विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
हरिवंशपर्व ] द्वादशोऽध्यायः [ ४७
पूर्वक मारकर राजाने अपना काम पूर्ण करके उस मारे हुए राक्षसको उत्तङ्क ऋषिको दिखाया ॥ ५५ ॥
उत्तङ्कस्तु वरं प्रादात् तस्मै राज्ञे महात्मने ।
ददौ तस्याक्षयं वित्तं शत्रुभिश्चापराजयम् ॥ ५६ ॥
धर्मे रतिं च सततं स्वर्गवासं तथाक्षयम् ।
पुत्राणां चाक्षयाँल्लोकान् स्वर्गे ये रक्षसा हताः ॥ ५७ ॥
उस समय उत्तङ्कने उन महात्मा राजाको वरदान दिया कि 'आपके पास अक्षय धन रहेगा तथा शत्रुओंसे आप कभी पराजित नहीं होंगे ॥ ५६ ॥
'धर्मपर आपकी श्रद्धा सर्वदा बनी रहेगी तथा आप अनन्त कालतक स्वर्गमें रहेंगे । साथ ही राक्षसने आपके जिन पुत्रोंको मार डाला है, उन्हें भी स्वर्गमें अक्षय लोक मिलेंगे' ॥ ५७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि धुन्धुवधे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें धुन्धुवधविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
द्वादशोऽध्यायः
धुन्धुमारके वंशका वर्णन और गालवकी उत्पत्ति
वैशम्पायन उवाच
तस्य पुत्रास्त्रयः शिष्टा दृढाश्वो ज्येष्ठ उच्यते ।
चन्द्राश्वकपिलाश्वौ तु कुमारौ द्वौ कनीयसौ ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! उन (धुन्धुमार) के तीन पुत्र बच गये थे, जिनमें दृढाश्व सबसे बड़ा था तथा चन्द्राश्व और कपिलाश्व दो छोटे थे ॥ १ ॥
धौन्धुमारिर्दृढाश्वस्तु हर्यश्वस्तस्य चात्मजः ।
हर्यश्वस्य निकुम्भोऽभूत् क्षत्रधर्मरतः सदा ॥ २ ॥
धुन्धुमारके दृढाश्व, दृढाश्वके हर्यश्व और हर्यश्वके निकुम्भ नामक पुत्र हुआ, जो सदा क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहता था ॥ २ ॥
संहताश्वो निकुम्भस्य पुत्रो रणविशारदः ।
अकृशाश्वः कृशाश्वश्च संहताश्वसुतौ नृप ॥ ३ ॥
निकुम्भके संहताश्व नामक पुत्र हुआ, जो युद्धकी कलामे निपुण था । राजन् ! संहताश्वके अकृशाश्व और कृशाश्व नामक दो पुत्र हुए ॥ ३ ॥
तस्य हैमवती कन्या सतां माता दृषद्वती ।
विख्याता त्रिषु लोकेषु पुत्रश्चास्याः प्रसेनजित् ॥ ४ ॥
उस (संहताश्व) की भार्या हिमवान्की पुत्री थी, जो तीनों लोकोंमें दृषद्वतीके नामसे प्रसिद्ध है । उससे प्रसेनजित् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था । वह श्रेष्ठ पुत्रोंकी जननी थी ॥ ४ ॥
लेभे प्रसेनजिद् भार्या गौरीं नाम पतिव्रताम् ।
अभिशप्ता तु सा भर्त्रा नदी वै बाहुदामभवत् ॥ ५ ॥
प्रसेनजित्की गौरी नामवाली भार्या थी । वह पतिव्रता थी । वह पतिके शाप देनेपर बाहुदा नदी हो गयी ॥ ५ ॥
तस्याः पुत्रो महानासीद् युवनाश्वो महीपतिः ।
मान्धाता युवनाश्वस्य त्रिलोकविजयी सुतः ॥ ६ ॥
उसके पुत्र महाराज युवनाश्व थे, युवनाश्वके त्रिलोक-विजयी मान्धाता नामक पुत्र हुआ ॥ ६ ॥
तस्य चैत्ररथी भार्या शशविन्दोः सुताभवत् ।
साध्वी बिन्दुमती नाम रूपेणासदृशी भुवि ॥ ७ ॥
शशविन्दु की पुत्री बिन्दुमती, जिसका दूसरा नाम चैत्ररथी था, मान्धाताकी भार्या थी । वह साध्वी पृथ्वीमे अनुपम रूपवती थी ॥ ७ ॥
पतिव्रता च ज्येष्ठा च भ्रातॄणामयुतस्य सा ।
तस्यामुत्पादयामास मान्धाता द्वौ सुतौ नृप ॥ ८ ॥
पुरुकुत्सं च धर्मज्ञं मुचुकुन्दं च धार्मिकम् ।
पुरुकुत्ससुतस्वासीत् त्रसदस्युर्महीपतिः ॥ ९ ॥
उसके दस हजार भाई थे और वह पतिव्रता उनमें सबसे बड़ी थी । राजन् ! मान्धाताने उसके गर्भसे धर्मज्ञ पुरुकुत्स और धार्मिक मुचुकुन्द—इन दो पुत्रोंको उत्पन्न किया। पुरुकुत्स-का पुत्र राजा त्रसदस्यु हुआ ॥ ८-९ ॥
नर्मदायामथोत्पन्नः सम्भूतस्तस्य चात्मजः ।
सम्भूतस्य तु दायादः सुधन्वा नाम पार्थिवः ॥ १० ॥
त्रसदस्युके नर्मदा नामवाली स्त्रीके गर्भसे सम्भूत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । सम्भूतका पुत्र सुधन्वा नामक राजा था ॥ १० ॥
सुधन्वनः सुतश्चासीत् त्रिधन्वा रिपुमर्दनः ।
राज्ञस्त्रिधन्वनस्त्वासीद् विद्वांस्त्रय्यारुणः सुतः ॥ ११ ॥
सुधन्वाके त्रिधन्वा नामक पुत्र हुआ, जो शत्रुओंका मर्दन करनेवाला था । राजा त्रिधन्वाके त्रय्यारुण नामक विद्वान् पुत्र हुआ ॥ ११ ॥
तस्य सत्यव्रतो नाम कुमारोऽभून्महाबलः ।
पाणिग्रहणमन्त्राणां विघ्नं चक्रे सुदुर्मतिः ॥ १२ ॥
त्रय्यारुणके सत्यव्रत नामवाला महाबली कुमार हुआ । उसकी
४८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
बुद्धि बड़ी खोटी थी। वह (परस्त्रीहरणद्वारा) विवाहके मन्त्रोंमें विघ्न डालने लगा ॥ १२ ॥
येन भार्या हृता पूर्वं कृतोद्वाहा परस्य वै । बाल्यात् कामाच्च मोहाच्च संदर्पाच्चापलेन च ॥ १३ ॥
उसने बालकपन, काम, मोह, हर्ष और चपलताके कारण किसी दूसरे (नागरिक) की विवाहिता स्त्रीको छीन लिया था ॥ १३ ॥
अहार कन्यां कामात् स कस्यचित् पुरवासिनः । अधर्मशङ्कुना तेन राजा त्रय्यारुणोऽत्यजत् ॥ १४ ॥ अपध्वंसेति बहुशो वदन् क्रोधसमन्वितः । पितरं सोऽब्रवीत्त्यक्तः क्व गच्छामीति वै मुहुः॥ १५ ॥
इसी प्रकार उसने कामके वशमें होकर एक पुरवासीकी कन्याको हर लिया था। इस पापरूपी कीलसे विद्ध होनेके कारण राजा त्रय्यारुणने क्रोधमें उसे बार-बार कहा---'ओ नीच ! भाग जा यहाँसे।' पिताके त्याग देनेपर उसने बार-बार उनसे पूछा---'मैं कहाँ जाऊँ ?' ॥ १४-१५ ॥
पिता त्वेनमथोवाच श्वपाकः सह वर्तय । नाहं पुत्रेण पुत्रार्थी त्वयाद्य कुलपांसन ॥ १६ ॥
तब उसके पिताने कहा---'ओ कुलकलंक ! जा तू श्वपाकों* के साथ रह, मैं तुझ-जैसे पुत्रसे पुत्रवान् बनना नहीं चाहता'॥
इत्युक्तः स निराक्रामन्नगराद् वचनात् पितुः । न च तं वारयामास वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ १७ ॥
पिताके इस प्रकार कहनेपर वह उनके कथनानुसार नगरसे बाहर निकल गया। उस समय भगवान् वसिष्ठ ऋषि-ने भी उसके पिताको इस प्रकार कहनेसे नहीं रोका ॥ १७ ॥
स तु सत्यव्रतस्तात श्वपाकावसथान्तिके । पित्रा त्यक्तोऽवसद्धीरः पिता तस्य वनं ययौ ॥ १८ ॥
तात ! धीर सत्यव्रत पिताके त्याग देनेपर चाण्डालोंकी बस्तीमें रहने लगा और उसके पिता त्रय्यारुण (विरक्त होकर) वनको चले गये ॥ १८ ॥
ततस्तस्मिंस्तु विषये नावर्षत् पाकशासनः । समा द्वादश राजेन्द्र तेनाधर्मेण वै तदा ॥ १९ ॥
राजेन्द्र ! उस समय उस देशमें (उस कन्याहरणरूप) अधर्मके कारण इन्द्रने बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं की ॥ १९ ॥
दारांस्तु तस्य विषये विश्वामित्रो महातपाः । संन्यस्य सागरानूपे चचार विपुलं तपः ॥ २० ॥
उस समय महातपस्वी विश्वामित्र भी सत्यव्रतके उस देशमें अपनी स्त्रीको न्यास (धरोहर) के रूपमें रखकर समुद्रके तटपर भयंकर तप कर रहे थे ॥ २० ॥
तस्य पत्नी गले बद्ध्वा मध्यमं पुत्रमौरसम् । शेषस्य भरणार्थाय व्यक्रीणाद् गोशतेन वै ॥ २१ ॥
विश्वामित्रकी स्त्री अपने शेष कुटुम्बके पालनके लिये अपने मध्यम पुत्रके गलेमें रस्सी बाँधकर उसको सौ गौओंके मूल्यपर बेचनेके लिये लेकर घूमने लगी ॥ २१ ॥
तं तु बद्धं गले दृष्ट्वा विक्रीयन्तं नृपात्मजः । महर्षिपुत्रं धर्मात्मा मोक्षयामास भारत ॥ २२ ॥
भारत ! धर्मात्मा राजकुमार (सत्यव्रत) ने उस महर्षिपुत्रको गलेमें बँधा तथा बिकता देखकर छुड़ा लिया ॥ २२ ॥
सत्यव्रतो महाबाहुर्भरणं तस्य चाकरोत् । विश्वामित्रस्य तुष्ट्यर्थमनुकम्पार्थमेव च ॥ २३ ॥
फिर महाबाहु सत्यव्रतने विश्वामित्रको संतुष्ट करने और उनकी कृपा प्राप्त करनेके लिये उस पुत्रका भरण-पोषण किया २३
सोऽभवद् गालवो नाम गलबन्धान्महातपाः । महर्षिः कौशिकस्तात तेन वीरेण मोक्षितः ॥ २४ ॥
वह महातपस्वी गलेमें बन्धन पड़नेके कारण गालव नामसे प्रसिद्ध हुआ। तात ! (इस प्रकार) उस वीरने कुशिकवंशी महर्षि (गालव) को (इस आपत्तिसे) मुक्त किया था ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि गालवोत्पत्तौ द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें गालवकी उत्पत्तिविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
त्रयोदशोऽध्यायः
त्रिशङ्कुके चरित्रका वर्णन तथा उनके वंशमें हरिश्चन्द्र आदिका उत्पन्न होना
वैशम्पायन उवाच
सत्यव्रतस्तु भक्त्या च कृपया च प्रतिज्ञया । विश्वामित्रकलत्रं तद् बभार विनये स्थितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं---राजन् ! विश्वामित्रजीके प्रति श्रद्धा-भक्ति, उनके असहाय कुटुम्बके प्रति दयाभाव तथा अपनी की हुई प्रतिज्ञासे प्रेरित हो सत्यव्रत विनय-
* श्वपाक चाण्डालोंकी एक जातिका नाम है।
हरिवंशपर्व ] त्रयोदशोऽध्यायः ४९
पूर्वक विश्वामित्रजीकी स्त्रीका पालन करने लगा ॥ १ ॥
हत्वा मृगान् वराहांश्च महिषांश्च वनेचरान् ।
विश्वामित्राश्रमस्याभ्याशे मांसं वृक्षे बबन्ध सः ॥ २ ॥
वह ढूँढ़नेसे मिलनेवाले कंदविशेष, वराही कंद तथा महिष कंद आदि जंगली कंद-मूलोंको [काटकर उनका गूदा विश्वामित्रके आश्रमके पासके वृक्षोंमें बाँध देता था ॥ २ ॥
उपांशुव्रतमास्थाय दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ।
पितुर्निंयोगाद्वसतः तस्मिन् वनगते नृपे ॥ ३ ॥
पिता (राजा) के वन चले जानेपर बारह वर्षोंके लिये वह चुपचाप (किसीको विदित न हो इस प्रकार) व्रत करने लगा ॥ ३ ॥
अयोध्यां चैव राष्ट्रं च तथैवान्तःपुरं मुनिः ।
याज्योपाध्यायसम्बन्धाद् वसिष्ठः पर्यरक्षत ॥ ४ ॥
इधर पुरोहिताई और यजमानीके सम्बन्धके कारण मुनि वसिष्ठ अयोध्याकी, राज्यकी और रनिवासकी रक्षा करने लगे ॥ ४ ॥
सत्यव्रतस्तु बाल्याच्च भाविनोऽर्थस्य वा बलात् ।
वसिष्ठेऽभ्यधिकं मन्युं धारयामास वै तदा ॥ ५ ॥
इधर सत्यव्रत अपनी मूर्खता या होनहारके कारण वसिष्ठ-जीके ऊपर अधिक कुपित रहने लगा ॥ ५ ॥
पित्रा तु तं तदा राष्ट्रात् त्यज्यमानं स्वमात्मजम् ।
न वारयामास मुनिर्वसिष्ठः कारणेन ह ॥ ६ ॥
परंतु मुनि वसिष्ठने तो उसके पिताको, उनके द्वारा अपने पुत्रके राज्यसे निकाले जाते समय विशेष कारणवश ही नहीं रोका था ॥ ६ ॥
पाणिग्रहणमन्त्राणां निष्ठा स्यात् सप्तमे पदे ।
न च सत्यव्रतस्तस्य तमुपांशुमबुध्यत ॥ ७ ॥
पाणिग्रहण अर्थात् विवाहके मन्त्र सप्तपदीके पूर्ण होनेपर पूर्ण हुए माने जाते हैं। (इसके पहले स्त्रीमें कन्यात्व ही रहता है; अतः वसिष्ठजी सत्यव्रतसे बारह वर्षोंतक कन्याहरणका प्रायश्चित्त कराना चाहते थे ।) परंतु वसिष्ठजीके इस गूढ़ आशयको सत्यव्रत समझ न सका ॥ ७ ॥
जानन् धर्मं वसिष्ठस्तु न मां त्रातीति भारत ।
सत्यव्रतस्तदा रोषं वसिष्ठे मनसाकरोत् ॥ ८ ॥
'वसिष्ठजी धर्मको जानते हैं, तब भी मेरी रक्षा नहीं करते हैं !' भारत ! यह विचारकर सत्यव्रत अपने मनमें उनपर कुपित रहने लगा ॥ ८ ॥
गुणबुद्ध्या तु भगवान् वसिष्ठः कृतवांस्तथा।
न च सत्यव्रतस्तस्य तमुपांशुमबुध्यत ॥ ९ ॥
भगवान् वसिष्ठजीने तो गुणबुद्धिसे ऐसा किया था, परंतु सत्यव्रत उनके इस गुप्त अभिप्रायको समझ न सका ॥ ९ ॥
तस्मिन्नपरितोषो यः पितुरासीन्महात्मनः ।
तेन द्वादश वर्षाणि नाववर्षत् पाकशासनः ॥ १० ॥
