विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 46, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] पञ्चमोऽध्यायः [ २३
'हम अपने कर्मोंसे देवता और ऋषियोंको प्रसन्न करेंगे ॥ ३६॥
न चास्य विद्मो वै कर्म न तथा लक्षणं यशः ।
स्तोत्रं येनास्य कुर्याम राज्ञस्तेजस्विनो द्विजाः॥ ३७॥
'परंतु ब्राह्मणो ! इन तेजस्वी राजाके कर्म, लक्षण और यशको तो हम जानते ही नहीं, जिससे इनकी स्तुति करें' ॥ ३७॥
ऋषिभिस्तौ नियुक्तौ च भविष्यैः स्तूयतामिति।
यानि कर्माणि कृत्वाम् पृथुः पश्चान्महाबलः ॥ ३८ ॥
तब ऋषियोंने उन्हें यह कहकर स्तुति-कार्यमें नियुक्त किया कि 'तुम दोनों इनके भविष्यमे होनेवाले गुणोंका उल्लेख करते हुए स्तवन करो।' उन्होंने वैसा ही किया। सूत और मागधने जो-जो कर्म बताये, उन्हींको महाबली पृथुने पीछेसे पूर्ण किया ॥ ३८॥
'सत्यवाग् दानशीलोऽयं सत्यसंधो नरेश्वरः ।
श्रीमाञ्जैत्रः क्षमाशीलो विक्रान्तो दुष्टशासनः ॥ ३९ ॥
(सूत और मागधने राजा पृथुकी स्तुति इस प्रकार आरम्भ की—) 'ये नरेश्वर सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाले, सत्यवादी, दान देनेवाले, लक्ष्मीवान् और विजयी हैं। ये क्षमा करनेवाले, पराक्रमी तथा दुष्टोंका शासन करनेवाले हैं॥ ३९॥
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च दयावान् प्रियभाषणः ।
मान्यो मानयिता यज्वा ब्रह्मण्यः सत्यसंगरः ॥ ४० ॥
'ये धर्मज्ञ, कृतज्ञ, दयावान् और प्रिय भाषण करनेवाले हैं। ये माननीय हैं और (दूसरोंका) मान करनेवाले हैं। यज्ञ करनेवाले, ब्राह्मण-भक्त तथा सत्यप्रतिज्ञ हैं॥ ४०॥
शमः शान्तश्च निरतो व्यवहारस्थितो नृपः ।
ततः प्रभृति लोकेषु स्तवेषु जनमेजय ।
आशीर्वादाः प्रयुज्यन्ते सूतमागधवन्दिभिः ॥ ४१ ॥
'ये राजा शमसम्पन्न, शान्त, कार्यतत्पर तथा अपने व्यवहारमें संलग्न रहनेवाले हैं।' जनमेजय ! उसी समयसे लोगोंमे स्तुतिके अवसरोंपर सूत, मागध और वन्दियोंके द्वारा आशीर्वाद दिलानेकी प्रथा प्रचलित हुई ॥ ४१ ॥
तयोः स्तवैस्तैः सुप्रीतः पृथुः प्रादात् प्रजेश्वरः।
अनूपदेशं सूताय मगधान् मागधाय च ॥ ४२ ॥
प्रजाओके ईश्वर पृथुने उन दोनोंके इन स्तोत्रोंसे प्रसन्न होकर सूतको अनूपदेश और मागधको मगध देश दे दिया ॥ ४२ ॥
तं दृष्ट्वा परमप्रीताः प्रजाः प्राहर्महर्षयः ।
वृत्तीनामेष वो दाता भविष्यति जनेश्वरः ॥ ४३ ॥
इस बातको देखकर महर्षि परम प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रजाओसे कहा, 'ये जनेश्वर (राजा) तुम्हें वृत्ति-आजीविका देनेवाले होंगे' ॥ ४३ ॥
ततो वैन्यं महाराज प्रजाः समभिदुद्रुवुः ।
त्वं नो वृत्तिं विधत्स्वेति महर्षिवचनात् तदा ॥ ४४ ॥
महाराज ! महर्षियोंके ऐसा कहनेपर प्रजा वेनपुत्र राजा पृथुके पास दौड़-दौड़कर आने और कहने लगी कि 'आप हमारी वृत्तिका प्रबन्ध कीजिये' ॥ ४४॥
सोऽभिद्रुतः प्रजाभिस्तु प्रजाहितचिकीर्षया ।
धनुर्गृह्य पृषत्कांश्च पृथिवीमाद्रवद् बली ॥ ४५ ॥
जब प्रजा उनके पास इस प्रकार दौड़कर आयी, तब वे महाबली नरेश प्रजाका हित करनेकी इच्छासे अपने धनुष और बाण लेकर पृथिवीको लक्ष्य करके दौड़े॥४५॥
ततो वैन्यभयन्त्रस्ता गौर्भूत्वा प्राद्रवन्मही ।
तां पृथुर्धनुरादाय द्रवन्तीमन्वधावत ॥ ४६ ॥
तब तो पृथिवी वेन-कुमार पृथुके भयसे त्रस्त हो गौका रूप धारणकर भागने लगी। पृथु भी धनुष लेकर उस भागती हुई पृथिवीके पीछे दौड़ने लगे ॥ ४६॥
सा लोकान् ब्रह्मलोकादीन् गत्वा वैन्यभयात् तदा।
प्रददर्शाग्रतो वैन्यं प्रगृहीतशरासनम् ॥४७॥
पृथिवी राजा पृथुके भयसे ब्रह्मलोक आदि लोकोंमे गयी; परन्तु (उसने सर्वत्र ही) वेनपुत्र पृथुको हाथमें धनुष-बाण धारण किये अपने सामने खड़ा हुआ देखा ॥ ४७ ॥
ज्वलद्भिर्निशितैर्बाणैर्दीप्तस्तेजसमच्युतम् ।
महायोगं महात्मानं दुर्धर्षममरैरपि ॥ ४८ ॥
अलभन्ती तु सा त्राणं वैन्यमेवान्वपद्यत ।
कृताञ्जलिपुटा भूत्वा पूज्यालोकैस्त्रिभिः सदा ॥ ४९ ॥
उवाच वैन्यं नाधर्म्यं स्त्रीवधं कर्तुमर्हसि ।
कथं धारयिता चासि प्रजा राजन् विना मया ॥ ५० ॥
अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले पृथु प्रज्वलित तीखे बाणोंद्वारा और भी तेजसे उद्भासित हो रहे थे। वे महान् योगबलसे सम्पन्न महात्मा नरेश देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष थे। जब पृथिवीको कहीं भी शरण न मिली, तब वह पृथुकी ही शरणमें पहुँची और तीनों लोकोंकी सदासे पूजनीया पृथिवी दोनों हाथ जोड़कर वेनपुत्र पृथुसे कहने लगी—'आपको स्त्रीवधरूप अधर्मका काम करना उचित नहीं है। राजन् ! (पहले आप यह तो सोचिये कि) मेरे बिना इन प्रजाओको कहाँ स्थापित करेंगे ? ॥ ४८-५०॥
मयि लोकाः स्थिता राजन् मयेदं धार्यते जगत् ।
मद्विनाशे विनश्येयुः प्रजाः पार्थिव विद्धि तत् ॥ ५१ ॥
'राजन् ! ये सब लोक मुझपर ही स्थित हैं, मैं ही इस जगत्को धारण कर रही हूँ; (अतः) भूपाल ! आप इस बातको जान रक्खें कि मेरा विनाश होनेपर ये सब प्रजा भी नष्ट हो जायँगी ॥ ५१ ॥