भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

हरिवंशपर्व ] षष्ठोऽध्यायः [ २५


अतः आप उस उपायको देखिये या ढूँढ़ निकालिये, जिससे आप इन प्रजाओंको पुष्ट करके धारण कर सकें। (इसकी युक्ति मैं बताती हूँ) आप मेरे लिये एक बछड़ेकी खोज कीजिये, जिससे मैं (स्नेहसे) पेम्हाकर दूध दूँ ॥ ९ ॥

समां च कुरु सर्वत्र मां त्वं धर्मभृतां वर ।
यथा विस्पन्दमानं मे क्षीरं सर्वत्र भावयेत् ॥ १० ॥

धर्मचारियोंमें श्रेष्ठ ! आप मुझे सर्वत्र सम (चौरस) कीजिये, जिससे कि मेरा झरता हुआ दूध सर्वत्र (व्याप्त) हो जाय ॥ १० ॥

वैशम्पायन उवाच
तत उत्सारयामास शैलाञ्छतसहस्रशः ।
धनुष्कोट्या तदा वैन्यस्तेन शैला विवर्धिताः ॥ ११ ॥

वैशम्पायनजीने कहा—जनमेजय ! तब वेनपुत्र पृथुने धनुषके कोनेसे सैकड़ों और सहस्रों पर्वतोंको उठाकर (ईंटोंकी दीवार-के समान) खड़ा कर दिया, इससे पर्वत बड़े हो गये ॥ ११ ॥

इत्थं वैन्यस्तदा राजा महीं चक्रे समां ततः ।
मन्वन्तरेष्वतीतेषु विषमासीद् वसुंधरा ॥ १२ ॥

इस प्रकार वेनपुत्र राजा पृथुने पृथ्वीको सम (चौरस) कर दिया। पिछले मन्वन्तरोंमें यह पृथ्वी ऊँची-नीची थी ॥ १२ ॥

स्वभावेनाभवन् ह्यस्याः समानि विषमाणि च ।
चाक्षुषस्यान्तरे पूर्वमासीदेवं तदा किल ॥ १३ ॥

पहले चाक्षुष मन्वन्तरमे इस पृथ्वीके प्रदेश स्वभावतः ऊँचे-नीचे थे ॥ १३ ॥

न हि पूर्वविसर्गे वै विषमे पृथिवीतले ।
प्रविभागः पुराणां च ग्रामाणां वा तदाभवत् ॥ १४ ॥

पहले सर्गमें पृथ्वीके विषम होनेके कारण नगर और ग्रामोंका विभाग नहीं हुआ था ॥ १४ ॥

न सस्यानि न गोरक्षा न कृषिनं वणिक्पथः ।
नैव सत्यानृतं तत्र न लोभो न च मत्सरः ॥ १५ ॥

उस समय न किसी प्रकारका धान्य होता था, न गोरक्षा होती थी और न खेती होती थी तथा न सत्य एवं मिथ्यासे मिला हुआ (वाणिज्य) होता था, उस समय न लोभ था न मत्सर ॥ १५ ॥

वैवस्वतेऽन्तरे चास्मिन् साम्प्रतं समुपस्थिते ।
वैण्यात् प्रभृति राजेन्द्र सर्वस्यैतस्य सम्भवः ॥ १६ ॥

राजेन्द्र ! इस वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तरके आनेपर वेनपुत्र पृथुके समयसे ही इन सभी वस्तुओंकी उत्पत्ति हुई है ॥ १६ ॥

यत्र यत्र समं त्वस्य भूमेरासीद्विदांपत ।
तत्र तत्र प्रजाः सर्वाः संवासं समरोचयन् ॥ १७ ॥

निष्पाप नरेश ! जहाँ-जहाँ यह भूमि सम हो गयी, वहाँ प्रजाने रहना पसंद किया ॥ १७ ॥

आहारः फलमूलानि प्रजानामभवत् तदा ।
कृच्छ्रेण महता युक्त इत्येषमनुशुश्रुम ॥ १८ ॥

हमने ऐसा सुना है कि (वेनपुत्र पृथुद्वारा भूमिको दोहन होनेसे) पहले प्रजाओंका आहार फल और मूल था तथा वह भी उन्हें बड़ी कठिनतासे मिलता था ॥ १८ ॥

संकल्पयित्वा वत्सं तु मनुं स्वायम्भुवं प्रभुम् ।
स्वपाणौ पुरुषश्रेष्ठ दुदोह पृथिवीं ततः ।
सस्यजातानि सर्वाणि पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ॥ १९ ॥
तेनान्नेन प्रजास्तात वर्तन्तेऽद्यापि नित्यशः ।

पुरुषश्रेष्ठ ! वेन-पुत्र प्रतापी पृथुने प्रभु स्वायम्भुव मनुको बछड़ा बनाकर पृथ्वीसे सब प्रकारके धान्योंको अपने हाथमें ही दुहा। तात ! उस दिनसे सब प्रजा उसी अन्नसे आजतक बढ़ रही है ॥ १९ ॥

ऋषिभिः श्रूयते चापि पुनर्मुग्धा वसुंधरा ॥ २० ॥
वत्सः सोमोऽभवत् तेषां दोग्धा चाङ्गिरसः सुतः।
बृहस्पतिर्महातेजाः पात्रं छन्दांसि भारत ।
क्षीरमासीदनुपमं तपो ब्रह्म च शाश्वतम् ॥ २१ ॥

भारत ! सुना है, फिर ऋषियोंने भी भूमिको दुहा था, उस समय सोम उनका बछड़ा हुआ, अङ्गिराके पुत्र महातेजस्वी बृहस्पति दुहनेवाले बने और छन्द (वेद) पात्र बने थे। तपोमय शाश्वत ब्रह्म अनुपम दुग्धके रूपमें प्रकट हुआ था ॥ २०-२१ ॥

पुनर्देवगणैः सर्वैः पुरंदरपुरोगमैः।
काञ्चनं पात्रमादाय दुग्धेयं श्रूयते मही ॥ २२ ॥

(यह भी) सुना जाता है कि फिर इन्द्र आदि सब देवताओंने भी सुवर्णका पात्र लेकर इस पृथ्वीको दुहा था ॥ २२ ॥

वत्सस्तु मघवानासीद् दोग्धा च सविता प्रभुः ।
क्षीरमूर्जस्करं चैव वर्तन्ते येन देवताः ॥ २३ ॥

(उस समय) इन्द्र बछड़ा और भगवान् सूर्य दुहनेवाले बने तथा पुष्टिकारक अमृतरूपी क्षीर प्रकट हुआ, जिससे देवता सदा जीवित रहते हैं ॥ २३ ॥

पितृभिः श्रूयते चापि पुनर्मुग्धा वसुंधरा ।
रजतं पात्रमादाय स्वधाममितविक्रमैः ॥ २४ ॥

सुना है कि फिर अतुल पराक्रमी पितरोंने भी पृथ्वीको दुहा था, उन्होंने चाँदीका पात्र लेकर स्वधा (रूपी दूध) का दोहन किया था ॥ २४ ॥

यमो वैवस्वतस्तेषामासीद् वत्सः प्रतापवान् ।
अन्तकश्चाभवद् दोग्धा कालो लोकप्रकालकः ॥ २५ ॥