उसके महात्मा पिताको सत्यव्रतके ऊपर जो असंतोष उत्पन्न हो गया, इस कारण इन्द्रने उसके राज्यमें बारह वर्षों-तक वर्षा नहीं की ॥ १० ॥
तेन त्विदानीं वहता दीक्षां तां दुर्वहां भुवि ।
कुलस्य निष्कृतिस्तात कृता सा वै भवेदिति ॥ ११ ॥
न तं वसिष्ठो भगवान् पित्रा त्यक्तं न्यवारयत्।
अभिषेक्ष्यामहं पुत्रमस्येत्येवं मतिर्मुनेः ॥ १२ ॥
तात ! 'यदि (सत्यव्रत) भूतलपर कठिनतासे पूर्ण होनेवाली इस दीक्षाको पूर्ण कर लेगा तो इसके कुलका उद्धार हो जायगा'। यह विचारकर भगवान् वसिष्ठने उसके पिताद्वारा त्यागे गये सत्यव्रतको नहीं रोका था, उनका विचार था कि '(प्रायश्चित्तके अनन्तर) इसके पुत्रको ही मैं राज्यपर अभिषिक्त कर दूँगा' ॥ ११-१२ ॥
स तु द्वादशवर्षाणि दीक्षां तामुद्वहन् बली ।
उपांशुव्रतमास्थाय महत् सत्यव्रतो नृप ॥ १३ ॥
राजन् ! बलवान् सत्यव्रतने भी चुपचाप दीक्षा लेकर बारह वर्षतक इस महाव्रतको धारण किया ॥ १३ ॥
अविद्यमाने मांसे तु वसिष्ठस्य महात्मनः ।
सर्वकामदुघां दोग्ध्रीं ददर्श स नृपात्मजः ॥ १४ ॥
एक समय कंद-मूलके गूदेके न रहनेपर उस राजकुमार-की दृष्टि सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाली महात्मा वसिष्ठकी दुधार गौके ऊपर पड़ी ॥ १४ ॥
तां वै क्रोधाच्च मोहाच्च श्रमाच्चैव क्षुधार्दितः ।
दशधर्मान् गतो राजा जघान जनमेजय ॥ १५ ॥
जनमेजय ! राजकुमार सत्यव्रतने उस गौको क्रोध, मोह और कामके कारण तथा भूखसे पीड़ा पानेके कारण दश अनिष्ट धर्मों (अवस्थाओं)* को प्राप्त होनेकी दशामें मार डाला ॥ १५ ॥
* वे दस धर्म या अवस्थाएँ इस प्रकार हैं--
मत्तः प्रमत्त उन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धो बुभुक्षितः ।
त्वरमाणश्च भीरुश्च लुब्धः कामी च ते दश ॥
अर्थात् मद, प्रमाद, उन्माद, श्रम, क्रोध, भूख, उतावली, भय, लोभ और काम--इन दस दशाओंमें पड़े हुए मनुष्य पाप कर बैठते हैं।
५० श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
तच्च मांसं स्वयं चैव विश्वामित्रस्य चात्मजान्।
भोजयामास तच्छ्रुत्वा वसिष्ठोऽप्यस्य चुक्रुधे।
क्रुद्धस्तु भगवान् वाक्यमिदमाह नृपात्मजम् ॥ १६ ॥
उस मांसको उसने विश्वामित्रके पुत्रोंको खिलाया और अपने आप भी खाया। यह सुनकर वसिष्ठजी भी क्रोधमें भर गये और क्रोधमें भरे हुए वसिष्ठजीने राजाके पुत्रसे यह बात कही ॥ १६ ॥
वसिष्ठ उवाच
पातयेमहं क्रूर तव शङ्कूमसंशयम्।
यदि ते द्वाविमौ शङ्कन स्यातां वै कृतौ पुनः॥ १७ ॥
वसिष्ठजीने कहा—क्रूर ! यदि तुझमें फिर किये हुए ये दो शङ्कु (पाप) न होते तो मैं तेरे प्रथम शङ्कु (पाप) को अवश्य नष्ट कर देता ॥ १७ ॥
पितुश्चापरितोषेण गुरोर्दाग्धीवधेन च।
अप्रेक्षितोपयोगाच्च त्रिविधस्ते व्यतिक्रमः ॥ १८ ॥
पिताको संतुष्ट न रखने, गुरुकी दूध देनेवाली गौकी हत्या कर डालने और अप्रेक्षित मांस खानेसे तुम्हारे द्वारा तीन प्रकारके पाप बन गये ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं त्रीण्यस्य शङ्कनि तानि दृष्ट्वा महोतपाः।
त्रिशङ्कुरिति होवाच त्रिशङ्कुरिति स स्मृतः॥ १९ ॥
वैशम्पायनजी बोले—इस प्रकार उसके तीन शङ्कुओंको देखकर महातपस्वी वसिष्ठजीने जो उसे त्रिशङ्कु कहा, इसके कारण वह त्रिशङ्कु ही कहलाने लगा ॥ १९ ॥
विश्वामित्रस्तु दारणामागतो भरणे कृते।
स तु तस्मै वरं प्रादान्मुनिः प्रीतस्त्रिशङ्कवे ॥ २० ॥
जब विश्वामित्रजी लौटे, तब अपनी स्त्री आदिका भरण-पोषण करनेके कारण प्रसन्न होकर त्रिशङ्कुको वर देने लगे ॥
छन्द्यमानो वरेणाथ वरं वव्रे नृपात्मजः।
सशरीरो व्रजे स्वर्गमित्येवं याचितो मुनिः ॥ २१ ॥
जब विश्वामित्रजीने राजकुमारसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा तब उसने मुनिसे वर माँगा कि ‘मैं सदेह स्वर्गमें जाऊँ’ ॥ २१ ॥
अनावृष्टिभये तस्मिन् गते द्वादशवार्षिके।
राज्येऽभिषिच्य पित्र्ये तु याजयामास तं मुनिः॥ २२ ॥
(विश्वामित्रके प्रसादमात्रसे) बारह वर्षोंकी अनावृष्टिका भय दूर हो जानेपर विश्वामित्र (मुनि अपने तपसे उसके पापोंको भस्म करके) उसका पिताके राज्यपर अभिषेक कर उसका यज्ञ कराने लगे ॥ २२ ॥
मिषतां देवतानां च वसिष्ठस्य च कौशिकः।
सशरीरं तदा तं तु दिवमारोपयत् प्रभुः ॥ २३ ॥
तदनन्तर तपकी शक्तिसे सम्पन्न कौशिकगोत्री विश्वामित्र वसिष्ठ और देवताओंके देखते-देखते ही त्रिशङ्कुको सशरीर स्वर्गमें भेज दिया ॥ २३ ॥
तस्य सत्यरथा नाम भार्या कैकयवंशजा।
कुमारं जनयामास हरिश्चन्द्रमकल्मषम् ॥ २४ ॥
त्रिशङ्कुके कैकयवंशमें उत्पन्न हुई एक सत्यरथा नामकी भार्या थी। उसमें उसने हरिश्चन्द्र नामवाले निष्पाप पुत्रको उत्पन्न किया ॥ २४ ॥
स वै राजा हरिश्चन्द्रस्त्रैशङ्कव इति स्मृतः।
आहर्ता राजसूयस्य स सम्राडिति विश्रुतः॥ २५ ॥
वे राजा हरिश्चन्द्र त्रैशङ्कवनामसे प्रसिद्ध थे, उन्होंने राजसूय यज्ञ किया था, अतएव वे सम्राट् कहलाते थे ॥ २५ ॥
हरिश्चन्द्रस्य पुत्रोऽभूद्रोहितो नाम वीर्यवान्।
येनेदं रोहितपुरं कारितं राज्यसिद्धये ॥ २६ ॥
हरिश्चन्द्रके रोहित नामवाला वीर्यवान् पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसने अपने राज्य-कार्यकी सिद्धिके लिये रोहितपुर बसाया था ॥ २६ ॥
कृत्वा राज्यं स राजर्षिः पालयित्वा त्वथ प्रजाः।
संसारासारतां ज्ञात्वा द्विजेभ्यस्तत्पुरं ददौ ॥ २७ ॥
उस राजर्षिने राज्य तथा प्रजाका पालन करनेके अनन्तर संसारकी असारताको जानकर अपना नगर ब्राह्मणोंको दे दिया था ॥ २७ ॥
हरितो रोहितस्याथ चञ्चुर्हारीत उच्यते।
विजयश्च सुदेवश्च चञ्चुपुत्रौ बभूवतुः ॥ २८ ॥
रोहितका पुत्र हरित और हरितका पुत्र चञ्चु हुआ—यह प्रसिद्ध है। चञ्चुके विजय और सुदेव नामवाले दो पुत्र हुए ॥ २८ ॥
जेता क्षत्रस्य सर्वस्य विजयस्तेन संस्मृतः।
रुरुकस्तनयस्तस्य राजधर्मार्थकोविदः ॥ २९ ॥
उस (विजय) ने सम्पूर्ण क्षत्रियोंको जीत लिया था, इसलिये वह विजय कहलाता था। उसके राजकार्य, धर्मकार्य और आर्थिक विषयोंमें चतुर रुरुक नामवाला पुत्र हुआ ॥ २९ ॥
रुरुकस्य वृकः पुत्रो वृकाद् बाहुस्तु जज्ञिवान्।
शकैर्यवनकाम्बोजैः पारदैः पह्लवैः सह ॥ ३० ॥
हैहयास्तालजङ्घाश्च निरस्यन्ति स्म तं नृपम्।
नात्यर्थं धार्मिकस्तात स हि धर्मयुगेऽभवत् ॥ ३१ ॥
रुरुकका पुत्र वृक हुआ और वृकके बाहु नामवाला पुत्र उत्पन्न हुआ। वह राजा उस (राज) धर्मके युगमें
हरिवंशपर्व ] चतुर्दशोऽध्यायः [ ५१
अतिधार्मिक नहीं था, इसलिये हैहय और तालजङ्घ वंशके राजाओंने शक, यवन, काम्बोज, पारद और पह्लव (आदि) राजाओंका साथ देकर बाहुकको उसके राज्यसे भ्रष्ट कर दिया ॥ ३०-३१ ॥
आग्नेयमस्त्रं लब्ध्वा च भार्गवात् सगरो नृपः।
जिगाय पृथिवीं हत्वा तालजङ्घान् सहैहयान् ॥ ३३ ॥
सगरने भृगुवंशी और्वसे आग्नेय अस्त्रको सीखकर तालजंघ और हैहय राजाओंको मारकर पृथिवीको जीत लिया ॥ ३३ ॥
सगरस्तु सुतो बाहोर्जज्ञे सह गरेण च।
और्वस्याश्रममागम्य भार्गवेणाभिरक्षितः ॥ ३२ ॥
बाहुकका जो पुत्र उत्पन्न हुआ वह गर अर्थात् विषके साथ ही उत्पन्न हुआ था। इससे वह सगर कहलाने लगा। (उसकी माताके) और्वके आश्रममें आनेपर भृगुवंशी और्वने उसकी रक्षा की थी ॥ ३२ ॥
शकानां पह्लवानां च धर्मं निरसदच्युतः।
क्षत्रियाणां कुरुश्रेष्ठ पारदानां स धर्मवित् ॥ ३४ ॥
कुरुश्रेष्ठ ! धर्मको जाननेवाले पूर्णशक्ति-सम्पन्न सगरने शक, पह्लव और पारद क्षत्रियोंको धर्मभ्रष्ट कर दिया था ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि त्रिशङ्कुचरितकथनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमे त्रिशङ्कुके चरित्रका वर्णनविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
चतुर्दशोऽध्यायः
सगरकी उत्पत्ति और चरित्र तथा सगर-पुत्रोंके उद्योगसे समुद्रका 'सागर' होना
जनमेजय उवाच
कथं स सगरो जातो गरेणैव सहाच्युतः।
किमर्थं च शकादीनां क्षत्रियाणां महौजसाम् ॥ १ ॥
धर्मं कुलोचितं क्रुद्धो राजा निरसदच्युतः।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण तपोधन ॥ २ ॥
**जनमेजने कहा—**तपोधन ! वे राजा सगर विषके साथ क्यों उत्पन्न हुए थे ? विषके साथ रहते हुए भी मरे क्यों नहीं ? और मर्यादासे च्युत न होनेवाले उन नरेशने क्रोधमें भरकर महाबली शक आदि क्षत्रियोंके कुलोचित धर्मको क्यों नष्ट कर दिया था ? इसका आप मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये ॥ १-२ ॥
वैशम्पायन उवाच
बाहोर्व्यसनिनस्तात हृतं राज्यमभूत् किल।
हैहयैस्तालजङ्घैश्च शकैः सार्धं विशाम्पते ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी बोले—**राजन् ! राजा बाहु शिकार और जुए आदि व्यसनोंमें ही पड़ा रहता था। तात ! (इस अवसरसे लाभ उठाकर) बाहुके राज्यको हैहय, तालजङ्घ तथा शकोंने छीन लिया ॥ ३ ॥
यवनाः पारदाश्चैव काम्बोजाः पह्लवाः खसाः।
एते ह्यपि गणाः पञ्च हैहयार्थे पराक्रमन् ॥ ४ ॥
यवन, पारद, काम्बोज, खस और पह्लव—इन पाँच गणोंने भी हैहय राजाओंके लिये पराक्रम किया था ॥ ४ ॥
हृतराज्यस्तदा राजा स वै बाहुर्वनं ययौ।
पत्न्या चानुगतो दुःखी वने प्राणानवासृजत् ॥ ५ ॥
राज्यके छिन जानेपर राजा बाहु वनको चला गया और उसकी पत्नी भी उसके पीछे-पीछे गयी। इसके बाद उस राजाने दुखी होकर वनमें ही अपने प्राणोंको त्याग दिया ॥ ५ ॥
पत्नी तु यादवी तस्य सगर्भा पृष्ठतोऽन्वगात्।
सपत्न्या च गरस्तस्यै दत्तः पूर्वमभूत् किल ॥ ६ ॥
उसकी पत्नी यदुवंशकी कन्या थी। वह गर्भवती थी, तब भी बाहुके पीछे-पीछे वनमें गयी थी। उसकी सौतने उसे पहले ही विष दे दिया था ॥ ६ ॥
सा तु भर्तुश्चितां कृत्वा वने तामध्यरोहत।
और्वस्तां भार्गवस्तात कारुण्यात् समवारयत् ॥ ७ ॥
तात ! जब वह स्वामीकी चिता बनाकर उसपर चढ़ने लगी, उसी समय वनमें विराजमान भृगुवंशी और्व ऋषिले दयाके कारण उसे रोका ॥ ७ ॥
तस्याश्रमे च तं गर्भं गरेणैव सहाच्युतम्।
व्यजायत महाबाहुं सगरं नाम पार्थिवम् ॥ ८ ॥
तब उसने उनके आश्रममें ही विष (गर) सहित गर्भको, जो आगे चलकर सगर नामक महाबाहु राजाके रूपमें प्रसिद्ध हुआ, उत्पन्न किया। राजा सगर कभी धर्मसे च्युत नहीं हुए थे ॥ ८ ॥
और्वस्तु जातकर्मादि तस्य कृत्वा महात्मनः।
अध्याप्य वेदशास्त्राणि ततोऽस्त्रं प्रत्यपादयत् ॥ ९ ॥
और्वने महामना सगरके जातकर्म आदि संस्कार कराकर उन्हें वेद और शास्त्र पढ़ाये, फिर अस्त्रविद्या सिखायी ॥ ९ ॥
| ५२ | श्रीमहाभारते खिलेभागे | [ हरिवंशे |
|---|
आग्नेयं तु महाघोरममरैरपि दुःसहम्।
स तेनास्त्रबलेनाजी बलेन च समन्वितः ॥ १० ॥
हैहयान्निजघानाशु क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव ।
आजहार च लोकेषु कीर्तिं कीर्तिमंतां वरः ॥ ११ ॥
उन्होंने सगरको देवताओंके लिये भी असह्य महाघोर आग्नेय अस्त्र दिया था। जब वे अस्त्र-बल और शारीरिक बलसे सम्पन्न हो गये, तब क्रोधमें भरकर रुद्र जैसे शीघ्रतासे पशुओंका संहार करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने हैहयोंका संहार कर डाला। इस प्रकार कीर्तिमानोंमें श्रेष्ठ उन वीर पुरुषने संसारमें (अद्भुत) कीर्ति पायी थी ॥ १०-११ ॥
