विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 84, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः ६१
'तुम तो उनके शरीरकी रचना करनेवाले देवता होगे और वे ज्ञान प्रदान करनेवाले तुम्हारे पितर होंगे—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है ॥ ३१ ॥
अन्योन्यं पितरो यूयं ते चैवेति न संशयः।
देवाश्च पितरश्चैव तद् बुध्यध्वं दिवौकसः ॥ ३२ ॥
'देवताओ और पितरो ! तुम दोनों आपसमे एक दूसरेके पितर हो, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। स्वर्गवासियो ! इस बातको तुम भलीभाँति जान लो' ॥ ३२ ॥
ततस्ते पुनरागम्य पुत्रानूचुर्दिवौकसः।
ब्रह्मणा च्छिन्नसंदेहाः प्रीतिमन्तः परस्परम् ॥ ३३ ॥
'तत्र वे देवता, जिनका सारा संशय ब्रह्माजीद्वारा नष्ट हो गया था और जो परस्पर प्रीतियुक्त थे, पुनः पुत्रोंके पास आये और उनसे बोले—॥ ३३ ॥
यूयं वै पितरोऽस्माकं यैर्वयं प्रतिबोधिताः।
धर्मज्ञाः कश्च वः कामः को वरो वः प्रदीयताम् ॥ ३४ ॥
'तुम हमारे पितर हो, क्योंकि तुमने हमको ज्ञान प्रदान किया है; तुम धर्मज्ञ हो, तुम्हारी क्या इच्छा है ? तुम्हे क्या वर दिया जाय ? ॥ ३४ ॥
यदुक्तं चैव युष्माभिस्तत् तथा न तदन्यथा ।
उक्ताश्च यस्माद् युष्माभिः पुत्रका इति वै वयम् ।
तस्माद् भवन्तः पितरो भविष्यन्ति न संशयः ॥ ३५ ॥
'तुमने जो बात कही है, वह ठीक है; इसमें कुछ अनुचित नहीं है। परंतु तुमने जो हमें 'पुत्रकाः' कहकर सम्बोधित किया है इस कारण तुम पितर होओगे, इसमें कुछ संदेह नहीं है'॥ ३५ ॥
योऽनिष्ट्वा तु पितॄञ्छ्राद्धैः क्रियाः काश्चित् करिष्यति ।
राक्षसा दानवा नागाः फलं प्राप्स्यन्ति तस्य तत् ॥ ३६॥
जो प्राणी श्राद्धोंद्वारा (पहले) पितरोंका पूजन किये बिना ही जो कुछ क्रियाएँ करेगा, उन क्रियाओंका फल राक्षस, दानव और सर्पोंको प्राप्त होगा ॥ ३६ ॥
श्राद्धैराप्यायिताश्चैव पितरः सोममव्ययम् ।
आप्याय्यमाना युष्माभिर्वर्द्धयिष्यन्ति नित्यदा ॥ ३७ ॥
तुम दिव्य पितर हो, तुम्हारे द्वारा श्राद्धोंसे परिपुष्ट किये गये लौकिक पितर स्वयं तुम हो अपने अधिदेवता सोमकी वृद्धि करेंगे ॥ ३७ ॥
श्राद्धैराप्यायितः सोमो लोकानाप्याययिष्यति ।
समुद्रपर्वतवनं जङ्गमाजङ्गमैर्वृतम् ॥ ३८ ॥
'श्राद्धोंसे आप्यायित होता हुआ चन्द्रमा समुद्र, पर्वत, वन और चर-अचर प्राणियोंसे भरे हुए लोकोंको आप्यायित (तृप्त) करेगा ॥ ३८ ॥
श्राद्धानि पुष्टिकामारच ये करिष्यन्ति मानवाः।
तेभ्यः पुष्टिं प्रजाश्चैव दास्यन्ति पितरः सदा ॥ ३९ ॥
'जो मनुष्य पुष्टि पानेकी इच्छासे श्राद्ध करेंगे, पितर उनको सदा पुष्टि और संतान देंगे ॥ ३९ ॥
श्राद्धे ये च प्रदास्यन्ति त्रीन् पिण्डान् नामगोत्रतः ।
सर्वत्र वर्तमानांस्तान् पितरः सपितामहान् ।
भावयिष्यन्ति सततं श्राद्धदानेन तर्पिताः ॥४०॥
'जो पुरुष सर्वत्र विद्यमान पिता, पितामह और प्रपितामहको उनके नाम और गोत्रका उच्चारण कर तीन पिण्ड देंगे, श्राद्ध-दानसे तृप्त हुए वे पितर उनकी सदा वृद्धि करेंगे ॥४०॥
एवमाज्ञापितं पूर्वं ब्रह्मणा परमेष्ठिना ।
इति तद्वचनं सत्यं भवत्वद्य दिवौकसः ।
पुत्राश्च पितरश्चैव वयं सर्वे परस्परम् ॥ ४१ ॥
'परमेष्ठी ब्रह्माजीने पहले ही ऐसी आज्ञा दी है। स्वर्गवासियो ! उनका वचन अब सत्य हो, हम सब परस्पर पुत्र और पितर हैं' ॥ ४१ ॥
सनत्कुमार उवाच
त एते पितरो देवा देवाश्च पितरस्तथा ।
अन्योन्यं पितरो ह्येते देवाश्च पितरश्च ह ॥ ४२ ॥
सनत्कुमारजीने कहा—मुने ! जो देवता हैं, वे ही पितर हैं और जो पितर हैं, वे ही देवता हैं। इस प्रकार ये देवता और पितर आपसमें एक दूसरेके पिता और पूज्य हैं ॥ ४२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितरोंकी उत्पत्तिविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
अष्टादशोऽध्यायः
पितृकल्प—मार्कण्डेय-सनत्कुमार-संवादमें पितरोंके गण, लोक, शक्ति और कन्याओंका वर्णन तथा पितरोंके प्रभावको देखनेके लिये मार्कण्डेयजीको दिव्य दृष्टिकी प्राप्ति
मार्कण्डेय उवाच
इत्युक्तोऽहं भगवता देवदेवेन भास्वता ।
सनत्कुमारेण पुनः पृष्टवान् देवमव्ययम् ॥ १ ॥
संदेहममरश्रेष्ठं भगवन्तमरिंदमम् ।
निबोध तन्मे गाङ्गेय निखिलं सर्वमादितः ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं—गङ्गानन्दन भीष्म ! तेजस्वी