भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

३४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


तीन ऋतुओंका एक अयन माना है और दो अयनोंका एक वर्ष कहा है * ॥ ११ ॥

चत्वार्येव सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम् ।
तावच्छती भवेत् संध्या संध्यांशश्च तथा नृप ॥ १२॥
राजन् ! देवताओंके चार हजार वर्षोंका एक सत्ययुग होता है, चार सौ वर्षोंकी उसकी संध्या होती है और इतना ही उसका संध्यांश होता है † ॥ १२ ॥

त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेता स्यात् परिमाणतः ।
तस्याश्च त्रिशती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ॥ १३ ॥
तीन हजार वर्षोंके परिमाणका त्रेतायुग होता है और तीन सौ वर्षोंकी उसकी संध्या होती है तथा इतना ही उसका संध्यांश होता है ॥ १३ ॥

तथा वर्षसहस्रे द्वे द्वापरं परिकीर्तितम् ।
तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ॥ १४ ॥
इसी प्रकार दो हजार वर्षोंका द्वापरयुग कहा गया है; दो सौ वर्षोंकी उसकी संध्या होती है और इतना ही उसका संध्यांश होता है ॥ १४ ॥

कलिवर्षसहस्रं च संख्यातोऽत्र मनीषिभिः ।
तस्यापि शतिका संध्या संध्यांशश्चैव तद्विधः ॥ १५ ॥
इसी गणनाके अनुसार बुद्धिमान् पुरुषोंने कलियुगको एक हजार वर्षोंवाला बताया है। सौ वर्षोंकी उसकी संध्या होती है और इतना ही संध्यांश होता है ॥ १५ ॥

एषा द्वादशसाहस्री युगसंख्या प्रकीर्तिता ।
दिव्येनानेन मानेन युगसंख्यां निबोध मे ॥ १६ ॥
यह बारह हजार वर्षोंकी एक चतुर्युगीकी संख्या कही गयी । राजन् ! इस दिव्यमानसे तुम युगोंके वर्षोंकी गिनती समझ लो‡ ॥ १६ ॥

कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चैव चतुर्युगी ।
युगं तदेकसप्तत्या गणितं नृपसत्तम ॥ १७ ॥
मन्वन्तरमिति प्रोक्तं संख्यानार्थविशारदैः ।
अयनं चापि तत्प्रोक्तं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे ॥ १८ ॥
सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चारोंको चतुर्युगी कहते हैं । नृपश्रेष्ठ ! संख्या करनेमें चतुर पुरुषोंने इकहत्तर चौकड़ी युगों (से कुछ अधिक काल) का नाम मन्वन्तर कहा है (क्योंकि हजारका चौदहवाँ भाग इतना ही होता है)। इसके भी दक्षिणायन और उत्तरायण—ये दो अयन कहे गये हैं * ॥ १७-१८ ॥

मनुः प्रलीयते यत्र समाप्ते चायने प्रभोः ।
ततोऽपरो मनुः कालमेतावन्तं भवत्युत ॥ १९ ॥
उत्तरायणके पूर्ण होनेपर मनु ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं । फिर इतने ही समयतक दूसरे मनु रहते हैं ॥ १९ ॥

समतीतेषु राजेन्द्र प्रोक्तः संवत्सरः स वै ।
तदेव चायुतं प्रोक्तं मुनिना तत्त्वदर्शिना ॥ २० ॥
राजेन्द्र ! तत्त्वदर्शी मुनिने दस हजार (अस्सी) मनुओंका ब्रह्माजीका एक वर्ष कहा है † ॥ २० ॥

ब्रह्मणस्तदहः प्रोक्तं कल्पश्चेति स कथ्यते ।
सहस्रयुगपर्यन्ता या निशा प्रोच्यते बुधैः ॥ २१ ॥
निमज्जत्यप्सु यत्रोर्वी सशैलवनकानना ।
तस्मिन् युगसहस्रे तु पूर्णे भरतसत्तम ॥ २२ ॥
ब्राह्मे दिवसपर्यन्ते कल्पो निःशेष उच्यते ।
युगानि सप्ततिस्तानि साग्राणि कथितानि ते ॥ २३ ॥
कृतत्रेतादियुक्तानि मनोन्तरमुच्यते ।
चतुर्दशैते मनवः कीर्तिताः कीर्तिवर्द्धनाः ॥ २४ ॥
वेदेषु सपुराणेषु सर्वेषु प्रभविष्णवः ।
प्रजानां पतयो राजन् धन्यमेषां प्रकीर्तनम् ॥ २५ ॥
भरतसत्तम ! ब्रह्माजीका जो दिन कहा है, उसीका नाम कल्प है और विद्वान् पुरुषोंने हजार युगोंकी ब्रह्माजीकी जो रात्रि कही है, उसमें वन और पर्वतोंसहित पृथ्वी जलमें डूब जाती है और उन हजार चतुर्युगियोंके पूर्ण होनेपर जो ब्रह्माजीका दिन आरम्भ होता है, उसकी समाप्ति तकका समय एक कल्प कहलाता है । राजन् ! सत्ययुग, त्रेतायुगादिसहित इकहत्तर चतुर्युगीसे कुछ अधिक कालका एक मन्वन्तर कहलाता है ।† यह कीर्ति


* अर्थात् देवताओंके बहत्तर हजार वर्षोंका मनुका एक दिन होता है ।
† युगके पहले भागका नाम संध्या और युगके अन्तिम भागका नाम संध्यांश है ।
‡ सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुगकी एक चतुर्युगी देवताओंके बारह हजार वर्षोंकी होती है अर्थात् दिव्य दस हजार वर्षोंके ये चारों युग होते हैं । इन चारों युगोंकी संध्याएँ एक हजार दिव्य वर्षोंकी होती हैं और इनके संध्यांश भी एक हजार दिव्य वर्षोंके होते हैं ।
* अर्थात् वे पहले धूमादिमार्गसे देवलोकमें पहुँचकर अपने अधिकारको भोगनेके अनन्तर उत्तरायणके मार्गसे ब्रह्मलोकमें पहुँच जाते हैं ।
† इकहत्तर चतुर्युगके हिसाबसे चौदह मन्वन्तरोंमें ९९४ चतुर्युग होते हैं । तथा ब्रह्माके एक दिनमें एक हजार चतुर्युग होते हैं, अतः छः चतुर्युग और बचे । छः चतुर्युगका चौदहवाँ भाग कुछ कम पाँच हजार एक सौ तीन दिव्य वर्ष होता है । इस प्रकार एक मन्वन्तरमें इकहत्तर चतुर्युगके अतिरिक्त इतने दिव्य वर्ष और अधिक होते हैं ।