ततः शकान् सयवनान् काम्बोजान् पारदांस्तथा।
पह्लवांश्चैव निःशेषान् कर्तुं व्यवसितस्तदा ॥ १२ ॥
इसके अनन्तर उन्होंने शक, यवन, काम्बोज, पारद और पह्लवोंको भी निःशेष (सर्वथा नष्ट) करनेका निश्चय किया॥ १२ ॥
ते बध्यमाना वीरेण सगरेण महात्मना ।
वसिष्ठं शरणं गत्वा प्रणिपेतुर्मनीषिणम् ॥ १३ ॥
जब वीर और महात्मा सगर उनका सर्वनाश करने लगे, तब वे (शक, यवनादि) बुद्धिमान् वसिष्ठजीकी शरणमें गये और उनके पैरोंमें गिर पड़े ॥ १३ ॥
वसिष्ठस्त्वथ तान् दृष्ट्वा समयेन महाद्युतिः ।
सगरं वारयामास तेषां दत्त्वाभयं तदा ॥ १४ ॥
परम यशस्वी वसिष्ठजीने कुछ विशेष शर्तोंपर उनको अभयदान दिया और सगरको (उन्हें मारनेसे) रोका ॥ १४ ॥
सगरः स्वां प्रतिज्ञां च गुरोर्वाक्यं निशम्य च ।
धर्मं जघान तेषां वै वेषान्यत्वं चकार ह ॥ १५ ॥
सगरने अपनी प्रतिज्ञा और गुरुके वाक्यकी ओर ध्यान देकर (उनके प्राण नहीं लिये) उनके धर्मको नष्ट कर दिया; और उनका वेष बदल दिया ॥ १५ ॥
अर्द्धं शकानां शिरसो मुण्डं कृत्वा व्यसर्जयत्।
यवनानां शिरः सर्वं काम्बोजानां तथैव च ॥ १६ ॥
उन्होंने शकोंके आधे शिरको मूँड़कर छोड़ दिया, यवनोंके सारे शिरको मूँड़ दिया, और पह्लवोंके भी शिरको मुँड़वा दिया ॥ १६ ॥
पारदा मुक्तकेशाश्च पह्लवाः श्मश्रुधारिणः ।
निःस्वाध्यायवषट्काराः कृतास्तेन महात्मना ॥ १७ ॥
उन महात्मा नरेशने पारदोंके शिरको मुक्तकेश (खुले हुए केशोंवाला) कर दिया और पह्लवोंको श्मश्रुधारी (केवल दाढ़ीवाला) बना दिया और सबको स्वाध्याय तथा वषट्कारसे रहित कर दिया ॥ १७ ॥
शका यवनकाम्बोजाः पारदाश्च विशाम्पते ।
कोलिसर्पाः समहिषा दार्वाश्चोलाः सकेरलाः ॥ १८ ॥
सर्वे ते क्षत्रियास्तात धर्मस्तेषां निराकृतः ।
वसिष्ठवचनाद् राजन् सगरेण महात्मना ॥ १९ ॥
तात ! जनेश्वर ! शक, यवन, काम्बोज, पारद, कोलिसर्प, महिष, दर्द, चोल और केरल—ये सब क्षत्रिय ही थे। वसिष्ठजीके वचनसे महात्मा सगरने (इन सबका संहार न करके केवल) इनके धर्मको ही नष्ट कर दिया था ॥ १८-१९ ॥
खसांस्तुपारान्द्रांश्चोलांश्च मद्रान् किष्किन्धकांस्तथा।
कौन्तलांश्च तथा वङ्गान् साल्वान् कौद्रुणकांस्तथा ॥ २० ॥
स धर्मविजयी राजा विजित्येमां वसुंधराम् ।
अश्वं वै प्रेरयामास वाजिमेधाय दीक्षितः ॥ २१ ॥
उन धर्मविजयी राजाने अश्वमेधकी दीक्षा लेकर खस, तुषार, चोल, मद्र, किष्किन्धक, कौन्तल, वङ्ग, साल्व तथा कौद्रुण देशके राजाओंको जीता। इस प्रकार पृथ्वीका विजय करते हुए उन्होंने अश्वमेध यज्ञके लिये अपना घोड़ा छोड़ा ॥
तस्य चारयतः सोऽश्वः समुद्रे पूर्वदक्षिणे ।
वेलासमीपेऽपहृतो भूमिं चैव प्रवेशितः ॥ २२ ॥
जब उनका घोड़ा घुमाया जा रहा था, उस समय पूर्व-दक्षिणमें समुद्रके किनारे किसीने उस घोड़ेको चुरा लिया और उसे भूमिमें छिपा दिया ॥ २२ ॥
स तं देशं तदा पुत्रैः खानयामास पार्थिवः ।
आसेदुस्ते ततस्तत्र खन्यमाने महार्णवे ॥ २३ ॥
तमादिपुरुषं देवं हरिं कृष्णं प्रजापतिम् ।
विष्णुं कपिलरूपेण स्वपन्तं पुरुषोत्तमम् ॥ २४ ॥
उस समय राजा (सगर) ने अपने पुत्रोंसे उस स्थानको खुदवाया। समुद्रके खोदनेपर उनके पुत्रोंने आदिपुरुष, हरि (अविद्याको हरनेवाले), कृष्ण (सच्चिदानन्दस्वरूप) प्रजापति पुरुषोत्तम, (कपिलरूपी विष्णुको वहाँ सोते हुए समाधिमें स्थित) देखा ॥ २३-२४ ॥
तस्य चक्षुःसमुत्थेन तेजसा प्रतिबुध्यतः ।
दग्धास्ते वै महाराज चत्वारस्त्ववशेषिताः ॥ २५ ॥
बर्हकेतुः सुकेतुश्च तथा धर्मरथो नृपः ।
शूरः पञ्चजनश्चैव तस्य वंशकरो नृपः ॥ २६ ॥
उनके योगनिद्राको त्यागनेपर उनके नेत्रमोंसे निकलते हुए तेजसे वे सब (राजकुमार) भस्म हो गये। महाराज ! केवल बर्हकेतु, सुकेतु, राजा धर्मरथ और वंशको चलानेवाला शूर पञ्चजन—ये चार राजकुमार ही जीवित बच सके थे ॥ २५-२६ ॥
प्रादाच्च तस्मै भगवान् हरिनारायणो वरान् ।
अक्षयं वंशमिक्ष्वाकोः कीर्तिं चाप्यनिवर्तनीम् ॥ २७ ॥
पुत्रं समुद्रं च विभुः स्वर्गवासं तथाक्षयम् ।
पुत्राणां चाक्षयाँल्लोकांस्तस्य ये चक्षुषा हताः ॥ २८ ॥
हरिवंशपर्व ] 'पञ्चदशोऽध्यायः ५३
उन्हें (कपिलरूपी) विष्णु हरिनारायण भगवान्ने यह वरदान दिया था कि इक्ष्वाकुका वंश अक्षय रहेगा और राजा सगरकी कीर्ति कभी नष्ट नहीं होगी। समुद्र उनका पुत्र कहा जायगा (अर्थात् भविष्यमें यह सागर नामसे प्रसिद्ध होगा) और उन्हें अक्षय स्वर्गवास मिलेगा। कपिलजीने अपने नेत्रके तेजसे भस्म हुए सगर-पुत्रोंको भी अक्षयलोकोंकी प्राप्ति होनेका वर दिया ॥ २७-२८ ॥
समुद्रश्चार्घ्यमादाय ववन्दे तं महीपतिम् ।
सागरत्वं च लेभे स कर्मणा तेन तस्य वै ॥ २९ ॥
(उस समय) समुद्रने अर्घ्य लेकर उन राजा (सगर) को प्रणाम किया और सगरके इस कर्मके कारण समुद्रका सागर नाम पड़ गया ॥ २९ ॥
तं चाश्वमेधिकं सोऽश्वं समुद्रादुपलब्धवान् ।
आजहाराश्वमेधानां शतं स सुमहायशाः ।
पुत्राणां च सहस्राणि षष्टिस्तस्येति नः श्रुतम् ॥ ३० ॥
उन्होंने अश्वमेधयज्ञके घोड़ेको भी समुद्रसे प्राप्त किया। इस तरह उन महायशस्वी राजाने सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे—ऐसा सुना जाता है। इन महाराजके पुत्रोंकी संख्या साठ हजार थी ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि सगरोत्पत्तिर्नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें सगरकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥
पञ्चदशोऽध्यायः
सूर्यवंशका वर्णन
| जनमेजय उवाच<br>सगरस्यात्मजा वीराः कथं जाता महात्मनः ।<br>विक्रान्ताः षष्टिसहस्रा विधिना केन वा द्विज ॥ १ ॥<br>जनमेजयने कहा—द्विज ! महात्मा सगरके साठ हजार वीर और पराक्रमी पुत्र किस प्रकार उत्पन्न हुए थे ? ॥ १ ॥ | तत्रैका जगृहे पुत्राँल्लुब्धा शूरान् बहूंस्तथा ॥ ५ ॥<br>एकं वंशधरं त्वेका तथेत्याह च तां मुनिः ।<br>केशिन्यसूत सगरादसमञ्जसमात्मजम् ॥ ६ ॥<br>उनमेंसे एक पुत्रलोभिनी स्त्रीने तो बहुतसे शूरवीर पुत्रोंको माँग लिया तथा एकने एक ही वंशधर पुत्रको माँगा। तब मुनिने तथास्तु—ऐसा ही होगा, कहकर वरदान दे दिया। केशिनीके सगरसे असमञ्जस नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ५-६ ॥ |
| वैशम्पायन उवाच<br>द्वे भार्ये सगरस्यास्तां तपसा दग्धकिल्बिषे ।<br>ज्येष्ठा विदर्भदुहिता केशिनी नाम विश्रुता ॥ २ ॥<br>वैशम्पायनजीने उत्तर दिया—सगरकी दो रानियाँ थीं। तपसे उनके पाप नष्ट हो गये थे। उनमें बड़ी रानी विदर्भ-नरेशकी पुत्री थीं और केशिनी नामसे प्रसिद्ध थीं ॥ २ ॥ | राजा पञ्चजनो नाम बभूव सुमहाबलः ।<br>इतरा सुषुवे तुम्बीं बीजपूर्णामिति श्रुतिः ॥ ७ ॥<br>वह पञ्चजन नामसे प्रसिद्ध महाबलवान् राजा था। दूसरीने बीजोंसे भरी हुई एक तूंबी उत्पन्न की, यह बात प्रसिद्ध है ॥ ७ ॥ |
| कनीयसी तु या तस्य पत्नी परमधर्मिणी ।<br>अरिष्टनेमिदुहिता रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥ ३ ॥<br>उन राजाकी जो छोटी पत्नी थी, वह बड़ी ही धर्मात्मा थी। वह अरिष्टनेमि (कश्यप) की पुत्री थी। उसके समान पृथिवीपर कोई भी दूसरी रूपवती स्त्री नहीं थी ॥ ३ ॥ | तत्र षष्टिसहस्राणि गर्भास्ते तिलसम्मिताः ।<br>सम्बभूवुर्यथाकालं ववृधुश्च यथाक्रमम् ॥ ८ ॥<br>उस तूंबीमें तिलके समान साठ हजार गर्भ थे, जो समय आनेपर उत्पन्न हुए और क्रमशः बढ़ने लगे ॥ ८ ॥ |
| और्वस्ताभ्यां वरं प्रादात् तं निबोध जनाधिप ।<br>षष्टिं पुत्रसहस्राणि गृह्णात्वेका तपस्विनी ॥ ४ ॥<br>एकं वंशधरं त्वेका यथेष्टं वरयत्विति ।<br>जनाधिप ! और्वने उन दोनोंको जो वर दिया था, उसे सुनो। (और्वने कहा था) दोनोंमेंसे कोई एक तपस्विनी रानी तो साठ हजार पुत्र माँग ले और एक वंश चलानेवाले एक ही पुत्रको माँगे। अब जिसे जो वर अच्छा लगता हो वह उस वरको माँग ले ॥ ४½ ॥ | घृतपूर्णेषु कुम्भेषु तान् गर्भान् निदधे पिता ।<br>धात्रीश्चैकैकशः प्रादात् तावतीरेव पोषणे ॥ ९ ॥<br>पिताने उन गर्भोको घृतसे भरे हुए घड़ोंमें डाल दिया और उनका पोषण करनेके लिये एक-एक घड़ेपर एक-एक करके उतनी ही धाइयोंको नियुक्त कर दिया ॥ ९ ॥<br><br>ततो दशसु मासेषु समुत्तस्थुर्यथासुखम् ।<br>कुमारास्ते यथाकालं सगरप्रीतिवर्धनाः ॥ १० ॥ |
५४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
दस महीने बीतनेपर सगरकी प्रीतिको बढ़ानेवाले बहुत-से बच्चे सुखपूर्वक समयानुसार उत्पन्न होने लगे ॥ १० ॥
षष्टिः पुत्रसहस्राणि तस्यैवामभवन् नृप ।
गर्भादलाबुमध्द्याद् वै जातानि पृथिवीपते ॥ ११ ॥
राजन् ! इस प्रकार सगरके साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए थे और पृथिवीपते ! वे तूँबीके बीजोंकी तरह तूँबी (लौकी) के मध्यमें रखे हुए गर्भोंसे उत्पन्न हुए थे ॥ ११ ॥
तेषां नारायणं तेजः प्रविष्ठानां महात्मनाम् ।
एकः पञ्चजनो नाम पुत्रो राजा बभूव ह ॥ १२ ॥
भगवान् नारायण (कपिलदेव) के तेजमें प्रविष्ट हुए राजकुमारोंमेंसे एक पञ्चजन (असमंजस) नामक राजपुत्र ही राजा हो पाया ॥ १२ ॥
सुतः पञ्चजनस्यासीदंशुमान् नाम वीर्यवान् ।
दिलीपस्तनयस्तस्य खट्वाङ्ग इति विश्रुतः ॥ १३ ॥
पञ्चजन (असमंजस) का पुत्र वीर्यवान् अंशुमान् हुआ। उसका पुत्र दिलीप हुआ, जो खट्वाङ्ग नामसे भी प्रसिद्ध है ॥ १३ ॥
येन स्वर्गादिहागत्य मुहूर्तं प्राप्य जीवितम् ।
त्रयोऽनुसंहिता लोका बुद्ध्या सत्येन चानघ ॥ १४ ॥
अनघ ! उसने मुहूर्त भरका (४८ मिनटका) जीवन पाकर स्वर्गसे इस मृत्युलोकमें आकर सूक्ष्म बुद्धिसे तथा सत्य (ब्रह्मभाव) के द्वारा तीनों लोकोंको तत्त्वतः जान लिया था ॥ १४ ॥
दिलीपस्य तु दायादो महाराजो भगीरथः ।
यः स गङ्गां सरिच्छ्रेष्ठामवातारयत प्रभुः ॥ १५ ॥
दिलीपके पुत्र महाराज भगीरथ हुए । उन प्रभुने नदियोंमें श्रेष्ठ गङ्गाजीको (स्वर्गसे भूमिपर) उतारा था ॥ १५ ॥
कीर्तिमान् स महाभागः शक्रतुल्यपराक्रमः ।
समुद्रमानयच्चैनां दुहितृत्वेन कल्पयन् ।
तस्माद् भागीरथी गङ्गा कथ्यते वंशचिन्तकैः ॥ १६ ॥
इन्द्रके तुल्य पराक्रमी उन यशस्वी महापुरुषने गङ्गाजीको समुद्रतक पहुँचा दिया और उन्होंने गङ्गाजीको अपनी पुत्री बनाया; इसीलिये वंशका कीर्तन करनेवाले विद्वान् गङ्गाजीको भागीरथी (भगीरथकी पुत्री) कहते हैं ॥ १६ ॥
भगीरथसुतो राजा श्रुत इत्यभिविश्रुतः ।
नाभागस्तु श्रुतस्यासीत् पुत्रः परमधार्मिकः ॥ १७ ॥
भगीरथका पुत्र श्रुत नामसे प्रसिद्ध है। श्रुतका नाभाग नामक परमधार्मिक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १७ ॥
अम्बरीषस्तु नाभागिः सिन्धुद्वीपपिताभवत् ।
अयुताजिद् तु दायादः सिन्धुद्वीपस्य वीर्यवान् ॥ १८ ॥
नाभागका पुत्र अम्बरीष हुआ । वह सिन्धुद्वीपका पिता था । सिन्धुद्वीपके अयुताजित् नामक वीर्यवान् पुत्र हुआ ॥ १८ ॥
अयुताजित्सुतस्त्वासीदृतुपर्णो महायशाः ।
