भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

हरिवंशपर्व ] द्वादशोऽध्यायः [ ४७


पूर्वक मारकर राजाने अपना काम पूर्ण करके उस मारे हुए राक्षसको उत्तङ्क ऋषिको दिखाया ॥ ५५ ॥

उत्तङ्कस्तु वरं प्रादात् तस्मै राज्ञे महात्मने ।
ददौ तस्याक्षयं वित्तं शत्रुभिश्चापराजयम् ॥ ५६ ॥
धर्मे रतिं च सततं स्वर्गवासं तथाक्षयम् ।
पुत्राणां चाक्षयाँल्लोकान् स्वर्गे ये रक्षसा हताः ॥ ५७ ॥

उस समय उत्तङ्कने उन महात्मा राजाको वरदान दिया कि 'आपके पास अक्षय धन रहेगा तथा शत्रुओंसे आप कभी पराजित नहीं होंगे ॥ ५६ ॥
'धर्मपर आपकी श्रद्धा सर्वदा बनी रहेगी तथा आप अनन्त कालतक स्वर्गमें रहेंगे । साथ ही राक्षसने आपके जिन पुत्रोंको मार डाला है, उन्हें भी स्वर्गमें अक्षय लोक मिलेंगे' ॥ ५७ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि धुन्धुवधे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें धुन्धुवधविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥


द्वादशोऽध्यायः

धुन्धुमारके वंशका वर्णन और गालवकी उत्पत्ति

वैशम्पायन उवाच

तस्य पुत्रास्त्रयः शिष्टा दृढाश्वो ज्येष्ठ उच्यते ।
चन्द्राश्वकपिलाश्वौ तु कुमारौ द्वौ कनीयसौ ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! उन (धुन्धुमार) के तीन पुत्र बच गये थे, जिनमें दृढाश्व सबसे बड़ा था तथा चन्द्राश्व और कपिलाश्व दो छोटे थे ॥ १ ॥

धौन्धुमारिर्दृढाश्वस्तु हर्यश्वस्तस्य चात्मजः ।
हर्यश्वस्य निकुम्भोऽभूत् क्षत्रधर्मरतः सदा ॥ २ ॥
धुन्धुमारके दृढाश्व, दृढाश्वके हर्यश्व और हर्यश्वके निकुम्भ नामक पुत्र हुआ, जो सदा क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहता था ॥ २ ॥

संहताश्वो निकुम्भस्य पुत्रो रणविशारदः ।
अकृशाश्वः कृशाश्वश्च संहताश्वसुतौ नृप ॥ ३ ॥
निकुम्भके संहताश्व नामक पुत्र हुआ, जो युद्धकी कलामे निपुण था । राजन् ! संहताश्वके अकृशाश्व और कृशाश्व नामक दो पुत्र हुए ॥ ३ ॥

तस्य हैमवती कन्या सतां माता दृषद्वती ।
विख्याता त्रिषु लोकेषु पुत्रश्चास्याः प्रसेनजित् ॥ ४ ॥
उस (संहताश्व) की भार्या हिमवान्‌की पुत्री थी, जो तीनों लोकोंमें दृषद्वतीके नामसे प्रसिद्ध है । उससे प्रसेनजित् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था । वह श्रेष्ठ पुत्रोंकी जननी थी ॥ ४ ॥

लेभे प्रसेनजिद् भार्या गौरीं नाम पतिव्रताम् ।
अभिशप्ता तु सा भर्त्रा नदी वै बाहुदामभवत् ॥ ५ ॥
प्रसेनजित्‌की गौरी नामवाली भार्या थी । वह पतिव्रता थी । वह पतिके शाप देनेपर बाहुदा नदी हो गयी ॥ ५ ॥

तस्याः पुत्रो महानासीद् युवनाश्वो महीपतिः ।
मान्धाता युवनाश्वस्य त्रिलोकविजयी सुतः ॥ ६ ॥
उसके पुत्र महाराज युवनाश्व थे, युवनाश्वके त्रिलोक-विजयी मान्धाता नामक पुत्र हुआ ॥ ६ ॥

तस्य चैत्ररथी भार्या शशविन्दोः सुताभवत् ।
साध्वी बिन्दुमती नाम रूपेणासदृशी भुवि ॥ ७ ॥
शशविन्दु की पुत्री बिन्दुमती, जिसका दूसरा नाम चैत्ररथी था, मान्धाताकी भार्या थी । वह साध्वी पृथ्वीमे अनुपम रूपवती थी ॥ ७ ॥

पतिव्रता च ज्येष्ठा च भ्रातॄणामयुतस्य सा ।
तस्यामुत्पादयामास मान्धाता द्वौ सुतौ नृप ॥ ८ ॥
पुरुकुत्सं च धर्मज्ञं मुचुकुन्दं च धार्मिकम् ।
पुरुकुत्ससुतस्वासीत् त्रसदस्युर्महीपतिः ॥ ९ ॥
उसके दस हजार भाई थे और वह पतिव्रता उनमें सबसे बड़ी थी । राजन् ! मान्धाताने उसके गर्भसे धर्मज्ञ पुरुकुत्स और धार्मिक मुचुकुन्द—इन दो पुत्रोंको उत्पन्न किया। पुरुकुत्स-का पुत्र राजा त्रसदस्यु हुआ ॥ ८-९ ॥

नर्मदायामथोत्पन्नः सम्भूतस्तस्य चात्मजः ।
सम्भूतस्य तु दायादः सुधन्वा नाम पार्थिवः ॥ १० ॥
त्रसदस्युके नर्मदा नामवाली स्त्रीके गर्भसे सम्भूत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । सम्भूतका पुत्र सुधन्वा नामक राजा था ॥ १० ॥

सुधन्वनः सुतश्चासीत् त्रिधन्वा रिपुमर्दनः ।
राज्ञस्त्रिधन्वनस्त्वासीद् विद्वांस्त्रय्यारुणः सुतः ॥ ११ ॥
सुधन्वाके त्रिधन्वा नामक पुत्र हुआ, जो शत्रुओंका मर्दन करनेवाला था । राजा त्रिधन्वाके त्रय्यारुण नामक विद्वान् पुत्र हुआ ॥ ११ ॥

तस्य सत्यव्रतो नाम कुमारोऽभून्महाबलः ।
पाणिग्रहणमन्त्राणां विघ्नं चक्रे सुदुर्मतिः ॥ १२ ॥
त्रय्यारुणके सत्यव्रत नामवाला महाबली कुमार हुआ । उसकी