भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
६२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

देवदेव भगवान् सनत्कुमारके इस प्रकार कहनेपर मैंने काम-क्रोधादि शत्रुओंका दमन करनेवाले उन देवश्रेष्ठ अव्यय भगवान् सनत्कुमारसे अपने जिन सारे संदेहोंको आरम्भसे पूछा था, उन्हें मुझसे सुनो ॥ १-२ ॥

कियन्तो वै पितृगणाः कस्मिंल्लोके प्रतिष्ठिताः ।
वर्तन्ते देवप्रवरा देवानां सोमवर्द्धनाः ॥ ३ ॥

(श्राद्धके द्वारा) चन्द्रमाको पुष्ट करनेवाले तथा देवताओंके भी श्रेष्ठ देवता पितरोंके कितने गण हैं और वे किस लोकमें प्रतिष्ठित रहते हैं ? ॥ ३ ॥

सनत्कुमार उवाच

सप्तैते यजतां श्रेष्ठ स्वर्गे पितृगणाः स्मृताः।
चत्वारो मूर्तिमन्तश्च त्रयस्तेषाममूर्तयः ॥ ४ ॥

सनत्कुमारजीने कहा—याजकोंमें श्रेष्ठ मार्कण्डेय ! स्वर्गमें रहनेवाले सात पितर माने गये हैं, उनमें चार तो मूर्तिमान् हैं और तीन मूर्तिरहित * ॥ ४ ॥

तेषां लोकं विसर्गं च कीर्तयिष्यामितच्छृणु ।
प्रभावं च महत्त्वं च विस्तरेण तपोधन ॥ ५ ॥

तपोधन ! मैं उनके लोक, सृष्टि, प्रभाव और महत्त्वका विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ, उसे सुनिये ॥ ५ ॥

धर्ममूर्तिधरास्तेषां त्रयो ये परमा गणाः ।
तेषां नामानि लोकांश्च कथयिष्यामि तच्छृणु ॥ ६ ॥

(साथ ही) धर्ममय शरीर धारण करनेवाले पितरोंके जो तीन परम गण हैं, उनके नाम और लोकोंका भी मैं वर्णन करता हूँ, उसे भी सुनिये ॥ ६ ॥

लोकाः सनातना नाम यत्र तिष्ठन्ति भास्वराः ।
अमूर्तयः पितृगणास्ते वै पुत्राः प्रजापतेः ॥ ७ ॥

उन पितरोंके 'सनातन' नामवाले लोक हैं, जहाँ वे तेजस्वी, भौतिक शरीरसे रहित—दिव्य रूपवाले पितृगण, जो प्रजापतिके पुत्र हैं, निवास करते हैं ॥ ७ ॥

विराजस्य द्विजश्रेष्ठ वैराजा इति विश्रुताः ।
यजन्ति तान् देवगणा विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ८ ॥

द्विजश्रेष्ठ ! विराज प्रजापतिके पुत्र होनेके कारण वे वैराज नामसे प्रसिद्ध हैं। देवगण शास्त्रोक्त विधिसे इन वैराज पितरोंका पूजन करते हैं ॥ ८ ॥

एते वै योगविभ्रष्टा लोकान् प्राप्य सनातनान् ।
पुनर्युगसहस्रान्ते जायन्ते ब्रह्मवादिनः ॥ ९ ॥

ये योगभ्रष्ट होनेके कारण सनातन ब्रह्मलोकमें पहुँचनेपर भी सहस्र युगोंके अन्तमें ब्रह्माजीके साथ मुक्त नहीं होते; अतः दूसरे कल्पमें (प्रजापतिसे ही) ब्रह्मवादी मुनिके रूपमें फिर प्रकट हो जाते हैं ॥ ९ ॥

ते तु प्राप्य स्मृतिं भूयः साङ्ख्यं योगमनुत्तमम् ।
यान्ति योगगतिं सिद्धाः पुनरावृत्तिदुर्लभाम् ॥ १० ॥

वे फिर पूर्व-कल्पकी स्मृति होनेसे परम उत्तम सांख्ययोगका अनुष्ठान करके सिद्ध हो जाते हैं और पुनरावृत्ति (जन्म-मरण) से रहित योग-गतिको प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥

एते स्युः पितरस्तात योगिनां योगवर्द्धनाः ।
आप्याययन्ति ये पूर्वं सोमं योगबलेन च ॥ ११ ॥

तात ! जो पहले योगबलसे सोमको पुष्ट करते हैं, वे ही ये पितर योगियोंके योगको बढ़ानेवाले हैं ॥ ११ ॥

तस्माच्छ्राद्धानि देयानि योगिनां तु विशेषतः ।
एष वै प्रथमः सर्गः सोमपानां महात्मनाम् ॥ १२ ॥

इसलिये इन योगियोंके लिये विशेषरूपसे श्राद्ध करना चाहिये। यही सोमकी वृद्धि करनेवाले 'सोमपा' नामक पितरोंका प्रथम सर्ग है ॥ १२ ॥

एतेषां मानसी कन्या मेना नाम महागिरेः ।
पत्नी हिमवतः श्रेष्ठा यस्या मैनाक उच्यते ॥ १३ ॥

इन (वैराज पितरों) की मानसी कन्याका नाम मेना है। वह महागिरि हिमाचलकी श्रेष्ठ पत्नी है। उसका पुत्र मैनाक कहा जाता है ॥ १३ ॥

मैनाकस्य सुतः श्रीमान् क्रौञ्चो नाम महागिरिः ।
पर्वतप्रवरः पुत्रो नानारत्नसमन्वितः ॥ १४ ॥

मैनाकका पुत्र महागिरि श्रीमान् क्रौञ्च (पर्वत) है, जो पर्वतोंमें श्रेष्ठ और नाना प्रकारके रत्नोंसे भरा-पूरा है ॥ १४ ॥

तिस्रः कन्यास्तु मेनायां जनयामास शैलराट् ।
अपर्णामेकपर्णां च तृतीयामेकपाटलाम् ॥ १५ ॥

पर्वतराज हिमालयने मेनाके गर्भसे तीन कन्याएँ उत्पन्न कीं, जिनके नाम थे—अपर्णा, एकपर्णा तथा तीसरी एकपाटला ॥ १५ ॥

तपश्चरन्त्यः सुमहद् दुष्करं देवदानवैः ।
लोकान् संतापयामासुस्तास्तिस्रः स्थाणुजङ्गमान् ॥ १६ ॥

इन तीनो कन्याओने ऐसी घोर तपस्याका अनुष्ठान प्रारम्भ किया, जो देवताओ और दानवोंके लिये भी दुष्कर थी, इससे उन तीनोने स्थावर-जङ्गमसहित समस्त लोकोंको संतप्त कर दिया ॥ १६ ॥

आहारमेकपर्णेन एकपर्णा समाचरत् ।
पाटलापुष्पमेकं च आदधावेकपाटला ॥ १७ ॥

(उन दिनों) एकपर्णा एक ही पत्ता खाकर रह जाती


* अर्थात् सुकाल, अङ्गिरस, सुस्वधा और सोमपा—ये चार मूर्तिमान् हैं। इन्हें दिव्य शरीर प्राप्त हुआ है। वैराज, अग्निष्वात्त और बर्हिषद्—ये तीन अमूर्त हैं। (नीलकण्ठीसे)

हरिवंशपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः ६३

थी और एकपाटला पाटला (ताम्रपुष्पी) के एक ही पुष्पको आहाररूपमें ग्रहण करती थी ॥ १७ ॥
एका तत्र निराहारा तां माता प्रत्यषेधयत् ।
'उ' 'मा' इति निषेधन्ती मातृस्नेहेन दुःखिता ॥ १८ ॥
उनमेंसे एक (अपर्णा सर्वथा) निराहार रहने लगी । तब मातृस्नेहके कारण दुःखित हो उसकी माताने उससे 'उ मा' (अरी ! ऐसा मत कर) कहकर (निराहार रहनेका) निषेध किया ॥ १८ ॥
सा तथोक्ता तया मात्रा देवी दुश्चरचारिणी ।
उमेत्येवाभवत् ख्याता त्रिषु लोकेषु सुन्दरी ॥ १९ ॥
वह दुश्चर तप करनेवाली सुन्दरी देवी इस प्रकार माता-द्वारा कहे जानेपर इस 'उमा' नामसे ही तीनों लोकोंमें विख्यात हो गयी ॥ १९ ॥
तथैव नाम्ना तेनेह विश्रुता योगधर्मिणी ।
एतत् तु त्रिकुमारीकं जगत् स्थास्यति भार्गव ॥ २० ॥
उसी प्रकार वह योगधर्मका पालन करनेवाली उसी नामसे विख्यात हुई । भार्गव ! इन तीन कुमारियों (की तपःशक्ति) से युक्त होकर ही यह जगत् स्थिर रहेगा ॥ २० ॥
तपःशरीरास्ताः सर्वास्तिस्रो योगबलान्विताः ।
सर्वाश्च ब्रह्मवादिन्यः सर्वाश्चैवोर्ध्वरेतसः ॥ २१ ॥
इन तीनोंका शरीर तपोमय है, ये सब योगबलसे सम्पन्न हैं तथा ये सभी ब्रह्मवादिनी और ऊर्ध्वरेता हैं ॥ २१ ॥
उमा तासां वरिष्ठा च ज्येष्ठा च वरवर्णिनी ।
महायोगबलोपेता महादेवमुपस्थिता ॥ २२ ॥
उमा उन सबमें ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, सुन्दरी तथा महान् योग-बलसे सम्पन्न थीं। उनका विवाह महादेवजीसे हुआ ॥ २२ ॥
असितस्यैकपर्णा तु देवलस्य महात्मनः ।
पत्नी दत्ता महाब्रह्मन् योगाचार्याय धीमते ॥ २३ ॥
महाब्रह्मन् ! एकपर्णा बुद्धिमान् महात्मा योगाचार्य असित-देवलको पत्नीरूपमें दी गयी ॥ २३ ॥
जैगीषव्याय तु तथा विद्धि तामेकपाटलाम् ।
एते चापि महाभागे योगाचार्यावुपस्थिते ॥ २४ ॥
इसी प्रकार एकपाटला जैगीषव्यको ब्याही गयी थी, ये दोनों महाभाग्यवती कन्याएँ योगाचार्योंकी सेवामें उपस्थित हुई हैं ॥ २४ ॥
लोकाः सोमपदा नाम मरीचेर्यत्र वै सुताः ।
पितरो यत्र वर्तन्ते देवास्तान् भावयन्त्युत ॥ २५ ॥
(अब दूसरे गण अग्निष्वात्त पितरोंका वर्णन करते हैं—) पितरोंके लिये दूसरे सोमपद नामवाले लोक हैं, जहाँ मरीचि प्रजापतिके पुत्र 'पितर' होकर रहते हैं । वहाँ देवता इनकी पूजा करते हैं ॥ २५ ॥
अग्निष्वात्ता इति ख्याताः सर्व एवामितौजसः ।
एतेषां मानसी कन्या अच्छोदा नाम निम्नगा ॥ २६ ॥
ये सब अमिततेजस्वी पितर अग्निष्वात्त नामसे प्रसिद्ध हैं । अच्छोदा नामकी नदी इनकी मानसी कन्या है ॥ २६ ॥
अच्छोदं नाम विख्यातं सरो यस्याः समुत्थितम् ।
तया न दृष्टपूर्वास्ते पितरस्तु कदाचन ॥ २७ ॥
उसीसे अच्छोदनामक प्रसिद्ध सरोवर प्रकट हुआ है। उस (नदीरूपी मानसी कन्या) ने इन पितरोंको पहले कभी नहीं देखा था ॥ २७ ॥
अप्यमूर्तानथ पितॄन् सा ददर्श शुचिस्मिता ।
सम्भूता मनसा तेषां पितॄन् स्वान् नाभिजानती ॥ २८ ॥
उस पवित्र मुसकानवालीने अमूर्त पितरोंको भी दिव्य-दृष्टिसे देखा । पर उन्हें देखकर भी वह यह न जान सकी कि ये मेरे पिता हैं और मैं इनके मनसे उत्पन्न हुई हूँ ॥ २८ ॥
व्रीडिता तेन दुःखेन बभूव वरवर्णिनी ।
सा दृष्ट्वा पितरं चक्रे वसुं नामान्तरिक्षगम् ॥ २९ ॥
अमावसुरिति ख्यातमायोः पुत्रं यशस्विनम् ।
अद्रिकाप्सरसायुक्तं विमानेऽधिष्ठितं दिवि ॥ ३० ॥
तब वह सुन्दरी अच्छोदा उस दुःखके कारण लज्जित हो गयी। फिर उसने वसुको, जो आयुके यशस्वी पुत्र, अमावसु नामसे विख्यात, अन्तरिक्षचारी और स्वर्गमें अद्रिका अप्सराके साथ विमानमें बैठे थे, देखा और उन्हींको अपना पिता मान लिया ॥ २९-३० ॥
सा तेन व्यभिचारेण मनसः कामरूपिणी ।
पितरं प्रार्थयित्वान्यं योगभ्रष्टा पपात ह ॥ ३१ ॥
वह इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली स्त्री दूसरेको पिता बनाकर मानसिक व्यभिचारके कारण योगभ्रष्ट होकर गिरने लगी ॥ ३१ ॥
त्रीण्यपश्यद् विमानानि पतमाना दिवश्च्युता ।
त्रसरेणुप्रमाणानि साऽपश्यत् तेषु तान् पितॄन् ॥ ३२ ॥
सुसूक्ष्मान्परिसङ्ख्यातानग्नीनग्निविषाहितान् ।
त्रायध्वमित्युवाचार्ता पतन्ती तामवाक्शिराः ॥ ३३ ॥
स्वर्गसे भ्रष्ट होकर नीचेको गिरती हुई अच्छोदाने त्रसरेणुके आकारके तीन विमानोंको देखा । तदनन्तर उसने उनमें (बैठे हुए) उन पितरोंको देखा, जो अत्यन्त सूक्ष्म, स्पष्ट न दीख पड़नेवाले और अग्नियोंमें स्थापित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे थे । नीचे सिर करके गिरती हुई अच्छोदाने उनसे आर्त स्वरमें कहा—'मेरी रक्षा कीजिये' ॥ ३२-३३ ॥
तैरूक्ता सा तु मा भैषीरिति व्योम्नि व्यवस्थिता ।
ततः प्रसादयामास तान् पितॄन् दीनया गिरा ॥ ३४ ॥

६४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

उन पितरोंने कहा—'डरो मत' उनके ऐसा कहते ही अच्छोदा आकाशमें रुक गयी और फिर दीन वाणीसे उन पितरोंको प्रसन्न करने लगी ॥ ३४ ॥

ऊचुस्ते पितरः कन्यां भ्रष्टैश्वर्यां व्यतिक्रमात् ।
भ्रष्टैश्वर्या स्वदोषेण पतसि त्वं शुचिस्मिते ॥ ३५ ॥

व्यतिक्रमके कारण पुत्रीको ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हुई देख वे पितर कहने लगे—शुचिस्मिते ! तू अपने ही दोषसे ऐश्वर्यसे भ्रष्ट होकर गिर रही है ॥ ३५ ॥

यैः क्रियन्ते हि कर्माणि शरीरैर्हविषि दैवतैः ।
तैरेव तत्कर्मफलं प्राप्नुवन्तीह देवताः ॥ ३६ ॥

'स्वर्गस्थ देवता जिन शरीरोंके द्वारा जैसा कर्म करते हैं, उन कर्मोंका फल वे उन शरीरोंको ही धारण करके भोगते हैं ॥ ३६ ॥

सद्यः फलन्ति कर्माणि देवत्वे प्रेत्य मानुषे ।
तस्मात् त्वं तपसः पुत्रिप्रेत्येदं प्राप्स्यसे फलम् ॥ ३७ ॥

'देवयोनिमें दैवयोगवश बने हुए कर्म तत्काल ही फल देते हैं और मनुष्ययोनिमें किये हुए कर्मोंका फल मरनेके बाद मिला करता है, अतः पुत्रि ! तू मरनेके बाद तपस्याका फल प्राप्त करेगी ॥ ३७ ॥

