भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 65
४२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

विनताश्वको पश्चिम दिशाका राज्य मिला और भरतश्रेष्ठ ! गयकी राजधानी पूर्व दिशामें गया नामकी पुरी हुई ॥ १९ ॥
प्रविष्टे तु मनो तात दिवाकरमरिंदम।
दशधा तद्धतक्षत्रमकरोत् पृथिवीमिमाम् ॥ २० ॥
तात ! शत्रुसूदन ! मनुके सूर्यमें प्रवेश कर जानेपर उनके इक्ष्वाकु आदि दस पुत्रोंने पृथ्वीको दस भागोंमें बाँट लिया ॥ २० ॥
यूपाइ्किता वसुमती यस्येयं सवनाकरा।
इक्ष्वाकुर्ज्येष्ठदायादो मध्यदेशमवाप्तवान् ॥ २१ ॥
मनुके बड़े पुत्र इक्ष्वाकुको मध्यदेशका राज्य मिला। यज्ञस्तम्भोंसे अलंकृत एवं वन और खानोंसहित यह सारी पृथ्वी इक्ष्वाकुकी ही है ॥ २१ ॥
कन्याभावाच्च सुद्युम्नो नैनं गुणमवाप्तवान्।
वसिष्ठवचनाच्चासीत् प्रतिष्ठाने महात्मनः ॥ २२ ॥
प्रतिष्ठा धर्मराजस्य सुद्युम्नस्य कुरुद्वह।
सुद्युम्न कन्याभावके कारण इस सौभाग्यपूर्ण पदको न पा सके। परंतु कुरुद्वह ! वसिष्ठजीके वचनसे महात्मा धर्मराज सुद्युम्नको भी प्रतिष्ठानपुर (झूँसी—प्रयाग) का राज्य मिल गया था ॥ २२½ ॥
तत्पुरूरवसे प्रादाद् राज्यं प्राप्य महायशाः ॥ २३ ॥
सुद्युम्नः कारयामास प्रतिष्ठाने नृपक्रियाम्।
महायशस्वी सुद्युम्नने राज्य पानेके बाद प्रतिष्ठानमें (कुछ दिनतक) राज्य किया, फिर उन्होंने अपना राज्य पुरूरवा-को दे दिया ॥ २३½ ॥
उत्कलस्य त्रयः पुत्रास्त्रिषु लोकेषु विश्रुताः।
धृष्टकश्चाम्बरीषश्च दण्डश्चेति सुतास्त्रयः ॥ २४ ॥
उत्कलके तीन पुत्र थे, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध थे। उनके नाम थे—धृष्टक, अम्बरीष और दण्ड ॥ २४ ॥
यश्चकार महात्मा वै दण्डकारण्यमुत्तमम्।
धनं तल्लोकविख्यातं तापसानामन्नुत्तमम् ॥ २५ ॥
तत्र प्रविष्टमात्रस्तु नरः पापात् प्रमुच्यते।
महात्मा दण्डने दण्डकारण्य नामक वनका निर्माण किया, जो तपस्वियोंके लिये परमोत्तम (आश्रम) तथा लोकमें अत्यन्त विख्यात है। उसमें प्रवेश करते ही मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २५½ ॥
सुद्युम्नश्च दिवं यात ऐलमुत्पाद्य भारत ॥ २६ ॥
मानवेयो महाराज स्त्रीपुंसोर्लक्षणैर्युतः।
धृतवान् य इलेत्येव सुद्युम्नश्चातिविश्रुतः ॥ २७ ॥
भरतवंशी महाराज ! सुद्यम्न कन्यावस्थामें ऐल (पुरूरवा) को(और पुरुषावस्थामें उत्कल आदि अन्य तीन पुत्रोंको) उत्पन्न करके स्वर्ग चले गये। ये सुद्युम्न स्त्री तथा पुरुष दोनोंके ही लक्षणोंसे संयुक्त हुए थे। इन्होंने इलाके रूपमे रहनेपर गर्भ धारण किया था, फिर ये ही (पुरुषत्व प्राप्त होनेपर) सुद्युम्न नामसे प्रसिद्ध हो गये थे ॥ २६-२७ ॥
