विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें४८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
बुद्धि बड़ी खोटी थी। वह (परस्त्रीहरणद्वारा) विवाहके मन्त्रोंमें विघ्न डालने लगा ॥ १२ ॥
येन भार्या हृता पूर्वं कृतोद्वाहा परस्य वै । बाल्यात् कामाच्च मोहाच्च संदर्पाच्चापलेन च ॥ १३ ॥
उसने बालकपन, काम, मोह, हर्ष और चपलताके कारण किसी दूसरे (नागरिक) की विवाहिता स्त्रीको छीन लिया था ॥ १३ ॥
अहार कन्यां कामात् स कस्यचित् पुरवासिनः । अधर्मशङ्कुना तेन राजा त्रय्यारुणोऽत्यजत् ॥ १४ ॥ अपध्वंसेति बहुशो वदन् क्रोधसमन्वितः । पितरं सोऽब्रवीत्त्यक्तः क्व गच्छामीति वै मुहुः॥ १५ ॥
इसी प्रकार उसने कामके वशमें होकर एक पुरवासीकी कन्याको हर लिया था। इस पापरूपी कीलसे विद्ध होनेके कारण राजा त्रय्यारुणने क्रोधमें उसे बार-बार कहा---'ओ नीच ! भाग जा यहाँसे।' पिताके त्याग देनेपर उसने बार-बार उनसे पूछा---'मैं कहाँ जाऊँ ?' ॥ १४-१५ ॥
पिता त्वेनमथोवाच श्वपाकः सह वर्तय । नाहं पुत्रेण पुत्रार्थी त्वयाद्य कुलपांसन ॥ १६ ॥
तब उसके पिताने कहा---'ओ कुलकलंक ! जा तू श्वपाकों* के साथ रह, मैं तुझ-जैसे पुत्रसे पुत्रवान् बनना नहीं चाहता'॥
इत्युक्तः स निराक्रामन्नगराद् वचनात् पितुः । न च तं वारयामास वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ १७ ॥
पिताके इस प्रकार कहनेपर वह उनके कथनानुसार नगरसे बाहर निकल गया। उस समय भगवान् वसिष्ठ ऋषि-ने भी उसके पिताको इस प्रकार कहनेसे नहीं रोका ॥ १७ ॥
स तु सत्यव्रतस्तात श्वपाकावसथान्तिके । पित्रा त्यक्तोऽवसद्धीरः पिता तस्य वनं ययौ ॥ १८ ॥
तात ! धीर सत्यव्रत पिताके त्याग देनेपर चाण्डालोंकी बस्तीमें रहने लगा और उसके पिता त्रय्यारुण (विरक्त होकर) वनको चले गये ॥ १८ ॥
ततस्तस्मिंस्तु विषये नावर्षत् पाकशासनः । समा द्वादश राजेन्द्र तेनाधर्मेण वै तदा ॥ १९ ॥
राजेन्द्र ! उस समय उस देशमें (उस कन्याहरणरूप) अधर्मके कारण इन्द्रने बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं की ॥ १९ ॥
दारांस्तु तस्य विषये विश्वामित्रो महातपाः । संन्यस्य सागरानूपे चचार विपुलं तपः ॥ २० ॥
उस समय महातपस्वी विश्वामित्र भी सत्यव्रतके उस देशमें अपनी स्त्रीको न्यास (धरोहर) के रूपमें रखकर समुद्रके तटपर भयंकर तप कर रहे थे ॥ २० ॥
तस्य पत्नी गले बद्ध्वा मध्यमं पुत्रमौरसम् । शेषस्य भरणार्थाय व्यक्रीणाद् गोशतेन वै ॥ २१ ॥
विश्वामित्रकी स्त्री अपने शेष कुटुम्बके पालनके लिये अपने मध्यम पुत्रके गलेमें रस्सी बाँधकर उसको सौ गौओंके मूल्यपर बेचनेके लिये लेकर घूमने लगी ॥ २१ ॥
तं तु बद्धं गले दृष्ट्वा विक्रीयन्तं नृपात्मजः । महर्षिपुत्रं धर्मात्मा मोक्षयामास भारत ॥ २२ ॥
भारत ! धर्मात्मा राजकुमार (सत्यव्रत) ने उस महर्षिपुत्रको गलेमें बँधा तथा बिकता देखकर छुड़ा लिया ॥ २२ ॥
सत्यव्रतो महाबाहुर्भरणं तस्य चाकरोत् । विश्वामित्रस्य तुष्ट्यर्थमनुकम्पार्थमेव च ॥ २३ ॥
फिर महाबाहु सत्यव्रतने विश्वामित्रको संतुष्ट करने और उनकी कृपा प्राप्त करनेके लिये उस पुत्रका भरण-पोषण किया २३
सोऽभवद् गालवो नाम गलबन्धान्महातपाः । महर्षिः कौशिकस्तात तेन वीरेण मोक्षितः ॥ २४ ॥
वह महातपस्वी गलेमें बन्धन पड़नेके कारण गालव नामसे प्रसिद्ध हुआ। तात ! (इस प्रकार) उस वीरने कुशिकवंशी महर्षि (गालव) को (इस आपत्तिसे) मुक्त किया था ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि गालवोत्पत्तौ द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें गालवकी उत्पत्तिविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
त्रयोदशोऽध्यायः
त्रिशङ्कुके चरित्रका वर्णन तथा उनके वंशमें हरिश्चन्द्र आदिका उत्पन्न होना
वैशम्पायन उवाच
सत्यव्रतस्तु भक्त्या च कृपया च प्रतिज्ञया । विश्वामित्रकलत्रं तद् बभार विनये स्थितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं---राजन् ! विश्वामित्रजीके प्रति श्रद्धा-भक्ति, उनके असहाय कुटुम्बके प्रति दयाभाव तथा अपनी की हुई प्रतिज्ञासे प्रेरित हो सत्यव्रत विनय-
* श्वपाक चाण्डालोंकी एक जातिका नाम है।