विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 83, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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महामुने ! हम (सनत्कुमार, सनक आदि) तो अपने आत्माको आत्मामें लीनकर प्रजा (उत्पन्न करने) के धर्म और कामको दूर करके यतिधर्मका पालन करनेवाले हैं॥ १६॥
यथोत्पन्नस्तथैवाहं कुमार इति विद्धि माम्।
तस्मात् सनत्कुमारोति नामैतन्मे प्रतिष्ठितम् ॥ १७॥
मैं जैसे उत्पन्न हुआ हूँ, वैसा ही कुमार हूँ। अर्थात् बालकके समान राग-द्वेष आदिसे शून्य हूँ; अतः तुम मुझे कुमार जानो। इसीलिये मेरा नाम सनत्कुमार* प्रसिद्ध है॥ १७॥
मद्भक्त्या ते तपश्चीर्णं मम दर्शनकाङ्क्षया।
एष दृष्टोऽस्मि भवता किं कामं करवाणि ते ॥ १८॥
तुमने मेरा दर्शन करनेकी अभिलाषासे भक्ति (श्रद्धा) पूर्वक तपस्या की है, अतः मैं तुम्हारे सामने प्रकट हुआ हूँ। बताओ ! अब मैं तुम्हारी किस इच्छाको पूर्ण करूँ? ॥ १८॥
इत्युक्तवन्तं तमहं प्रत्यवोचं सनातनम्।
अनुज्ञातो भगवता प्रीयमाणेन भारत ॥ १९॥
भारत ! वह सनातन कुमार सनत्कुमार जब इस प्रकार कह चुके और जब प्रसन्न होकर उन्होंने मुझे प्रश्न करनेकी आज्ञा दे दी, तब मैंने उनसे वार्तालाप किया था ॥ १९॥
ततोऽहमेनंमर्थं वै तमपृच्छं सनातनम्।
पृष्टः पितॄणां सर्गं च फलं श्राद्धस्य चानघ ॥ २०॥
चिच्छेद संशयं भीष्म स तु देवेश्वरो मम।
स मामुवाच धर्मात्मा कथान्ते बहुवार्षिके।
रमे त्वय्याहं विप्रर्षे शृणु सर्वं यथातथम् ॥ २१॥
निष्पाप भीष्म ! तब मैंने उन सनातन ऋषिसे पितरोंकी उत्पत्ति और श्राद्धके फलसम्बन्धी विषयको लेकर ही प्रश्न किया। मेरे पूछनेपर उन देवेश्वरने मेरे संदेहको दूर कर दिया। बहुत कालसे आरम्भ की हुई कथाके अन्तमें उन धर्मात्माने मुझसे कहा—'विप्रर्षे ! मैं तुम्हारे प्रश्नसे संतुष्ट हूँ। तुम इन सब प्रश्नोंका उत्तर यथार्थ रीतिसे सुनो ॥ २०-२१॥
देवानसृजत ब्रह्मा मां यक्ष्यन्तीति भार्गव।
तमुत्सृज्य तथात्मानमयजंस्ते फलार्थिनः ॥ २२॥
'भार्गव ! देवतालोग मेरी पूजा करेंगे—इस विचारसे ब्रह्माजीने उनकी रचना की, किंतु वे फलके लोभमें पड़कर ब्रह्माजीको छोड़ अपनी ही पूजामें लग गये—इन्द्रिय-तृप्तिके चक्करमें ही पड़ गये ॥ २२॥
ते शप्ता ब्रह्मणा मूढा नष्टसंज्ञा दिवौकसः।
न स्म किंचिद् विजानन्ति ततो लोकोऽप्यमुह्यत॥ २३॥
* सनत् अर्थात् निरन्तर कुमारके समान राग-द्वेष आदिसे शून्य—यह सनत्कुमार शब्दका अर्थ है।
'इसपर ब्रह्माजीने उन्हें शाप दे दिया, जिससे उन मोहग्रस्त देवताओंकी चेतना नष्ट हो गयी और उन्हें कुछ भी ज्ञान न रह गया। फिर तो उनका अनुसरण करनेवाला संसार भी मोहमें पड़ गया ॥ २३॥
ते भूयः प्रणताः शप्ताः प्रायाचन्त पितामहम्।
अनुग्रहाय लोकानां ततस्तानब्रवीदिदम् ॥ २४॥
'इस प्रकार शाप हो जानेपर वे फिर ब्रह्माजीके चरणोंमें जाकर गिरे और उनसे क्षमायाचना की। तब ब्रह्माजीने लोककल्याणकी दृष्टिसे उन देवताओंसे इस प्रकार कहा—॥
प्रायश्चित्तं चरध्वं वै व्यभिचारो हि वः कृतः।
पुत्रांश्च परिपृच्छध्वं ततो ज्ञानमवाप्स्यथ ॥ २५॥
'अब तुम प्रायश्चित्त करो; क्योंकि तुमने व्यभिचार (पूज्य-पूजाका व्यतिक्रम) किया है; इसलिये तुम अपने पुत्रोंसे पूछो, तब तुमलोगोंको ज्ञान प्राप्त होगा ॥ २५॥
प्रायश्चित्तक्रियार्थे ते पुत्रान् पप्रच्छुरार्तवत्।
तेभ्यस्ते प्रयतात्मानः शशंसुस्तनयास्तदा ॥ २६॥
तब देवताओोंने दुखी होकर अपने पुत्रोंसे प्रायश्चित्त-कर्मके विषयमें पूछा। फिर तो वे जितात्मा पुत्र बहुत सोच-विचारकर उनसे बोले ॥ २६॥
प्रायश्चित्तानि धर्मज्ञा वाङ्मनःकर्मजानि वै।
शंसन्ति कुशला नित्यं चक्षुर्भ्यामपि नित्यशः ॥ २७॥
धर्म-ज्ञानमें निपुण पुरुषोंका कहना है कि वाणी, मन और कर्मसे तथा नेत्रोंसे भी सदा प्रायश्चित्त होता है ॥ २७॥
प्रायश्चित्तार्थतत्त्वज्ञा लब्धसंज्ञा दिवौकसः।
गम्यतां पुत्रकाश्चेति पुत्रैरुक्ताश्च ते तदा ॥ २८॥
'अतः देवताओ ! तुम प्रायश्चित्तके तत्त्वको जानकर सचेत हो जाओ !' फिर पुत्रोंने उनसे कहा कि 'पुत्रो ! अब तुम जाओ' ॥ २८॥
अभिशप्तास्तु ते देवाः पुत्रवाक्येन निन्दिताः।
पितामहमुपागच्छन् संशयच्छेदनाय वै ॥ २९॥
'तब वे देवता पुत्रोंद्वारा पुत्र कहे जानेपर अपनी निन्दा समझते हुए तथा पुत्रोंसे भी अभिशप्त होकर अपना संशय दूर करनेके लिये ब्रह्माजीके पास पहुँचे ॥ २९॥
ततस्तानब्रवीद् देवो यूयं वै ब्रह्मवादिनः।
तस्माद् यदुक्तं युष्माकं तत् तथा न तदन्यथा ॥ ३०॥
'तब ब्रह्माजीने देवताओंसे कहा—'तुमलोग ब्रह्मवादी हो। इसलिये उन्होंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह ठीक ही है। इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है ॥ ३०॥
यूयं शरीरकर्तारस्तेषां देवा भविष्यथ।
ते तु ज्ञानप्रदातारः पितरो वो न संशयः ॥ ३१॥