विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 47, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| २४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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न त्वमर्हसि मां हन्तुं श्रेयश्चेत् त्वं चिकीर्षसि ।
प्रजानां पृथिवीपाल शृणु चेदं वचो मम ॥ ५२ ॥
'पृथ्वीपाल ! यदि आप प्रजाका कल्याण करना चाहते हैं तो आपको मेरा वध करना उचित नहीं है। साथ ही आप मेरी इस बातको भी सुनिये ॥ ५२ ॥
उपायतः समारब्धाः सर्वे सिद्ध्यन्त्युपक्रमाः ।
उपायं पश्य येन त्वं धारयेथाः प्रजा नृप ॥ ५३ ॥
'प्रायः सब कार्य ठीक उपायसे आरम्भ किये जानेपर ही सिद्ध होते हैं; अतः राजन् ! उस उपायका विचार कीजिये, जिससे कि आप प्रजाका पालन कर सकें ॥ ५३ ॥
हत्वापि मां न शक्तस्त्वं प्रजा धारयितुं नृप ।
अनुभूता भविष्यामि यच्छ कोपं महाद्युते ॥ ५४ ॥
'राजन् ! आप मेरा वध करके भी प्रजाका पालन एवं धारण न कर सकेंगे। अतः महाद्युते ! आप अपने क्रोधको शान्त करें, मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगी ॥ ५४ ॥
अवध्याश्च स्त्रियः प्राहुस्तिर्यग्योनिगतेष्वपि ।
सत्त्वेषु पृथिवीपाल न धर्मं त्यक्तुमर्हसि ॥ ५५ ॥
'भूपाल ! तिर्यक्-योनिके प्राणियोंमें भी स्त्रियोंको अवध्य कहा है, अतः आप धर्मका परित्याग न करें' ॥ ५५ ॥
एवं बहुविधं वाक्यं श्रुत्वा राजा महामनाः ।
कोपं निगृह्य धर्मात्मा वसुधामिदमब्रवीत् ॥ ५६ ॥
ऐसे ही और बहुत-से (अनुनय-विनयके) वाक्योंको सुनकर धर्मात्मा और उदार मनवाले राजा पृथु अपने क्रोधको रोककर वसुधासे इस प्रकार बोले ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पृथूपाख्याने पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पृथुका उपाख्यानविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः
पृथुका उपाख्यान—पृथ्वीका 'पृथुकी पुत्री' बनकर अनेक प्रकारके दूध देना तथा अनेक पात्रों एवं दुहनेवालोंका वर्णन
पृथुरुवाच
एकस्यार्थाय यो हन्यादात्मनो वा परस्य वा ।
बहून् वै प्राणिनो लोके भवेत् तस्येह पातकम् ॥ १ ॥
पृथुने कहा—वसुधे ! जो पुरुष इस संसारमें अपने या पराये किसी भी एक व्यक्तिके लिये बहुत-से जीवोंका वध करता है, उसे ही यहाँ पाप लगता है ॥ १ ॥
सुखमेधन्ति बहवो यस्मिंस्तु निहतेऽशुभे ।
तस्मिन् नास्ति हते भद्रे पातकं चोपपातकम् ॥ २ ॥
भद्रे ! जिस पापी व्यक्तिके मारे जानेसे बहुत-से प्राणियोंको सुख मिलता हो, उसको मारनेसे न तो पाप लगता है और न उपपातक ही ॥ २ ॥
एकस्मिन् यत्र निधनं प्रापिते दुष्टकारिणि ।
बहूनां भवति क्षेमं तत्र पुण्यप्रदो वधः ॥ ३ ॥
जहाँ दुष्टताका व्यवहार करनेवाले एक व्यक्तिका वध करनेसे बहुत-से मनुष्योंका कल्याण होता हो, वहाँ उसका वध करना पुण्यप्रद ही है ॥ ३ ॥
सोऽहं प्रजानिमित्तं त्वां हनिष्यामि वसुंधरे ।
यदि मे वचनं नाद्य करिष्यसि जगद्धितम् ॥ ४ ॥
अतः वसुंधरे ! यदि आज तू जगत्का हित करनेवाले मेरे वचनको नहीं मानती है तो मैं प्रजाके हितके लिये तेरा अवश्य वध कर डालूँगा ॥ ४ ॥
त्वां निहत्याद्य बाणेन मच्छशासनपराङ्मुखीम् ।
आत्मानं प्रथयित्वाहं प्रजा धारयिता चिरम् ॥ ५ ॥
तू आज मेरे शासनसे पराङ्मुख हो रही है, अतः आज तुझे बाणसे मारकर अपने देहको ही फैलाकर मैं उसपर प्रजाको धारण करूँगा ॥ ५ ॥
सा त्वं शासनमास्थाय मम धर्मभृतां वरे ।
संजीवय प्रजाः सर्वाः समर्था ह्यसि धारणे ॥ ६ ॥
अतएव धर्मचारियोंमें श्रेष्ठ देवि ! तू मेरे शासनको मानकर सारी प्रजाको जीवित रख; क्योंकि तू प्रजाको धारण करने—जीवित रखनेमें समर्थ है ॥ ६ ॥
दुहितृत्वं च मे गच्छ तत एनमहं शरम् ।
नियच्छेयं त्वद्वधार्थमुद्यतं घोरदर्शनम् ॥ ७ ॥
साथ ही तू मेरी पुत्री बन जा, तब मैं तेरे वधके लिये उठाये हुए इस भयंकर दीखनेवाले बाणको रोक लूँगा ॥ ७ ॥
पृथिव्युवाच
सर्वमेतदहं वीर विधास्यामि न संशयः ।
उपायतः समारब्धाः सर्वे सिद्ध्यन्त्युपक्रमाः ॥ ८ ॥
पृथ्वीने कहा—वीर ! मैं निस्संदेह यह सब कुछ करूँगी, परंतु ठीक उपायसे आरम्भ करनेपर ही सब कार्य सिद्ध होते हैं ॥ ८ ॥
उपायं पश्य येन त्वं धारयेथाः प्रजा इमाः ।
वत्सं तु मम सम्पश्य क्षरेयं येन वत्सला ॥ ९ ॥