विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] सप्तदशोऽध्यायः ५९
सप्तदशोऽध्यायः
पितृकल्प—भीष्म-मार्कण्डेय-संवाद और मार्कण्डेयजीके साथ सनत्कुमारजीकी बातचीत
भीष्म उवाच
ततोऽहं तस्य वचनान्मार्कण्डेयं समाहितः।
प्रश्नं तमेवान्वपृच्छं यन्मे पृष्टः पुरा पिता ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर ! तब मैंने पिताजीके कथनानुसार एकाग्रचित्त हो मार्कण्डेयजीसे फिर वही प्रश्न पूछा, जिसके विषयमें पहले पिताजीसे जिज्ञासा की थी ॥ १ ॥
स मामुवाच धर्मात्मा मार्कण्डेयो महातपाः।
भीष्म वक्ष्यामि कात्स्न्र्येन शृणुष्व प्रयतोऽनघ ॥ २ ॥
तब महातपस्वी धर्मात्मा मार्कण्डेयजी मुझसे कहने लगे—‘निष्पाप भीष्म ! मैं तुझसे सब बात कहता हूँ, तू सावधान होकर सुन ॥ २ ॥
अहं पितृप्रसादाद् वै दीर्घायुष्टमवाप्तवान्।
पितृभक्त्यैव लब्धं च प्राग्लोके परमं यशः ॥ ३ ॥
‘प्राचीन कालमे मैंने पितृ-प्रसादसे ही दीर्घायु प्राप्त की थी और पितृ-भक्तिसे ही इस संसारमें बड़ा भारी यश पाया है ॥ ३ ॥
सोऽहं युगस्य पर्यन्ते बहुवर्षसहस्रिके।
अधिरुह्य गिरिं मेरुं तपोऽतप्यं सुदुश्चरम् ॥ ४ ॥
‘एक समय मैं मेरुपर्वतके ऊपर जाकर अनेक सहस्र वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले युगान्त कालतक घोर तप करता रहा ॥ ४ ॥
ततः कदाचित् पश्यामि दिवं प्रज्वाल्य तेजसा।
विमानं महदायान्तमुत्तरेण गिरेस्तदा ॥ ५ ॥
‘इसी बीच मैंने एक समय पर्वतके उत्तरकी ओरसे एक बड़े भारी विमानको आते हुए देखा, वह अपने तेजसे (सम्पूर्ण) आकाशको प्रकाशित कर रहा था ॥ ५ ॥
तस्मिन् विमाने पर्यङ्के ज्वलितादित्यसंनिभम्।
अपश्यं तत्र चैवाहं शयानं दीप्ततेजसम् ॥ ६ ॥
अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषमग्नावग्निमिवोहितम्।
सोऽहं तस्मै नमस्कृत्य प्रणम्य शिरसा विभुम् ॥ ७ ॥
संनिविष्टं विमानस्थं पाद्यार्घ्याभ्यामपूजयम्।
अपृच्छं चैव दुर्धर्षं विद्याम त्वां कथं विभो ॥ ८ ॥
‘उस विमानके सिंहासनपर मैंने चमकते हुए सूर्यके समान दीप्त तेजवाले तथा अग्निमे स्थापित किये हुए अग्निके समान अङ्गुष्ठमात्र पुरुषको लेटे हुए देखा। मैंने उन विभुको सिर झुकाकर प्रणाम किया और विमानमे विराजमान उन दुर्धर्ष पुरुषकी पाद्य और अर्घ्यसे पूजाकर उनसे पूछा—'विभो ! हम आपको कैसे जानें कि आप कौन हैं ? ॥ ६–८ ॥
तपोवीर्यात् समुत्पन्नं नारायण गुणात्मकम्।
दैवतं ह्यसि देवानामिति मे वर्तते मतिः ॥ ९ ॥
‘नारायण ! यद्यपि आपका यह स्वरूप नारायणके गुण शुद्ध सत्त्वसे निर्मित तथा तपके प्रभावसे प्रकट हुआ है, मेरा विचार है कि आप देवताओंके भी देवता हैं' ॥ ९ ॥
स मामुवाच धर्मात्मा स्मयमान इवानघ।
न ते तपः सुचरितं येन मां नावबुध्यसे ॥ १० ॥
‘तब वे धर्मात्मा मुसकराकर कहने लगे—'निष्पाप ! तुमने (अभी) भली प्रकार तप नहीं किया है, इस कारण तुम मुझे पहचान न सके' ॥ १० ॥
क्षणेनैव प्रमाणं स बिभ्रदन्यदनुत्तमम्।
रूपेण न मया कश्चिद् दृष्टपूर्वः पुमान् क्वचित् ॥ ११ ॥
‘क्षणभरमें ही उन्होंने दूसरे उत्तम स्वरूपको धारण कर लिया। ऐसे रूपवाला दूसरा कोई पुरुष मैंने पहले कभी नहीं देखा था' ॥ ११ ॥
सनत्कुमार उवाच
विद्धि मां ब्रह्मणः पुत्रं मानसं पूर्वजं विभोः।
तपोवीर्यसमुत्पन्नं नारायणगुणात्मकम् ॥ १२ ॥
सनत्कुमारजी बोले—मुने ! तुम मुझे विभु ब्रह्माजीका ज्येष्ठ मानस पुत्र जानो। मैं उनके तपके प्रभावसे उत्पन्न हुआ हूँ और मेरा शरीर नारायणके गुण-शुद्ध सत्त्वसे भरा हुआ है ॥ १२ ॥
सनत्कुमार इति यः श्रुतो देवेषु वै पुरा।
सोऽस्मि भार्गव भद्रं ते कं कामं करवाणि ते ॥ १३ ॥
प्राचीन कालसे ही देवताओंमें जो सनत्कुमार प्रसिद्ध हैं, मैं वही हूँ। भार्गव ! तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हारी किस कामनाको पूर्ण करूँ ? ॥ १३ ॥
ये त्वन्ये ब्रह्मणः पुत्रा यवीयांसस्तु ते मम।
भ्रातरः सप्त दुर्धर्षास्तेषां वंशाः प्रतिष्ठिताः ॥ १४ ॥
ब्रह्माजीके जो दूसरे पुत्र हैं, वे मेरे छोटे भाई हैं। वे मेरे सात भाई परम दुर्धर्ष हैं, उनके वंश प्रतिष्ठित हैं ॥ १४ ॥
क्रतुर्वसिष्ठः पुलहः पुलस्त्योऽत्रिस्तथाङ्गिराः।
मरीचिस्तु तथा धीमान् देवगन्धर्वसेविताः।
त्रीँल्लोकान् धारयन्तीमान् देवगन्धर्वपूजिताः ॥ १५ ॥
(उनके नाम इस प्रकार हैं—) क्रतु, वसिष्ठ, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अङ्गिरा और बुद्धिमान् मरीचि—इन सबकी देवता और गन्धर्व सेवा करते हैं। ये देवता और गन्धर्वोंसे पूजित ऋषि तीनों लोकोंको (अपने तपसे) धारण किये हुए हैं ॥ १५ ॥
वयं तु यतिधर्माणः संयोज्यात्मानमात्मनि।
प्रजाधर्मं च कामं च व्यपहाय महामुने ॥ १६ ॥