विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
देवदेव भगवान् सनत्कुमारके इस प्रकार कहनेपर मैंने काम-क्रोधादि शत्रुओंका दमन करनेवाले उन देवश्रेष्ठ अव्यय भगवान् सनत्कुमारसे अपने जिन सारे संदेहोंको आरम्भसे पूछा था, उन्हें मुझसे सुनो ॥ १-२ ॥
कियन्तो वै पितृगणाः कस्मिंल्लोके प्रतिष्ठिताः ।
वर्तन्ते देवप्रवरा देवानां सोमवर्द्धनाः ॥ ३ ॥
(श्राद्धके द्वारा) चन्द्रमाको पुष्ट करनेवाले तथा देवताओंके भी श्रेष्ठ देवता पितरोंके कितने गण हैं और वे किस लोकमें प्रतिष्ठित रहते हैं ? ॥ ३ ॥
सनत्कुमार उवाच
सप्तैते यजतां श्रेष्ठ स्वर्गे पितृगणाः स्मृताः।
चत्वारो मूर्तिमन्तश्च त्रयस्तेषाममूर्तयः ॥ ४ ॥
सनत्कुमारजीने कहा—याजकोंमें श्रेष्ठ मार्कण्डेय ! स्वर्गमें रहनेवाले सात पितर माने गये हैं, उनमें चार तो मूर्तिमान् हैं और तीन मूर्तिरहित * ॥ ४ ॥
तेषां लोकं विसर्गं च कीर्तयिष्यामितच्छृणु ।
प्रभावं च महत्त्वं च विस्तरेण तपोधन ॥ ५ ॥
तपोधन ! मैं उनके लोक, सृष्टि, प्रभाव और महत्त्वका विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ, उसे सुनिये ॥ ५ ॥
धर्ममूर्तिधरास्तेषां त्रयो ये परमा गणाः ।
तेषां नामानि लोकांश्च कथयिष्यामि तच्छृणु ॥ ६ ॥
(साथ ही) धर्ममय शरीर धारण करनेवाले पितरोंके जो तीन परम गण हैं, उनके नाम और लोकोंका भी मैं वर्णन करता हूँ, उसे भी सुनिये ॥ ६ ॥
लोकाः सनातना नाम यत्र तिष्ठन्ति भास्वराः ।
अमूर्तयः पितृगणास्ते वै पुत्राः प्रजापतेः ॥ ७ ॥
उन पितरोंके 'सनातन' नामवाले लोक हैं, जहाँ वे तेजस्वी, भौतिक शरीरसे रहित—दिव्य रूपवाले पितृगण, जो प्रजापतिके पुत्र हैं, निवास करते हैं ॥ ७ ॥
विराजस्य द्विजश्रेष्ठ वैराजा इति विश्रुताः ।
यजन्ति तान् देवगणा विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ८ ॥
द्विजश्रेष्ठ ! विराज प्रजापतिके पुत्र होनेके कारण वे वैराज नामसे प्रसिद्ध हैं। देवगण शास्त्रोक्त विधिसे इन वैराज पितरोंका पूजन करते हैं ॥ ८ ॥
एते वै योगविभ्रष्टा लोकान् प्राप्य सनातनान् ।
पुनर्युगसहस्रान्ते जायन्ते ब्रह्मवादिनः ॥ ९ ॥
ये योगभ्रष्ट होनेके कारण सनातन ब्रह्मलोकमें पहुँचनेपर भी सहस्र युगोंके अन्तमें ब्रह्माजीके साथ मुक्त नहीं होते; अतः दूसरे कल्पमें (प्रजापतिसे ही) ब्रह्मवादी मुनिके रूपमें फिर प्रकट हो जाते हैं ॥ ९ ॥
ते तु प्राप्य स्मृतिं भूयः साङ्ख्यं योगमनुत्तमम् ।
यान्ति योगगतिं सिद्धाः पुनरावृत्तिदुर्लभाम् ॥ १० ॥
वे फिर पूर्व-कल्पकी स्मृति होनेसे परम उत्तम सांख्ययोगका अनुष्ठान करके सिद्ध हो जाते हैं और पुनरावृत्ति (जन्म-मरण) से रहित योग-गतिको प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥
एते स्युः पितरस्तात योगिनां योगवर्द्धनाः ।
आप्याययन्ति ये पूर्वं सोमं योगबलेन च ॥ ११ ॥
तात ! जो पहले योगबलसे सोमको पुष्ट करते हैं, वे ही ये पितर योगियोंके योगको बढ़ानेवाले हैं ॥ ११ ॥
तस्माच्छ्राद्धानि देयानि योगिनां तु विशेषतः ।
एष वै प्रथमः सर्गः सोमपानां महात्मनाम् ॥ १२ ॥
इसलिये इन योगियोंके लिये विशेषरूपसे श्राद्ध करना चाहिये। यही सोमकी वृद्धि करनेवाले 'सोमपा' नामक पितरोंका प्रथम सर्ग है ॥ १२ ॥
एतेषां मानसी कन्या मेना नाम महागिरेः ।
पत्नी हिमवतः श्रेष्ठा यस्या मैनाक उच्यते ॥ १३ ॥
इन (वैराज पितरों) की मानसी कन्याका नाम मेना है। वह महागिरि हिमाचलकी श्रेष्ठ पत्नी है। उसका पुत्र मैनाक कहा जाता है ॥ १३ ॥
मैनाकस्य सुतः श्रीमान् क्रौञ्चो नाम महागिरिः ।
पर्वतप्रवरः पुत्रो नानारत्नसमन्वितः ॥ १४ ॥
मैनाकका पुत्र महागिरि श्रीमान् क्रौञ्च (पर्वत) है, जो पर्वतोंमें श्रेष्ठ और नाना प्रकारके रत्नोंसे भरा-पूरा है ॥ १४ ॥
तिस्रः कन्यास्तु मेनायां जनयामास शैलराट् ।
अपर्णामेकपर्णां च तृतीयामेकपाटलाम् ॥ १५ ॥
पर्वतराज हिमालयने मेनाके गर्भसे तीन कन्याएँ उत्पन्न कीं, जिनके नाम थे—अपर्णा, एकपर्णा तथा तीसरी एकपाटला ॥ १५ ॥
तपश्चरन्त्यः सुमहद् दुष्करं देवदानवैः ।
लोकान् संतापयामासुस्तास्तिस्रः स्थाणुजङ्गमान् ॥ १६ ॥
इन तीनो कन्याओने ऐसी घोर तपस्याका अनुष्ठान प्रारम्भ किया, जो देवताओ और दानवोंके लिये भी दुष्कर थी, इससे उन तीनोने स्थावर-जङ्गमसहित समस्त लोकोंको संतप्त कर दिया ॥ १६ ॥
आहारमेकपर्णेन एकपर्णा समाचरत् ।
पाटलापुष्पमेकं च आदधावेकपाटला ॥ १७ ॥
(उन दिनों) एकपर्णा एक ही पत्ता खाकर रह जाती
* अर्थात् सुकाल, अङ्गिरस, सुस्वधा और सोमपा—ये चार मूर्तिमान् हैं। इन्हें दिव्य शरीर प्राप्त हुआ है। वैराज, अग्निष्वात्त और बर्हिषद्—ये तीन अमूर्त हैं। (नीलकण्ठीसे)