दिव्याक्षहृदयज्ञो वै राजा नलसखो बली ॥ १९ ॥
अयुताजित्के ऋतुपर्णनामवाला महायशस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। वह दिव्य अक्ष (द्यूत) विद्याका रहस्यवेत्ता, राजा नलका सखा तथा बड़ा बली था ॥ १९ ॥
ऋतुपर्णसुतस्त्वासीदार्तुपर्णिर्महीपतिः ।
सुदासस्तस्य तनयो राजा त्विन्द्रसखोऽभवत् ॥ २० ॥
ऋतुपर्णका पुत्र राजा आर्त्तपर्णि हुआ। उसका पुत्र राजा सुदास हुआ, जो इन्द्रका मित्र था ॥ २० ॥
सुदासस्य सुतस्त्वासीत्सौदासो नाम पार्थिवः ।
ख्यातः कल्माषपादो वै नाम्ना मित्रसहस्तथा ॥ २१ ॥
सुदासके सौदास नामका पुत्र हुआ, जो राजा कल्माषपाद और मित्रसह नामसे भी प्रसिद्ध था ॥ २१ ॥
कल्माषपादस्य सुतः सर्वकर्मेति विश्रुतः ।
अनरण्यस्तु पुत्रोऽभूद् विश्रुतः सर्वकर्मणः ॥ २२ ॥
कल्माषपादके सर्वकर्मा नामसे प्रसिद्ध पुत्र उत्पन्न हुआ और सर्वकर्माका पुत्र अनरण्य नामसे विख्यात हुआ ॥ २२ ॥
अनरण्यसुतो निघ्नो निघ्नपुत्रौ बभूवतुः ।
अनमित्रो रघुश्चैव पार्थिवर्षभ सत्तमो ॥ २३ ॥
नृपश्रेष्ठ ! अनरण्यका पुत्र निघ्न हुआ, निघ्नके अनमित्र और रघु नामक दो श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २३ ॥
अनमित्रस्य धर्मात्मा विद्वान् दुलिदुहोऽभवत् ।
दिलीपस्तनयस्तस्य रामप्रपितामहः ॥ २४ ॥
अनमित्रके दुलिदुह नामवाला धर्मात्मा और विद्वान् पुत्र उत्पन्न हुआ। दुलिदुहके पुत्र दिलीप हुए, जो श्रीरामचन्द्रजीके वृद्ध प्रपितामह थे ॥ २४ ॥
दीर्घबाहुर्दिलीपस्य रघुर्नामाभवत् सुतः ।
अयोध्यायां महाराजो रघुश्चासीन्महाबलः ॥ २५ ॥
दिलीपके रघुनामक महाबाहु पुत्र उत्पन्न हुए। ये रघु अयोध्यामें महाबली सम्राट् हुए ॥ २५ ॥
अजस्तु रघुनो जज्ञे अजाद् दशरथोऽभवत् ।
रामो दशरथाज्जज्ञे धर्मात्मा सुमहायशाः ॥ २६ ॥
रघुसे अज उत्पन्न हुए । अजसे दशरथ हुए तथा दशरथसे धर्मात्मा एवं महायशस्वी श्रीरामचन्द्र प्रकट हुए ॥ २६ ॥
| हरिवंशपर्व ] | षोडशोऽध्यायः | ५५ |
|---|
रामस्य तनयो जज्ञे कुश इत्यभिविश्रुतः।
अतिथिस्तु कुशाज्जज्ञे निषधस्तस्य चात्मजः ॥ २७ ॥
श्रीरामके कुश नामसे प्रसिद्ध पुत्र उत्पन्न हुआ। कुशके अतिथि नामक पुत्र हुआ और अतिथिके पुत्रका नाम निषध था ॥ २७ ॥
निषधस्य नलः पुत्रो नभः पुत्रो नलस्य तु।
नभस्य पुण्डरीकस्तु क्षेमधन्वा ततः स्मृतः ॥ २८ ॥
निषधका पुत्र नल, नलका पुत्र नभ, नभका पुत्र पुण्डरीक और पुण्डरीकका पुत्र क्षेमधन्वा हुआ ॥ २८ ॥
क्षेमधन्वसुतस्त्वासीद् देवानीकः प्रतापवान्।
आसीदहीनगुर्नाम देवानीकसुतः प्रभुः ॥ २९ ॥
क्षेमधन्वाका पुत्र प्रतापी देवानीक हुआ, देवानीकके अहीनगु नामक प्रभावशाली पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ २९ ॥
अहीनगोस्तु दायादः सुधन्वा नाम पार्थिवः।
सुधन्वनः सुतश्चैव ततो जज्ञेऽनलो नृपः ॥ ३० ॥
अहीनगुका पुत्र राजा सुधन्वा हुआ और सुधन्वाका पुत्र अनल नामक राजा हुआ ॥ ३० ॥
उक्थो नाम स धर्मात्मानलपुत्रो बभूव ह।
वज्रनाभः सुतस्तस्य उक्थस्य च महात्मनः ॥ ३१ ॥
अनलके उक्थ नामक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हुआ और उन महात्मा उक्थके पुत्रका नाम वज्रनाभ हुआ ॥ ३१ ॥
शङ्खस्तस्य सुतो विद्वान् व्युषिताश्व इति श्रुतः।
पुष्पस्तस्य सुतो विद्वानर्थसिद्धिश्च तत्सुतः ॥ ३२ ॥
वज्रनाभके शंख नामक विद्वान् पुत्र उत्पन्न हुआ, जो व्युषिताश्वके नामसे भी प्रसिद्ध है। शंखका पुत्र पुष्प और पुष्पका पुत्र विद्वान् अर्थसिद्धि था ॥ ३२ ॥
सुदर्शनः सुतस्तस्य अग्निवर्णः सुदर्शनात् ।
अग्निवर्णस्य शीघ्रस्तु शीघ्रस्य तु मरुः सुतः ॥ ३३ ॥
अर्थसिद्धिका पुत्र सुदर्शन, सुदर्शनसे अग्निवर्ण, अग्निवर्णका पुत्र शीघ्र और शीघ्रके मरु नामका पुत्र हुआ ॥ ३३ ॥
मरुस्तु योगमास्थाय कलापद्वीपमास्थितः।
तस्यासीद् विश्रुतवतः पुत्रो राजा बृहद्बलः ॥ ३४ ॥
मरु योगका आश्रय लेकर कलापद्वीपमें रहने लगे। परम प्रसिद्ध मरुके पुत्र राजा बृहद्बल हुए ॥ ३४ ॥
नलौ द्वावेव विख्यातौ पुराणे भरतर्षभ।
वीरसेनात्मजश्चैव यश्चेक्ष्वाकुकुलोद्भवः ॥ ३५ ॥
भरतर्षभ ! पुराणमें नल नामसे दो ही राजा प्रसिद्ध हैं—एक वीरसेन-पुत्र नल और दूसरा इक्ष्वाकु-कुलोत्पन्न (निषध-पुत्र) नल ॥ ३५ ॥
इक्ष्वाकुवंशप्रभवाः प्राधान्येनेह कीर्तिताः।
एते विवस्वतो वंशे राजानो भूरितेजसः ॥ ३६ ॥
विवस्वान् (सूर्य) के वंशमें ये परम तेजस्वी राजा उत्पन्न हुए हैं। यहाँ इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न हुए मुख्य-मुख्य राजाओंका वर्णन किया गया है ॥ ३६ ॥
पठन् सम्यगिमां सृष्टिमादित्यस्य विवस्वतः।
श्राद्धदेवस्य देवस्य प्रजानां पुष्टिदस्य च ॥ ३७ ॥
प्रजावानेति सायुज्यमादित्यस्य विवस्वतः।
विपाप्मा विरजाश्चैव आयुष्मान्श्च भवत्युत ॥ ३८ ॥
जो मनुष्य अदितिनन्दन भगवान् सूर्यकी तथा प्रजाओंके पोषक देवता श्राद्धदेवकी इस सृष्टि-परम्पराका भलीभाँति पाठ करता है, वह संतानवान् होता और निष्पाप, रजोगुण-रहित एवं दीर्घायु हो अन्तमे भगवान् सूर्यका सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ३७-३८ ॥
इति श्रीमद्भारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आदित्यस्य वंशानुकीर्तनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें सूर्यवंशका वर्णनविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
षोडशोऽध्यायः
श्राद्धकल्प—जनमेजयद्वारा पिताका श्राद्ध तथा पितृस्वरूपनिर्णयसम्बन्धी प्रश्न, शन्तनुका अपने श्राद्धमें स्वयं हाथ बढ़ाकर भीष्मसे पिण्ड माँगना
| जनमेजय उवाच | |
|---|---|
| कथं वै श्राद्धदेवत्वमादित्यस्य विवस्वतः।<br>श्रोतुमिच्छामि विप्राग्र्य श्राद्धस्य च परं विधिम् ॥ १ ॥ | सूर्यके पुत्र यम श्राद्धदेव क्यों कहलाते हैं ? और श्राद्धकी उत्तम विधि क्या है ? इसे मैं सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥ |
| जनमेजयने पूछा— द्विजश्रेष्ठ ! अदितिनन्दन भगवान् | पितॄणामादिसर्गं च क एते पितरः स्मृताः।<br>एवं च श्रुतमस्माभिः कथ्यमानं द्विजातिभिः ॥ २ ॥ |
५६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
स्वर्गस्थाः पितरो ये च देवानापि देवताः।
इति वेदविदः प्राहुरेतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
पितरोंकी आदि सृष्टि कैसे हुई ? ये पितर कौन हैं ? हमने ब्राह्मणोंके मुखसे यह बात सुनी है कि जो पितर स्वर्गमें स्थित हैं, वे देवताओंके भी देवता हैं। वेदके जाननेवाले भी ऐसा ही कहते हैं। अतः मैं इस बातको भलीभाँति जानना चाहता हूँ ॥ २-३ ॥
ये च तेषां गणाः प्रोक्ता यच्च तेषां बलं परम्।
यथा च कृतमस्माभिः श्राद्धं प्रीणाति वै पितॄन् ॥ ४ ॥
प्रीताश्च पितरो ये श्न श्रेयसा योजयन्ति हि।
एषं वेदितुमिच्छामि पितॄणां सर्गमुत्तमम् ॥ ५ ॥
उनके जो गण कहे गये हैं, उनका जो परम बल है और हमारा किया हुआ श्राद्ध जिस प्रकार उन्हें तृप्त करता है तथा जो पितर प्रसन्न होकर मनुष्योंका कल्याण करते हैं उन सबको एवं उत्तम पितृसर्गको मैं जानना चाहता हूँ ॥ ४-५ ॥
वैशम्पायन उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि पितॄणां सर्गमुत्तमम्।
यथा च कृतमस्माभिः श्राद्धं प्रीणाति वै पितॄन्।
प्रीताश्च पितरो ये श्न श्रेयसा योजयन्ति हि ॥ ६ ॥
मार्कण्डेयेन कथितं भीष्माय परिपृच्छते।
अपृच्छद् धर्मराजो हि शरतल्पगतं पुरा।
एवमेव पुरा प्रश्नं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ७ ॥
तद् तेऽनुपूर्व्या वक्ष्यामि भीष्मेणोदाहृतं यथा।
गीतं सनत्कुमारेण मार्कण्डेयाय पृच्छते ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी बोले—बहुत अच्छा, मैं तुमसे पितरोंके उत्तम सर्गका वर्णन करूँगा, हमारा किया हुआ श्राद्ध जिस प्रकार पितरोंको तृप्त करता है तथा जो पितर श्राद्धसे संतुष्ट होकर हमें कल्याणके भागी बनाते हैं, उनका परिचय दूँगा। पूर्वकालमें भीष्मके पूछनेपर मार्कण्डेयजीने उनसे इस विषयका वर्णन किया था। फिर महाभारतकालमें शरशय्यापर पड़े हुए भीष्मजीसे धर्मराज युधिष्ठिरने भी पहले ऐसा ही प्रश्न किया था, जैसा इस समय तुम मुझसे पूछ रहे हो। भीष्मजीने युधिष्ठिरको जिस प्रकार उत्तर दिया था, वह सब मैं तुम्हें क्रमशः बताऊँगा। पहले मार्कण्डेयजीके पूछनेपर सनत्कुमारजीने जो उपदेश दिया था, वही युधिष्ठिर और भीष्मके संवादमें कहा गया है ॥ ६-८ ॥
युधिष्ठिर उवाच
पुष्टिकामेन धर्मज्ञ कथं पुष्टिरवाप्यते।
एतद् वै श्रोतुमिच्छामि किं कुर्व्वाणो न शोचति ॥ ९ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—धर्मज्ञ ! पुष्टि चाहनेवाला पुरुष किस प्रकार पुष्टि पा सकता है और कैसा कर्म करनेसे मनुष्यको शोक नहीं करना पड़ता ? इसे मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ९ ॥
भीष्म उवाच
श्राद्धैः प्रीणाति हि पितॄन् सर्वकामफलैस्तु यः।
तत्परः प्रयततः श्राद्धी प्रेत्य चेह च मोदते ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर ! जो समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले श्राद्धोंद्वारा तत्पर होकर पितरोंको तृप्त करता है, वह पितरोंकी प्रीतिमें लीन रहनेवाला श्राद्धकर्ता इस संसारमें आनन्दभागी होता है और मरनेके बाद परलोकमें सुख भोगता है ॥ १० ॥
पितरो धर्मकामस्य प्रजाकामस्य च प्रजाम्।
पुष्टिकामस्य पुष्टिं च प्रयच्छन्ति युधिष्ठिर ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर ! पितर धर्म चाहनेवालेको धर्म, संतान चाहनेवालेको संतान और पुष्टि चाहनेवालेको पुष्टि भी प्रदान करते हैं ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर उवाच
वर्तन्ते पितरः स्वर्गे केषांचिन्नरके पुनः।
प्राणिनां नियतं वापि कर्मजं फलमुच्यते ॥ १२ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—किन्हींके पितर स्वर्गमें रहते हैं और किन्हींके नरकमें; क्योंकि यह बात प्रसिद्ध है कि प्राणियोंको (अपने) कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाला फल अवश्य भोगना पड़ता है ॥ १२ ॥
श्राद्धानि चैव कुर्व्वन्ति फलकामाः सदा नराः।
अभिसंधाय पितरं पितुश्च पितरं तथा ॥ १३ ॥
पितुः पितामहं चैव त्रिषु पिण्डेषु नित्यशः।
तानि श्राद्धानिदत्तानि कथं गच्छन्ति वै पितॄन् ॥ १४ ॥
फल चाहनेवाले पुरुष सदा पिता, पितामह और प्रपितामहको लक्ष्य करके श्राद्ध करते हैं। सर्वदा इन तीन पिण्डोंमें ही दिये गये श्राद्ध पितरोंको कैसे प्राप्त होते हैं ? ॥ १३-१४ ॥
कथं च शक्तास्ते दातुं नरकस्थाः फलं पुनः।
के वा ते पितरोऽन्ये स्युःकान् यजामो वयं पुनः ॥ १५ ॥
और वे पितर (जब स्वयं) नरकमें निवास कर रहे हैं, तब वे फल भी कैसे दे सकते हैं ? अथवा यदि वे पितर उनसे भिन्न हैं तो कौन हैं—उनका क्या परिचय है ? हम किन पितरोंकी पूजा करें ? ॥ १५ ॥
देवा अपि पितॄन् स्वर्गे यजन्तीति च नः श्रुतम्।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महाद्युते ॥ १६ ॥