नरिष्यतः शकाः पुत्रा नाभागस्य तु भारत।
अम्बरीषोऽभवत् पुत्रः पार्थिवर्षभसत्तमः ॥ २८ ॥
भारत ! (मनुके पञ्चम पुत्र) नरिष्यन्तके पुत्र शक हुए और (मनुके द्वितीय पुत्र) नाभागके पुत्र राजराजेश्वर अम्बरीष हुए ॥ २८ ॥
धृष्णोस्तु धार्ष्टकं क्षत्रं रणधृष्टं बभूव ह।
करूपस्य तु कारूषाः क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ॥ २९ ॥
सहस्रं क्षत्रियगणो विक्रान्तः सम्बभूव ह।
नाभागारिष्टपुत्राश्च क्षत्रिया वैश्यतां गताः ॥ ३० ॥
(मनुके तृतीय पुत्र) धृष्णुके धार्ष्टक नामक क्षत्रिय हुए। वे रणमें ढीठ थे। (मनुके आठवें पुत्र) करूपसे कारूष नामवाले युद्धदुर्मद क्षत्रिय हुए। यह हजारों क्षत्रियोंका मण्डल परम पराक्रमी था। (मनुके सप्तम पुत्र) नाभागारिष्ट-के क्षत्रिय पुत्र वैश्य हो गये थे* ॥ २९-३० ॥
प्रांशोरेकोऽभवत् पुत्रः शर्यातिरिति विश्रुतः।
नरिष्यतस्य दायादो राजा दण्डधरो दमः।
शर्यातेर्मिथुनं चासीदानर्तो नाम विश्रुतः ॥ ३१ ॥
पुत्रः कन्या सुकन्याख्या या पत्नी च्यवनस्य ह।
आनर्तस्य तु दायादो रेवो नाम महाद्युतिः ॥ ३२ ॥
(मनुके छठे पुत्र) प्रांशुके एक पुत्र हुआ, वह शर्याति नामसे प्रसिद्ध था। (मनुके पञ्चम पुत्र) नरिष्यन्तका पुत्र दण्डधारी राजा दम हुआ। (मनुके चौथे पुत्र) शर्यातिकी दो संतान उत्पन्न हुईं; उनमें एक तो पुत्र था, जो आनर्त नामसे प्रसिद्ध हुआ और एक कन्या थी, जिसका नाम सुकन्या था। वह च्यवन ऋषिकी पत्नी हुई। आनर्तके रेव नामका महाकान्तिमान् पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ३१-३२ ॥
आनर्तविषयश्चासीत् पुरी चास्य कुशस्थली।
रेवस्य रैवतः पुत्रः ककुद्मी नाम धार्मिकः ॥ ३३ ॥
उसका राज्य आनर्त (जहाँ आज द्वारका है) देशमें था और उसकी पुरी (राजधानी) का नाम कुशस्थली (आजकी द्वारकापुरी) था। रेवके पुत्र रैवत हुए, इन्हींका दूसरा नाम ककुद्मी था। ये धार्मिक थे ॥ ३३ ॥
ज्येष्ठःपुत्रशतस्यासीद् राज्यं प्राप्य कुशस्थलीम्।
स कन्यासाहितः श्रुत्वा गान्धर्वं ब्रह्मणोऽन्तिके ॥ ३४ ॥


* युद्धमें हार जानेके कारण क्षत्रिय होनेपर भी इनका नाना अपनेको वैश्य कहता था; अतः ऐसी वैश्यपुत्रीके पुत्र होनेसे ये वैश्य कहलाये। इस ग्रन्थके ग्यारहवें अध्यायके नवें श्लोककी टिप्पणीमें इसका पूर्ण समाधान है।