भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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हरिवंशपर्व ] एकादशोऽध्यायः ४५

जनमेजय उवाच

धुन्धोर्वधमहं ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।
यदर्थं कुवलाश्वः सन् धुन्धुमारत्वमागतः॥ २४॥

जनमेजयने कहा—ब्रह्मन् ! मैं धुन्धुके वधकी उस कथाको यथार्थ रीतिसे सुनना चाहता हूँ, जिससे कुवलाश्वका नाम धुन्धुमार पड़ गया था॥ २४॥

वैशम्पायन उवाच

कुवलाश्वस्य पुत्राणां शतमुत्तमधन्विनाम्।
सर्वे विद्यासु निष्णाता बलवन्तो दुरासदाः॥ २५॥

वैशम्पायनजी बोले—कुवलाश्वके धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ सौ पुत्र थे। वे सभी समस्त विद्याओंमें निपुण, बलवान् तथा दुर्दम्य थे॥ २५॥

बभूवुर्धार्मिकाः सर्वे यज्वानो भूरिदक्षिणाः।
कुवलाश्वं सुतं राज्ये बृहदश्वो न्ययोजयत्॥ २६॥

वे सभी धार्मिक पुत्र यज्ञ करके बहुत-सी दक्षिणा दिया करते थे। बृहदश्वने अपने ज्येष्ठ पुत्र कुवलाश्वको राज-सिंहासनपर बैठाया॥ २६॥

पुत्रसंक्रामितश्रीस्तु वनं राजा समाविशत्।
तमुत्तङ्कोऽथ विप्रर्षिः प्रयान्तं प्रत्यवारयत्॥ २७॥

अपनी राज्यलक्ष्मीको पुत्रके अधीन करके राजा बृहदश्व स्वयं वनको चले। उस समय ब्रह्मर्षि उत्तङ्कने उन्हे वनमें जानेसे रोका॥ २७॥

उत्तङ्क उवाच

भवता रक्षणं कार्यं तत् तावत् कर्तुमर्हसि।
निरुद्विग्नस्तपस्तप्तुं न हि शक्नोषि पार्थिव॥ २८॥

उत्तङ्क ऋषिने कहा—राजन् ! हमारी रक्षा करना आपका कर्तव्य है; अतः पहले वही कीजिये। अन्यथा आप निश्चिन्त होकर तप नहीं कर सकते॥ २८॥

त्वया हि पृथिवी राजन् रक्ष्यमाणा महात्मना।
भविष्यति निरुद्विग्ना नारण्यं गन्तुमर्हसि॥ २९॥

राजन् ! जब आप-जैसे महात्मा इस पृथिवीकी रक्षा करेंगे, तभी इस पृथ्वीपर शान्ति होगी; अतः आपका वन-में जाना उचित नहीं है॥ २९॥

पालने हि महान् धर्मः प्रजानामिह दृश्यते।
न तथा दृश्यतेऽरण्ये मा ते भूद् बुद्धिरीदृशी॥ ३०॥

हम देखते हैं कि यहाँ रहकर प्रजाका पालन करनेसे आपको महान् पुण्य होगा। वनमें रहनेपर ऐसे पुण्यकी प्राप्ति आपको हो, यह हमे नहीं दीखता। इसलिये आप ऐसा विचार न करें॥ ३०॥

ईदृशो न हि राजेन्द्र धर्मः क्वचन दृश्यते।
प्रजानां पालने यो वै पुरा राजर्षिभिः कृतः।
रक्षितव्याः प्रजा राज्ञा तास्त्वं रक्षितुमर्हसि॥ ३१॥

राजेन्द्र ! प्राचीन कालमें राजर्षियोंने प्रजाओंका पालन करके जैसा पुण्य-संचय किया है, वैसा पुण्य और कहीं नहीं दिखायी देता। राजाको प्रजाओंकी रक्षा करनी चाहिये; अतः आप प्रजाकी रक्षा करें॥ ३१॥

ममाश्रमसमीपे हि समेषु मरुधन्वसु।
समुद्रो वालुकापूर्ण उज्जानक इति श्रुतः।
देवतानामवध्यश्च महाकायो महाबलः॥ ३२॥
अन्तर्भूमिगतस्तत्र वालुकान्तर्हितो महान्।
राक्षसस्य मधोः पुत्रो धुन्धुनामा महासुरः।
शेते लोकविनाशाय तप आस्थाय दारुणम्॥ ३३॥

मेरे आश्रमके समीप मरुप्रदेशकी समतल भूमिमें बालूसे भरा हुआ उज्जानक नामवाला समुद्र है। वहीं एक विशालकाय महाबली राक्षस रहता है, जो देवताओंके लिये भी अवध्य है। वह महान् असुर मधु नामक राक्षसका पुत्र है। उसका नाम धुन्धु है। वह वहाँ पृथिवीके भीतर बालूमें छिपकर सोता है और सम्पूर्ण लोकोंका संहार करनेके लिये कठोर तपस्या कर रहा है॥ ३२-३३॥

संवत्सरस्य पर्यन्ते स निःश्वासं प्रमुञ्चति।
यदा तदा भूश्चलति सशैलवनकानना॥ ३४॥

वह एक वर्ष बीतनेपर जब बड़े जोरसे साँस छोड़ता है, उस समय पर्वत और वनोंसहित सारी पृथिवी डोलने लगती है॥ ३४॥

तस्य निःश्वासवातेन रज उद्धूयते महत्।
आदित्यपथमावृत्य सप्ताहं भूमिकम्पनम्॥ ३५॥

उसके श्वासकी वायुसे बड़ी भारी धूलि उड़ती है, जो सूर्यके मार्गको भी ढँक लेती है; साथ ही एक सप्ताह तक भूकम्प होता रहता है॥ ३५॥

सविस्फुलिङ्गं साङ्गारं सधूममतिदारुणम्।
तेन तात न शक्नोमि तस्मिन् स्थातुं स्वकाश्रमे॥ ३६॥

तात ! (उस समय पृथिवीमेंसे) चिनगारियाँ, अंगारे और अत्यन्त दारुण धुएँ निकलने लगते हैं। इसलिये तात ! मैं अपने आश्रममें (सुखपूर्वक) नहीं रह पाता॥ ३६॥

तं मारय महाकायं लोकानां हितकाम्यया।
लोकाः स्वस्था भवन्त्वद्य तस्मिन् विनिहतेऽसुरे॥ ३७॥

आप लोकोंका हित करनेकी इच्छासे उस विशाल शरीरवाले दैत्यका संहार करें, आज उस असुरकें मारे जानेपर सब लोग सुखी हो जायें॥ ३७॥

त्वं हि तस्य वधायैकः समर्थः पृथिवीपते।
विष्णुना च वरो दत्तो महाँ पूर्वयुगेऽनघ॥ ३८॥

पृथिवीपते ! एक आप ही उसका वध कर सकते हैं, क्योंकि निष्पाप नरेश ! भगवान् विष्णुने पहले युगमें मुझे एक वर दिया था॥ ३८॥