हरिवंशपर्व ] षोडशोऽध्यायः ५७
. हमने सुना है कि स्वर्गमें ( रहनेवाले ) देवता भी पितरोंका पूजन करते हैं। महाद्युते ! इन सब बातोंको मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ १६ ॥
स भवान् कथयत्वेतां कथाममितबुद्धिमान् ।
यथा दत्तं पितॄणां वै तारणायेह कल्पते ॥ १७ ॥
पितरोंके निमित्त किया हुआ श्राद्ध किस प्रकार प्राणियोंका उद्धार करता है ? इस कथाका आप वर्णन कीजिये, क्योंकि आपकी बुद्धि अथाह है ॥ १७ ॥
भीष्म उवाच
अत्र ते कीर्तयिष्यामि यथाश्रुतमरिंदम ।
ये च ते पितरोऽन्ये स्म यान् यजामो वयं पुनः ।
पित्रा मम पुरा गीतं लोकान्तरगतेन वै ॥ १८ ॥
भीष्मजीने कहा—शत्रुमर्दन ! हमलोग जिनकी पूजा करते हैं, इस विषयको जैसा मैंने सुना है, वह सब तुमसे कहूँगा। जो अन्य ( पिता-पितामह आदिसे भिन्न ) पितर हैं, इस विषयमे मेरे परलोकवासी पिताने भी गाथा गायी है ॥
श्राद्धकाले मम पितुर्मया पिण्डः समुद्यतः ।
तं पिता मम हस्तेन भित्त्वा भूमिमयाचत ॥ १९ ॥
श्राद्धके समय जब मैं अपने पिताको पिण्ड देने लगा, तब उनका हाथ भूमिको फाड़कर निकल आया और वे उस हाथमें ही मुझसे पिण्ड माँगने लगे ॥ १९ ॥
हस्ताभरणपूर्गेन केयूराभरणेन च ।
रक्ताङ्गुलितलेनाथ यथा दृष्टः पुरा मया ॥ २० ॥
उनका बाजूबंद आदि हाथके आभूषणोंसे विभूषित और लाल-लाल अङ्गुलियोंवाला वह हाथ वैसा ही था जैसा मैंने पहले ( जीवित अवस्थामें ) देखा था ॥ २० ॥
नैष कल्पे विधिर्दृष्ट इति संचिन्त्य चाप्यहम् ।
कुशेष्वेव ततः पिण्डं दत्तवानविचारयन् ॥ २१ ॥
उस समय मैंने विचारा कि कल्पसूत्रोंमें तो मैंने ऐसी विधि कहीं नहीं देखी है, यह विचारकर मैंने बिना कुछ परवा किये ही पिण्डको कुशाओंपर ही रख दिया ॥ २१ ॥
ततः पिता मे सुप्रीतो वाचा मधुरया तदा ।
उवाच भरतश्रेष्ठ प्रीयमाणो मयानघ ॥ २२ ॥
निष्पाप भरतश्रेष्ठ ! उस समय मेरे द्वारा संतुष्ट किये गये पिता परम प्रसन्न हुए और मधुर वाणीमें मुझसे कहने लगे ॥ २२ ॥
त्वया दायादवानस्मि कृतार्थोऽमुत्र चेह च ।
सत्पुत्रेण त्वया पुत्र धर्मज्ञेन विपश्चिता ॥ २३ ॥
'पुत्र ! तू धर्मज्ञ और विद्वान् है। तुझ-सरीखा सुपुत्र होनेसे मुझे पुत्रवान् होनेका फल मिल गया तथा मैं इस लोक और परलोक—दोनोंमें कृतार्थ हो गया ॥ २३ ॥
मया तु तव जिज्ञासा प्रयुक्तैषा दृढव्रत ।
व्यवस्थानं तु धर्मेषु कर्तुं लोकस्य चानघ ॥ २४ ॥
'दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करनेवाले निष्पाप भीष्म ! धर्ममें लोगोंकी आस्था दृढ़ करनेके लिये ही मैंने यह तेरी परीक्षा ली है ॥ २४ ॥
यथा चतुर्थं धर्मस्य रक्षिता लभते फलम् ।
पापस्य हि तथा मूढः फलं प्राप्नोत्यरक्षिता ॥ २५ ॥
'धर्मकी रक्षा करनेवालेको जैसे धर्मका चौथाई फल मिलता है, इसी प्रकार धर्मकी रक्षा न करनेवाला मूढ़ मनुष्य पापके चौथाई फलको पाता है ॥ २५ ॥
प्रमाणं यद्धि कुरुते धर्माचारेषु पार्थिवः ।
प्रजास्तदनुवर्तन्ते प्रमाणाचरितं सदा ॥ २६ ॥
'धर्मविषयक आचारमें राजा जिस बातको प्रामाणिक बता देता है, प्रजा उस प्रमाणभूत राजाके आचरणका अनुकरण करती है ॥ २६ ॥
त्वया च भरतश्रेष्ठ वेदधर्माश्च शाश्वताः ।
कृताः प्रमाणं प्रीतिश्च मम निर्वर्तितातुल ॥ २७ ॥
'भरतश्रेष्ठ ! तूने सनातन वैदिक धर्मको ही प्रमाण माना है, इसलिये मैं तुमपर बहुत ही प्रसन्न हुआ हूँ ॥ २७ ॥
तस्मात् तवाहं सुप्रीतः प्रीत्या च वरमुत्तमम् ।
ददामि तं प्रतीच्छ त्वं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ॥ २८ ॥
'अब इस प्रसन्नताकें कारण मैं तुम्हें श्रेष्ठ वर देना चाहता हूँ। तू तीनों लोकोंमें दुर्लभ वरको ग्रहण कर ॥ २८ ॥
न ते प्रभविता मृत्युर्यावज्जीवितुमिच्छसि ।
त्वत्तोऽभ्यनुज्ञां सम्प्राप्य मृत्युः प्रभविता तव ॥ २९ ॥
'तू जबतक जीवित रहना चाहेगा, तबतक तुझपर मृत्युका प्रभाव न होगा। तेरी आज्ञा पानेपर ही तुझपर मृत्यु प्रभाव डाल सकेगी ॥ २९ ॥
किं वा ते प्रार्थितं भूयो ददामि वरमुत्तमम् ।
तद् ब्रूहि भरतश्रेष्ठ यत् ते मनसि वर्तते ॥ ३० ॥
'भरतश्रेष्ठ ! और जो बात तेरे मनमें हो उसे बता, मैं तुझे तेरी प्रार्थनाके अनुसार और कौन-सा उत्तम वर दूँ ?' ॥ ३० ॥
इत्युक्तवन्तं तमहंमभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
अब्रुवं कृतकृत्योऽहं प्रसन्ने त्वयि सत्तम ॥ ३१ ॥
पिताजीके इस प्रकार कहनेपर मैंने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा—'श्रेष्ठतम पुरुष ! मै आपकी प्रसन्नतासे ही कृतकृत्य हो गया ॥ ३१ ॥
यदि त्वनुग्रहं भूयस्त्वत्तोऽर्हामि महाद्युते ।
प्रष्टुमिच्छामि वै किंचिद् व्याहृतं भवता स्वयम् ॥ ३२ ॥
५८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'महाद्युते ! यदि मैं इससे भी अधिक आपके अनुग्रह-का पात्र होऊँ, तो मैं आपके मुखसे एक प्रश्नका उत्तर सुनना चाहता हूँ' ॥ ३२ ॥
स मामुवाच धर्मात्मा ब्रूहि भीष्म यदिच्छसि ।
छेत्तास्मि संशयं सर्वं यन्मां पृच्छसि भारत ॥ ३३ ॥
तब उन धर्मात्माने मुझसे कहा—'भीष्म ! बता, तू मुझसे क्या पूछना चाहता है ? भारत ! तू मुझसे जो कुछ पूछेगा, तेरे उस संदेहको मैं दूर करूँगा' ॥ ३३ ॥
अपृच्छं तमहं तातं तत्रान्तर्हितमेव च ।
गतं सुकृतिनां लोकं कौतूहलसमन्वितः ॥ ३४ ॥
तब मैंने वहाँ अदृश्य होकर खड़े और पुण्यात्माओंके लोकोंमें पहुँचे हुए अपने पितासे कौतूहलमें भरकर पूछा ॥ ३४॥
भीष्म उवाच
श्रूयन्ते पितरो देवा देवानामति देवताः ।
देवाश्च पितरोऽन्ये वा कान् यजामोऽद्यं पुनः ॥ ३५ ॥
भीष्मजीने पूछा—पिताजी ! पितृगण देवताओंके भी देवता सुने जाते हैं। देवता ही पितर हैं या दोनों भिन्न-भिन्न हैं ? हम किनकी पूजा
हरिवंशपर्व ] सप्तदशोऽध्यायः ५९
सप्तदशोऽध्यायः
पितृकल्प—भीष्म-मार्कण्डेय-संवाद और मार्कण्डेयजीके साथ सनत्कुमारजीकी बातचीत
भीष्म उवाच
ततोऽहं तस्य वचनान्मार्कण्डेयं समाहितः।
प्रश्नं तमेवान्वपृच्छं यन्मे पृष्टः पुरा पिता ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर ! तब मैंने पिताजीके कथनानुसार एकाग्रचित्त हो मार्कण्डेयजीसे फिर वही प्रश्न पूछा, जिसके विषयमें पहले पिताजीसे जिज्ञासा की थी ॥ १ ॥
स मामुवाच धर्मात्मा मार्कण्डेयो महातपाः।
भीष्म वक्ष्यामि कात्स्न्र्येन शृणुष्व प्रयतोऽनघ ॥ २ ॥
तब महातपस्वी धर्मात्मा मार्कण्डेयजी मुझसे कहने लगे—‘निष्पाप भीष्म ! मैं तुझसे सब बात कहता हूँ, तू सावधान होकर सुन ॥ २ ॥
अहं पितृप्रसादाद् वै दीर्घायुष्टमवाप्तवान्।
पितृभक्त्यैव लब्धं च प्राग्लोके परमं यशः ॥ ३ ॥
‘प्राचीन कालमे मैंने पितृ-प्रसादसे ही दीर्घायु प्राप्त की थी और पितृ-भक्तिसे ही इस संसारमें बड़ा भारी यश पाया है ॥ ३ ॥
सोऽहं युगस्य पर्यन्ते बहुवर्षसहस्रिके।
अधिरुह्य गिरिं मेरुं तपोऽतप्यं सुदुश्चरम् ॥ ४ ॥
‘एक समय मैं मेरुपर्वतके ऊपर जाकर अनेक सहस्र वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले युगान्त कालतक घोर तप करता रहा ॥ ४ ॥
ततः कदाचित् पश्यामि दिवं प्रज्वाल्य तेजसा।
विमानं महदायान्तमुत्तरेण गिरेस्तदा ॥ ५ ॥
‘इसी बीच मैंने एक समय पर्वतके उत्तरकी ओरसे एक बड़े भारी विमानको आते हुए देखा, वह अपने तेजसे (सम्पूर्ण) आकाशको प्रकाशित कर रहा था ॥ ५ ॥
तस्मिन् विमाने पर्यङ्के ज्वलितादित्यसंनिभम्।
अपश्यं तत्र चैवाहं शयानं दीप्ततेजसम् ॥ ६ ॥
अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषमग्नावग्निमिवोहितम्।
सोऽहं तस्मै नमस्कृत्य प्रणम्य शिरसा विभुम् ॥ ७ ॥
संनिविष्टं विमानस्थं पाद्यार्घ्याभ्यामपूजयम्।
अपृच्छं चैव दुर्धर्षं विद्याम त्वां कथं विभो ॥ ८ ॥
‘उस विमानके सिंहासनपर मैंने चमकते हुए सूर्यके समान दीप्त तेजवाले तथा अग्निमे स्थापित किये हुए अग्निके समान अङ्गुष्ठमात्र पुरुषको लेटे हुए देखा। मैंने उन विभुको सिर झुकाकर प्रणाम किया और विमानमे विराजमान उन दुर्धर्ष पुरुषकी पाद्य और अर्घ्यसे पूजाकर उनसे पूछा—'विभो ! हम आपको कैसे जानें कि आप कौन हैं ? ॥ ६–८ ॥
तपोवीर्यात् समुत्पन्नं नारायण गुणात्मकम्।
दैवतं ह्यसि देवानामिति मे वर्तते मतिः ॥ ९ ॥
‘नारायण ! यद्यपि आपका यह स्वरूप नारायणके गुण शुद्ध सत्त्वसे निर्मित तथा तपके प्रभावसे प्रकट हुआ है, मेरा विचार है कि आप देवताओंके भी देवता हैं' ॥ ९ ॥
स मामुवाच धर्मात्मा स्मयमान इवानघ।
न ते तपः सुचरितं येन मां नावबुध्यसे ॥ १० ॥
‘तब वे धर्मात्मा मुसकराकर कहने लगे—'निष्पाप ! तुमने (अभी) भली प्रकार तप नहीं किया है, इस कारण तुम मुझे पहचान न सके' ॥ १० ॥
क्षणेनैव प्रमाणं स बिभ्रदन्यदनुत्तमम्।
रूपेण न मया कश्चिद् दृष्टपूर्वः पुमान् क्वचित् ॥ ११ ॥
‘क्षणभरमें ही उन्होंने दूसरे उत्तम स्वरूपको धारण कर लिया। ऐसे रूपवाला दूसरा कोई पुरुष मैंने पहले कभी नहीं देखा था' ॥ ११ ॥
सनत्कुमार उवाच
विद्धि मां ब्रह्मणः पुत्रं मानसं पूर्वजं विभोः।
तपोवीर्यसमुत्पन्नं नारायणगुणात्मकम् ॥ १२ ॥
सनत्कुमारजी बोले—मुने ! तुम मुझे विभु ब्रह्माजीका ज्येष्ठ मानस पुत्र जानो। मैं उनके तपके प्रभावसे उत्पन्न हुआ हूँ और मेरा शरीर नारायणके गुण-शुद्ध सत्त्वसे भरा हुआ है ॥ १२ ॥
सनत्कुमार इति यः श्रुतो देवेषु वै पुरा।
सोऽस्मि भार्गव भद्रं ते कं कामं करवाणि ते ॥ १३ ॥
प्राचीन कालसे ही देवताओंमें जो सनत्कुमार प्रसिद्ध हैं, मैं वही हूँ। भार्गव ! तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हारी किस कामनाको पूर्ण करूँ ? ॥ १३ ॥
ये त्वन्ये ब्रह्मणः पुत्रा यवीयांसस्तु ते मम।
भ्रातरः सप्त दुर्धर्षास्तेषां वंशाः प्रतिष्ठिताः ॥ १४ ॥
ब्रह्माजीके जो दूसरे पुत्र हैं, वे मेरे छोटे भाई हैं। वे मेरे सात भाई परम दुर्धर्ष हैं, उनके वंश प्रतिष्ठित हैं ॥ १४ ॥
क्रतुर्वसिष्ठः पुलहः पुलस्त्योऽत्रिस्तथाङ्गिराः।
मरीचिस्तु तथा धीमान् देवगन्धर्वसेविताः।
त्रीँल्लोकान् धारयन्तीमान् देवगन्धर्वपूजिताः ॥ १५ ॥
(उनके नाम इस प्रकार हैं—) क्रतु, वसिष्ठ, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अङ्गिरा और बुद्धिमान् मरीचि—इन सबकी देवता और गन्धर्व सेवा करते हैं। ये देवता और गन्धर्वोंसे पूजित ऋषि तीनों लोकोंको (अपने तपसे) धारण किये हुए हैं ॥ १५ ॥
वयं तु यतिधर्माणः संयोज्यात्मानमात्मनि।
प्रजाधर्मं च कामं च व्यपहाय महामुने ॥ १६ ॥
| ६० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
महामुने ! हम (सनत्कुमार, सनक आदि) तो अपने आत्माको आत्मामें लीनकर प्रजा (उत्पन्न करने) के धर्म और कामको दूर करके यतिधर्मका पालन करनेवाले हैं॥ १६॥
यथोत्पन्नस्तथैवाहं कुमार इति विद्धि माम्।
तस्मात् सनत्कुमारोति नामैतन्मे प्रतिष्ठितम् ॥ १७॥
मैं जैसे उत्पन्न हुआ हूँ, वैसा ही कुमार हूँ। अर्थात् बालकके समान राग-द्वेष आदिसे शून्य हूँ; अतः तुम मुझे कुमार जानो। इसीलिये मेरा नाम सनत्कुमार* प्रसिद्ध है॥ १७॥
