विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 79, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
स्वर्गस्थाः पितरो ये च देवानापि देवताः।
इति वेदविदः प्राहुरेतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
पितरोंकी आदि सृष्टि कैसे हुई ? ये पितर कौन हैं ? हमने ब्राह्मणोंके मुखसे यह बात सुनी है कि जो पितर स्वर्गमें स्थित हैं, वे देवताओंके भी देवता हैं। वेदके जाननेवाले भी ऐसा ही कहते हैं। अतः मैं इस बातको भलीभाँति जानना चाहता हूँ ॥ २-३ ॥
ये च तेषां गणाः प्रोक्ता यच्च तेषां बलं परम्।
यथा च कृतमस्माभिः श्राद्धं प्रीणाति वै पितॄन् ॥ ४ ॥
प्रीताश्च पितरो ये श्न श्रेयसा योजयन्ति हि।
एषं वेदितुमिच्छामि पितॄणां सर्गमुत्तमम् ॥ ५ ॥
उनके जो गण कहे गये हैं, उनका जो परम बल है और हमारा किया हुआ श्राद्ध जिस प्रकार उन्हें तृप्त करता है तथा जो पितर प्रसन्न होकर मनुष्योंका कल्याण करते हैं उन सबको एवं उत्तम पितृसर्गको मैं जानना चाहता हूँ ॥ ४-५ ॥
वैशम्पायन उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि पितॄणां सर्गमुत्तमम्।
यथा च कृतमस्माभिः श्राद्धं प्रीणाति वै पितॄन्।
प्रीताश्च पितरो ये श्न श्रेयसा योजयन्ति हि ॥ ६ ॥
मार्कण्डेयेन कथितं भीष्माय परिपृच्छते।
अपृच्छद् धर्मराजो हि शरतल्पगतं पुरा।
एवमेव पुरा प्रश्नं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ७ ॥
तद् तेऽनुपूर्व्या वक्ष्यामि भीष्मेणोदाहृतं यथा।
गीतं सनत्कुमारेण मार्कण्डेयाय पृच्छते ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी बोले—बहुत अच्छा, मैं तुमसे पितरोंके उत्तम सर्गका वर्णन करूँगा, हमारा किया हुआ श्राद्ध जिस प्रकार पितरोंको तृप्त करता है तथा जो पितर श्राद्धसे संतुष्ट होकर हमें कल्याणके भागी बनाते हैं, उनका परिचय दूँगा। पूर्वकालमें भीष्मके पूछनेपर मार्कण्डेयजीने उनसे इस विषयका वर्णन किया था। फिर महाभारतकालमें शरशय्यापर पड़े हुए भीष्मजीसे धर्मराज युधिष्ठिरने भी पहले ऐसा ही प्रश्न किया था, जैसा इस समय तुम मुझसे पूछ रहे हो। भीष्मजीने युधिष्ठिरको जिस प्रकार उत्तर दिया था, वह सब मैं तुम्हें क्रमशः बताऊँगा। पहले मार्कण्डेयजीके पूछनेपर सनत्कुमारजीने जो उपदेश दिया था, वही युधिष्ठिर और भीष्मके संवादमें कहा गया है ॥ ६-८ ॥
युधिष्ठिर उवाच
पुष्टिकामेन धर्मज्ञ कथं पुष्टिरवाप्यते।
एतद् वै श्रोतुमिच्छामि किं कुर्व्वाणो न शोचति ॥ ९ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—धर्मज्ञ ! पुष्टि चाहनेवाला पुरुष किस प्रकार पुष्टि पा सकता है और कैसा कर्म करनेसे मनुष्यको शोक नहीं करना पड़ता ? इसे मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ९ ॥
भीष्म उवाच
श्राद्धैः प्रीणाति हि पितॄन् सर्वकामफलैस्तु यः।
तत्परः प्रयततः श्राद्धी प्रेत्य चेह च मोदते ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर ! जो समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले श्राद्धोंद्वारा तत्पर होकर पितरोंको तृप्त करता है, वह पितरोंकी प्रीतिमें लीन रहनेवाला श्राद्धकर्ता इस संसारमें आनन्दभागी होता है और मरनेके बाद परलोकमें सुख भोगता है ॥ १० ॥
पितरो धर्मकामस्य प्रजाकामस्य च प्रजाम्।
पुष्टिकामस्य पुष्टिं च प्रयच्छन्ति युधिष्ठिर ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर ! पितर धर्म चाहनेवालेको धर्म, संतान चाहनेवालेको संतान और पुष्टि चाहनेवालेको पुष्टि भी प्रदान करते हैं ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर उवाच
वर्तन्ते पितरः स्वर्गे केषांचिन्नरके पुनः।
प्राणिनां नियतं वापि कर्मजं फलमुच्यते ॥ १२ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—किन्हींके पितर स्वर्गमें रहते हैं और किन्हींके नरकमें; क्योंकि यह बात प्रसिद्ध है कि प्राणियोंको (अपने) कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाला फल अवश्य भोगना पड़ता है ॥ १२ ॥
श्राद्धानि चैव कुर्व्वन्ति फलकामाः सदा नराः।
अभिसंधाय पितरं पितुश्च पितरं तथा ॥ १३ ॥
पितुः पितामहं चैव त्रिषु पिण्डेषु नित्यशः।
तानि श्राद्धानिदत्तानि कथं गच्छन्ति वै पितॄन् ॥ १४ ॥
फल चाहनेवाले पुरुष सदा पिता, पितामह और प्रपितामहको लक्ष्य करके श्राद्ध करते हैं। सर्वदा इन तीन पिण्डोंमें ही दिये गये श्राद्ध पितरोंको कैसे प्राप्त होते हैं ? ॥ १३-१४ ॥
कथं च शक्तास्ते दातुं नरकस्थाः फलं पुनः।
के वा ते पितरोऽन्ये स्युःकान् यजामो वयं पुनः ॥ १५ ॥
और वे पितर (जब स्वयं) नरकमें निवास कर रहे हैं, तब वे फल भी कैसे दे सकते हैं ? अथवा यदि वे पितर उनसे भिन्न हैं तो कौन हैं—उनका क्या परिचय है ? हम किन पितरोंकी पूजा करें ? ॥ १५ ॥
देवा अपि पितॄन् स्वर्गे यजन्तीति च नः श्रुतम्।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महाद्युते ॥ १६ ॥