विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः ६३
थी और एकपाटला पाटला (ताम्रपुष्पी) के एक ही पुष्पको आहाररूपमें ग्रहण करती थी ॥ १७ ॥
एका तत्र निराहारा तां माता प्रत्यषेधयत् ।
'उ' 'मा' इति निषेधन्ती मातृस्नेहेन दुःखिता ॥ १८ ॥
उनमेंसे एक (अपर्णा सर्वथा) निराहार रहने लगी । तब मातृस्नेहके कारण दुःखित हो उसकी माताने उससे 'उ मा' (अरी ! ऐसा मत कर) कहकर (निराहार रहनेका) निषेध किया ॥ १८ ॥
सा तथोक्ता तया मात्रा देवी दुश्चरचारिणी ।
उमेत्येवाभवत् ख्याता त्रिषु लोकेषु सुन्दरी ॥ १९ ॥
वह दुश्चर तप करनेवाली सुन्दरी देवी इस प्रकार माता-द्वारा कहे जानेपर इस 'उमा' नामसे ही तीनों लोकोंमें विख्यात हो गयी ॥ १९ ॥
तथैव नाम्ना तेनेह विश्रुता योगधर्मिणी ।
एतत् तु त्रिकुमारीकं जगत् स्थास्यति भार्गव ॥ २० ॥
उसी प्रकार वह योगधर्मका पालन करनेवाली उसी नामसे विख्यात हुई । भार्गव ! इन तीन कुमारियों (की तपःशक्ति) से युक्त होकर ही यह जगत् स्थिर रहेगा ॥ २० ॥
तपःशरीरास्ताः सर्वास्तिस्रो योगबलान्विताः ।
सर्वाश्च ब्रह्मवादिन्यः सर्वाश्चैवोर्ध्वरेतसः ॥ २१ ॥
इन तीनोंका शरीर तपोमय है, ये सब योगबलसे सम्पन्न हैं तथा ये सभी ब्रह्मवादिनी और ऊर्ध्वरेता हैं ॥ २१ ॥
उमा तासां वरिष्ठा च ज्येष्ठा च वरवर्णिनी ।
महायोगबलोपेता महादेवमुपस्थिता ॥ २२ ॥
उमा उन सबमें ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, सुन्दरी तथा महान् योग-बलसे सम्पन्न थीं। उनका विवाह महादेवजीसे हुआ ॥ २२ ॥
असितस्यैकपर्णा तु देवलस्य महात्मनः ।
पत्नी दत्ता महाब्रह्मन् योगाचार्याय धीमते ॥ २३ ॥
महाब्रह्मन् ! एकपर्णा बुद्धिमान् महात्मा योगाचार्य असित-देवलको पत्नीरूपमें दी गयी ॥ २३ ॥
जैगीषव्याय तु तथा विद्धि तामेकपाटलाम् ।
एते चापि महाभागे योगाचार्यावुपस्थिते ॥ २४ ॥
इसी प्रकार एकपाटला जैगीषव्यको ब्याही गयी थी, ये दोनों महाभाग्यवती कन्याएँ योगाचार्योंकी सेवामें उपस्थित हुई हैं ॥ २४ ॥
लोकाः सोमपदा नाम मरीचेर्यत्र वै सुताः ।
पितरो यत्र वर्तन्ते देवास्तान् भावयन्त्युत ॥ २५ ॥
(अब दूसरे गण अग्निष्वात्त पितरोंका वर्णन करते हैं—) पितरोंके लिये दूसरे सोमपद नामवाले लोक हैं, जहाँ मरीचि प्रजापतिके पुत्र 'पितर' होकर रहते हैं । वहाँ देवता इनकी पूजा करते हैं ॥ २५ ॥
अग्निष्वात्ता इति ख्याताः सर्व एवामितौजसः ।
एतेषां मानसी कन्या अच्छोदा नाम निम्नगा ॥ २६ ॥
ये सब अमिततेजस्वी पितर अग्निष्वात्त नामसे प्रसिद्ध हैं । अच्छोदा नामकी नदी इनकी मानसी कन्या है ॥ २६ ॥
अच्छोदं नाम विख्यातं सरो यस्याः समुत्थितम् ।
तया न दृष्टपूर्वास्ते पितरस्तु कदाचन ॥ २७ ॥
उसीसे अच्छोदनामक प्रसिद्ध सरोवर प्रकट हुआ है। उस (नदीरूपी मानसी कन्या) ने इन पितरोंको पहले कभी नहीं देखा था ॥ २७ ॥
अप्यमूर्तानथ पितॄन् सा ददर्श शुचिस्मिता ।
सम्भूता मनसा तेषां पितॄन् स्वान् नाभिजानती ॥ २८ ॥
उस पवित्र मुसकानवालीने अमूर्त पितरोंको भी दिव्य-दृष्टिसे देखा । पर उन्हें देखकर भी वह यह न जान सकी कि ये मेरे पिता हैं और मैं इनके मनसे उत्पन्न हुई हूँ ॥ २८ ॥
व्रीडिता तेन दुःखेन बभूव वरवर्णिनी ।
सा दृष्ट्वा पितरं चक्रे वसुं नामान्तरिक्षगम् ॥ २९ ॥
अमावसुरिति ख्यातमायोः पुत्रं यशस्विनम् ।
अद्रिकाप्सरसायुक्तं विमानेऽधिष्ठितं दिवि ॥ ३० ॥
तब वह सुन्दरी अच्छोदा उस दुःखके कारण लज्जित हो गयी। फिर उसने वसुको, जो आयुके यशस्वी पुत्र, अमावसु नामसे विख्यात, अन्तरिक्षचारी और स्वर्गमें अद्रिका अप्सराके साथ विमानमें बैठे थे, देखा और उन्हींको अपना पिता मान लिया ॥ २९-३० ॥
सा तेन व्यभिचारेण मनसः कामरूपिणी ।
पितरं प्रार्थयित्वान्यं योगभ्रष्टा पपात ह ॥ ३१ ॥
वह इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली स्त्री दूसरेको पिता बनाकर मानसिक व्यभिचारके कारण योगभ्रष्ट होकर गिरने लगी ॥ ३१ ॥
त्रीण्यपश्यद् विमानानि पतमाना दिवश्च्युता ।
त्रसरेणुप्रमाणानि साऽपश्यत् तेषु तान् पितॄन् ॥ ३२ ॥
सुसूक्ष्मान्परिसङ्ख्यातानग्नीनग्निविषाहितान् ।
त्रायध्वमित्युवाचार्ता पतन्ती तामवाक्शिराः ॥ ३३ ॥
स्वर्गसे भ्रष्ट होकर नीचेको गिरती हुई अच्छोदाने त्रसरेणुके आकारके तीन विमानोंको देखा । तदनन्तर उसने उनमें (बैठे हुए) उन पितरोंको देखा, जो अत्यन्त सूक्ष्म, स्पष्ट न दीख पड़नेवाले और अग्नियोंमें स्थापित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे थे । नीचे सिर करके गिरती हुई अच्छोदाने उनसे आर्त स्वरमें कहा—'मेरी रक्षा कीजिये' ॥ ३२-३३ ॥
तैरूक्ता सा तु मा भैषीरिति व्योम्नि व्यवस्थिता ।
ततः प्रसादयामास तान् पितॄन् दीनया गिरा ॥ ३४ ॥