मद्भक्त्या ते तपश्चीर्णं मम दर्शनकाङ्क्षया।
एष दृष्टोऽस्मि भवता किं कामं करवाणि ते ॥ १८॥
तुमने मेरा दर्शन करनेकी अभिलाषासे भक्ति (श्रद्धा) पूर्वक तपस्या की है, अतः मैं तुम्हारे सामने प्रकट हुआ हूँ। बताओ ! अब मैं तुम्हारी किस इच्छाको पूर्ण करूँ? ॥ १८॥
इत्युक्तवन्तं तमहं प्रत्यवोचं सनातनम्।
अनुज्ञातो भगवता प्रीयमाणेन भारत ॥ १९॥
भारत ! वह सनातन कुमार सनत्कुमार जब इस प्रकार कह चुके और जब प्रसन्न होकर उन्होंने मुझे प्रश्न करनेकी आज्ञा दे दी, तब मैंने उनसे वार्तालाप किया था ॥ १९॥
ततोऽहमेनंमर्थं वै तमपृच्छं सनातनम्।
पृष्टः पितॄणां सर्गं च फलं श्राद्धस्य चानघ ॥ २०॥
चिच्छेद संशयं भीष्म स तु देवेश्वरो मम।
स मामुवाच धर्मात्मा कथान्ते बहुवार्षिके।
रमे त्वय्याहं विप्रर्षे शृणु सर्वं यथातथम् ॥ २१॥
निष्पाप भीष्म ! तब मैंने उन सनातन ऋषिसे पितरोंकी उत्पत्ति और श्राद्धके फलसम्बन्धी विषयको लेकर ही प्रश्न किया। मेरे पूछनेपर उन देवेश्वरने मेरे संदेहको दूर कर दिया। बहुत कालसे आरम्भ की हुई कथाके अन्तमें उन धर्मात्माने मुझसे कहा—'विप्रर्षे ! मैं तुम्हारे प्रश्नसे संतुष्ट हूँ। तुम इन सब प्रश्नोंका उत्तर यथार्थ रीतिसे सुनो ॥ २०-२१॥
देवानसृजत ब्रह्मा मां यक्ष्यन्तीति भार्गव।
तमुत्सृज्य तथात्मानमयजंस्ते फलार्थिनः ॥ २२॥
'भार्गव ! देवतालोग मेरी पूजा करेंगे—इस विचारसे ब्रह्माजीने उनकी रचना की, किंतु वे फलके लोभमें पड़कर ब्रह्माजीको छोड़ अपनी ही पूजामें लग गये—इन्द्रिय-तृप्तिके चक्करमें ही पड़ गये ॥ २२॥
ते शप्ता ब्रह्मणा मूढा नष्टसंज्ञा दिवौकसः।
न स्म किंचिद् विजानन्ति ततो लोकोऽप्यमुह्यत॥ २३॥
* सनत् अर्थात् निरन्तर कुमारके समान राग-द्वेष आदिसे शून्य—यह सनत्कुमार शब्दका अर्थ है।
'इसपर ब्रह्माजीने उन्हें शाप दे दिया, जिससे उन मोहग्रस्त देवताओंकी चेतना नष्ट हो गयी और उन्हें कुछ भी ज्ञान न रह गया। फिर तो उनका अनुसरण करनेवाला संसार भी मोहमें पड़ गया ॥ २३॥
ते भूयः प्रणताः शप्ताः प्रायाचन्त पितामहम्।
अनुग्रहाय लोकानां ततस्तानब्रवीदिदम् ॥ २४॥
'इस प्रकार शाप हो जानेपर वे फिर ब्रह्माजीके चरणोंमें जाकर गिरे और उनसे क्षमायाचना की। तब ब्रह्माजीने लोककल्याणकी दृष्टिसे उन देवताओंसे इस प्रकार कहा—॥
प्रायश्चित्तं चरध्वं वै व्यभिचारो हि वः कृतः।
पुत्रांश्च परिपृच्छध्वं ततो ज्ञानमवाप्स्यथ ॥ २५॥
'अब तुम प्रायश्चित्त करो; क्योंकि तुमने व्यभिचार (पूज्य-पूजाका व्यतिक्रम) किया है; इसलिये तुम अपने पुत्रोंसे पूछो, तब तुमलोगोंको ज्ञान प्राप्त होगा ॥ २५॥
प्रायश्चित्तक्रियार्थे ते पुत्रान् पप्रच्छुरार्तवत्।
तेभ्यस्ते प्रयतात्मानः शशंसुस्तनयास्तदा ॥ २६॥
तब देवताओोंने दुखी होकर अपने पुत्रोंसे प्रायश्चित्त-कर्मके विषयमें पूछा। फिर तो वे जितात्मा पुत्र बहुत सोच-विचारकर उनसे बोले ॥ २६॥
प्रायश्चित्तानि धर्मज्ञा वाङ्मनःकर्मजानि वै।
शंसन्ति कुशला नित्यं चक्षुर्भ्यामपि नित्यशः ॥ २७॥
धर्म-ज्ञानमें निपुण पुरुषोंका कहना है कि वाणी, मन और कर्मसे तथा नेत्रोंसे भी सदा प्रायश्चित्त होता है ॥ २७॥
प्रायश्चित्तार्थतत्त्वज्ञा लब्धसंज्ञा दिवौकसः।
गम्यतां पुत्रकाश्चेति पुत्रैरुक्ताश्च ते तदा ॥ २८॥
'अतः देवताओ ! तुम प्रायश्चित्तके तत्त्वको जानकर सचेत हो जाओ !' फिर पुत्रोंने उनसे कहा कि 'पुत्रो ! अब तुम जाओ' ॥ २८॥
अभिशप्तास्तु ते देवाः पुत्रवाक्येन निन्दिताः।
पितामहमुपागच्छन् संशयच्छेदनाय वै ॥ २९॥
'तब वे देवता पुत्रोंद्वारा पुत्र कहे जानेपर अपनी निन्दा समझते हुए तथा पुत्रोंसे भी अभिशप्त होकर अपना संशय दूर करनेके लिये ब्रह्माजीके पास पहुँचे ॥ २९॥
ततस्तानब्रवीद् देवो यूयं वै ब्रह्मवादिनः।
तस्माद् यदुक्तं युष्माकं तत् तथा न तदन्यथा ॥ ३०॥
'तब ब्रह्माजीने देवताओंसे कहा—'तुमलोग ब्रह्मवादी हो। इसलिये उन्होंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह ठीक ही है। इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है ॥ ३०॥
यूयं शरीरकर्तारस्तेषां देवा भविष्यथ।
ते तु ज्ञानप्रदातारः पितरो वो न संशयः ॥ ३१॥
हरिवंशपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः ६१
'तुम तो उनके शरीरकी रचना करनेवाले देवता होगे और वे ज्ञान प्रदान करनेवाले तुम्हारे पितर होंगे—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है ॥ ३१ ॥
अन्योन्यं पितरो यूयं ते चैवेति न संशयः।
देवाश्च पितरश्चैव तद् बुध्यध्वं दिवौकसः ॥ ३२ ॥
'देवताओ और पितरो ! तुम दोनों आपसमे एक दूसरेके पितर हो, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। स्वर्गवासियो ! इस बातको तुम भलीभाँति जान लो' ॥ ३२ ॥
ततस्ते पुनरागम्य पुत्रानूचुर्दिवौकसः।
ब्रह्मणा च्छिन्नसंदेहाः प्रीतिमन्तः परस्परम् ॥ ३३ ॥
'तत्र वे देवता, जिनका सारा संशय ब्रह्माजीद्वारा नष्ट हो गया था और जो परस्पर प्रीतियुक्त थे, पुनः पुत्रोंके पास आये और उनसे बोले—॥ ३३ ॥
यूयं वै पितरोऽस्माकं यैर्वयं प्रतिबोधिताः।
धर्मज्ञाः कश्च वः कामः को वरो वः प्रदीयताम् ॥ ३४ ॥
'तुम हमारे पितर हो, क्योंकि तुमने हमको ज्ञान प्रदान किया है; तुम धर्मज्ञ हो, तुम्हारी क्या इच्छा है ? तुम्हे क्या वर दिया जाय ? ॥ ३४ ॥
यदुक्तं चैव युष्माभिस्तत् तथा न तदन्यथा ।
उक्ताश्च यस्माद् युष्माभिः पुत्रका इति वै वयम् ।
तस्माद् भवन्तः पितरो भविष्यन्ति न संशयः ॥ ३५ ॥
'तुमने जो बात कही है, वह ठीक है; इसमें कुछ अनुचित नहीं है। परंतु तुमने जो हमें 'पुत्रकाः' कहकर सम्बोधित किया है इस कारण तुम पितर होओगे, इसमें कुछ संदेह नहीं है'॥ ३५ ॥
योऽनिष्ट्वा तु पितॄञ्छ्राद्धैः क्रियाः काश्चित् करिष्यति ।
राक्षसा दानवा नागाः फलं प्राप्स्यन्ति तस्य तत् ॥ ३६॥
जो प्राणी श्राद्धोंद्वारा (पहले) पितरोंका पूजन किये बिना ही जो कुछ क्रियाएँ करेगा, उन क्रियाओंका फल राक्षस, दानव और सर्पोंको प्राप्त होगा ॥ ३६ ॥
श्राद्धैराप्यायिताश्चैव पितरः सोममव्ययम् ।
आप्याय्यमाना युष्माभिर्वर्द्धयिष्यन्ति नित्यदा ॥ ३७ ॥
तुम दिव्य पितर हो, तुम्हारे द्वारा श्राद्धोंसे परिपुष्ट किये गये लौकिक पितर स्वयं तुम हो अपने अधिदेवता सोमकी वृद्धि करेंगे ॥ ३७ ॥
श्राद्धैराप्यायितः सोमो लोकानाप्याययिष्यति ।
समुद्रपर्वतवनं जङ्गमाजङ्गमैर्वृतम् ॥ ३८ ॥
'श्राद्धोंसे आप्यायित होता हुआ चन्द्रमा समुद्र, पर्वत, वन और चर-अचर प्राणियोंसे भरे हुए लोकोंको आप्यायित (तृप्त) करेगा ॥ ३८ ॥
श्राद्धानि पुष्टिकामारच ये करिष्यन्ति मानवाः।
तेभ्यः पुष्टिं प्रजाश्चैव दास्यन्ति पितरः सदा ॥ ३९ ॥
'जो मनुष्य पुष्टि पानेकी इच्छासे श्राद्ध करेंगे, पितर उनको सदा पुष्टि और संतान देंगे ॥ ३९ ॥
श्राद्धे ये च प्रदास्यन्ति त्रीन् पिण्डान् नामगोत्रतः ।
सर्वत्र वर्तमानांस्तान् पितरः सपितामहान् ।
भावयिष्यन्ति सततं श्राद्धदानेन तर्पिताः ॥४०॥
'जो पुरुष सर्वत्र विद्यमान पिता, पितामह और प्रपितामहको उनके नाम और गोत्रका उच्चारण कर तीन पिण्ड देंगे, श्राद्ध-दानसे तृप्त हुए वे पितर उनकी सदा वृद्धि करेंगे ॥४०॥
एवमाज्ञापितं पूर्वं ब्रह्मणा परमेष्ठिना ।
इति तद्वचनं सत्यं भवत्वद्य दिवौकसः ।
पुत्राश्च पितरश्चैव वयं सर्वे परस्परम् ॥ ४१ ॥
'परमेष्ठी ब्रह्माजीने पहले ही ऐसी आज्ञा दी है। स्वर्गवासियो ! उनका वचन अब सत्य हो, हम सब परस्पर पुत्र और पितर हैं' ॥ ४१ ॥
सनत्कुमार उवाच
त एते पितरो देवा देवाश्च पितरस्तथा ।
अन्योन्यं पितरो ह्येते देवाश्च पितरश्च ह ॥ ४२ ॥
सनत्कुमारजीने कहा—मुने ! जो देवता हैं, वे ही पितर हैं और जो पितर हैं, वे ही देवता हैं। इस प्रकार ये देवता और पितर आपसमें एक दूसरेके पिता और पूज्य हैं ॥ ४२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितरोंकी उत्पत्तिविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
अष्टादशोऽध्यायः
पितृकल्प—मार्कण्डेय-सनत्कुमार-संवादमें पितरोंके गण, लोक, शक्ति और कन्याओंका वर्णन तथा पितरोंके प्रभावको देखनेके लिये मार्कण्डेयजीको दिव्य दृष्टिकी प्राप्ति
मार्कण्डेय उवाच
इत्युक्तोऽहं भगवता देवदेवेन भास्वता ।
सनत्कुमारेण पुनः पृष्टवान् देवमव्ययम् ॥ १ ॥
संदेहममरश्रेष्ठं भगवन्तमरिंदमम् ।
निबोध तन्मे गाङ्गेय निखिलं सर्वमादितः ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं—गङ्गानन्दन भीष्म ! तेजस्वी
| ६२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
देवदेव भगवान् सनत्कुमारके इस प्रकार कहनेपर मैंने काम-क्रोधादि शत्रुओंका दमन करनेवाले उन देवश्रेष्ठ अव्यय भगवान् सनत्कुमारसे अपने जिन सारे संदेहोंको आरम्भसे पूछा था, उन्हें मुझसे सुनो ॥ १-२ ॥
कियन्तो वै पितृगणाः कस्मिंल्लोके प्रतिष्ठिताः ।
वर्तन्ते देवप्रवरा देवानां सोमवर्द्धनाः ॥ ३ ॥
(श्राद्धके द्वारा) चन्द्रमाको पुष्ट करनेवाले तथा देवताओंके भी श्रेष्ठ देवता पितरोंके कितने गण हैं और वे किस लोकमें प्रतिष्ठित रहते हैं ? ॥ ३ ॥
सनत्कुमार उवाच
सप्तैते यजतां श्रेष्ठ स्वर्गे पितृगणाः स्मृताः।
चत्वारो मूर्तिमन्तश्च त्रयस्तेषाममूर्तयः ॥ ४ ॥
सनत्कुमारजीने कहा—याजकोंमें श्रेष्ठ मार्कण्डेय ! स्वर्गमें रहनेवाले सात पितर माने गये हैं, उनमें चार तो मूर्तिमान् हैं और तीन मूर्तिरहित * ॥ ४ ॥
तेषां लोकं विसर्गं च कीर्तयिष्यामितच्छृणु ।
प्रभावं च महत्त्वं च विस्तरेण तपोधन ॥ ५ ॥
तपोधन ! मैं उनके लोक, सृष्टि, प्रभाव और महत्त्वका विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ, उसे सुनिये ॥ ५ ॥
धर्ममूर्तिधरास्तेषां त्रयो ये परमा गणाः ।
तेषां नामानि लोकांश्च कथयिष्यामि तच्छृणु ॥ ६ ॥
(साथ ही) धर्ममय शरीर धारण करनेवाले पितरोंके जो तीन परम गण हैं, उनके नाम और लोकोंका भी मैं वर्णन करता हूँ, उसे भी सुनिये ॥ ६ ॥
लोकाः सनातना नाम यत्र तिष्ठन्ति भास्वराः ।
अमूर्तयः पितृगणास्ते वै पुत्राः प्रजापतेः ॥ ७ ॥
उन पितरोंके 'सनातन' नामवाले लोक हैं, जहाँ वे तेजस्वी, भौतिक शरीरसे रहित—दिव्य रूपवाले पितृगण, जो प्रजापतिके पुत्र हैं, निवास करते हैं ॥ ७ ॥
विराजस्य द्विजश्रेष्ठ वैराजा इति विश्रुताः ।
यजन्ति तान् देवगणा विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ८ ॥
द्विजश्रेष्ठ ! विराज प्रजापतिके पुत्र होनेके कारण वे वैराज नामसे प्रसिद्ध हैं। देवगण शास्त्रोक्त विधिसे इन वैराज पितरोंका पूजन करते हैं ॥ ८ ॥
एते वै योगविभ्रष्टा लोकान् प्राप्य सनातनान् ।
पुनर्युगसहस्रान्ते जायन्ते ब्रह्मवादिनः ॥ ९ ॥
ये योगभ्रष्ट होनेके कारण सनातन ब्रह्मलोकमें पहुँचनेपर भी सहस्र युगोंके अन्तमें ब्रह्माजीके साथ मुक्त नहीं होते; अतः दूसरे कल्पमें (प्रजापतिसे ही) ब्रह्मवादी मुनिके रूपमें फिर प्रकट हो जाते हैं ॥ ९ ॥