इत्युक्ता पितृभिः सा तु पितॄन् प्रासादयत् स्वकान् ।
ध्यात्वा प्रसादं ते चक्रुस्तस्याः सर्वेऽनुकम्पया ॥ ३८ ॥

पितरोंके इस प्रकार कहनेपर उसने अपने पितरोंको प्रसन्न किया । तब उन लोगोंने दयापूर्वक उसके कल्याणके विषयमें विचार किया ॥ ३८ ॥

अवश्यं भाविनं ज्ञात्वा तेऽर्थमूचुस्ततस्तु ताम् ।
अस्य राज्ञो वसोः कन्या त्वमपत्यं भविष्यसि ॥ ३९ ॥
उत्पन्नस्य पृथिव्यां तु मानुषेषु महात्मनः ।
कन्या च भूत्वा लोकान् स्वान् पुनः प्राप्स्यसि दुर्लभान् ॥ ४० ॥

वे अवश्य होनेवाली घटनाको जानकर उससे कहने लगे—'जब यह महात्मा वसु मृत्युलोकमे मनुष्य-योनिमें उत्पन्न होगा, तब तू इस राजाकी कन्या होगी । इस प्रकार इसकी कन्या बनकर तू फिर अपने दुर्लभ लोकोंको प्राप्त करेगी ॥ ३९-४० ॥

पराशरस्य दायादं त्वं पुत्रं जनयिष्यसि ।
स वेदमकं ब्रह्मर्षिश्चतुर्धा विभजिष्यति ॥ ४१ ॥
महाभिषस्य पुत्रौ द्वौ शन्तनोः कीर्तिवर्धनौ ।
विचित्रवीर्यं धर्मज्ञं तथा चित्राङ्गदं शुभम् ॥ ४२ ॥

'तू पराशर ऋषिका वंशधर पुत्र उत्पन्न करेगी । वह ब्रह्मर्षि एक वेदको चार भागोंमें विभक्त करेगा । फिर तू ( जो ) महाभिष* शन्तनु नामवाले राजाकी कीर्तिको बढ़ानेवाले दो पुत्रोंको उत्पन्न करेगी, उनमेंसे एक धर्मज्ञ पुत्रका नाम विचित्रवीर्य होगा और दूसरे कल्याणमय पुत्रका नाम चित्राङ्गद ॥ ४१-४२ ॥

एतानुत्पाद्य पुत्रांस्त्वं पुनर्लोकानवाप्स्यसि ।
व्यतिक्रमात् पितॄणां च जन्म प्राप्स्यसि कुत्सितम् ॥ ४३ ॥

'इन पुत्रोंको उत्पन्न करके तू अपने लोकोंमें फिर आ जायगी। पितरोंका व्यतिक्रम करनेके कारण तुझे कुत्सित जन्म मिलेगा ॥ ४३ ॥

अस्यैव राज्ञः कन्या त्वमद्रिकाया भविष्यसि ।
अष्टाविंशे भवित्री त्वं द्वापरे मत्स्ययोनिजा ॥ ४४ ॥

'तू इसी राजाके द्वारा अद्रिकाके गर्भसे कन्यारूपमें उत्पन्न होगी । और अट्ठाईसवें द्वापरमें मछलीकी संतानके रूपमे प्रकट होगी' ॥ ४४ ॥

एवमुक्ता तु दाशेयी जाता सत्यवती तदा ।
मत्स्ययोनौ समुत्पन्ना राज्ञस्तस्य वसोः सुता ॥ ४५ ॥

पितरोंके इस प्रकार कहनेपर वह राजा वसुकी पुत्री ( बनकर ) मत्स्ययोनिमें उत्पन्न हुई । वही दाशेयी ( दाशराजकी पुत्री ) तथा सत्यवती कहलाती है ॥ ४५ ॥

वैभ्राजा नाम ते लोका दिवि सन्ति सुदर्शनाः ।
यत्र बर्हिषदो नाम पितरो दिवि विश्रुताः ॥ ४६ ॥

( अब पितरोंके तीसरे गण बर्हिषदोंका वर्णन करते हैं—) स्वर्गमें वैभ्राज * नामके दर्शनीय लोक हैं। जहाँ बर्हिषद् नामवाले द्युलोक-विख्यात पितृगण निवास करते हैं ॥ ४६ ॥

तान् वै देवगणाः सर्वे यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
नागाः सर्पाः सुपर्णाश्च भावयन्त्यमितौजसः ॥ ४७ ॥

समस्त देवगण, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग, सर्प तथा अमिततेजस्वी गरुड आदि उन ( बर्हिषद् नामवाले पितरों ) की उपासना करते हैं ॥ ४७ ॥

'एते पुत्रा महात्मानः पुलस्त्यस्य प्रजापतेः ।
महात्मनो महाभागास्तेजोयुक्तास्तपस्विनः ॥ ४८ ॥

ये बर्हिषद् नामक पितर महाभाग्यवान्, तेजस्वी, तपस्वी और महात्मा हैं तथा महान् आत्मबलसे युक्त प्रजापति पुलस्त्यके पुत्र हैं ॥ ४८ ॥

एतेषां मानसी कन्या पीवरी नाम विश्रुता ।
योगा च योगिपत्नी च योगिमाता तथैव च ॥ ४९ ॥
भवित्री द्वापरे प्राप्य युगं धर्मभृतां वरा ।
पराशरकुलोद्भूतः शुको नाम महातपाः ॥ ५० ॥
भविष्यति युगे तस्मिन् महायोगी द्विजर्षभः ।
व्यासादरण्यां सम्भूतो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ ५१ ॥


* शन्तनु ही पूर्वजन्ममें महाभिष थे ।
* विभ्राट् सूर्यनारायणका एक नाम है। उन विभ्राट् सूर्यदेवके लोक वैभ्राज कहलाते हैं।

[ हरिवंशपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः ६५

इन (बर्हिषद पितरों) की मानसी कन्या पीवरी नामसे विख्यात है। पीवरी स्वयं योगिनी, योगीकी पत्नी तथा योगियोंकी माता है। धर्मधारिणी स्त्रियोंमें श्रेष्ठ यह पीवरी द्वापरमें उत्पन्न होनेवाली है। उसी युगमें पराशरके कुलमें व्यासजीके द्वारा अरणीसे आविर्भूत धूमरहित अग्निके समान प्रकाशमान्, महातपस्वी, महायोगी, द्विजश्रेष्ठ शुक उत्पन्न होंगे॥४९-५१॥

स तस्यां पितृकन्यायां पीवर्यां जनयिष्यति।
कन्यां पुत्रांश्च चतुरोयोगाचार्यान्महाबलान् ॥ ५२ ॥
कृष्णं गौरं प्रभुं शम्भुं कृत्वीं कन्यां तथैव च।
ब्रह्मदत्तस्य जननीं महिषीं त्वणुहस्य च ॥ ५३ ॥

वे ही शुकदेव पितरोंकी इस कन्या पीवरीमें कृष्ण, गौर, प्रभु और शम्भु—इन चार महाबली योगाचार्य पुत्रों तथा ब्रह्मदत्तकी जननी और अणुहकी पत्नी कृत्वी नामवाली कन्याको उत्पन्न करेंगे ॥ ५२-५३ ॥

एतानुत्पाद्य धर्मात्मा योगाचार्यान् महाव्रतान्।
श्रुत्वा स्वजनकाद् धर्मान् व्यासादमितबुद्धिमान् ॥ ५४॥
महायोगी ततो गन्ता पुनरावर्तिनीं गतिम्।
यत्तत्पदमनुद्विग्नमव्ययं ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ५५ ॥

वे धर्मात्मा इन महाव्रतधारी योगाचार्योंको उत्पन्न कर अपने पिता व्यासजीसे धर्मोंका रहस्य सुनेंगे। तदनन्तर अपार बुद्धिवाले महायोगी शुक अपुनरावर्तिनी गतिको प्राप्त होंगे। वह परमगति उद्वेगरहित, कभी नष्ट न होनेवाला तथा सनातन ब्रह्मपदरूप है ॥ ५४-५५ ॥

