विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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ये सब इस वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तरके देवता हैं और इस महात्मा वैवस्वत मनुके इक्ष्वाकु आदि दस पुत्र हैं ॥ ३६-३७ ॥
एतेषां कीर्तितानां तु महर्षीणां महौजसाम्।
राजन् पुत्राश्च पौत्राश्च दिक्षु सर्वासु भारत ॥ ३८ ॥
भरतवंशी राजन्! जिनकी चर्चा हुई है, इन परम तेजस्वी महर्षियोंके पुत्र और पौत्र सब दिशाओंमें (व्याप्त हैं) ॥ ३८ ॥
मन्वन्तरेषु सर्वेषु प्राग्दिशः सप्तसप्तकाः।
स्थिता लोकव्यवस्थार्थं लोकसंरक्षणाय च ॥ ३९ ॥
सब मन्वन्तरोंमें पूर्व कथित उन्चास पवन लोकोंकी व्यवस्था और रक्षा करनेके लिये स्थित रहते हैं ॥ ३९ ॥
मन्वन्तरे व्यतिक्रान्ते चत्वारः सप्तका गणाः।
कृत्वा कर्म दिवं यान्ति ब्रह्मलोकमनामयम् ॥ ४० ॥
प्रत्येक मन्वन्तरके बीतनेपर उनमेंसे अट्ठाईस पवन अपने कर्मको (पूर्ण) करके स्वर्गमें जाकर अनामय (व्याधिरहित) ब्रह्मलोकको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ४० ॥
ततोऽन्ये तपसा युक्ताः स्थानमापूरयन्त्युत।
अतीता वर्तमानाश्च क्रमेणैतेन भारत ॥ ४१ ॥
एतान्युक्तानि कौरव्य सप्तातीतानि भारत।
मन्वन्तराणि षट् चापि निबोधानागतानि मे ॥ ४२ ॥
भारत ! तब मन्वन्तरके अन्तमें दूसरे वायु तपोबलसे उनके पदपर आरूढ होकर उनके स्थानको पूर्ण कर देते हैं। कौरव्य ! बीते हुए और वर्तमान सात मन्वन्तरोंका वर्णन कर दिया। भरतनन्दन ! अब भविष्यके छः (सात) मन्वन्तरोंका वर्णन मुझसे सुनो ॥ ४१-४२ ॥
सावर्णा मनवस्तात पञ्च तांश्च निबोध मे।
एको वैवस्वतस्तेषां चत्वारस्तु प्रजापतेः ॥ ४३ ॥
परमेष्ठिसुतास्तात मेरुसावर्णतां गतः।
दक्षस्यैते हि दौहित्राः प्रियायास्तनया नृप।
महान्तस्तपसा युक्ता मेरुपृष्ठे महौजसः ॥ ४४ ॥
तात ! सावर्णि मनु पाँच हैं, उनको मुझसे सुनो। उनमेंसे एक तो सूर्यके पुत्र हैं और चार प्रजापति परमेष्ठीके, ये सब दक्षके नाती हैं तथा (दक्षकन्या) प्रियाके पुत्र हैं। राजन् ! मेरु पर्वतपर बड़ा भारी तप करके ये महातपस्वी मनु मेरुसावर्णि नामको प्राप्त हुए ॥ ४३-४४ ॥
रुचेः प्रजापतेः पुत्रो रौच्यो नाम मनुः स्मृतः।
भूत्यां चोत्पादितो देव्यां भौत्यो नाम रुचेः सुतः ॥ ४५ ॥
प्रजापति रुचिके पुत्र रौच्य मनु कहलाते हैं और भूति देवीके गर्भसे उत्पन्न रुचिके पुत्र भौत्य कहलाते हैं॥ ४५ ॥