ते तु प्राप्य स्मृतिं भूयः साङ्ख्यं योगमनुत्तमम् ।
यान्ति योगगतिं सिद्धाः पुनरावृत्तिदुर्लभाम् ॥ १० ॥
वे फिर पूर्व-कल्पकी स्मृति होनेसे परम उत्तम सांख्ययोगका अनुष्ठान करके सिद्ध हो जाते हैं और पुनरावृत्ति (जन्म-मरण) से रहित योग-गतिको प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥
एते स्युः पितरस्तात योगिनां योगवर्द्धनाः ।
आप्याययन्ति ये पूर्वं सोमं योगबलेन च ॥ ११ ॥
तात ! जो पहले योगबलसे सोमको पुष्ट करते हैं, वे ही ये पितर योगियोंके योगको बढ़ानेवाले हैं ॥ ११ ॥
तस्माच्छ्राद्धानि देयानि योगिनां तु विशेषतः ।
एष वै प्रथमः सर्गः सोमपानां महात्मनाम् ॥ १२ ॥
इसलिये इन योगियोंके लिये विशेषरूपसे श्राद्ध करना चाहिये। यही सोमकी वृद्धि करनेवाले 'सोमपा' नामक पितरोंका प्रथम सर्ग है ॥ १२ ॥
एतेषां मानसी कन्या मेना नाम महागिरेः ।
पत्नी हिमवतः श्रेष्ठा यस्या मैनाक उच्यते ॥ १३ ॥
इन (वैराज पितरों) की मानसी कन्याका नाम मेना है। वह महागिरि हिमाचलकी श्रेष्ठ पत्नी है। उसका पुत्र मैनाक कहा जाता है ॥ १३ ॥
मैनाकस्य सुतः श्रीमान् क्रौञ्चो नाम महागिरिः ।
पर्वतप्रवरः पुत्रो नानारत्नसमन्वितः ॥ १४ ॥
मैनाकका पुत्र महागिरि श्रीमान् क्रौञ्च (पर्वत) है, जो पर्वतोंमें श्रेष्ठ और नाना प्रकारके रत्नोंसे भरा-पूरा है ॥ १४ ॥
तिस्रः कन्यास्तु मेनायां जनयामास शैलराट् ।
अपर्णामेकपर्णां च तृतीयामेकपाटलाम् ॥ १५ ॥
पर्वतराज हिमालयने मेनाके गर्भसे तीन कन्याएँ उत्पन्न कीं, जिनके नाम थे—अपर्णा, एकपर्णा तथा तीसरी एकपाटला ॥ १५ ॥
तपश्चरन्त्यः सुमहद् दुष्करं देवदानवैः ।
लोकान् संतापयामासुस्तास्तिस्रः स्थाणुजङ्गमान् ॥ १६ ॥
इन तीनो कन्याओने ऐसी घोर तपस्याका अनुष्ठान प्रारम्भ किया, जो देवताओ और दानवोंके लिये भी दुष्कर थी, इससे उन तीनोने स्थावर-जङ्गमसहित समस्त लोकोंको संतप्त कर दिया ॥ १६ ॥
आहारमेकपर्णेन एकपर्णा समाचरत् ।
पाटलापुष्पमेकं च आदधावेकपाटला ॥ १७ ॥
(उन दिनों) एकपर्णा एक ही पत्ता खाकर रह जाती
* अर्थात् सुकाल, अङ्गिरस, सुस्वधा और सोमपा—ये चार मूर्तिमान् हैं। इन्हें दिव्य शरीर प्राप्त हुआ है। वैराज, अग्निष्वात्त और बर्हिषद्—ये तीन अमूर्त हैं। (नीलकण्ठीसे)
हरिवंशपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः ६३
थी और एकपाटला पाटला (ताम्रपुष्पी) के एक ही पुष्पको आहाररूपमें ग्रहण करती थी ॥ १७ ॥
एका तत्र निराहारा तां माता प्रत्यषेधयत् ।
'उ' 'मा' इति निषेधन्ती मातृस्नेहेन दुःखिता ॥ १८ ॥
उनमेंसे एक (अपर्णा सर्वथा) निराहार रहने लगी । तब मातृस्नेहके कारण दुःखित हो उसकी माताने उससे 'उ मा' (अरी ! ऐसा मत कर) कहकर (निराहार रहनेका) निषेध किया ॥ १८ ॥
सा तथोक्ता तया मात्रा देवी दुश्चरचारिणी ।
उमेत्येवाभवत् ख्याता त्रिषु लोकेषु सुन्दरी ॥ १९ ॥
वह दुश्चर तप करनेवाली सुन्दरी देवी इस प्रकार माता-द्वारा कहे जानेपर इस 'उमा' नामसे ही तीनों लोकोंमें विख्यात हो गयी ॥ १९ ॥
तथैव नाम्ना तेनेह विश्रुता योगधर्मिणी ।
एतत् तु त्रिकुमारीकं जगत् स्थास्यति भार्गव ॥ २० ॥
उसी प्रकार वह योगधर्मका पालन करनेवाली उसी नामसे विख्यात हुई । भार्गव ! इन तीन कुमारियों (की तपःशक्ति) से युक्त होकर ही यह जगत् स्थिर रहेगा ॥ २० ॥
तपःशरीरास्ताः सर्वास्तिस्रो योगबलान्विताः ।
सर्वाश्च ब्रह्मवादिन्यः सर्वाश्चैवोर्ध्वरेतसः ॥ २१ ॥
इन तीनोंका शरीर तपोमय है, ये सब योगबलसे सम्पन्न हैं तथा ये सभी ब्रह्मवादिनी और ऊर्ध्वरेता हैं ॥ २१ ॥
उमा तासां वरिष्ठा च ज्येष्ठा च वरवर्णिनी ।
महायोगबलोपेता महादेवमुपस्थिता ॥ २२ ॥
उमा उन सबमें ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, सुन्दरी तथा महान् योग-बलसे सम्पन्न थीं। उनका विवाह महादेवजीसे हुआ ॥ २२ ॥
असितस्यैकपर्णा तु देवलस्य महात्मनः ।
पत्नी दत्ता महाब्रह्मन् योगाचार्याय धीमते ॥ २३ ॥
महाब्रह्मन् ! एकपर्णा बुद्धिमान् महात्मा योगाचार्य असित-देवलको पत्नीरूपमें दी गयी ॥ २३ ॥
जैगीषव्याय तु तथा विद्धि तामेकपाटलाम् ।
एते चापि महाभागे योगाचार्यावुपस्थिते ॥ २४ ॥
इसी प्रकार एकपाटला जैगीषव्यको ब्याही गयी थी, ये दोनों महाभाग्यवती कन्याएँ योगाचार्योंकी सेवामें उपस्थित हुई हैं ॥ २४ ॥
लोकाः सोमपदा नाम मरीचेर्यत्र वै सुताः ।
पितरो यत्र वर्तन्ते देवास्तान् भावयन्त्युत ॥ २५ ॥
(अब दूसरे गण अग्निष्वात्त पितरोंका वर्णन करते हैं—) पितरोंके लिये दूसरे सोमपद नामवाले लोक हैं, जहाँ मरीचि प्रजापतिके पुत्र 'पितर' होकर रहते हैं । वहाँ देवता इनकी पूजा करते हैं ॥ २५ ॥
अग्निष्वात्ता इति ख्याताः सर्व एवामितौजसः ।
एतेषां मानसी कन्या अच्छोदा नाम निम्नगा ॥ २६ ॥
ये सब अमिततेजस्वी पितर अग्निष्वात्त नामसे प्रसिद्ध हैं । अच्छोदा नामकी नदी इनकी मानसी कन्या है ॥ २६ ॥
अच्छोदं नाम विख्यातं सरो यस्याः समुत्थितम् ।
तया न दृष्टपूर्वास्ते पितरस्तु कदाचन ॥ २७ ॥
उसीसे अच्छोदनामक प्रसिद्ध सरोवर प्रकट हुआ है। उस (नदीरूपी मानसी कन्या) ने इन पितरोंको पहले कभी नहीं देखा था ॥ २७ ॥
अप्यमूर्तानथ पितॄन् सा ददर्श शुचिस्मिता ।
सम्भूता मनसा तेषां पितॄन् स्वान् नाभिजानती ॥ २८ ॥
उस पवित्र मुसकानवालीने अमूर्त पितरोंको भी दिव्य-दृष्टिसे देखा । पर उन्हें देखकर भी वह यह न जान सकी कि ये मेरे पिता हैं और मैं इनके मनसे उत्पन्न हुई हूँ ॥ २८ ॥
व्रीडिता तेन दुःखेन बभूव वरवर्णिनी ।
सा दृष्ट्वा पितरं चक्रे वसुं नामान्तरिक्षगम् ॥ २९ ॥
अमावसुरिति ख्यातमायोः पुत्रं यशस्विनम् ।
अद्रिकाप्सरसायुक्तं विमानेऽधिष्ठितं दिवि ॥ ३० ॥
तब वह सुन्दरी अच्छोदा उस दुःखके कारण लज्जित हो गयी। फिर उसने वसुको, जो आयुके यशस्वी पुत्र, अमावसु नामसे विख्यात, अन्तरिक्षचारी और स्वर्गमें अद्रिका अप्सराके साथ विमानमें बैठे थे, देखा और उन्हींको अपना पिता मान लिया ॥ २९-३० ॥
सा तेन व्यभिचारेण मनसः कामरूपिणी ।
पितरं प्रार्थयित्वान्यं योगभ्रष्टा पपात ह ॥ ३१ ॥
वह इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली स्त्री दूसरेको पिता बनाकर मानसिक व्यभिचारके कारण योगभ्रष्ट होकर गिरने लगी ॥ ३१ ॥
त्रीण्यपश्यद् विमानानि पतमाना दिवश्च्युता ।
त्रसरेणुप्रमाणानि साऽपश्यत् तेषु तान् पितॄन् ॥ ३२ ॥
सुसूक्ष्मान्परिसङ्ख्यातानग्नीनग्निविषाहितान् ।
त्रायध्वमित्युवाचार्ता पतन्ती तामवाक्शिराः ॥ ३३ ॥
स्वर्गसे भ्रष्ट होकर नीचेको गिरती हुई अच्छोदाने त्रसरेणुके आकारके तीन विमानोंको देखा । तदनन्तर उसने उनमें (बैठे हुए) उन पितरोंको देखा, जो अत्यन्त सूक्ष्म, स्पष्ट न दीख पड़नेवाले और अग्नियोंमें स्थापित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे थे । नीचे सिर करके गिरती हुई अच्छोदाने उनसे आर्त स्वरमें कहा—'मेरी रक्षा कीजिये' ॥ ३२-३३ ॥
तैरूक्ता सा तु मा भैषीरिति व्योम्नि व्यवस्थिता ।
ततः प्रसादयामास तान् पितॄन् दीनया गिरा ॥ ३४ ॥
| ६४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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उन पितरोंने कहा—'डरो मत' उनके ऐसा कहते ही अच्छोदा आकाशमें रुक गयी और फिर दीन वाणीसे उन पितरोंको प्रसन्न करने लगी ॥ ३४ ॥
ऊचुस्ते पितरः कन्यां भ्रष्टैश्वर्यां व्यतिक्रमात् ।
भ्रष्टैश्वर्या स्वदोषेण पतसि त्वं शुचिस्मिते ॥ ३५ ॥
व्यतिक्रमके कारण पुत्रीको ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हुई देख वे पितर कहने लगे—शुचिस्मिते ! तू अपने ही दोषसे ऐश्वर्यसे भ्रष्ट होकर गिर रही है ॥ ३५ ॥
यैः क्रियन्ते हि कर्माणि शरीरैर्हविषि दैवतैः ।
तैरेव तत्कर्मफलं प्राप्नुवन्तीह देवताः ॥ ३६ ॥
'स्वर्गस्थ देवता जिन शरीरोंके द्वारा जैसा कर्म करते हैं, उन कर्मोंका फल वे उन शरीरोंको ही धारण करके भोगते हैं ॥ ३६ ॥
सद्यः फलन्ति कर्माणि देवत्वे प्रेत्य मानुषे ।
तस्मात् त्वं तपसः पुत्रिप्रेत्येदं प्राप्स्यसे फलम् ॥ ३७ ॥
'देवयोनिमें दैवयोगवश बने हुए कर्म तत्काल ही फल देते हैं और मनुष्ययोनिमें किये हुए कर्मोंका फल मरनेके बाद मिला करता है, अतः पुत्रि ! तू मरनेके बाद तपस्याका फल प्राप्त करेगी ॥ ३७ ॥
इत्युक्ता पितृभिः सा तु पितॄन् प्रासादयत् स्वकान् ।
ध्यात्वा प्रसादं ते चक्रुस्तस्याः सर्वेऽनुकम्पया ॥ ३८ ॥
पितरोंके इस प्रकार कहनेपर उसने अपने पितरोंको प्रसन्न किया । तब उन लोगोंने दयापूर्वक उसके कल्याणके विषयमें विचार किया ॥ ३८ ॥
अवश्यं भाविनं ज्ञात्वा तेऽर्थमूचुस्ततस्तु ताम् ।
अस्य राज्ञो वसोः कन्या त्वमपत्यं भविष्यसि ॥ ३९ ॥
उत्पन्नस्य पृथिव्यां तु मानुषेषु महात्मनः ।
कन्या च भूत्वा लोकान् स्वान् पुनः प्राप्स्यसि दुर्लभान् ॥ ४० ॥
वे अवश्य होनेवाली घटनाको जानकर उससे कहने लगे—'जब यह महात्मा वसु मृत्युलोकमे मनुष्य-योनिमें उत्पन्न होगा, तब तू इस राजाकी कन्या होगी । इस प्रकार इसकी कन्या बनकर तू फिर अपने दुर्लभ लोकोंको प्राप्त करेगी ॥ ३९-४० ॥
पराशरस्य दायादं त्वं पुत्रं जनयिष्यसि ।
स वेदमकं ब्रह्मर्षिश्चतुर्धा विभजिष्यति ॥ ४१ ॥
महाभिषस्य पुत्रौ द्वौ शन्तनोः कीर्तिवर्धनौ ।
विचित्रवीर्यं धर्मज्ञं तथा चित्राङ्गदं शुभम् ॥ ४२ ॥
'तू पराशर ऋषिका वंशधर पुत्र उत्पन्न करेगी । वह ब्रह्मर्षि एक वेदको चार भागोंमें विभक्त करेगा । फिर तू ( जो ) महाभिष* शन्तनु नामवाले राजाकी कीर्तिको बढ़ानेवाले दो पुत्रोंको उत्पन्न करेगी, उनमेंसे एक धर्मज्ञ पुत्रका नाम विचित्रवीर्य होगा और दूसरे कल्याणमय पुत्रका नाम चित्राङ्गद ॥ ४१-४२ ॥
एतानुत्पाद्य पुत्रांस्त्वं पुनर्लोकानवाप्स्यसि ।
व्यतिक्रमात् पितॄणां च जन्म प्राप्स्यसि कुत्सितम् ॥ ४३ ॥
'इन पुत्रोंको उत्पन्न करके तू अपने लोकोंमें फिर आ जायगी। पितरोंका व्यतिक्रम करनेके कारण तुझे कुत्सित जन्म मिलेगा ॥ ४३ ॥
अस्यैव राज्ञः कन्या त्वमद्रिकाया भविष्यसि ।
अष्टाविंशे भवित्री त्वं द्वापरे मत्स्ययोनिजा ॥ ४४ ॥
'तू इसी राजाके द्वारा अद्रिकाके गर्भसे कन्यारूपमें उत्पन्न होगी । और अट्ठाईसवें द्वापरमें मछलीकी संतानके रूपमे प्रकट होगी' ॥ ४४ ॥
एवमुक्ता तु दाशेयी जाता सत्यवती तदा ।
मत्स्ययोनौ समुत्पन्ना राज्ञस्तस्य वसोः सुता ॥ ४५ ॥
पितरोंके इस प्रकार कहनेपर वह राजा वसुकी पुत्री ( बनकर ) मत्स्ययोनिमें उत्पन्न हुई । वही दाशेयी ( दाशराजकी पुत्री ) तथा सत्यवती कहलाती है ॥ ४५ ॥
वैभ्राजा नाम ते लोका दिवि सन्ति सुदर्शनाः ।
यत्र बर्हिषदो नाम पितरो दिवि विश्रुताः ॥ ४६ ॥
( अब पितरोंके तीसरे गण बर्हिषदोंका वर्णन करते हैं—) स्वर्गमें वैभ्राज * नामके दर्शनीय लोक हैं। जहाँ बर्हिषद् नामवाले द्युलोक-विख्यात पितृगण निवास करते हैं ॥ ४६ ॥
तान् वै देवगणाः सर्वे यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
नागाः सर्पाः सुपर्णाश्च भावयन्त्यमितौजसः ॥ ४७ ॥
