भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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४६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


यस्त्वं महासुरं रौद्रं हनिष्यसि महाबलम् ।
तस्य त्वं वरदानेन तेज आप्याययिष्यसि ॥ ३९ ॥

भगवान्के उस वरदानके अनुसार जब कि (अयोध्याके राजा) आप इस महाबली भयंकर दानवका संहार करेंगे, अपने तेजको (वैष्णव तेजसे) परिपुष्ट कर लोगे ॥ ३९ ॥

न हि धुन्धुर्महातेजास्तेजसाल्पेन शक्यते ।
निर्दग्धुं पृथिवीपाल स हि वर्षशतैरपि ।
वीर्यं हि सुमहत्तस्य देवैरपि दुरासदम् ॥ ४० ॥

पृथिवीपाल ! महातेजस्वी धुन्धुको अल्प तेजवाला पुरुष सौ वर्षमें भी नहीं मार सकता। उसमें इतना अधिक बल है कि देवताओंके लिये भी उसे दबाना कठिन है ॥ ४० ॥

स एवमुक्तो राजर्षिरुत्तङ्केन महात्मना ।
कुवलाश्वं सुतं प्रादात् तस्मै धुन्धुनिबर्हणे ॥ ४१ ॥

महात्मा उत्तङ्कने जब उन राजर्षिसे इस प्रकार कहा, तब उन्होंने धुन्धु दैत्यको नष्ट करनेके लिये अपने पुत्र कुवलाश्वको उनकी सेवामें दे दिया ॥ ४१ ॥

बृहदश्व उवाच

भगवन् न्यस्तशस्त्रोऽहमयं तु तनयो मम ।
भविष्यति द्विजश्रेष्ठ धुन्धुमारो न संशयः ॥ ४२ ॥

बृहदश्वने कहा—भगवन् ! मैंने तो शस्त्र त्याग दिये हैं, किंतु द्विजश्रेष्ठ ! यह मेरा पुत्र (आपको समर्पित) है, यह अवश्य धुन्धुमार होगा ॥ ४२ ॥

स तं व्यादिश्य तनयं राजर्षिर्धुन्धुमारणे ।
जगाम पर्वतायैव तपसे संशितव्रतः ॥ ४३ ॥

(यह कहकर) प्रशंसनीय व्रतवाले वे राजर्षि अपने पुत्रको धुन्धुका वध करनेकी आज्ञा देकर स्वयं तप करनेके लिये पर्वतपर चले गये ॥ ४३ ॥

कुवलाश्वस्तु पुत्राणां शतेन सह पार्थिवः ।
प्रायादुत्तङ्कसहितो धुन्धोस्तस्य विनिग्रहे ॥ ४४ ॥

तब राजा कुवलाश्व अपने सौ पुत्रों और उत्तङ्कको साथमें लेकर धुन्धुको दण्ड देनेके लिये चल दिये ॥ ४४ ॥

तमाविशत् तदा विष्णुर्भगवान्स्तेजसा प्रभुः ।
उत्तङ्कस्य नियोगाद् वै लोकस्य हितकाम्यया ॥ ४५ ॥

उस समय भगवान् विष्णु उत्तङ्क ऋषिकी प्रेरणासे लोकोंका हित करनेके लिये अपने तेजःस्वरूपसे उस राजाके शरीरमें प्रविष्ट हो गये ॥ ४५ ॥

तस्मिन् प्रयाते दुर्धर्षे दिवि शब्दो महानभूत् ।
एष श्रीमानवध्योऽद्य धुन्धुमारो भविष्यति ॥ ४६ ॥

तब उस दुर्धर्ष राजाके प्रस्थान करनेपर आकाशमे गम्भीर वाणी सुनायी दी कि 'ये श्रीमान् राजा अवध्य हैं, आज इनके हाथसे धुन्धु अवश्य मारा जायगा' ॥ ४६ ॥

दिव्यैर्माल्यैश्च तं देवाः समन्तात् समवाकिरन् ।
देवदुन्दुभयश्चापि प्रणेदुर्भर्तर्षभ ॥ ४७ ॥

भरतर्षभ ! तदनन्तर देवताओंने अपनी दुन्दुभियाँ बजाकर उनके ऊपर चारों ओरसे दिव्य पुष्पोंकी वर्षा की ॥ ४७ ॥

स गत्वा जयतां श्रेष्ठस्तनैः सह वीर्यवान् ।
समुद्रं खानयामास वालुकार्णवमव्ययम् ॥ ४८ ॥

विजय पानेवालोंमें श्रेष्ठ वह वीर्यवान् राजा अपने पुत्रोंके साथ वहाँ पहुँचकर अपार रेतेसे भरे हुए समुद्रको खुदवाने लगे ॥ ४८ ॥

नारायणेन कौरव्य तेजसाऽऽप्यायितः स वै ।
बभूव स महातेजा भूयो बलसमन्वितः ॥ ४९ ॥

कौरव्य ! वे महाबली राजा भगवान् नारायणके तेजसे पुष्ट होनेके कारण और भी अधिक तेजस्वी हो गये ॥ ४९ ॥

तस्य पुत्रैः खनद्भिस्तु वालुकान्तर्हितस्तदा ।
धुन्धुरासादितो राजन् दिशमावृत्य पश्चिमाम् ॥ ५० ॥

राजन् ! धरती खोदते हुए कुवलाश्वपुत्रोंने बालूके भीतर छिपे हुए धुन्धुका पता लगा लिया। वह पश्चिम दिशाको घेरकर पड़ा था ॥ ५० ॥

मुखेनाग्निना क्रोधाल्लोकानुद्वर्तयन्निव ।
वारि सुस्राव वेगेन महोदधिरिवोदये ॥ ५१ ॥
सोमस्य भरतश्रेष्ठ धारोर्मिकलिलं महत् ।
तस्य पुत्रशतं दग्धं त्रिभिरूनं तु रक्षसा ॥ ५२ ॥

धुन्धु अपने मुखकी आगसे सम्पूर्ण लोकोंका संहार-सा करता हुआ जलका स्रोत बहाने लगा। भरतश्रेष्ठ ! जैसे चन्द्रमाके उदयकालमें समुद्रमें ज्वार आता है, उसकी उत्ताल तरङ्गं बढ़ने लगती हैं, उसी प्रकार वहाँ धारा, लहर और कीचड़से युक्त महान् जलस्रोत वेगपूर्वक बढ़ने लगा। उस राक्षसने कुवलाश्वके सौ पुत्रोंमेंसे तीनको छोड़कर शेष सबको अपनी मुखाग्निसे जलाकर भस्म कर दिया ॥ ५१-५२ ॥

ततः स राजा कौरव्य राक्षसं तं महाबलम् ।
आससाद महातेजा धुन्धुं धुन्धुनिबर्हणः ॥ ५३ ॥

कुरुनन्दन ! तब धुन्धुका संहार करनेके लिये आये हुए वे महातेजस्वी राजा उस महाबली राक्षसके सामने पहुँचे ॥ ५३ ॥

तस्य वारिमयं वेगमापीय स नराधिपः ।
योगी योगेन वह्निं च शमयामास वारिणा ॥ ५४ ॥

फिर उन योगी नरेशने योगके प्रभावसे उसके जलमय वेगको पी लिया तथा जलसे अग्निको शान्त कर दिया ॥ ५४ ॥

निहत्य तं महाकायं बलेनोदकराक्षसम् ।
उत्तङ्कं दर्शयामास कृतकर्मा नराधिपः ॥ ५५ ॥

इस प्रकार उस विशाल शरीरवाले जल-राक्षसको बल-