भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

[ हरिवंशपर्व ] अष्टमोऽध्यायः ३३


अष्टमोऽध्यायः

चारों युगों, मन्वन्तरों और ब्रह्माजीके दिन एवं वर्षका मान

जनमेजय उवाच
मन्वन्तरस्य संख्यानं युगानां च महामते ।
ब्रह्मणोऽह्नः प्रमाणं च वक्तुमर्हसि मे द्विज ॥ १ ॥

जनमेजयने कहा— परम बुद्धिमान् द्विजवर ! आप मुझसे मन्वन्तरोंके युगोंकी संख्याका वर्णन कीजिये तथा ब्रह्माजीके दिनका प्रमाण भी बताइये ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
अहोरात्रं भजेत् सूर्यो मानवं लौकिकं परम् ।
तामुपादाय गणनां शृणु संख्यामरिन्दम ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी बोले— शत्रुदमन ! सूर्य मनुष्योंके दिन और रात्रिका विभाग करते हैं । इस लौकिक गणनासे आरम्भ करके मनुसे भी परे द्विपरार्धनामक ब्राह्म-गणनास्तकका वर्णन सुनो ॥ २ ॥

निमेषैः पञ्चदशभिः काष्ठा त्रिंशत् तु ताः कलाः ।
त्रिंशत्कलो मुहूर्त्तस्तु त्रिंशता तैर्मनीषिणः ॥ ३ ॥
अहोरात्रमिति प्राहुश्चन्द्रसूर्यगतिं नृप ।
विशेषेण तु सर्वेषु अहोरात्रे च नित्यशः ॥ ४ ॥

राजन् ! पंद्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है और तीस काष्ठाओंकी एक कला होती है । तीस कलाओंका एक मुहूर्त होता है और बुद्धिमान् पुरुष तीस मुहूर्तोंको एक दिन-रात कहते हैं, जिसका निर्माण चन्द्रमा तथा सूर्यकी गतिद्वारा होता है । विशेषकर सूर्य-चन्द्रमाके उदय-अस्तसे मेरुके परिवर्ती भू-प्रदेशमें रात-दिन होता है ॥ ३-४ ॥

अहोरात्राः पञ्चदश पक्ष इत्यभिशब्दितः ।
द्वौ पक्षौ तु स्मृतो मासो मासौ द्वावृतुरुच्यते ॥ ५ ॥

पंद्रह अहोरात्र (दिन-रात) का नाम पक्ष है और दो पक्षों—पखवाड़ोंका एक महीना माना जाता है तथा दो महीनोंकी एक ऋतु कहलाती है ॥ ५ ॥

अब्दं द्वयनमुक्तं च अयनं ऋतुभिस्त्रिभिः ।
दक्षिणं चोत्तरं चैव संख्यातत्त्वविशारदैः ॥ ६ ॥

तीन ऋतुओंका एक अयन होता है और दो अयनोंका एक वर्ष होता है । संख्याके तत्त्वको जाननेमें चतुर पुरुषोंने उन दोनों अयनोंका नाम दक्षिणायन और उत्तरायण बताया है ॥ ६ ॥

मानेनानेन यो मासः पक्षद्वयसमन्वितः ।
पितॄणां तदहोरात्रमिति कालविदो विदुः ॥ ७ ॥

इस मानसे जो दो पक्षोंका (एक) मास होता है, उसे समयको जाननेवाले (चतुर पुरुष) पितरोंका (एक) दिन-रात कहते हैं ॥ ७ ॥

कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लपक्षस्तु शर्वरी ।
कृष्णपक्षं त्वहः श्राद्धं पितॄणां वर्तते नृप ॥ ८ ॥

कृष्ण-पक्ष उन पितरोंका दिन होता है और शुक्ल पक्ष उनकी रात्रि होती है, इसलिये राजन् ! कृष्णपक्षरूप दिनमें पितरोंका श्राद्ध होता है* ॥ ८ ॥

मानुषेण तु मानेन यो वै संवत्सरः स्मृतः ।
देवानां तदहोरात्रं दिवा चैवोत्तरायणम् ।
दक्षिणायनं स्मृता रात्रिः प्राज्ञैस्तत्त्वार्थकोविदैः॥ ९ ॥

मनुष्योंके मानसे जो एक वर्ष कहा गया है, वह देवताओंका एक दिन-रात होता है । तत्त्वको जाननेमें चतुर बुद्धिमान् पुरुषोंने उत्तरायणको देवताओंका दिन और दक्षिणायनको देवताओंकी रात्रि बताया है† ॥ ९ ॥

दिव्यमब्दं दशगुणमहोरात्रं मनोः स्मृतम् ।
अहोरात्रं दशगुणं मानवः पक्ष उच्यते ॥ १० ॥

देवताओंके दस वर्षोंका मनुका एक दिन-रात कहा है और इस दिन-रातका दसगुना मनुका एक पक्ष कहलाता है ॥ १० ॥

पक्षो दशगुणो मासो मासैर्द्वादशभिर्गुणैः ।
ऋतुर्मनूनां संप्रोक्तः प्राज्ञैस्तत्त्वार्थदर्शिभिः ।
ऋतुद्वयेण त्वयनं तद्द्वयेनैव वत्सरः ॥ ११ ॥

दस पक्षोंका मनुका एक मास होता है, बारह महीनोंकी एक ऋतु होती है । तत्त्वार्थदर्शी बुद्धिमानोंने


* चन्द्रलोकमें रहनेवाले पितर शुक्ल-पक्षमें चन्द्रमासे ढके हुए सूर्यको नहीं देखते । कृष्ण-पक्षमें सूर्य और चन्द्रमा एक-दूसरेके सम्मुख होनेके कारण उन्हें सूर्यका दर्शन होता है, इसलिये शुक्ल-पक्षको पितरोंकी रात्रि और कृष्ण-पक्षको पितरोंका दिन कहा है । इसीलिये सम्पूर्ण कृष्णपक्षको अथवा अत्यन्त आवश्यकता होनेपर दिनका अन्त होनेके कारण अमावास्याको श्राद्ध-काल बताया है ।

† तात्पर्य यह है कि मकर-संक्रान्तिसे मिथुन-संक्रान्तिके अन्ततक सूर्यके रथकी किरणोंके और अक्षांशकी किरणोंके प्रतिदिन ध्रुवकी ओर खिंचते रहनेसे उत्तरकी ओर चलनेवाला सूर्य मेरु पर्वतके शिखरपर रहनेवाले देवताओंको दीखता रहता है, अतः उत्तरायण देवताओंका दिन होता है तथा कर्क-संक्रान्तिसे लेकर धनुः-संक्रान्तिके अन्ततक उन दोनों प्रकारकी किरणोंके ध्रुवको प्रतिदिन क्रमशः छोड़ते रहनेसे दक्षिणकी ओर चलता हुआ सूर्य देवताओंको नहीं दीखता । अतएव दक्षिणायन देवताओंकी रात है ।

म० १० २