भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 61

३८ . श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

पदा संतर्जयामास संज्ञां चैवस्ततो यमः ॥ २२ ॥

वे वैवस्वत यम बालस्वभाव एवं रोषके कारण तथा होनहार (भावी) के वशीभूत हो संज्ञाको पैर दिखाकर डाँटने लगे ॥ २२ ॥

तं शशाप ततः क्रोधात् सावर्णिजननी नृप।
चरणः पततामेष तवेति भृशदुःखिता ॥ २३ ॥

राजन् ! इसपर सावर्णीकी माताने अति दुःखित हो कोपमें भरकर उन्हें शाप दिया कि 'तुम्हारा यह चरण गिर जाय' ॥ २३ ॥

यमस्तु तत् पितुः सर्वं प्राञ्जलिः प्रत्यवेदयत् ।
भृशं शापभयोद्विग्नः संज्ञावाक्यप्रतोदितः ॥ २४ ॥

छाया-संज्ञाके उस वाक्यसे पीड़ित और शापके भयसे अत्यन्त व्याकुल होकर यमने हाथ जोड़कर पितासे वह सब बात कह दी ॥

शापोऽयं विनिवर्तेत प्रोवाच पितरं तदा ।
मात्रा स्नेहेन सर्वेषु वर्तितव्यं सुतेषु वै ॥ २५ ॥

वे पितासे बोले—'मुझे यह शाप न लगे । ( देखिये ) माताको तो सब पुत्रोंके प्रति समानरूपसे स्नेहपूर्वक व्यवहार करना चाहिये ॥ २५ ॥

सेयमस्मानपाहाय यवीयांसं बुभूपति ।
तस्यां मयोद्यतः पादो न तु देहे निपातितः ॥ २६ ॥
बाल्याद्वा यदि वा मोहात् तद्भवान् क्षन्तुमर्हति ।

'पर यह हम सबको छोड़कर सबसे छोटेसे ही स्नेहका व्यवहार करती है। सो मैंने उसके ऊपर पैर उठाया ही था, शरीरपर मारा नहीं था। मैंने यह काम लड़कपनसे किया हो अथवा मोहवश, परंतु आप मुझे क्षमा कर दें ॥ २६½ ॥

यस्मात् ते पूजनीयाहं लङ्घितास्मि त्वया सुत ॥ २७ ॥
तस्मात् तवैष चरणः पतिष्यति न संशयः ।
अपत्यं दुरपत्यं स्यान्नाम्बा कुजननी भवेत् ॥ २८ ॥

'(संज्ञाने कहा—) बेटा ! मैं तुम्हारी पूजनीया हूँ, तो भी तुमने मेरा तिरस्कार किया है, अतः तुम्हारा यह पैर निस्सन्देह गिर जायगा ।' संतान तो कुसंतान हो सकती है, परंतु माता कुमाता नहीं हो सकती ॥ २७-२८ ॥

शप्तोऽहमस्मि लोकेश जनन्या तपतां वर ।
तव प्रसादाच्चरणो न पतेन्मम गोपते ॥ २९ ॥

'लोकेश्वर ! माताने मुझे शाप दे दिया है, परंतु तपनेवालोंमें श्रेष्ठ गोपते ! आपकी कृपासे मेरा पैर न गिरे(ऐसी कृपा कीजिये )' ॥ २९ ॥

विवस्वानुवाच

असंशयं पुत्र महत् भविष्यत्यत्र कारणम् ।
येन त्वामाविशत् क्रोधो धर्मज्ञं सत्यवादिनम् ॥ ३० ॥

सूर्यने कहा—पुत्र ! तुम धर्मज्ञ और सत्यवादी हो, तुमको जो क्रोध चढ़ आया इसमें निस्संदेह कोई बड़ा भारी कारण होगा ॥ ३० ॥

न शक्यमन्यथा कर्तुं मया मातुर्वचस्तव ।
कृमयो मांसमादाय यास्यन्ति धरणीतलम् ॥ ३१ ॥
तव पादान्महाप्राज्ञ ततस्त्वं प्राप्स्यसे सुखम् ।
कृतमेवं वचस्तथ्यं मातुस्तव भविष्यति ॥ ३२ ॥
शापस्य परिहारेण त्वं च त्रातो भविष्यसि ।

मैं तुम्हारी माताके वचनको ( सर्वथा तो ) लौटा नहीं सकता। ( पर ) महाप्राज्ञ ! कीड़े तुम्हारे चरणमेंसे मांस लेकर पृथ्वीतलपर चले जायेंगे, तब तुम्हें सुख मिलेगा । इस प्रकार तुम्हारी माताका कहा हुआ वचन ( भी ) सत्य हो जायगा और शापका परिहार होनेसे तुम्हारी भी रक्षा हो जायगी ॥ ३१-३२½ ॥

आदित्योऽथाब्रवीत् संज्ञां किमर्थं तनयेषु वै ॥ ३३ ॥
तुल्येष्वभ्यधिकः स्नेहः क्रियतेऽति पुनःपुनः ।
सा तत्परिहसन्ती तु नाचचक्षे विवस्वते ॥ ३४ ॥

फिर सूर्यने संज्ञासे कहा—'सभी पुत्र बराबर हैं, तो भी तू (किसीसे कम और किसीसे ) अधिक स्नेह क्यों करती है।' सूर्यने यह बात बार-बार कही, परंतु वह हँसती ही रह गयी और उसने सूर्यसे कुछ भी न कहा ॥ ३३-३४ ॥

आत्मानं सुसमाधाय योगात् तथ्यमपश्यत ।
तां शप्तुकामो भगवान् नाशाय कुरुनन्दन ॥ ३५ ॥
मूर्धजेषु च जग्राह समयेऽतिगतेऽपि च ।
सा तत् सर्वं यथावृत्तमाचचक्षे विवस्वते ॥ ३६ ॥

कुरुनन्दन ! भगवान् सूर्यने अपने चित्तको एकाग्र करके योगके द्वारा सत्य बात जान ली और शापद्वारा उसका विनाश करनेके लिये उसके केश पकड़ लिये । तब अपनी शपथके उतर जानेपर छायाने सूर्यनारायणसे सारी बात ज्यों-की-त्यों बतला दी ॥ ३५-३६ ॥

विवस्वांश्च तच्छ्रुत्वा क्रुद्धस्त्वष्टारमभ्यगात् ।
त्वष्टा तु तं यथा न्यायमर्चयित्वा विभावसुम् ।
निर्दग्धुकामं रोषेण सान्त्वयामास वै तदा ॥ ३७ ॥

सूर्यनारायण इस बातको सुनते ही क्रोधमें भरकर त्वष्टाके पास पहुँचे । त्वष्टाने विधिपूर्वक उनकी पूजा करके जब देखा कि ये तो रोषसे मुझे भस्म ही करना चाहते हैं, तब उन्होंने सूर्यनारायणको इस प्रकार शान्त करना-समझाना आरम्भ किया ॥ ३७ ॥

त्वष्टोवाच

तवातितेजसाक्षिप्तमिदं रूपं न शोभते ।
असहन्ती च तत् संज्ञा वने चरति शाद्वले ॥ ३८ ॥

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