समस्त देवगण, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग, सर्प तथा अमिततेजस्वी गरुड आदि उन ( बर्हिषद् नामवाले पितरों ) की उपासना करते हैं ॥ ४७ ॥
'एते पुत्रा महात्मानः पुलस्त्यस्य प्रजापतेः ।
महात्मनो महाभागास्तेजोयुक्तास्तपस्विनः ॥ ४८ ॥
ये बर्हिषद् नामक पितर महाभाग्यवान्, तेजस्वी, तपस्वी और महात्मा हैं तथा महान् आत्मबलसे युक्त प्रजापति पुलस्त्यके पुत्र हैं ॥ ४८ ॥
एतेषां मानसी कन्या पीवरी नाम विश्रुता ।
योगा च योगिपत्नी च योगिमाता तथैव च ॥ ४९ ॥
भवित्री द्वापरे प्राप्य युगं धर्मभृतां वरा ।
पराशरकुलोद्भूतः शुको नाम महातपाः ॥ ५० ॥
भविष्यति युगे तस्मिन् महायोगी द्विजर्षभः ।
व्यासादरण्यां सम्भूतो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ ५१ ॥
* शन्तनु ही पूर्वजन्ममें महाभिष थे ।
* विभ्राट् सूर्यनारायणका एक नाम है। उन विभ्राट् सूर्यदेवके लोक वैभ्राज कहलाते हैं।
[ हरिवंशपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः ६५
इन (बर्हिषद पितरों) की मानसी कन्या पीवरी नामसे विख्यात है। पीवरी स्वयं योगिनी, योगीकी पत्नी तथा योगियोंकी माता है। धर्मधारिणी स्त्रियोंमें श्रेष्ठ यह पीवरी द्वापरमें उत्पन्न होनेवाली है। उसी युगमें पराशरके कुलमें व्यासजीके द्वारा अरणीसे आविर्भूत धूमरहित अग्निके समान प्रकाशमान्, महातपस्वी, महायोगी, द्विजश्रेष्ठ शुक उत्पन्न होंगे॥४९-५१॥
स तस्यां पितृकन्यायां पीवर्यां जनयिष्यति।
कन्यां पुत्रांश्च चतुरोयोगाचार्यान्महाबलान् ॥ ५२ ॥
कृष्णं गौरं प्रभुं शम्भुं कृत्वीं कन्यां तथैव च।
ब्रह्मदत्तस्य जननीं महिषीं त्वणुहस्य च ॥ ५३ ॥
वे ही शुकदेव पितरोंकी इस कन्या पीवरीमें कृष्ण, गौर, प्रभु और शम्भु—इन चार महाबली योगाचार्य पुत्रों तथा ब्रह्मदत्तकी जननी और अणुहकी पत्नी कृत्वी नामवाली कन्याको उत्पन्न करेंगे ॥ ५२-५३ ॥
एतानुत्पाद्य धर्मात्मा योगाचार्यान् महाव्रतान्।
श्रुत्वा स्वजनकाद् धर्मान् व्यासादमितबुद्धिमान् ॥ ५४॥
महायोगी ततो गन्ता पुनरावर्तिनीं गतिम्।
यत्तत्पदमनुद्विग्नमव्ययं ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ५५ ॥
वे धर्मात्मा इन महाव्रतधारी योगाचार्योंको उत्पन्न कर अपने पिता व्यासजीसे धर्मोंका रहस्य सुनेंगे। तदनन्तर अपार बुद्धिवाले महायोगी शुक अपुनरावर्तिनी गतिको प्राप्त होंगे। वह परमगति उद्वेगरहित, कभी नष्ट न होनेवाला तथा सनातन ब्रह्मपदरूप है ॥ ५४-५५ ॥
अमूर्त्तिमन्तः पितरो धर्ममूर्त्तिधरा मुने।
कथा यत्रेयमुत्पन्ना वृष्ण्यन्धककुलान्वया ॥ ५६ ॥
मुने ! अमूर्तिमान् पितर धर्ममय शरीर धारण करनेवाले हैं। इन्हींसे वृष्णि और अन्धक कुलोंसे सम्बन्ध रखनेवाली यह कथा आरम्भ होती है ॥ ५६ ॥
सुकाला नाम पितरो वसिष्ठस्य प्रजापतेः।
निरता दिवि लोकेषु ज्योतिर्भांसिषु भासुराः।
सर्वकामसमृद्धेषु द्विजास्तान् भावयन्त्युत ॥ ५७॥
सुकाल नामक पितर प्रजापति वसिष्ठके पुत्र हैं। वे दीप्तिमान् पितर स्वर्गमें सभी कामोपभोगोंसे परिपूर्ण तथा ज्योतिर्मय लोकोंमें निवास करते हैं। ब्राह्मणलोग उनकी आराधना करते हैं ॥ ५७ ॥
तेषां वै मानसी कन्या गौर्नाम्ना दिवि विश्रुता ।
तवैव वंशे या दत्ता शुकस्य महिषी प्रिया।
एकशृङ्गेति विख्याता साध्यानां कीर्तिवर्द्धिनी ॥ ५८ ॥
(मार्कण्डेयजी कहते हैं—भीष्म !) इन (सुकाल नामक पितरों) की मानसी कन्या स्वर्गमें गौ नामसे विख्यात है। वह तुम्हारे ही वंशमें दी गयी है। वह शुककी प्रिया भार्या है। साध्योंकी कीर्ति बढ़ानेवाली वह गौ (यहाँ) एकशृङ्गा नामसे प्रसिद्ध है ॥ ५८ ॥
मरीचिगर्भाँस्ताँल्लोकान् समाश्रित्य व्यवस्थिताः।
ये त्वङ्गिरसः पुत्राः साध्यैः संवर्द्धिताः पुरा ॥ ५९ ॥
(अब क्षत्रियोंद्वारा पूज्य आङ्गिरस पितरोंका वर्णन करते हैं—) पहले जिनका साध्योंने पोषण किया था, वे अङ्गिरा ऋषिके पुत्र आङ्गिरस पितर सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशित होने-वाले लोकोंका आश्रय लेकर रहते हैं ॥ ५९ ॥
तान् क्षत्रियगणास्तात भावयन्ति फलार्थिनः।
तेषां तु मानसी कन्या यशोदा नाम विश्रुता ॥ ६० ॥
तात ! फल चाहनेवाले क्षत्रिय लोग उन (आङ्गिरस पितरों)का पूजन करते हैं। इन (आङ्गिरस पितरों) की मानसी कन्या यशोदा नामसे प्रसिद्ध है ॥ ६० ॥
पत्नी सा विश्वमहतः स्नुषा वै वृद्धशर्मणः।
राजर्षेर्जननी चापि दिलीपस्य महात्मनः ॥ ६१ ॥
वह विश्वमहान्की पत्नी, वृद्धशर्माकी पुत्रवधू एवं राजर्षि महात्मा दिलीपकी माता है ॥ ६१ ॥
तस्य यज्ञे पुरा गीता गाथाः प्रीतैर्महर्षिभिः।
तदा देवयुगे तात वाजिमेधे महामखे ॥ ६२ ॥
तात ! उस समय देवयुगमें उस (दिलीप) के अश्वमेध नामक महायज्ञमें महर्षियोंने प्रसन्न होकर यह गाथा गायी थी—॥
अग्नेर्जन्म तथा श्रुत्वा शाण्डिल्यस्य महात्मनः।
दिलीपं यजमानं ये पश्यन्ति सुसमाहिताः।
सत्यवन्तं महात्मानं तेऽपि स्वर्गजितो नराः ॥ ६३ ॥
'जो मनुष्य चित्तको एकाग्र करके शाण्डिल्यगोत्रमें उत्पन्न महात्मा अग्निके जन्मको सुनकर सत्यवादी महात्मा दिलीपको यज्ञ करते देखते हैं, वे भी स्वर्गको जीत लेंगे' ॥ ६३ ॥
सुस्वधा नाम पितरः कर्दमस्य प्रजापतेः।
समुत्पन्नास्तु पुलहान्महात्मानो द्विजर्षभाः ॥ ६४ ॥
कर्दम प्रजापतिके सुस्वधा नामवाले पितर हैं, जो ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ और महान् आत्मबलसे सम्पन्न हैं तथा महर्षि पुलहसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ६४ ॥
लोकेषु दिवि वर्तन्ते कामगेषु विहङ्गमाः।
तांश्च वैश्यगणास्तात भावयन्ति फलार्थिनः ॥ ६५ ॥
तात ! ये आकाशमें विचरण करनेवाले (सुस्वधा संज्ञक पितर) स्वर्गमें इच्छानुसार सब कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले लोकोंमें रहते हैं। फल-कामुक वैश्यगण इनकी उपासना करते हैं ॥ ६५ ॥
तेषां वै मानसी कन्या विरजा नाम विश्रुता ।
ययातेर्जननी ब्रह्मन् महिषी नहुषस्य च ॥ ६६ ॥
म० ह० ३
६६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
(सनत्कुमारजी कहते हैं—) ब्रह्मन् ! इनकी मानसी कन्या विरजा नामसे प्रसिद्ध है। वह ययातिकी माता और नहुषकी पत्नी है ॥ ६६ ॥
त्रय एते गणाः प्रोक्ताश्चतुर्थं तु निबोध मे।
उत्पन्ना ये स्वधायां ते सोमपा वै कवेः सुताः।
हिरण्यगर्भस्य सुताः शूद्रास्तान् भावयन्त्युत ॥ ६७ ॥
यह मैंने मनुष्यपूज्य पितरोंके तीन गणोंका वर्णन कर दिया। अब चौथे गणका वर्णन सुनो। ये पितृगण कविकी पुत्री स्वधाके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्र हैं और सोमपा कहलाते हैं। ये अग्निके आत्मज हैं। शूद्र इनकी उपासना करते हैं ॥ ६७ ॥
मानसा नाम ते लोका यत्र तिष्ठन्ति ते दिवि।
तेषां वै मानसी कन्या नर्मदा सरितां वरा ॥ ६८ ॥
ये स्वर्गमें जिन लोकोंमें निवास करते हैं, वे मानस-लोक कहलाते हैं। इनकी मानसी कन्या नर्मदा कहलाती है, जो नदियोंमें श्रेष्ठ है ॥ ६८ ॥
या भावयति भूतानि दक्षिणापथगामिनी।
पुरुकुत्सस्य या पत्नी त्रसदस्योर्जनन्यपि ॥ ६९ ॥
वह दक्षिणापथकी ओर बहकर प्राणियोंको पवित्र करती है। वह पुरुकुत्सकी पत्नी और त्रसदस्युकी माता है ॥ ६९ ॥
तेषामथाभ्युपगमान्मनुस्तात युगे युगे।
प्रवर्तयति श्राद्धानि नष्टे धर्मे प्रजापतिः ॥ ७० ॥
तात ! प्रजापति मनु प्रत्येक युगके आरम्भमें इन पितरोंको पूज्य समझकर लुप्त हुए श्राद्ध-धर्मका उद्धार करनेके लिये श्राद्धोंको फिर प्रचलित किया करते हैं ॥ ७० ॥
पितॄणामादिसर्गेण सर्वेषां द्विजसत्तम।
तस्मादेनं स्वधर्मेण श्राद्धदेवं वदन्ति वै ॥ ७१ ॥
‘द्विजसत्तम ! (यम) इन सब सात प्रकारके पितरोंके आदिमें उत्पन्न होते हैं और ये अपने धर्मके प्रवर्तक हैं। इस कारण इनको श्राद्धदेव कहते हैं ॥ ७१ ॥
सर्वेषां राजतं पात्रमथ वा रजतान्वितम्।
दृष्टं स्वधां पुरोधाय श्राद्धं प्रीणाति वै पितॄन् ॥ ७२ ॥
इन सब पितरोंको चाँदीका या चाँदी मिला हुआ पात्र तथा ‘स्वधा पितृभ्यः’ कहकर दिया हुआ श्राद्ध तृप्ति एवं प्रसन्नता प्रदान करता है ॥ ७२ ॥
सोमस्याप्यायनं कृत्वा अग्नेर्वैवस्वतस्य च।
उद्गायनमप्यग्नावग्न्यभावेऽप्सु वा पुनः ॥ ७३ ॥
पितॄन् प्रीणाति यो भक्त्या पितरः प्रीणयन्ति तम्।
यच्छन्ति पितरः पुष्टिं प्रजाश्च विपुलास्तथा ॥ ७४ ॥
स्वर्गमारोग्यमेवाथ यदन्यदपि चेप्सितम्।
दैवकार्यादपि मुने पितृकार्यं विशिष्यते ॥ ७५ ॥
जो मनुष्य सोम, अग्नि और वैवस्वत यमका आप्यायन करके फिर अग्निमें उदगायन करता है अथवा अग्निके अभावमें जलमें उदगायन करके पितरोंको भक्तिपूर्वक तृप्त करता है, उसे पितर तृप्त करते हैं। तथा बहुत-सी संतान, पुष्टि, स्वर्ग एवं आरोग्य और समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करते हैं। मुने ! पितृकार्य देवकार्यसे भी श्रेष्ठ है ॥ ७३-७५ ॥
देवतानां हि पितरः पूर्वमाप्यायनं स्मृतम्।
शीघ्रप्रसादा ह्यक्रोधा लोकस्याप्यायनं परम् ॥ ७६ ॥
पितर आप्यायन (तृप्त) करनेपर देवताओंसे भी पहले प्रसन्न हो जाते हैं। ये पितर शीघ्र प्रसन्न होनेवाले तथा क्रोधरहित हैं और लोकोंको प्रसन्न रखनेवाले हैं ॥ ७६ ॥
स्थिरप्रसादाश्च सदा तान् नमस्यस्व भार्गव।
पितृभक्तोऽसि विप्रर्षे मद्भक्तश्च विशेषतः ॥ ७७ ॥
(सनत्कुमारजी मार्कण्डेय ऋषिसे कहते हैं) भार्गव ! पितरोंका प्रसाद सदा स्थिर रहनेवाला होता है, इसलिये तुम उन्हें प्रणाम किया करो। विप्रर्षे ! तुम पितरोंके भक्त हो और मेरे तो बहुत बड़े भक्त हो ॥ ७७ ॥
श्रेयस्तेऽद्य विधास्यामि प्रत्यक्षं कुरु तत् स्वयम्।
दिव्यं चक्षुः सविज्ञानं प्रदिशामि च तेऽनघ ॥ ७८ ॥
निष्पाप महर्षे ! इसलिये मैं आज तुम्हारा कल्याण करूँगा, उसे तुम स्वयं प्रत्यक्ष देख लो। मैं तुम्हें विज्ञानसहित दिव्य नेत्र प्रदान करता हूँ ॥ ७८ ॥
गतिमैतामप्रमत्तो मार्कण्डेय निशामय।
न हि योगगतिर्दिव्या पितॄणां च परा गतिः ॥ ७९ ॥
त्वद्विधेनापि सिद्धेन दृश्यते मांसचक्षुषा।
स एवमुक्त्वा देवेशो मामुपस्थितमग्रतः ॥ ८० ॥
चक्षुर्दत्त्वा सविज्ञानं देवानामपि दुर्लभम्।
जगाम गतिमग्रां वै द्वितीयोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ ८१ ॥
मार्कण्डेय ! अब तुम (श्राद्धके फलरूपमें मिलनेवाली) इस गतिको सावधान होकर देखो। तुम-जैसा सिद्ध पुरुष भी इस मांसमय चक्षुसे योगियोंकी दिव्य गतिको और पितरोंकी परा गतिको नहीं देख सकता। यों कहकर वे देवेश सामने खड़े हुए मुझको देवताओंके लिये भी दुर्लभ विज्ञानसहित दिव्य नेत्र देकर द्वितीय अग्निके समान प्रकाशित होते हुए अपने इष्ट-स्थानको चले गये ॥ ७९-८१ ॥
तन्निबोध कुरुश्रेष्ठ यन्मयासीन्निशामितम्।
प्रसादात् तस्य देवस्य दुर्ज्ञेयं भुवि मानुषैः ॥ ८२ ॥
कुरुश्रेष्ठ भीष्म ! उन देवताकी कृपासे मैंने जो घटना देखी थी, उसे तुम सुनो। पृथिवीमें उस घटनाका जानना मनुष्योंके लिये महाकठिन है ॥ ८२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