अमूर्त्तिमन्तः पितरो धर्ममूर्त्तिधरा मुने।
कथा यत्रेयमुत्पन्ना वृष्ण्यन्धककुलान्वया ॥ ५६ ॥

मुने ! अमूर्तिमान् पितर धर्ममय शरीर धारण करनेवाले हैं। इन्हींसे वृष्णि और अन्धक कुलोंसे सम्बन्ध रखनेवाली यह कथा आरम्भ होती है ॥ ५६ ॥

सुकाला नाम पितरो वसिष्ठस्य प्रजापतेः।
निरता दिवि लोकेषु ज्योतिर्भांसिषु भासुराः।
सर्वकामसमृद्धेषु द्विजास्तान् भावयन्त्युत ॥ ५७॥

सुकाल नामक पितर प्रजापति वसिष्ठके पुत्र हैं। वे दीप्तिमान् पितर स्वर्गमें सभी कामोपभोगोंसे परिपूर्ण तथा ज्योतिर्मय लोकोंमें निवास करते हैं। ब्राह्मणलोग उनकी आराधना करते हैं ॥ ५७ ॥

तेषां वै मानसी कन्या गौर्नाम्ना दिवि विश्रुता ।
तवैव वंशे या दत्ता शुकस्य महिषी प्रिया।
एकशृङ्गेति विख्याता साध्यानां कीर्तिवर्द्धिनी ॥ ५८ ॥

(मार्कण्डेयजी कहते हैं—भीष्म !) इन (सुकाल नामक पितरों) की मानसी कन्या स्वर्गमें गौ नामसे विख्यात है। वह तुम्हारे ही वंशमें दी गयी है। वह शुककी प्रिया भार्या है। साध्योंकी कीर्ति बढ़ानेवाली वह गौ (यहाँ) एकशृङ्गा नामसे प्रसिद्ध है ॥ ५८ ॥

मरीचिगर्भाँस्ताँल्लोकान् समाश्रित्य व्यवस्थिताः।
ये त्वङ्गिरसः पुत्राः साध्यैः संवर्द्धिताः पुरा ॥ ५९ ॥

(अब क्षत्रियोंद्वारा पूज्य आङ्गिरस पितरोंका वर्णन करते हैं—) पहले जिनका साध्योंने पोषण किया था, वे अङ्गिरा ऋषिके पुत्र आङ्गिरस पितर सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशित होने-वाले लोकोंका आश्रय लेकर रहते हैं ॥ ५९ ॥

तान् क्षत्रियगणास्तात भावयन्ति फलार्थिनः।
तेषां तु मानसी कन्या यशोदा नाम विश्रुता ॥ ६० ॥

तात ! फल चाहनेवाले क्षत्रिय लोग उन (आङ्गिरस पितरों)का पूजन करते हैं। इन (आङ्गिरस पितरों) की मानसी कन्या यशोदा नामसे प्रसिद्ध है ॥ ६० ॥

पत्नी सा विश्वमहतः स्नुषा वै वृद्धशर्मणः।
राजर्षेर्जननी चापि दिलीपस्य महात्मनः ॥ ६१ ॥

वह विश्वमहान्‌की पत्नी, वृद्धशर्माकी पुत्रवधू एवं राजर्षि महात्मा दिलीपकी माता है ॥ ६१ ॥

तस्य यज्ञे पुरा गीता गाथाः प्रीतैर्महर्षिभिः।
तदा देवयुगे तात वाजिमेधे महामखे ॥ ६२ ॥

तात ! उस समय देवयुगमें उस (दिलीप) के अश्वमेध नामक महायज्ञमें महर्षियोंने प्रसन्न होकर यह गाथा गायी थी—॥

अग्नेर्जन्म तथा श्रुत्वा शाण्डिल्यस्य महात्मनः।
दिलीपं यजमानं ये पश्यन्ति सुसमाहिताः।
सत्यवन्तं महात्मानं तेऽपि स्वर्गजितो नराः ॥ ६३ ॥

'जो मनुष्य चित्तको एकाग्र करके शाण्डिल्यगोत्रमें उत्पन्न महात्मा अग्निके जन्मको सुनकर सत्यवादी महात्मा दिलीपको यज्ञ करते देखते हैं, वे भी स्वर्गको जीत लेंगे' ॥ ६३ ॥

सुस्वधा नाम पितरः कर्दमस्य प्रजापतेः।
समुत्पन्नास्तु पुलहान्महात्मानो द्विजर्षभाः ॥ ६४ ॥

कर्दम प्रजापतिके सुस्वधा नामवाले पितर हैं, जो ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ और महान् आत्मबलसे सम्पन्न हैं तथा महर्षि पुलहसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ६४ ॥

लोकेषु दिवि वर्तन्ते कामगेषु विहङ्गमाः।
तांश्च वैश्यगणास्तात भावयन्ति फलार्थिनः ॥ ६५ ॥

तात ! ये आकाशमें विचरण करनेवाले (सुस्वधा संज्ञक पितर) स्वर्गमें इच्छानुसार सब कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले लोकोंमें रहते हैं। फल-कामुक वैश्यगण इनकी उपासना करते हैं ॥ ६५ ॥

तेषां वै मानसी कन्या विरजा नाम विश्रुता ।
ययातेर्जननी ब्रह्मन् महिषी नहुषस्य च ॥ ६६ ॥

म० ह० ३

६६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

(सनत्कुमारजी कहते हैं—) ब्रह्मन् ! इनकी मानसी कन्या विरजा नामसे प्रसिद्ध है। वह ययातिकी माता और नहुषकी पत्नी है ॥ ६६ ॥

त्रय एते गणाः प्रोक्ताश्चतुर्थं तु निबोध मे।
उत्पन्ना ये स्वधायां ते सोमपा वै कवेः सुताः।
हिरण्यगर्भस्य सुताः शूद्रास्तान् भावयन्त्युत ॥ ६७ ॥

यह मैंने मनुष्यपूज्य पितरोंके तीन गणोंका वर्णन कर दिया। अब चौथे गणका वर्णन सुनो। ये पितृगण कविकी पुत्री स्वधाके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्र हैं और सोमपा कहलाते हैं। ये अग्निके आत्मज हैं। शूद्र इनकी उपासना करते हैं ॥ ६७ ॥

मानसा नाम ते लोका यत्र तिष्ठन्ति ते दिवि।
तेषां वै मानसी कन्या नर्मदा सरितां वरा ॥ ६८ ॥

ये स्वर्गमें जिन लोकोंमें निवास करते हैं, वे मानस-लोक कहलाते हैं। इनकी मानसी कन्या नर्मदा कहलाती है, जो नदियोंमें श्रेष्ठ है ॥ ६८ ॥

या भावयति भूतानि दक्षिणापथगामिनी।
पुरुकुत्सस्य या पत्नी त्रसदस्योर्जनन्यपि ॥ ६९ ॥

वह दक्षिणापथकी ओर बहकर प्राणियोंको पवित्र करती है। वह पुरुकुत्सकी पत्नी और त्रसदस्युकी माता है ॥ ६९ ॥

तेषामथाभ्युपगमान्मनुस्तात युगे युगे।
प्रवर्तयति श्राद्धानि नष्टे धर्मे प्रजापतिः ॥ ७० ॥

तात ! प्रजापति मनु प्रत्येक युगके आरम्भमें इन पितरोंको पूज्य समझकर लुप्त हुए श्राद्ध-धर्मका उद्धार करनेके लिये श्राद्धोंको फिर प्रचलित किया करते हैं ॥ ७० ॥

पितॄणामादिसर्गेण सर्वेषां द्विजसत्तम।
तस्मादेनं स्वधर्मेण श्राद्धदेवं वदन्ति वै ॥ ७१ ॥

‘द्विजसत्तम ! (यम) इन सब सात प्रकारके पितरोंके आदिमें उत्पन्न होते हैं और ये अपने धर्मके प्रवर्तक हैं। इस कारण इनको श्राद्धदेव कहते हैं ॥ ७१ ॥

