भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 62

हरिवंशपर्व ] नवमोऽध्यायः ३९

त्वष्टाने कहा—आदित्य ! आपका यह अतितेजस्वी रूप अच्छा नहीं लगता। इसको न सह सकनेके कारण ही संज्ञा हरी घासवाले वनमें (हरी घासोंको) चर रही है ॥ ३८ ॥

द्रष्टा हि तां भवानद्य स्वां भार्यां शुभचारिणीम् ।
नित्यं तपस्यभिरतां वडवारूपधारिणीम् ॥ ३९ ॥
पर्णाहारां कृशां दीनां जटिलां ब्रह्मचारिणीम् ।
हस्तिहस्तपरिक्षिप्तां व्याकुलां पद्मिनीमिव ।
श्लाघ्यां योगबलोपेतां योगमास्थाय गोपते ॥ ४० ॥

किरणोंके स्वामी ! आज आप हाथीके सूँडसे खींचे जानेके कारण पद्मिनीके समान व्याकुल हुई, शुद्ध आचरणवाली और योगके बलसे सम्पन्न अतएव योगसे घोड़ीका रूप धारण करके सदा तप करती हुई, पत्तोंका आहार करनेवाली, दुबली, दीन, जटाधारिणी और ब्रह्मचारिणी अपनी उस प्रशंसनीया भार्याको देखेंगे ॥ ३९-४० ॥

अनुकूलं तु देवेश यदि स्यान्मम तन्मतम् ।
रूपं निर्वर्त्तयाम्यद्य तव कान्तमरिंदम ॥ ४१ ॥

देवेश ! यदि आपको मेरी बात ठीक लगे तो शत्रुदमन ! मैं आज आपके रूपको मनोहर बना दूँ ॥ ४१ ॥

रूपं विषमतश्चासीत् तिर्यगूर्ध्वसमं तु वै ।
तेनासौ सम्भृतो देवरूपेण तु विभावसुः ॥ ४२ ॥

पहले सूर्यका रूप तिरछा, ऊँचा और सब ओरसे एक-सा था। उस रूपसे सम्पन्न होनेके कारण ही वे विभावसु कहे जाते हैं ॥ ४२ ॥

तस्मात्त्वष्टुः स वै वाक्यं बहु मेने प्रजापतिः ।
समनुज्ञातवांश्चैव त्वष्टारं रूपसिद्धये ॥ ४३ ॥

इसलिये उन प्रजापति सूर्यनारायणने त्वष्टाकी बातको बहुत अच्छा समझा और उन्होंने अपना रूप ठीक करनेके लिये त्वष्टाको अनुमति दे दी ॥ ४३ ॥

ततोऽभ्युपगमात् त्वष्टा मार्तण्डस्य विवस्वतः ।
भ्रमिमारोप्य तत् तेजः शातयामास भारत ॥ ४४ ॥

भारत ! तब त्वष्टाने मार्तण्ड (सूर्य) के समीप जाकर उनको सानपर चढ़ाकर उनके तेजको खरादना आरम्भ कर दिया ॥ ४४ ॥

ततो निर्भासितं रूपं तेजसा संहृतेन वै ।
कान्तात् कान्तरं द्रष्टुमधिकं शुशुभे तदा ॥ ४५ ॥

इस प्रकार तेजके छिल जानेसे उनका रूप खिल उठा और उनका रूप रम्यातिरम्य होकर अधिक सुशोभित होने लगा ॥ ४५ ॥

मुखे निर्वर्तितं रूपं तस्य देवस्य गोपतेः ।
ततः प्रभृति देवस्य मुखमासीत् तु लोहितम् ।
मुखरागं तु यत्पूर्वं मार्तण्डस्य मुखच्युतम् ॥ ४६ ॥
आदित्या द्वादशैवेह सम्भूता मुखसम्भवाः ।
धातार्यमा च मित्रश्च वरुणोऽशो भगस्तथा ॥ ४७ ॥
इन्द्रो विवस्वान् पूषा च पर्जन्यो दशमस्तथा ।
ततस्त्वष्टा ततो विष्णुरजघन्यो जघन्यजः ॥ ४८ ॥

तबसे किरणोंके स्वामी भगवान् सूर्यके मुखका रूप बदल गया । उस समयसे उनका मुख रक्तवर्णका हो गया । उन मार्तण्डके मुखसे जो मुखराग छूटा था, उससे बारह आदित्य उत्पन्न हुए । उनके मुखसे धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, दसवें पर्जन्य, त्वष्टा, बारहवें विष्णु उत्पन्न हुए, जो अन्तमें प्रकट होनेके कारण सबसे छोटे होकर भी गुणोंमें सर्वश्रेष्ठ थे ॥ ४६–४८ ॥

हर्षे लेभे ततो देवो दृष्ट्वाऽऽदित्यान् स्वदेहजान् ।
गन्धैः पुष्पैरलङ्कारैर्भासता मुकुटेन च ॥ ४९ ॥

गन्ध, पुष्प, अलंकार और प्रकाशमान मुकुटोंसे सुशोभित अपने शरीरसे उत्पन्न हुए उन आदित्योंको देखकर भगवान् सूर्य बड़े प्रसन्न हुए ॥ ४९ ॥

एवं सम्पूजयामास त्वष्टा वाक्यमुवाच ह ।
गच्छ देव निजां भार्यां कुरुंश्चरति सोत्तरान् ॥ ५० ॥
वडवारूपमास्थाय वने चरति शाद्वले ।

इस प्रकार सूर्यनारायणका पूजन कर त्वष्टाने उनसे कहा—'देव ! अब आप अपनी पत्नीके पास जाइये । वह उत्तर कुरु (देशों) में भ्रमण कर रही है और हरी घाससे भरे हुए वनमें घोड़ीका रूप धारण करके विचर रही है' ॥

स तथा रूपमास्थाय स्वभार्यारूपलीलया ॥ ५१ ॥
ददर्श योगमास्थाय स्वां भार्यां वडवां ततः ।
अधृष्यां सर्वभूतानां तेजसा नियमेन च ॥ ५२ ॥
वडवावपुषा राजंश्चरन्तीमकुतोभयाम् ।
सोऽश्वरूपेण भगवांस्तां मुखे समभावयत् ॥ ५३ ॥
मैथुनाय विचेष्टन्ती परपुंसोपशङ्कया ।
सा तन्निरवमच्छुक्रं नासिकायां विवस्वतः ॥ ५४ ॥

तब सूर्यनारायणने भी अपनी पत्नीके रूपके अनुसार घोड़ेके समान विचरण करनेके लिये घोड़ेका ही रूप धारण कर लिया । उस समय सूर्यने ध्यानसे देखा तो उन्हें तेज और नियमके कारण सब भूतोंसे अधृष्य घोड़ीका रूप धारण करके किसी ओरसे भी भयकी आशंका न कर निर्भय हो विचरती हुई अपनी भार्या (संज्ञा) दीख पड़ी। राजन्! फिर तो घोड़ेके रूपमें भगवान् सूर्य उसके मुखके समीप पहुँचे । पर वह पर-पुरुषकी आशंकासे मैथुनके प्रतिकूल चेष्टा करने लगी और सूर्यके वीर्यको उसने अपनी नाकपरसे गिरा दिया ॥ ५१–५४ ॥