भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 63
४०श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

देवौ तस्यामजायेतामश्विनौ भिषजां वरौ।
नासत्यश्चैव दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनाविति ॥ ५५ ॥
उससे वैद्योंमें श्रेष्ठ अश्विनीकुमार नामक देवता उत्पन्न हुए। वे दोनों अश्विनीकुमार नासत्य और दस्र नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ५५ ॥

मार्तण्डस्यात्मजावेतावष्टमस्य प्रजापतेः।
संज्ञायां जनयामास वडवायां स भारत।
तां तु रूपेण कान्तेन दर्शयामास भास्करः ॥ ५६ ॥
भारत! ये दोनों आठवें प्रजापति मार्तण्डके पुत्र हैं। इन्हें सूर्य भगवान्‌ने अश्वरूपा संज्ञाके गर्भसे उत्पन्न किया था। तदनन्तर सूर्यने उसे अपने मनोहर रूपमें दर्शन दिया ॥ ५६ ॥

सा च दृष्ट्वैव भर्तारं तुतोष जनमेजय।
यमस्तु कर्मणा तेन भृशं पीडितमानसः ॥ ५७ ॥
जनमेजय! तब वह स्वामीको देखकर बड़ी संतुष्ट हुई। इधर यम अपने उस कर्मसे मन-ही-मन बड़े दुःखित रहते थे ॥ ५७ ॥

धर्मेण रञ्जयामास धर्मराज इह प्रजाः।
स लेभे कर्मणा तेन परमेण महाद्युतिः ॥ ५८ ॥
पितॄणामाधिपत्यं च लोकपालत्वमेव च।
मनुः प्रजापतिस्त्वासीत् सावर्णः स तपोधनः ॥ ५९ ॥
अतएव वे अपने धर्मराजत्वके अनुरूप ही धर्मयुक्त आचरणसे प्रजाओंको प्रसन्न रखने लगे। उस श्रेष्ठ कर्मके कारण उन महाकान्तिमान् धर्मराजको पितरोंका आधिपत्य और लोकपालका पद मिला तथा वे तपस्याके धनी प्रजापति सावर्ण मनु हुए ॥ ५८-५९ ॥

भाव्यः सोऽनागते काले मनुः सावर्णिकेऽन्तरे।
मेरुपृष्ठे तपो घोरमद्यापि चरति प्रभुः ॥ ६० ॥
वे सर्वसमर्थ सावर्ण भविष्यके (आठवें) मन्वन्तरके मनु होंगे। वे आज भी सुमेरुपर्वतके शिखरपर घोर तप कर रहे हैं ॥ ६० ॥

भ्राता शनैश्चरश्चास्य ग्रहत्वमुपलब्धवान्।
नासत्यौ यौ समाख्यातौ स्वर्वैद्यौ तौ बभूवतुः ॥ ६१ ॥
इनके भाई शनैश्चर ग्रह बन गये और जिन नासत्योंका वर्णन किया है, वे स्वर्गके वैद्य बन गये ॥ ६१ ॥

सेवतोऽपि तथा राजन्नश्वानां शान्तिदोऽभवत्।
त्वष्टा तु तेजसा तेन विष्णोश्चक्रमकल्पयत् ॥ ६२ ॥
तदप्रतिहतं युद्धे दानवान्तचिकीर्षया।
वे उपासना करनेवालेके घोड़ोंको शान्ति देते हैं। उसी तेज (की छीलन) से त्वष्टाने विष्णु भगवान्‌का (सुदर्शन) चक्र बनाया। वह दानवोंके अन्त करनेकी इच्छासे बनाया गया चक्र युद्धमें किसी प्रकार भी व्यर्थ नहीं जाता ॥ ६२ १/२ ॥

यवीयसी तयोर्या तु यमी कन्या यशस्विनी ॥ ६३ ॥
अभवत् सा सरिच्छ्रेष्ठा यमुना लोकभाविनी।
मनुरित्युच्यते लोके सावर्ण इति चोच्यते ॥ ६४ ॥
उन दोनोंमें छोटी जो यमी नामकी यशस्विनी कन्या थी, वह नदियोंमें श्रेष्ठ, लोकोंको पवित्र करनेवाली यमुना हुई। मनु संसारमें मनु कहलाते हैं और सावर्ण भी कहलाते हैं ॥ ६३-६४ ॥

द्वितीयो यः सुतस्तस्य मनोर्भ्राता शनैश्चरः।
ग्रहत्वं स च लेभे वै सर्वलोकाभिपूजितम् ॥ ६५ ॥
उनके दूसरे पुत्र और मनुके भ्राता जो शनैश्चर हैं, उन्होंने सब लोकोंसे पूजित ग्रहका पद प्राप्त किया ॥ ६५ ॥

य इदं जन्म देवानां शृणुयाद् वापि धारयेत्।
आपद्भ्यः स विमुच्येत प्राप्नुयाच्च महद्यशः ॥ ६६ ॥
जो मनुष्य देवताओंके जन्म (की इस कथा) को सुनता है अथवा मनमें धारण करता है, वह आपत्तियोंसे छूट जाता और बड़ा भारी यश पाता है ॥ ६६ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि वैवस्वतोत्पत्तौ नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें वैवस्वत मनु (आदि) की उत्पत्तिविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥


दशमोऽध्यायः

वैवस्वत मनुके वंशजोंका वर्णन और पुरूरवाकी उत्पत्ति

वैशम्पायन उवाच

मनोर्वैवस्वतस्यासन् पुत्रा वै नव तत्समाः। नरिष्यंश्च तथा प्रांशुर्नाभागारिष्टसप्तमाः।
इक्ष्वाकुश्चैव नाभागो धृष्णुः शर्यातिरेव च ॥ १ ॥ करूषश्च पृषध्रश्च नवैते भरतर्षभ ॥ २ ॥