विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] एकादशोऽध्यायः ४३
मुहूर्तभूतं देवस्य गतं बहुयुगं प्रभो ।
आजगाम युवैवाथ स्वां पुरीं यादवावृताम् ॥ ३५ ॥
(रेवके) सौ पुत्रोंमें ये सबसे ज्येष्ठ थे। कुशस्थलीका राज्य पानेके अनन्तर एक दिन ये अपनी कन्याके साथ (ब्रह्मलोकमें) गये, वहाँ ब्रह्माजीके समीप गन्धर्वोंका गीत सुनने लगे। राजन् ! संगीत सुनते-सुनते ये दो घड़ी वहाँ ठहरे रहे। इतने ही समयमें मानवलोकमें अनेक युग बीत गये। तत्पश्चात् ये यादवोंसे घिरी हुई अपनी पुरीमें आये। उस समयतक इनकी युवावस्था ज्यों-की-त्यों बनी हुई थी ॥ ३४-३५ ॥
कृतां द्वारवतीं नाम्ना बहुद्वारां मनोरमाम् ।
भोजवृष्ण्यन्धकैर्गुप्तां वासुदेवपुरोगमैः ॥ ३६ ॥
(उस समय उस पुरीमें) बहुत-से दरवाजे बन गये थे और वासुदेव आदि भोज, वृष्णि और अन्धकवंशी उस रमणीय पुरीकी रक्षा कर रहे थे। यादवोंने उसका नाम बदलकर द्वारवती रख दिया था ॥ ३६ ॥
ततः स रैवतो ज्ञात्वा यथातत्त्वमरिंदम ।
कन्यां तां बलदेवाय सुव्रतां नाम रेवतीम् ॥ ३७ ॥
दत्त्वा जगाम शिखरं मेरोस्तपसि संस्थितः ।
रेमे रामोऽपि धर्मात्मा रेवत्या सहितः सुखी ॥ ३८ ॥
शत्रुमर्दन ! इन सब बातोंको यथार्थ रीतिसे जानकर राजा रैवत अपनी रेवती नामकी सुव्रता कन्याको बलदेवजीके हाथमें देकर स्वयं मेरुपर्वतके शिखरपर चले गये और वहाँ तपस्यामें लग गये। (इधर) धर्मात्मा बलरामजी भी रेवतीके साथ सुखपूर्वक विहार करने लगे ॥ ३७-३८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि ऐलोत्पत्तिवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पुरूरवाकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
एकादशोऽध्यायः
धुन्धुमारकी कथा
जनमेजय उवाच
कथं बहुयुगे काले समतीते द्विजोत्तम ।
न जरा रेवतीं प्राप्ता रैवतं च ककुद्मिनम् ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—द्विजोत्तम ! बहुत-से युगोंका समय बीत जानेपर भी रेवती और ककुद्मी रैवतको बुढ़ापा क्यों नहीं व्याप्त हुआ ? ॥ १ ॥
मेहे गतं वा तस्य शार्यातेः संततिः कथम् ।
स्थिता पृथिव्यामद्यापि श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ २ ॥
शार्यातिके प्रपौत्र रैवत मेरुपर्वतपर चले गये, तब भी उनकी संतान आजतक पृथिवीपर कैसे वर्तमान है ? इस बातको मैं यथार्थ रीतिसे सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
न जरा क्षुत्पिपासे वा न मृत्युर्भरतर्षभ ।
ऋतुचक्रं न भवति ब्रह्मलोके सदानघ ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने उत्तर दिया—निष्पाप भरतश्रेष्ठ ! ब्रह्मलोकमें मृत्यु, भूख-प्यास और बुढ़ापा नहीं होते और वहाँ ऋतुचक्र भी अपना प्रभाव नहीं दिखाता (वहाँ तो सदा एक-सी दशा रहती है) ॥ ३ ॥
ककुद्मिनस्तु तं लोकं रैवतस्य गतस्य ह ।
हता पुण्यजनैस्तात राक्षसैः सा कुशस्थली ॥ ४ ॥
तात ! जब रैवत ककुद्मी ब्रह्मलोकको चले गये, तब यक्षों और राक्षसोंने कुशस्थलीको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ॥ ४ ॥
तस्य भ्रातृशतं चासीद् धार्मिकस्य महात्मनः ।
तद् वध्यमानं रक्षोभिर्दिशः प्राद्रवदच्युतम् ॥ ५ ॥
धर्मात्मा एवं महात्मा रैवतके सौ भाई थे। वे राक्षसोंसे हारे नहीं, परंतु राक्षसोंके बार-बार आक्रमण करनेके कारण (अनेक) दिशाओंमें भाग गये ॥ ५ ॥
विद्रुतस्य तु राजेन्द्र तस्य भ्रातृशतस्य वै ।
तेषां तु ते भयाक्रान्ताः क्षत्रियास्तत्र तत्र ह ॥ ६ ॥
राजेन्द्र ! जब उनके सौ भाई भाग गये, तब उस कुलके अन्य क्षत्रिय भी राक्षसोंके भयसे भागकर जहाँ-तहाँ बस गये॥६॥
अन्ववायस्तु सुमहांस्तत्र तत्र विशांपते ।
येषामेते महाराज शार्याता इति विश्रुताः ॥ ७ ॥
क्षत्रिया भरतश्रेष्ठ दिक्षु सर्वासु धार्मिकाः ।
सर्वशः पर्वतगणान् प्रविष्टाः कुरुनन्दन ॥ ८ ॥
प्रजानाथ ! उनका बड़ा भारी वंश जहाँ-तहाँ फैल गया। महाराज ! उनके वंशके ही ये धार्मिक क्षत्रिय सब दिशाओंमें शार्यात नामसे प्रसिद्ध हैं। भरतश्रेष्ठ कुरुनन्दन ! वे सब क्षत्रिय चारों ओरके पर्वतोंकी कन्दराओंमें प्रविष्ट हो गये थे ॥ ७-८ ॥