भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 80

हरिवंशपर्व ] षोडशोऽध्यायः ५७


. हमने सुना है कि स्वर्गमें ( रहनेवाले ) देवता भी पितरोंका पूजन करते हैं। महाद्युते ! इन सब बातोंको मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ १६ ॥

स भवान् कथयत्वेतां कथाममितबुद्धिमान् ।
यथा दत्तं पितॄणां वै तारणायेह कल्पते ॥ १७ ॥

पितरोंके निमित्त किया हुआ श्राद्ध किस प्रकार प्राणियोंका उद्धार करता है ? इस कथाका आप वर्णन कीजिये, क्योंकि आपकी बुद्धि अथाह है ॥ १७ ॥

भीष्म उवाच

अत्र ते कीर्तयिष्यामि यथाश्रुतमरिंदम ।
ये च ते पितरोऽन्ये स्म यान् यजामो वयं पुनः ।
पित्रा मम पुरा गीतं लोकान्तरगतेन वै ॥ १८ ॥

भीष्मजीने कहा—शत्रुमर्दन ! हमलोग जिनकी पूजा करते हैं, इस विषयको जैसा मैंने सुना है, वह सब तुमसे कहूँगा। जो अन्य ( पिता-पितामह आदिसे भिन्न ) पितर हैं, इस विषयमे मेरे परलोकवासी पिताने भी गाथा गायी है ॥

श्राद्धकाले मम पितुर्मया पिण्डः समुद्यतः ।
तं पिता मम हस्तेन भित्त्वा भूमिमयाचत ॥ १९ ॥

श्राद्धके समय जब मैं अपने पिताको पिण्ड देने लगा, तब उनका हाथ भूमिको फाड़कर निकल आया और वे उस हाथमें ही मुझसे पिण्ड माँगने लगे ॥ १९ ॥

हस्ताभरणपूर्गेन केयूराभरणेन च ।
रक्ताङ्गुलितलेनाथ यथा दृष्टः पुरा मया ॥ २० ॥

उनका बाजूबंद आदि हाथके आभूषणोंसे विभूषित और लाल-लाल अङ्गुलियोंवाला वह हाथ वैसा ही था जैसा मैंने पहले ( जीवित अवस्थामें ) देखा था ॥ २० ॥

नैष कल्पे विधिर्दृष्ट इति संचिन्त्य चाप्यहम् ।
कुशेष्वेव ततः पिण्डं दत्तवानविचारयन् ॥ २१ ॥

उस समय मैंने विचारा कि कल्पसूत्रोंमें तो मैंने ऐसी विधि कहीं नहीं देखी है, यह विचारकर मैंने बिना कुछ परवा किये ही पिण्डको कुशाओंपर ही रख दिया ॥ २१ ॥

ततः पिता मे सुप्रीतो वाचा मधुरया तदा ।
उवाच भरतश्रेष्ठ प्रीयमाणो मयानघ ॥ २२ ॥

निष्पाप भरतश्रेष्ठ ! उस समय मेरे द्वारा संतुष्ट किये गये पिता परम प्रसन्न हुए और मधुर वाणीमें मुझसे कहने लगे ॥ २२ ॥

त्वया दायादवानस्मि कृतार्थोऽमुत्र चेह च ।
सत्पुत्रेण त्वया पुत्र धर्मज्ञेन विपश्चिता ॥ २३ ॥

'पुत्र ! तू धर्मज्ञ और विद्वान् है। तुझ-सरीखा सुपुत्र होनेसे मुझे पुत्रवान् होनेका फल मिल गया तथा मैं इस लोक और परलोक—दोनोंमें कृतार्थ हो गया ॥ २३ ॥

मया तु तव जिज्ञासा प्रयुक्तैषा दृढव्रत ।
व्यवस्थानं तु धर्मेषु कर्तुं लोकस्य चानघ ॥ २४ ॥

'दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करनेवाले निष्पाप भीष्म ! धर्ममें लोगोंकी आस्था दृढ़ करनेके लिये ही मैंने यह तेरी परीक्षा ली है ॥ २४ ॥

यथा चतुर्थं धर्मस्य रक्षिता लभते फलम् ।
पापस्य हि तथा मूढः फलं प्राप्नोत्यरक्षिता ॥ २५ ॥

'धर्मकी रक्षा करनेवालेको जैसे धर्मका चौथाई फल मिलता है, इसी प्रकार धर्मकी रक्षा न करनेवाला मूढ़ मनुष्य पापके चौथाई फलको पाता है ॥ २५ ॥

प्रमाणं यद्धि कुरुते धर्माचारेषु पार्थिवः ।
प्रजास्तदनुवर्तन्ते प्रमाणाचरितं सदा ॥ २६ ॥

'धर्मविषयक आचारमें राजा जिस बातको प्रामाणिक बता देता है, प्रजा उस प्रमाणभूत राजाके आचरणका अनुकरण करती है ॥ २६ ॥

त्वया च भरतश्रेष्ठ वेदधर्माश्च शाश्वताः ।
कृताः प्रमाणं प्रीतिश्च मम निर्वर्तितातुल ॥ २७ ॥

'भरतश्रेष्ठ ! तूने सनातन वैदिक धर्मको ही प्रमाण माना है, इसलिये मैं तुमपर बहुत ही प्रसन्न हुआ हूँ ॥ २७ ॥

तस्मात् तवाहं सुप्रीतः प्रीत्या च वरमुत्तमम् ।
ददामि तं प्रतीच्छ त्वं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ॥ २८ ॥

'अब इस प्रसन्नताकें कारण मैं तुम्हें श्रेष्ठ वर देना चाहता हूँ। तू तीनों लोकोंमें दुर्लभ वरको ग्रहण कर ॥ २८ ॥

न ते प्रभविता मृत्युर्यावज्जीवितुमिच्छसि ।
त्वत्तोऽभ्यनुज्ञां सम्प्राप्य मृत्युः प्रभविता तव ॥ २९ ॥

'तू जबतक जीवित रहना चाहेगा, तबतक तुझपर मृत्युका प्रभाव न होगा। तेरी आज्ञा पानेपर ही तुझपर मृत्यु प्रभाव डाल सकेगी ॥ २९ ॥

किं वा ते प्रार्थितं भूयो ददामि वरमुत्तमम् ।
तद् ब्रूहि भरतश्रेष्ठ यत् ते मनसि वर्तते ॥ ३० ॥

'भरतश्रेष्ठ ! और जो बात तेरे मनमें हो उसे बता, मैं तुझे तेरी प्रार्थनाके अनुसार और कौन-सा उत्तम वर दूँ ?' ॥ ३० ॥

इत्युक्तवन्तं तमहंमभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
अब्रुवं कृतकृत्योऽहं प्रसन्ने त्वयि सत्तम ॥ ३१ ॥

पिताजीके इस प्रकार कहनेपर मैंने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा—'श्रेष्ठतम पुरुष ! मै आपकी प्रसन्नतासे ही कृतकृत्य हो गया ॥ ३१ ॥

यदि त्वनुग्रहं भूयस्त्वत्तोऽर्हामि महाद्युते ।
प्रष्टुमिच्छामि वै किंचिद् व्याहृतं भवता स्वयम् ॥ ३२ ॥