सर्वेषां राजतं पात्रमथ वा रजतान्वितम्।
दृष्टं स्वधां पुरोधाय श्राद्धं प्रीणाति वै पितॄन् ॥ ७२ ॥

इन सब पितरोंको चाँदीका या चाँदी मिला हुआ पात्र तथा ‘स्वधा पितृभ्यः’ कहकर दिया हुआ श्राद्ध तृप्ति एवं प्रसन्नता प्रदान करता है ॥ ७२ ॥

सोमस्याप्यायनं कृत्वा अग्नेर्वैवस्वतस्य च।
उद्गायनमप्यग्नावग्न्यभावेऽप्सु वा पुनः ॥ ७३ ॥
पितॄन् प्रीणाति यो भक्त्या पितरः प्रीणयन्ति तम्।
यच्छन्ति पितरः पुष्टिं प्रजाश्च विपुलास्तथा ॥ ७४ ॥
स्वर्गमारोग्यमेवाथ यदन्यदपि चेप्सितम्।
दैवकार्यादपि मुने पितृकार्यं विशिष्यते ॥ ७५ ॥

जो मनुष्य सोम, अग्नि और वैवस्वत यमका आप्यायन करके फिर अग्निमें उदगायन करता है अथवा अग्निके अभावमें जलमें उदगायन करके पितरोंको भक्तिपूर्वक तृप्त करता है, उसे पितर तृप्त करते हैं। तथा बहुत-सी संतान, पुष्टि, स्वर्ग एवं आरोग्य और समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करते हैं। मुने ! पितृकार्य देवकार्यसे भी श्रेष्ठ है ॥ ७३-७५ ॥

देवतानां हि पितरः पूर्वमाप्यायनं स्मृतम्।
शीघ्रप्रसादा ह्यक्रोधा लोकस्याप्यायनं परम् ॥ ७६ ॥

पितर आप्यायन (तृप्त) करनेपर देवताओंसे भी पहले प्रसन्न हो जाते हैं। ये पितर शीघ्र प्रसन्न होनेवाले तथा क्रोधरहित हैं और लोकोंको प्रसन्न रखनेवाले हैं ॥ ७६ ॥

स्थिरप्रसादाश्च सदा तान् नमस्यस्व भार्गव।
पितृभक्तोऽसि विप्रर्षे मद्‍भक्तश्च विशेषतः ॥ ७७ ॥

(सनत्कुमारजी मार्कण्डेय ऋषिसे कहते हैं) भार्गव ! पितरोंका प्रसाद सदा स्थिर रहनेवाला होता है, इसलिये तुम उन्हें प्रणाम किया करो। विप्रर्षे ! तुम पितरोंके भक्त हो और मेरे तो बहुत बड़े भक्त हो ॥ ७७ ॥

श्रेयस्तेऽद्य विधास्यामि प्रत्यक्षं कुरु तत् स्वयम्।
दिव्यं चक्षुः सविज्ञानं प्रदिशामि च तेऽनघ ॥ ७८ ॥

निष्पाप महर्षे ! इसलिये मैं आज तुम्हारा कल्याण करूँगा, उसे तुम स्वयं प्रत्यक्ष देख लो। मैं तुम्हें विज्ञानसहित दिव्य नेत्र प्रदान करता हूँ ॥ ७८ ॥

गतिमैतामप्रमत्तो मार्कण्डेय निशामय।
न हि योगगतिर्दिव्या पितॄणां च परा गतिः ॥ ७९ ॥
त्वद्विधेनापि सिद्धेन दृश्यते मांसचक्षुषा।
स एवमुक्त्वा देवेशो मामुपस्थितमग्रतः ॥ ८० ॥
चक्षुर्दत्त्वा सविज्ञानं देवानामपि दुर्लभम्।
जगाम गतिमग्रां वै द्वितीयोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ ८१ ॥

मार्कण्डेय ! अब तुम (श्राद्धके फलरूपमें मिलनेवाली) इस गतिको सावधान होकर देखो। तुम-जैसा सिद्ध पुरुष भी इस मांसमय चक्षुसे योगियोंकी दिव्य गतिको और पितरोंकी परा गतिको नहीं देख सकता। यों कहकर वे देवेश सामने खड़े हुए मुझको देवताओंके लिये भी दुर्लभ विज्ञानसहित दिव्य नेत्र देकर द्वितीय अग्निके समान प्रकाशित होते हुए अपने इष्ट-स्थानको चले गये ॥ ७९-८१ ॥

तन्निबोध कुरुश्रेष्ठ यन्मयासीन्निशामितम्।
प्रसादात् तस्य देवस्य दुर्ज्ञेयं भुवि मानुषैः ॥ ८२ ॥

कुरुश्रेष्ठ भीष्म ! उन देवताकी कृपासे मैंने जो घटना देखी थी, उसे तुम सुनो। पृथिवीमें उस घटनाका जानना मनुष्योंके लिये महाकठिन है ॥ ८२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥

हरिवंशपर्व ] एकोनविंशोऽध्यायः ६७


एकोनविंशोऽध्यायः

पितृकल्प—भरद्वाजके पुत्रोंकी कथा, योगभ्रष्ट पुरुषोंकी गति, योगसिद्धिके अधिकारी पुरुषोंके लक्षण तथा मार्कण्डेय-सनत्कुमार-संवादकी समाप्ति

मार्कण्डेय उवाच

आसन् पूर्वयुगे तात भरद्वाजात्मजा द्विजाः । योगधर्ममनुप्राप्य भ्रष्टा दुष्चरितेन वै ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं— (सनत्कुमारजीने अन्तर्धान होनेसे पहले मुझसे इस प्रकार कहा—) तात ! पूर्वयुगमें कुछ ब्राह्मण रहते थे, जो भरद्वाजके पुत्र थे। वे योगधर्मका सेवन करते-करते दुराचारमें फँस जानेके कारण (स्वर्गसे) भ्रष्ट हो गये थे ॥ १ ॥

अपभ्रंशमनुप्राप्ता योगधर्मापचारिणः । महतः सरसः पारे मानसस्य विसंज्ञिताः ॥ २ ॥

वे योगधर्मका उल्लङ्घन करनेवाले ब्राह्मण अचेतन-से होकर महान् मानसरोवरके तटपर आकर गिरे ॥ २ ॥

तमेवार्थमनुध्यायन्तो नष्टमत्स्यिव मोहिताः । अप्राप्य योगं ते सर्वे संयुक्ताः कालधर्मणा ॥ ३ ॥

वे सभी जलमें डूबते हुए पुरुषके समान मोहमें पड़ गये और उसी योगविषयका विचार करते-करते योगके तत्त्वको बिना पाये ही मर गये ॥ ३ ॥

ततस्ते योगविभ्रष्टा देवेषु सुचिरोषिताः । जाताः कौशिकदायादाः कुरुक्षेत्रे नरर्षभाः ॥ ४ ॥

अब वे योगभ्रष्ट नरश्रेष्ठ भरद्वाज-पुत्र, जो दीर्घकालतक देवताओंमें रह चुके हैं, कुरुक्षेत्रमें कौशिकके पुत्र बनकर उत्पन्न होंगे ॥ ४ ॥

हिंसया विहरिष्यन्तो धर्मं पितृकृतेन वै । ततस्ते पुनराजातिं भ्रष्टाः प्राप्स्यन्ति कुत्सिताम् ॥ ५ ॥

वे (ब्राह्मण होनेपर भी) पितरोंके लिये धर्म (श्राद्ध)के बहाने हिंसा करेंगे फिर वह हिंसारूपी पाप करनेके कारण भ्रष्ट होकर कुत्सित योनिमें उत्पन्न होंगे ॥ ५ ॥

तेषां पितृप्रसादेन पूर्वजातिकृतेन वै । स्मृतिरुत्पत्स्यते प्राप्य तां तां जातिं जुगुप्सिताम् ॥ ६ ॥

परंतु पूर्वजन्मके पितरोंकी कृपाके कारण उस-उस निन्दित योनिमें उत्पन्न होनेपर भी उनको पूर्वजन्मकी स्मृति बनी रहेगी ॥ ६ ॥