अनागताश्च सप्तैते स्मृता दिवि महर्षयः।
मनोरन्तरमासाद्य सावर्णस्य ह ताञ्छृणु ॥ ४६ ॥
अब भविष्यत्-कालमें होनेवाले सावर्णि मन्वन्तरके जो सात महर्षि स्वर्गमें विराजमान हैं, उन (अष्टम मन्वन्तरके) ऋषियोंको सुनो ॥ ४६ ॥
रामो व्यासस्तथाऽऽत्रेयो दीप्तिमानिति विश्रुतः।
भारद्वाजस्तथा द्रौणिरश्वत्थामा महाद्युतिः ॥ ४७ ॥
गौतमस्यात्मजश्चैव शरद्वान् गौतमः कृपः।
कौशिको गालवश्चैव रुरुः काश्यप एव च ॥ ४८ ॥
(परशु-) राम, व्यास, अत्रिपुत्र दीप्तिमान्, भरद्वाजगोत्री द्रोणपुत्र महातेजस्वी अश्वत्थामा, गौतमके वंशज एवं गौतम-गोत्री शरद्वान् (के पुत्र) कृपाचार्य, कौशिकगोत्री गालव और काश्यपगोत्री रुरु ॥ ४७-४८ ॥
एते सप्त महात्मानो भविष्या मुनिसत्तमाः।
ब्रह्मणः सदृशाश्चैते धन्याः सप्तर्षयः स्मृताः॥ ४९ ॥
ये ब्रह्माजीके समान धन्यवादके पात्र भविष्यके सात मुनिश्रेष्ठ महात्मा सप्तर्षि कहे गये हैं ॥ ४९ ॥
अभिजात्याथ तपसा मन्त्रव्याकरणैस्तथा।
ब्रह्मलोकप्रतिष्ठास्तु स्मृताः सप्तर्षयोऽमलाः ॥ ५० ॥
ये जन्म, तप, मन्त्र और व्याकरणके प्रभावसे पवित्र सात ऋषि ब्रह्मलोकमें रहते हैं ॥ ५० ॥
भूतभव्यभवज्ज्ञानं बुद्ध्या चैव तु ये स्वयम्।
तपसा चै प्रसिद्धा ये संगताः प्रविचिन्तकाः ॥ ५१ ॥
ये ऋषि स्वयं अपने तपसे भूत, भविष्य और वर्तमान कालके सब वृत्तान्तको जानकर प्रसिद्ध हो गये हैं तथा परस्पर मिलकर परमात्मतत्त्वका विचार करते रहते हैं॥ ५१ ॥
मन्त्रव्याकरणाद्यैश्च ऐश्वर्यात् सर्वशश्च ये।
एतान् भार्यान् द्विजो ज्ञात्वा नैष्ठिकानि च नाम च॥५२॥
ये मन्त्र, व्याकरण आदिसे तथा ऐश्वर्यके कारण भी (सर्वत्र प्रसिद्ध हैं)। ब्राह्मण इन भरण करनेयोग्य ऋषियोंको तथा इनके नैष्ठिक कर्मों और नामोंको जानकर (कल्याणका भागी होता है) ॥ ५२ ॥
सप्तैते सप्तभिश्चैव गुणैः सप्तर्षयः स्मृताः।
दीर्घायुषो मन्त्रकृत ईश्वरा दीर्घचक्षुषः ॥ ५३ ॥
ये सातो अपने सात गुणोंके कारण सप्तर्षि कहलाते हैं और दीर्घायु, मन्त्रद्रष्टा, सर्वसमर्थ तथा दीर्घदर्शी हैं ॥ ५३ ॥
बुद्ध्या प्रत्यक्षधर्माणो गोत्रप्रवर्तकास्तथा।
कृतादिषु युगाख्येषु सर्वेष्वेव पुनः पुनः ॥ ५४ ॥
प्रवर्तयन्ति ते वर्णानाश्रमांश्चैव सर्वशः।
सप्तर्षयो महाभागाः सत्यधर्मपरायणाः ॥ ५५ ॥
इन्हें अपनी बुद्धिसे धर्मके महत्त्वका प्रत्यक्ष अनुभव होता है तथा ये गोत्रप्रवर्तक (गोत्र चलानेवाले) हैं। सत्यधर्ममें परायण रहनेवाले ये महाभाग सप्तर्षि सत्ययुग