लिये मार्ग छोड़ देते थे। इस कारण इनके रथकी ध्वजा वृक्ष आदिसे कभी नहीं टूटती थी ॥ ३१ ॥
अकृष्टपच्या पृथिवी सिध्यन्त्यन्नानि चिन्तया ।
सर्वकामदुघा गावः पुटके पुटके मधु ॥ ३२ ॥
( उनके शासनकालमें ) पृथ्वी बिना जोते हुए ही अन्न देती थी। चिन्तनमात्रसे ही अन्न ( भोज्य पदार्थ ) तैयार हो जाते थे, गौएँ कामधेनुके समान सब कामनाओंको पूर्ण करती थीं और वृक्षोंके पत्ते-पत्तेमें मधुर रस भरा रहता था ॥ ३२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु यज्ञे पैतामहे शुभे ।
सूतः सूत्यां समुत्पन्नः सौत्येऽहनि महामतिः॥ ३३ ॥
इन्हींके ( राज्यत्व ) कालमें पितामहके शुभ यज्ञमें सोमको निकालनेके दिन सोमका अभिषव करते समय अर्थात् रस निकालनेके लिये सोमलताको कूटते समय महाबुद्धिमान् सूतकी उत्पत्ति हुई थी ॥ ३३ ॥
तस्मिन्नेव महायज्ञे जज्ञे प्राज्ञोऽथ मागधः ।
पृथोः स्तवार्थं तौ तत्र समाहूतौ सुरर्षिभिः ॥ ३४ ॥
तदनन्तर उसी महायज्ञमें बुद्धिमान् मागध प्रकट हुआ। देवता और ऋषियोंने पृथुकी स्तुति करनेके लिये उन दोनोंका वहाँ आवाहन किया था ॥ ३४ ॥
तावुचुऋषयः सर्वे स्तूयतामेष पार्थिवः ।
कर्मैतदनुरूपं वां पात्रं चायं नराधिपः ॥ ३५ ॥
सब ऋषियोंने उन दोनोंसे कहा कि तुम दोनों इन पृथिवीपतिकी स्तुति करो, यह कर्म तुम्हारे अनुरूप है और ये राजा भी स्तुतिके पात्र हैं ॥ ३५ ॥
तावूचतुस्तदा सर्वोस्तानृषीन् सूतमागधौ ।
आवां देवानृषींश्चैव प्रीणयावः स्वकर्मभिः ॥ ३६ ॥
उस समय सूत और मागधने उन सब ऋषियोंसे कहा,