ते धर्मचारिणो नित्यं भविष्यन्ति समाहिताः । ब्राह्मण्यं प्रतिलप्स्यन्ति ततो भूयः स्वकर्मणा ॥ ७ ॥

वे प्रत्येक जन्ममें धर्मात्मा रहकर अपने चित्तको सावधान रखेंगे और (अन्तमें) अपने कर्मवश फिर ब्राह्मणत्वको प्राप्त कर लेंगे ॥ ७ ॥

ततश्च योगं प्राप्स्यन्ति पूर्वजातिकृतं पुनः । भूयः सिद्धिमनुप्राप्ताः स्थानं प्राप्स्यन्ति शाश्वतम् ॥ ८ ॥

उस जन्ममें वे पुनः अपने पूर्वजन्मके योगको पायेंगे और फिर सिद्धिको पाकर शाश्वत स्थानको प्राप्त करेंगे ॥ ८ ॥

एवं धर्मे च ते बुद्धिर्भविष्यति पुनः पुनः । योगधर्मे च नितरां प्राप्स्यसे बुद्धिमुत्तमाम् ॥ ९ ॥

इसी प्रकार तुम्हारी बुद्धि भी बारंबार धर्ममें ही लगी रहेगी और तुम्हें योगधर्मके विषयमें सब प्रकारसे उत्तम बुद्धि प्राप्त होगी ॥ ९ ॥

योगो हि दुर्लभो नित्यमल्पप्रज्ञैः कदाचन । लब्ध्वापि नाशयन्त्येनं व्यसनैः कटुतामिताः । अधर्मेष्वेव वर्तन्ते प्रार्दयन्ते गुरुनपि ॥ १० ॥

अल्पबुद्धि मनुष्योंको योगसिद्धि मिलना सदा दुर्लभ है। उन्हें कदाचित् योगसिद्धि मिल भी जाय तो वे (मृगया आदि) व्यसनोंसे क्रूर होकर उसे नष्ट कर डालते हैं। वे अधर्मके कामोंमें ही लगे रहते हैं तथा अपने गुरुजनोंको भी कष्टमें डालते रहते हैं ॥ १० ॥

याचन्ते न त्वयाच्यानि रक्षन्ति शरणागतान् । नावजानन्ति कृपणान् माद्यन्ते न धनोष्मणा ॥ ११ ॥ युक्ताहारविहाराश्च युक्तचेष्टाः स्वकर्मसु । ध्यानाध्ययनयुक्ताश्च न नष्टानुगवेषिणः ॥ १२ ॥ नोपभोगरता नित्यं न मांसमधुभक्षणाः । न च कामपरा नित्यं न विप्रासेविनस्तथा ॥ १३ ॥ नानार्यसंकथासक्ता नालस्योपहतास्तथा । नात्यन्तमानसंसक्ता गोष्ठीषु निरतास्तथा ॥ १४ ॥ प्राप्नुवन्ति नरा योगं योगो वै दुर्लभो भुवि । प्रशान्ताश्च जितक्रोधा मानाहंकारवर्जिताः ॥ १५ ॥

जो अयाच्यसे याचना नहीं करते, शरणागतोंकी रक्षा करते हैं, कृपण (दीन) पुरुषोंका अपमान नहीं करते तथा जो धनकी गर्मीसे मदमत्त नहीं होते, जिनका आहार-विहार शास्त्रानुकूल होता है, जो अपने कर्मोंमें शास्त्रानुसार चेष्टा करते हैं, ईश्वरके ध्यान तथा स्वाध्यायमें परायण रहते हैं, नष्ट हुई वस्तुको पानेके लिये चोर आदिको नहीं ढूँढ़ते, सर्वदा भोगमें ही लीन नहीं रहते, सर्वदा मधु-मांसका भक्षण नहीं करते और सर्वदा काम-परायण भी नहीं रहते तथा जो सर्वदा ब्राह्मणोंकी सेवा करते हैं, अनार्य पुरुषोंकी बातोंमें आसक्त नहीं होते, जिनको कभी आलस्य नहीं सताता, जो अत्यन्त अभिमानमें आसक्त नहीं रहते,

५८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

सदा आत्ममीमांसा करनेमें लगे रहते हैं, ऐसे शान्त चित्तवाले, क्रोधको जीतनेवाले, मान तथा अहंकाररहित मनुष्योंको योग-सिद्धि मिलती है; क्योंकि पृथ्वीमें योगकी प्राप्ति अति दुर्लभ है॥

कल्याणभाजनं ये तु ते भवन्ति यतव्रताः।
एवंविधास्तु ते तात ब्राह्मणा ह्यभवंस्तदा ॥ १६ ॥

ऐसे व्रतोंका पालन करनेवाले मनुष्य ही कल्याणके पात्र होते हैं। तात! वे (भरद्वाजपुत्र) ऐसे ही ब्राह्मण बनकर उत्पन्न हुए हैं॥ १६॥

स्मरन्ति ह्यात्मनो दोषं प्रमादकृतमेव तु।
ध्यानाध्ययनयुक्ताश्च शान्ते वर्त्मनि संस्थिताः ॥ १७ ॥

वे अपने प्रमादवश हुए दोषका स्मरण करते रहते हैं और ध्यान तथा स्वाध्यायमें लगे रहकर शान्त मार्गमें स्थित रहते थे॥

योगधर्माद्धि धर्मज्ञ न धर्मोऽस्ति विशेषवान्।
वरिष्ठः सर्वधर्माणां तमेवाचर भार्गव ॥ १८ ॥

धर्मज्ञ भार्गव! योगधर्मसे श्रेष्ठ और कोई धर्म नहीं है। वह सभी धर्मोंसे श्रेष्ठ है, अतः तुम उसीका आचरण करो॥ १८॥

कालस्य परिणामेन लघ्वाहारो जितेन्द्रियः।
तत्परः प्रयतः श्राद्धी योगधर्ममवाप्स्यसि ॥ १९ ॥

यदि तुम श्रद्धापूर्वक प्रयत्नशील एवं योगधर्ममें परायण रहकर हलका भोजन करते हुए जितेन्द्रिय रहोगे तो कालक्रमसे तुम्हें योगसिद्धि प्राप्त हो जायगी ॥ १९ ॥

इत्युक्त्वा भगवान् देवस्तत्रैवान्तरधीयत।
अष्टादशैव वर्षाणि त्वेकाहमिव मेऽभवत् ॥ २० ॥

(मार्कण्डेयजी कहते हैं कि) इतनी बातें कहकर भगवान् सनत्कुमार वहीं अन्तर्धान हो गये। ये (सनत्कुमारकी सेवामें बीते हुए) अठारह वर्ष मुझे एक दिनके समान प्रतीत हुए॥ २०॥

उपासतस्तं देवेशं वर्षाण्यष्टादशैव मे।
प्रसादात् तस्य देवस्य न ग्लानिरभवत् तदा ॥ २१ ॥

अठारह वर्षतक उन देवेशकी उपासना करते रहनेपर भी उनकी कृपाके कारण उस समय मुझे कुछ भी ग्लानि नहीं हुई ॥ २१ ॥

न क्षुत्पिपासे कालं वा जानामि स्म तदानघ।
पश्चाच्छिष्यसकाशात् तु कालः संविदितो मया ॥ २२ ॥

निष्पाप! मुझे भूख, प्यास और समय आदि कुछ न मालूम हुआ। बादमें शिष्यके द्वारा मुझे समयका पता लगा॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥


विंशोऽध्यायः

पितृकल्प—ब्रह्मदत्त और उग्रायुधके वंश तथा पूजनीया चिड़ियाद्वारा शुक्रनीतिका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

तस्मिन्नन्तर्हिते देवे वचनात् तस्य वै प्रभोः।
चक्षुर्दिव्यं सविज्ञानं प्रादुरासीत् तदा मम ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी बोले— उन सनत्कुमारदेवके अन्तर्धान होनेपर उन्हीं प्रभुके वरदानसे मुझे दिव्य विज्ञानमय नेत्र प्राप्त हो गया ॥ १ ॥

