विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश |
|---|
पुलस्त्यगोत्री निश्चर एवं पुलहगोत्री अमितौजा—ये सात महर्षि होंगे। ये सब-के-सब ब्रह्माजीके (मानस) पुत्र हैं। उस मन्वन्तरमें देवताओंके तीन गण होंगे तथा इन तीसरे सावर्णि मनुके संवर्तक, सुधर्मा, देवानकि, पुरूद्रह, क्षेमधन्वा, दृढायु, आदर्श, पण्ढक और मनु—ये नौ पुत्र माने गये हैं॥
चतुर्थस्य तु सावर्णेश्चर्षीन् सप्त निबोध मे।
द्युतिर्वसिष्ठपुत्रश्च आत्रेयः सुतपास्तथा ॥ ७४॥
अङ्गिरास्तपसो मूर्त्तिस्तपस्वी काश्यपस्तथा।
तपोधनश्च पौलस्त्यः पौलहश्च तपो रविः ॥ ७५ ॥
भार्गवः सप्तमस्तेषां विज्ञेयस्तु तपोद्युतिः।
पञ्च देवगणाः प्रोक्ता मानसा ब्रह्मणश्च ते ॥ ७६ ॥
अब मैं चतुर्थ सावर्तिके (अर्थात् ग्यारहवें मन्वन्तरके) ऋषियोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। वसिष्ठजीके पुत्र द्युति, अत्रिगोत्रमें उत्पन्न सुतपा, अङ्गिरागोत्री तपोधूर्त्ति, कश्यपगोत्री तपस्वी, पुलस्त्यवंशमें उत्पन्न तपोधन, पुलहगोत्री तपोरवि और सातवाँ भृगुवंशी तपोद्युति (को) समझना चाहिये। (इस मन्वन्तरमें) देवताओंके पाँच गण होंगे। वे सब ब्रह्माजीके संकल्पसे उत्पन्न होंगे ॥ ७४-७६ ॥
देववायुस्तुरङ्गश्च देवश्रेष्ठो विदूरथः।
मित्रवान् मित्रदेवश्च मित्रसेनश्च मित्रकृत्।
मित्रबाहुः सुवर्चाश्च द्वादशस्य मनोः सुताः ॥ ७७ ॥
इन बारहवें मनुके देवबाहु, अवुर, देवश्रेष्ठ, विदूरथ, मित्रवान्, मित्रदेव, मित्रसेन, मित्रकृत्, मित्रबाहु और सुवर्चा (-ये दस) पुत्र होंगे ॥ ७७ ॥
त्रयोदशेऽथ पर्याये भाव्ये मन्वन्तरे मनोः।
अङ्गिराश्चैव धृतिमान् पौलस्त्यो हव्यपस्तु यः ॥ ७८ ॥
पौलहस्तत्त्वदर्शी च भार्गवश्च निरुत्सुकः।
निष्कम्पस्तथाऽऽत्रेयो निर्मोहः काश्यपस्तथा ॥ ७९ ॥
सुतपाश्चैव वासिष्ठः सप्तैते तु महर्षयः।
त्रय एव गणाः प्रोक्ता देवतानां स्वयम्भुवा ॥ ८० ॥
फिर भविष्यके तेरहवें मनुके मन्वन्तरमें अङ्गिरागोत्री धृतिमान्, पुलस्त्यवंशी हव्यप, पुलहवंशोत्पन्न तत्त्वदर्शी, भृगुगोत्री निरुत्सुक, अत्रिगोत्री निष्प्रकम्प, कश्यपगोत्री निर्मोह और वसिष्ठगोत्री सुतपा—ये सात महर्षि होंगे और देवताओंके तीन गण होंगे, ऐसा स्वयं ब्रह्माजीने कहा है॥
त्रयोदशस्य पुत्रास्ते विज्ञेयास्तु रुचेः सुताः।
चित्रसेनो विचित्रश्च नयो धर्मभृतो धृतः ॥ ८१ ॥
सुनेत्रः क्षत्रवृद्धिश्च सुतपा निर्भयो दृढः।
