भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 59
३६श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

आत्मबुद्धिरूप स्वाभाविक दोषोंको त्यागकर शुद्ध ब्रह्ममें पहुँचकर उसमें लीन हो जाते हैं, भरतसत्तम ! वे फिर (दूसरे) कल्पमें उत्पन्न नहीं होते ॥ ३९-४० ॥

तत्सर्वं क्रमयोगेन कालसंख्याविभागवित्।
सहस्रयुगसंख्यानं कृत्वा दिवसमीश्वरः ॥ ४१ ॥
रात्रिं युगसहस्रान्तां कृत्वा च भगवान् विभुः।
संहरत्यथ भूतानि सृजते च पुनः पुनः ॥ ४२ ॥

कालकी संख्याका विभाग करनेमें चतुर वे सर्वसमर्थ भगवान् परमात्मा क्रमानुसार सहस्र युगोंकी संख्यावाले दिन और (इसी प्रकार) सहस्र चतुर्युगियोंकी रात्रिको बनाकर प्राणियोंकी वारंवार रचना और संहार करते रहते हैं ॥ ४१-४२ ॥

व्यक्ताव्यक्तो महादेयो हरिनारायणः प्रभुः।
तस्य ते कीर्तयिष्यामि मनोर्वैवस्वतस्य ह ॥ ४३ ॥
विसर्गं भरतश्रेष्ठ साम्प्रतस्य महाद्युते।
वृष्णिवंशप्रसङ्गेन कथ्यमानं पुरातनम् ॥ ४४ ॥
यत्रोत्पन्नो महात्मा स हरिर्वृष्णिकुले प्रभुः।
सर्वासुरविनाशाय सर्वलोकहिताय च ॥ ४५ ॥

महादेव श्रीहरिनारायण प्रभु ही स्थूल-सूक्ष्म-रूप (में सर्वत्र विराजमान) हैं। महाद्युते! वर्तमान वैवस्वत मनु भी उनके ही अंश हैं। वृष्णिवंशके प्रसङ्गसे मैं उनकी पुरातन सृष्टिका वर्णन करूँगा। भरतश्रेष्ठ! वे परमात्मा और प्रभु श्रीहरि सारे असुरोंका विनाश तथा सम्पूर्ण लोकोंका कल्याण करनेके लिये इसी वृष्णिवंशमें उत्पन्न हुए थे ॥ ४३-४५ ॥

इति श्रीमद्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि मन्वन्तरगणनायामष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें मन्वन्तर-गणनाविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥


नवमोऽध्यायः

वैवस्वत मनु, यम, यमी (यमुना), अश्विनीकुमारों एवं शनैश्चरकी उत्पत्ति

वैशम्पायन उवाच

विवस्वान् कश्यपाज्जज्ञे दाक्षायण्यामरिंदम।
तस्य भार्याभवत् संज्ञा त्वाष्ट्री देवी विवस्वतः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—शत्रुदमन ! कश्यपजीसे दक्षकी पुत्रीमें विवस्वान् उत्पन्न हुए और त्वष्टाकी पुत्री संज्ञादेवी उन विवस्वान् (सूर्य) की भार्या हुई ॥ १ ॥

सुरेणुरिति विख्याता त्रिषु लोकेषु भाविनी।
सा वै भार्या भगवती मार्तण्डस्य महात्मनः ॥ २ ॥

महात्मा मार्तण्डकी वह पवित्र अन्तःकरणवाली भार्या भगवती संज्ञा तीनों लोकोंमें सुरेणुके नामसे (भी) प्रसिद्ध है ॥ २ ॥

भर्तूरूपेण नातुष्यद् रूपयौवनशालिनी।
संज्ञा नाम सुतपसा दीप्तेनेह समन्विता ॥ ३ ॥

वह रूपयौवनशालिनी संज्ञा अपने पति सूर्यदेवके मण्डलके तीव्र तप, तेज, एवं दीप्तिके कारण प्रसन्न नहीं रहती थी ॥ ३ ॥

आदित्यस्य हि तद्रूपं मण्डलस्य सुतेजसा।
गात्रेषु परिदग्धं वै नातिकान्तमिवाभवत् ॥ ४ ॥

उस संज्ञाका रूप सूर्यमण्डलके तेजसे अङ्गोंके संतप्त होनेके कारण (झुलस-सा गया। अतएव सूर्य उसको) बहुत अच्छे नहीं लगते थे ॥ ४ ॥

न खल्वयं मृतोऽण्डस्थ इति स्नेहादभाषत।
अज्ञानात् कश्यपस्तस्मान्मार्तण्ड इति चोच्यते ॥ ५ ॥

(अदितिके) अज्ञानमें पड़नेपर कश्यपजीने स्नेहपूर्वक कहा था कि यह मरा नहीं है, किंतु अण्ड (गर्भ) में स्थित है, इसलिये तबसे सूर्य ‘मार्तण्ड’ कहे जाते हैं* ॥ ५ ॥

तेजस्त्वभ्यधिकं तात नित्यमेव विवस्वतः।
येनातितापयामास स्त्रींल्लोकान् कश्यपात्मजः ॥ ६ ॥

तात ! (कश्यपके माहात्म्यके कारण जीवित हुए) विवस्वान्में सर्वदा अधिक तेज रहता है। उसी तेजसे कश्यप-जीके पुत्र सूर्य तीनों लोकोंको तपाते रहते हैं ॥ ६ ॥

त्रीण्यपत्यानि कौरव्य संज्ञायां तपतां वरः।
आदित्यो जनयामास कन्यां द्वौ च प्रजापती ॥ ७ ॥


* जब सूर्य अदितिके गर्भमें थे, उस समय भृगु उनके पास भिक्षा माँगनेके लिये आये;—परंतु अदिति गर्भके बोझके कारण शीघ्रतासे चलकर भिक्षा न दे सकी, तब भृगुने अदितिको शाप दे दिया कि तेरा गर्भ मृत हो जाय। यह सुनकर अदिति व्याकुल हो गयी, तब कश्यपजीने अपनी शक्तिसे भृगुके शापको दूर कर दिया और कहा कि यह वास्तवमें मृत नहीं हुआ, अण्ड (गर्भ) के भीतर वर्तमान है। अदितिके (मेरा गर्भ मृत हो गया) इस विपरीत ज्ञानके कारण ही सूर्य मार्तण्ड कहलाते हैं।