विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें४४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
नाभागारिष्टपुत्रौ द्वौ वैश्यौ ब्राह्मणतां गतौ।
करूपस्य च कारूषाः क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ॥ ९ ॥
नाभाग और अरिष्टके पुत्र ये दोनों वैश्य होकर पुनः)* ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो गये। करूषके कारूषनामक युद्धदुर्मद क्षत्रिय उत्पन्न हुए ॥ ९ ॥
प्रांशोरेकोऽभवत् पुत्रः प्रजातिरिरितः श्रुतम् ।
पृषध्रो हिंसयित्वा तु गुरोर्गां जनमेजय ॥ १० ॥
शापाच्छूद्रत्वमापन्नो नवैते परिकीर्तिताः ।
वैवस्वतस्य तनया मनोर्वै भरतर्षभ ॥ ११ ॥
हमने सुना है कि (मनुके छठे पुत्र) प्रांशुके प्रजाति नामका एक ही पुत्र उत्पन्न हुआ था। जनमेजय ! गुरुकी गौको मारनेपर (गुरुके) शापसे पृषध्र शूद्रत्वको प्राप्त हो गया था। भरतर्षभ ! यहाँ तक वैवस्वत मनुके नौ पुत्रोंका मैंने वर्णन किया ॥ १०-११ ॥
क्षुवतश्च मनोस्तात इक्ष्वाकुरभवत् सुतः।
तस्य पुत्रशतं त्वासीदिक्ष्वाकोर्भूरिदक्षिणम् ॥ १२ ॥
तात ! मनुके छींकनेसे इक्ष्वाकु नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई थी। उन इक्ष्वाकुके भी सौ पुत्र उत्पन्न हुए। ये सब-के-सब बड़ी-बड़ी दक्षिणा देनेवाले थे ॥ १२ ॥
तेषां विकुक्षिज्येष्ठस्तु विकुक्षित्वादयोधताम् ।
प्राप्तः परमधर्मज्ञः सोऽयोध्याधिपतिः प्रभुः ॥ १३ ॥
उनमें सबसे बड़ा पुत्र विकुक्षि था। यह विकुक्षि-विशाल कोख (वक्षःस्थल) वाला होनेसे सर्वथा अयोध्य था; अर्थात् उसके सामने कोई योद्धा ठहर नहीं सकता था। वही परम धार्मिक राजा विकुक्षि अयोध्याका स्वामी हुआ ॥ १३ ॥
शकुनिप्रमुखास्तस्य पुत्राः पञ्चाशदुत्तमाः ।
उत्तरापथदेशस्था रक्षितारो महीपते ॥ १४ ॥
राजन् ! उसके शकुनि आदि पचास उत्तम पुत्र थे, वे उत्तरापथ देशमें रहकर उस देशकी रक्षा करते थे ॥ १४ ॥
चत्वारिंशत्तथाष्टौ च दक्षिणस्यां तथा दिशि ।
शशादप्रमुखाश्चान्ये रक्षितारो विशाम्पते ॥ १५ ॥
जनेश्वर ! उसके शशाद आदि अड़तालीस पुत्र दक्षिण दिशामें रहकर दक्षिण दिशाकी रक्षा करते थे ॥ १५ ॥
* मातृजातयः पुत्राः स्युः—'पुत्र माताकी जातिके होते हैं' इस शास्त्रीय वचनसे वैश्य-स्त्रीमें उत्पन्न होनेके कारण ये पुत्र वैश्य कहलाते थे और इस वैश्य-स्त्रीका पिता भी क्षत्रिय था, परंतु संग्राममें शत्रुओंसे हार जानेके कारण अपनेको वैश्य कहने लगा था। इस कथाका विस्तृत वर्णन मार्कण्डेयपुराणके ११३ वें अध्यायमें है।
इक्ष्वाकुस्तु विकुक्षिं वै अष्टकायामथादिशत् ।
मांसमानय श्राद्धार्थं मृगान् हत्वा महाबलः ॥ १६ ॥
महाबली इक्ष्वाकुने अष्टका श्राद्धके लिये (अपने पुत्र) विकुक्षिको आज्ञा दी कि तू मृग नामक कन्दविशेषको काटकर श्राद्धके लिये उसका गूदा ला ॥ १६ ॥
श्राद्धकर्मणि चोद्दिष्टमकृते श्राद्धकर्मणि ।
भक्षयित्वा शशं तात शशादो मृगयागतः ॥ १७ ॥
परंतु तात ! विकुक्षिने श्राद्धकर्मके लिये नियत किये हुए शश (कन्दविशेष)को श्राद्ध पूर्ण होनेसे पहले ही खाकर उच्छिष्ट कर दिया और शिकार करके वापस लौट आया ॥ १७ ॥
इक्ष्वाकुणा परित्यक्तो वसिष्ठवचनात् प्रभुः ।
इक्ष्वाकौ संस्थिते तात शशादः पुरमावसत् ॥ १८ ॥
उस समय इक्ष्वाकुने वसिष्ठजीके कहनेसे शशादको त्याग दिया। तात ! फिर इक्ष्वाकुके मरनेपर शशाद नगरमें आया (और राज्यका स्वामी बनकर राज्य करनेलगा) ॥ १८ ॥
शशादस्य तु दायादः ककुत्स्थो नाम वीर्यवान् ।
इन्द्रस्य वृषभूतस्य ककुत्स्थोऽजयदासुरान् ॥ १९ ॥
पूर्वं देवासुरे युद्धे ककुत्स्थस्तेन हि स्मृतः ।
अनेनास्तु ककुत्थस्य पृथुरानैनसः स्मृतः ॥ २० ॥
शशादके ककुत्स्थ नामवाला वीर्यवान् पुत्र उत्पन्न हुआ, उसे पहले देवासुर-संग्राममें इन्द्रने स्मरण किया था। उस समय उसने इन्द्रको बैल बनाकर उनके ककुद् (पीठ)पर बैठकर असुरोंको जीता था; इसलिये इसका नाम ककुत्स्थ हुआ। ककुत्स्थके अनेना नामक पुत्र हुआ और अनेनाका पुत्र पृथु हुआ ॥ १९–२० ॥
विष्टराश्वः पृथोः पुत्रस्तस्मादार्द्रस्त्वजायत ।
आर्द्रस्य युवनाश्वस्तु श्रावस्तस्तु चात्मजः ॥ २१ ॥
पृथुके विष्टराश्व और विष्टराश्वके आर्द्र नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, आर्द्रके युवनाश्व और युवनाश्वका पुत्र श्राव हुआ ॥ २१ ॥
जज्ञे श्रावस्तको राजा श्रावस्ती येन निर्मिता ।
श्रावस्तस्य तु दायादो बृहदश्वो महायशाः ॥ २२ ॥
वह श्रावस्तक नाम धारण करके राजसिंहासनपर बैठा, उसीने श्रावस्तीपुरी बसायी। श्रावस्तका पुत्र महायशस्वी बृहदश्व हुआ ॥ २२ ॥
कुवलाश्वः सुतस्तस्य राजा परमधार्मिकः ।
यः स धुन्धुवधाद् राजा धुन्धुमारत्वमागतः ॥ २३ ॥
उसका पुत्र परमधार्मिक राजा कुवलाश्व हुआ, धुन्धु नामक दैत्यको मारनेके कारण वह राजा 'धुन्धुमार' नामसे भी प्रसिद्ध हुआ ॥ २३ ॥