रौच्यस्यैते मनोः पुत्रा अन्तरे तु त्रयोदशे ॥ ८२ ॥
अब तेरहवें मनु रुचिके पुत्रोंको इस प्रकार जानो—चित्रसेन, विचित्र, नय, धर्मभृत, धृत, सुनेत्र, क्षत्रवृद्धि, सुतपा, निर्भय और दृढ—ये तेरहवें मन्वन्तरमें रौच्य नामक मनुके पुत्र होंगे ॥ ८१-८२ ॥
चतुर्दशेऽथ पर्याये भौत्यस्यैवान्तरे मनोः।
भार्गवो ह्यतिबाहुश्च शुचिराङ्गिरसस्तथा ॥ ८३ ॥
युक्तदश्चैव तथाऽऽत्रेयः शुक्लो वासिष्ठ एव च।
अजितः पौलहश्चैव अन्त्याः सप्तर्षयश्च ते ॥ ८४ ॥
चौदहवें भौत्य नामक मनुके मन्वन्तरमें भृगुगोत्रोत्पन्न अतिबाहु, अङ्गिरागोत्री शुचि, अङ्गिरगोत्री युक्त, अत्रिगोत्रोत्पन्न युक्त, अत्रिगोत्री शुक्ल, वसिष्ठगोत्री शुक्र तथा पुलहगोत्री अजित—ये अन्तिम सप्तर्षि होंगे ॥ ८३-८४ ॥
एतेषां कल्प उत्थाय कीर्तनात् सुखमेधते।
यशश्चाप्नोति सुमहदायुष्मांश्च भवेन्नरः ॥ ८५ ॥
अतीतानागतानां वै महर्षीणां सदा नरः।
देवतानां गणाः प्रोक्ताः पञ्च चै भरतर्षभ ॥ ८६ ॥
मनुष्य प्रातःकाल उठकर इन भूत-भविष्यत्-कालके महर्षियोंका कीर्तन करनेसे सदा सुख पाता है, साथ ही वह बड़ा भारी यश पाता है और दीर्घायु होता है। भरतर्षभ ! उस समय देवताओंके पाँच गण होंगे ॥ ८५-८६ ॥
तरङ्गभीरूर्ध्वप्रभ तरस्वानुग्र एव च।
अभिमानी प्रवीणश्च जिष्णुः संक्रन्दनस्तथा ॥ ८७ ॥
तेजस्वी सबलश्चैव भौत्यस्यैते मनोः सुताः।
भौत्यस्यैवाधिकारो तु पूर्णे कल्पस्तु पूर्यते ॥ ८८ ॥
भौत्य मनुके तरङ्गभीरु, वप्र, तरस्वान्, उग्र, अभिमानी, प्रवीण, जिष्णु, संक्रन्दन, तेजस्वी और सबल—ये (दस) पुत्र होंगे तथा भौत्य मनुका अधिकारकाल पूर्ण होनेपर कल्प (अर्थात् ब्रह्माजीकी आयुका एक दिन) पूरा हो जाता है॥
इत्येते नामतोऽतीता मनवः कीर्तिता मया।
तैरियं पृथिवी तात समुद्रान्ता सपत्तना ॥ ८९ ॥
पूर्णे युगसहस्रं तु परिपाल्या नराधिप।
प्रजाभिश्चैव तपसा संहारस्तेषु भागशः ॥ ९० ॥
यह मैंने नाम लेकर बीते हुए (वर्तमान और होनेवाले) मनुओंका वर्णन किया। नराधिप ! ये (मनु) तपस्याके प्रभावसे हजार चतुर्युगी पूर्ण होनेतक नगरोंसे लेकर समुद्रतककी पृथ्वीका तथा प्रजाका सर्वदा पालन करते हैं। उक्त सभी मन्वन्तरोंमें अलग-अलग प्रजाका संहार होता है ॥ ८९-९० ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि मन्वन्तरवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें मन्वन्तर-वर्णनविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