ततोऽहं तानपश्यं वै ब्राह्मणान् कौशिकात्मजान्।
आपगेय कुरुक्षेत्रे यानुवाच विभुर्मम ॥ २ ॥

गङ्गानन्दन भीष्म! तब मैंने उन कौशिकपुत्र ब्राह्मणोंको कुरुक्षेत्रमें देखा, जिनका विभु सनत्कुमारजीने मुझसे वर्णन किया था॥ २॥

ब्रह्मदत्तोऽभवद् राजा यस्तेषां सप्तमो द्विजः।
पितृवर्तीति विख्यातो नाम्ना शीलेन कर्मणा ॥ ३ ॥

उन कौशिकपुत्रोंमें जो सातवाँ पितृवर्ती नामसे विख्यात ब्राह्मण था, वह अपने शील और कर्मसे (सातवें जन्ममें) ब्रह्मदत्त नामक राजा हुआ॥ ३॥

शुकस्य कन्या कृत्वी तं जनयामास पार्थिवम्।
अणुहात् पार्थिवश्रेष्ठात् काम्पिल्ये नगरोत्तमे ॥ ४ ॥

काम्पिल्यनामक श्रेष्ठ नगरमें पार्थिवश्रेष्ठ अणुहके यहाँ शुककी कन्या कृत्वीके उदरसे राजा ब्रह्मदत्त उत्पन्न हुआ॥ ४॥

भीष्म उवाच

यथोवाच महाभागो मार्कण्डेयो महातपाः।
तस्य वंशमहं राजन् कीर्तयिष्यामि तच्छृणु ॥ ५ ॥

भीष्मजी बोले— राजन्! महाभाग्यवान् एवं महातपस्वी मार्कण्डेयजीने जिस प्रकार मुझसे कहा था, (उसी तरह) मैं उस राजाके वंशका वर्णन करूँगा, तुम सुनो—॥ ५॥

युधिष्ठिर उवाच

अणुहः कस्य वै पुत्रः कस्मिन् काले बभूव ह।
राजा धर्मभृतां श्रेष्ठो यस्य पुत्रो महायशाः ॥ ६ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— (पितामह!) जिनके पुत्र महायशस्वी (ब्रह्मदत्त) थे, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ वे राजा अणुह किनके पुत्र थे और किस समय उत्पन्न हुए थे? ॥ ६॥

[ हरिवंशपर्व ]विंशोऽध्यायः६९

ब्रह्मदत्तो नरपतिः किंवीर्यः स बभूव ह।
कथं च सप्तमस्तेषां स बभूव नराधिपः ॥ ७ ॥
राजा ब्रह्मदत्तका पराक्रम कैसा था? और वे उन (भरद्वाजपुत्रों) में सातवें कैसे थे? ॥ ७ ॥

न ह्यल्पवीर्याय शुको भगवाँल्लोकपूजितः।
कन्यां प्रदद्याद् योगात्मा कृत्वीं कीर्तिमतीं प्रभुः॥ ८ ॥
लोकोंमें पूजनीय योगकी मूर्ति सर्वशक्तिसम्पन्न भगवान् शुकदेवजीने अपनी कीर्तिमती कन्या कृत्वीको किसी साधारण शक्तिवाले पुरुषके हाथमें नहीं दिया होगा ॥ ८ ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महाद्युते ।
ब्रह्मदत्तस्य चरितं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ९ ॥
महाद्युते ! मैं ब्रह्मदत्तके इस चरित्रको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ, अतः आप उसका वर्णन कीजिये ॥ ९ ॥

यथा च वर्तमानास्ते संसारे च द्विजातयः।
मार्कण्डेयेन कथितास्तद् भवान् प्रब्रवीतु मे ॥ १० ॥
मार्कण्डेयजीने उन द्विजोके संसारमे विचरण करनेका वृत्तान्त जिस प्रकार कहा हो, उसे आप उसी भाँति मुझसे कहिये ॥ १० ॥

भीष्म उवाच
प्रतीपस्य तु राजर्षेस्तुल्यकालो नराधिपः।
पितामहस्य मे राजन् बभूवेति मया श्रुतम् ॥ ११ ॥
भीष्मजीने कहा—राजन् ! मैंने सुना है कि राजा ब्रह्मदत्त मेरे पितामह राजर्षि प्रतीपके समयमें ही हुए थे ॥

ब्रह्मदत्तो महाभागो योगी राजर्षिसत्तमः।
रुतज्ञः सर्वभूतानां सर्वभूतहिते रतः ॥ १२ ॥
ब्रह्मदत्त सब प्राणियोके हितमे लगे रहनेवाले, राजर्षियोंमें श्रेष्ठ, महाभाग्यवान् और योगी थे। वे सभी प्राणियोंकी बोली समझ लेते थे ॥ १२ ॥

सखाऽऽस गालवो यस्य योगाचार्यो महायशाः।
शिक्षामुत्पाद्य तपसा क्रमो येन प्रवर्तितः।
कण्डरीकश्च योगात्मा तस्यैव सचिवो महान् ॥ १३ ॥
जिन्होंने तपोवलसे वेदाङ्गभूत शिक्षाका आविर्भाव करके वैदिक संहिताके मन्त्रोका क्रमपाठ प्रचलित किया था, वे महायशस्वी योगाचार्य गालव ब्रह्मदत्तके सखा थे । तथा योगात्मा कण्डरीक इन्हीं राजाके प्रधान मन्त्री थे ॥ १३ ॥

जात्यन्तरेषु सर्वेषु सखायः सर्व एव ते।
सप्तजातिषु सप्तैव बभूवुरमितौजसः।
यथोवाच महाभागो मार्कण्डेयो महातपाः ॥ १४ ॥
तस्य वंशमहं राजन् कीर्तयिष्यामि तच्छृणु ।
ब्रह्मदत्तस्य पौराणं पौरवस्य महात्मनः ॥ १५ ॥
इन सात भरद्वाजपुत्रोंके सात जातियोंमें सात वार जन्म हुए थे और ये सभी अमिततेजस्वी द्विज उन सम्पूर्ण जन्मान्तरोंमे एक दूसरेके मित्र बने रहते थे। राजन् ! महाभाग्यवान् एवं महातपस्वी मार्कण्डेयजीने जिस प्रकार मुझसे कहा था, उसी प्रकार मैं पुरुवंशियों एवं पुरुवंशी महात्मा ब्रह्मदत्तके वंशका वर्णन करता हूँ, उसे सुनो ॥ १४-१५ ॥

बृहत्क्षत्रस्य दायादः सुहोत्रो नाम धार्मिकः।
सुहोत्रस्यापि दायादो हस्ती नाम बभूव ह ॥ १६ ॥
बृहत्क्षत्रके पुत्र धार्मिक सुहोत्र हुए और सुहोत्रके भी पुत्र हस्ती हुए ॥ १६ ॥

तेनेदं निर्मितं पूर्वं हस्तिनापुरमुत्तमम्।
हस्तिनश्चापि दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः ॥ १७ ॥
अजमीढो द्विमीढश्च पुरुमीढस्तथैव च।
अजमीढस्य धूमिन्यां जज्ञे बृहदिषुनृप ।
बृहद्धनुर्वृहदिषोः पुत्रस्तस्य महायशाः ॥ १८ ॥
राजन् ! उन्होंने ही इस उत्तम हस्तिनापुरको बसाया था। हस्तीके भी अजमीढ, द्विमीढ और पुरुमीढ नामवाले परम धार्मिक तीन पुत्र हुए । अजमीढके धूमिनी नामकी पत्नीके गर्भसे बृहदिषु उत्पन्न हुए और बृहदिषुके पुत्र महायशस्वी बृहद्धनु हुए ॥ १७-१८ ॥

बृहद्धर्मेति विख्यातो राजा परमधार्मिकः।
सत्यजित् तनयस्तस्य विश्वजित् तस्य चात्मजः ॥ १९ ॥
वे परम धर्मात्मा राजा बृहद्धर्मा नामसे भी प्रसिद्ध थे। उनके पुत्र सत्यजित् हुए और सत्यजित्के पुत्र विश्वजित् हुए ॥

