भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 58

हरिवंशपर्व ] अष्टमोऽध्यायः ३५


बढ़ानेवाले चौदह मनुओंका वर्णन कर दिया। सभी पुराणों और वेदोंमें इन प्रभावशाली प्रजापति मनुओंका वर्णन आता है। राजन्! इनका कीर्तन करनेसे धनकी प्राप्ति होती है॥ २१-२५॥

मन्वन्तरेषु संहाराः संहारान्तेषु सम्भवाः।
न शक्यमन्तरं तेषां वक्तुं वर्षशतैरपि ॥ २६॥

मन्वन्तरोंमें कितने ही संहार होते हैं और संहारके बाद कितनी ही सृष्टियाँ होती रहती हैं। इनके अन्तरको सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं बताया जा सकता॥ २६॥

विसर्गस्य प्रजानां वै संहारस्य च भारत।
मन्वन्तरेषु संहाराः श्रूयन्ते भरतर्षभ ॥ २७॥

भारत! भरतश्रेष्ठ! प्रायः सभी मन्वन्तरोंमें यदा-कदा प्रजाकी सृष्टि और संहारकी परम्पराका उपसंहार हो जाता है—यह बात सुननेमें आती है॥ २७॥

सशेषास्तत्र तिष्ठन्ति देवाः सप्तर्षिभिः सह।
तपसा ब्रह्मचर्येण श्रुतेन च समाहिताः ॥ २८॥

मन्वन्तरोंके बाद जो संहार होता है, उसमें तपस्या, ब्रह्मचर्य और शास्त्र-ज्ञानसे सम्पन्न कुछ देवता और सप्तर्षि शेष रह जाते हैं॥ २८॥

पूर्णे युगसहस्रे तु कल्पो निःशेष उच्यते।
तत्र सर्वाणि भूतानि दग्धान्यादित्यतेजसा ॥ २९॥

सहस्र चतुर्युगियोंके पूर्ण होनेपर कल्प पूरा हो जाता है। उस समय सब भूत द्वादश आदित्योंकी किरणोंसे भस्म हो जाते हैं॥ २९॥

ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा सहादित्यगणैर्विभुम्।
योगं योगीश्वरं देवमजं क्षेत्रज्ञमच्युतम्।
प्रविशन्ति सुरश्रेष्ठं हरिं नारायणं प्रभुम् ॥ ३०॥

और वे (द्वादश सूर्य) भी (जिसका ईंधन जल गया है, ऐसे अग्निकी भाँति अपनी आत्माका उपसंहार करके) देवताओंसहित ब्रह्माजीको आगे करके योगीश्वर योगस्वरूप, देव, अज, क्षेत्रज्ञ, अच्युत, सुरश्रेष्ठ, सर्वव्यापी, प्रभु श्रीहरि नारायणमें प्रवेश कर जाते हैं॥ ३०॥

यः स्रष्टा सर्वभूतानां कल्पान्तेषु पुनः पुनः।
अव्यक्तः शाश्वतो देवस्तस्य सर्वमिदं जगत् ॥ ३१॥

जो प्रत्येक कल्पका अन्त होनेपर (दूसरे कल्पका आरम्भ होनेके समय) वारंवार सब भूतोंको रचते हैं, जो अप्रकट, शाश्वत देव हैं, उन्हींका यह सम्पूर्ण जगत् है॥ ३१॥

तत्र संवर्तते रात्रिः सकलैरार्णवे तदा।
नारायणो दधे निद्रां ब्राह्मं वर्षसहस्रकम् ॥ ३२॥

(यह प्रलय सुषुप्तिके समय होता है, अतएव) जब सम्पूर्ण विश्व एकार्णवके जलमें निमग्न हो जाता है, तब रात्रि होती है और ब्रह्माजीके हजार वर्षोंतक नारायण निद्रा लेते हैं॥ ३२॥

तावन्तमिति कालस्य रात्रिरित्यभिशब्दिता।
निद्रायोगमनुप्राप्तो यस्यां शेते पितामहः ॥ ३३॥

जितने समयतक ब्रह्माजी योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते हैं, उतना समय उनकी रात्रि कहलाती है॥ ३३॥

सा च रात्रिरपक्रान्ता सहस्रयुगपर्यया।
तदा प्रबुद्धो भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ३४॥
पुनः सिसृक्षया युक्तः सर्गाय विदधे मनः।
सैव स्मृतिः पुराणेयं तद्वृत्तं तद्विचेष्टितम् ॥ ३५॥

जब वह रात्रि सहस्र चतुर्युगी बीतनेपर समाप्त होती है, तब लोकोंके पितामह भगवान् ब्रह्माजी जागते हैं। फिर रचनेकी इच्छासे युक्त होकर मनमें सृष्टि करनेका विचार करते हैं। उस समय उनकी चेष्टा और स्मृति पहले कल्पकी तरह ही होती है॥ ३४-३५॥

देवस्थानानि तान्येव केवलं च विपर्ययः।
ततो दग्धानि भूतानि सर्वाण्यादित्यरश्मिभिः ॥ ३६॥
देवर्षियक्षगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः।
जायन्ते च पुनस्तात युगे भरतसत्तम ॥ ३७॥

तात! उस समय (ब्रह्माण्डमें सूर्य आदि) देवताओंके (और पिण्डमें चक्षु आदिके) स्थान भी वे ही होते हैं। परंतु (जीवोंका) विपर्यय (उलट-फेर) होता रहता है। भरतसत्तम! सूर्यकी किरणोंसे भस्म होकर (भगवान् विष्णुमें लीन हुए) सब भूत तथा देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष, पिशाच, सर्प और राक्षस भी फिर उस युगमें उत्पन्न हो जाते हैं॥ ३६-३७॥

यथर्तवृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये।
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा ब्राह्मीषु रात्रिषु ॥ ३८॥

जैसे (ग्रीष्म-शीत आदि) ऋतुओंके चिह्न उन ऋतुओंके आनेपर प्रकट होने लगते हैं, इसी प्रकार ब्रह्माजीकी रात्रियोंके बीतनेपर (पूर्व कल्पके समान) अनेक रूपोंवाले प्राणी (फिर) दीखने लगते हैं॥ ३८॥

निष्क्रमित्वा प्रजाकारः प्रजापतिरसंशयम्।
ये च वै मानवा देवाः सर्वे चैव महर्षयः ॥ ३९॥
ते सङ्गाः शुद्धसङ्गाः शश्वद्धर्मविसर्गतः।
न भवन्ति पुनस्तात युगे भरतसत्तम ॥ ४०॥

तात! प्रजाओंको रचनेवाले प्रजापति (उस समय नारायणमेसे) निकलकर (फिर भूतोंको रचने लगते हैं।) जो-जो मनुष्य, देवता और महर्षिगण शाश्वतधर्म अर्थात् देहादिमें