पुत्रो विश्वजितश्चापि सेनजित् पृथिवीपतिः।
पुत्राः सेनजितश्चासंश्चत्वारो लोकविश्रुताः ॥ २० ॥
विश्वजित्के भी पुत्र राजा सेनजित् हुए और सेनजित्के चार पुत्र हुए, जो समस्त विश्वमे विख्यात थे ॥ २० ॥

रुचिरः श्वेतकेतुश्च महिम्नारस्तथैव च।
वत्सश्चावन्तको राजा यस्यैते परिवत्सकाः ॥ २१॥
राजा (सेनजित्) अवन्तीमे रहते थे। उनके रुचिर, श्वेतकेतु, महिम्नार और वत्स नामक (चार) पुत्र थे ॥२१॥

रुचिरस्य तु दायादः पृथुसेनो महायशाः।
पृथुसेनस्य पारस्तु पारान्नीपस्तु जज्ञिवान् ॥ २२ ॥
रुचिरके पुत्र महायशस्वी पृथुसेन हुए। पृथुसेनके पार और पारके पुत्र नीप हुए॥ २२ ॥

नीपस्यैकशतं तात पुत्राणाममितौजसाम् ।
महारथानां राजेन्द्र शूराणां बाहुशालिनाम्।
नीपा इति समाख्याता राजानः सर्व एव ते ॥ २३ ॥
तात ! नीपके परम पराक्रमी, बाहुशाली एवं महारथी सौ वीर पुत्र उत्पन्न हुए। राजेन्द्र ! वे सब नीपवंशी राजा कहलाते थे ॥ २३ ॥

७८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तेषां वंशकरो राजा नीपानां कीर्तिवर्धनः।
काम्पिल्ये समरो नाम सस्नेहसमरोऽभवत् ॥ २४॥
काम्पिल्य नगरमें उन नीपोंके वंशप्रवर्तक एवं कीर्तिवर्धक राजा समर हुए। उनको संग्राम बहुत प्रिय था ॥ २४ ॥
समरस्य परः पारः सदश्व इति ते त्रयः।
पुत्राः परमधर्मज्ञाः परपुत्रः पृथुर्बभौ ॥ २५॥
समरके पर, पार और सदश्व—ये तीन परम धर्मज्ञ पुत्र हुए। परके पुत्र पृथु हुए ॥ २५ ॥
पृथोरस्तु सुकृतो नाम सुकृतेनेह कर्मणा।
जज्ञे सर्वगुणोपेतो विभ्राजस्तस्य चात्मजः ॥ २६॥
संसारमें पुण्यकर्म (सुकृत) करनेके कारण पृथुके सर्वगुणसम्पन्न सुकृत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और सुकृतके पुत्र विभ्राज हुए ॥ २६ ॥
विभ्राजस्य तु पुत्रोऽभूदणुहो नाम पार्थिवः।
बभौ शुकस्य जामाता कृत्वीभर्ता महायशाः ॥ २७॥
विभ्राजके पुत्र अणूह हुए। वे महायशस्वी राजा शुकके जामाता और कृत्वीके भर्ताके रूपमें वे सुशोभित हुए ॥
पुत्रोऽणूहस्य राजर्षिर्ब्रह्मदत्तोऽभवत् प्रभुः।
योगात्मा तस्य तनयो विष्वक्सेनः परंतपः ॥ २८॥
विभ्राजः पुनरायातः सुकृतेनेह कर्मणा।
अणूहके पुत्र राजर्षि ब्रह्मदत्त हुए। उनके पुत्र योगात्मा विष्वक्सेन हुए, जो बड़े प्रभावशाली और शत्रुओंको संतप्त करनेवाले थे। विभ्राज अपने कर्मके कारण ब्रह्मदत्तके पुत्र (विष्वक्सेन) बनकर फिर उत्पन्न हुए थे ॥ २८१/२॥
ब्रह्मदत्तस्य पुत्रोऽन्यः सर्वसेन इति श्रुतः ॥ २९॥
चक्षुषी तस्य निर्भिन्ने पक्षिण्या पूजनीयया।
सुचिरोषिता या राजन् ब्रह्मदत्तस्य वेश्मनि ॥ ३०॥
ब्रह्मदत्तके दूसरे पुत्र सर्वसेन नामसे प्रसिद्ध थे। राजन्! उनके दोनों नेत्रोंको बहुत समयसे ब्रह्मदत्तके महलमें रहनेवाली पूजनीया नामकी पक्षिणी (चिड़िया) ने फोड़ दिया था॥ २९-३० ॥
अथास्य पुत्रस्त्वपरो ब्रह्मदत्तस्य जज्ञिवान्।
विष्वक्सेन इति ख्यातो महाबलपराक्रमः ॥ ३१॥
तदनन्तर ब्रह्मदत्तके दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ। यह महाबली एवं पराक्रमी (विभ्राजावतार) विष्वक्सेनके नामसे प्रसिद्ध था ॥ ३१ ॥
विष्वक्सेनस्य पुत्रोऽभूद् दण्डसेनो महीपतिः।
भल्लाटोऽस्य कुमारोऽभूद् राधेयेन हतः पुरा ॥ ३२॥
विष्वक्सेनके पुत्र राजा दण्डसेन हुए। इनका पुत्र भल्लाट हुआ, जिसे राधापुत्र कर्णने मार डाला था ॥ ३२ ॥
दण्डसेनात्मजः शूरो महात्मा कुलवर्धनः।
भल्लाटपुत्रो दुर्बुद्धिरभवद्युधिष्ठिर ॥ ३३॥
युधिष्ठिर ! दण्डसेनका पुत्र भल्लाट शूरवीर, महात्मा और कुलको बढ़ानेवाला था; परंतु भल्लाटका पुत्र बड़ा दुर्बुद्धि निकला ॥ ३३ ॥
स तेषामभवद् राजा नीपानामन्तकृन्नृप।
तेन उग्रायुधस्यार्थे सर्वे नीपा विनाशिताः ॥ ३४॥
राजन् ! वह उन नीपोंका अन्त करनेवाला राजा हुआ। उसने उग्रायुधकेलिये समस्त नीपोंका विनाश करवा दिया था ॥
उग्रायुधो मदोत्सिक्तो मया विनिहतो युधि।
दर्पान्वितो दर्परुचिः सततं चानये रतः ॥ ३५॥
निरन्तर अनीतिमें लगे रहनेवाले और दर्पमें रुचि रखनेवाले उस अभिमानी मदोन्मत्त उग्रायुधको मैंने ही युद्धमें मार डाला था ॥

युधिष्ठिर उवाच
उग्रायुधः कस्य सुतः कस्मिन् वंशेऽथ जज्ञिवान्।
किमर्थं चैव भवता निहतस्तद् ब्रवीहि मे ॥ ३६॥
युधिष्ठिरने पूछा—(दादाजी!) उग्रायुध किसका पुत्र था, किस वंशमें उत्पन्न हुआ था और आपने उसे क्यों मार डाला ? यह मुझे बताइये ॥ ३६ ॥

भीष्म उवाच
अजमीढस्य दायादो विद्वान् राजा यवीनरः।
धृतिमांस्तस्य पुत्रस्तु तस्य सत्यधृतिः सुतः ॥ ३७॥
भीष्मजीने कहा—अजमीढके पुत्र विद्वान् राजा यवीनर थे। उनके पुत्र धृतिमान् हुए और धृतिमान्‌के पुत्र सत्यधृति थे ॥ ३७ ॥
जज्ञे सत्यधृतेः पुत्रो दृढनेमिः प्रतापवान्।
दृढनेमिसुतश्चापि सुधर्मा नाम पार्थिवः ॥ ३८॥
सत्यधृतिके प्रतापी पुत्र दृढनेमि हुए। दृढनेमिके पुत्र राजा सुधर्मा थे ॥ ३८ ॥
आसीत् सुधर्मणः पुत्रः सार्वभौमः प्रजेश्वरः।
सार्वभौम इति ख्यातः पृथिव्यामेकराड् विभुः ॥ ३९॥
सुधर्माके पुत्र प्रजापालक सार्वभौम हुए, जो समस्त पृथ्वीके एकच्छत्र सम्राट् थे। इसीलिये सार्वभौम नामसे प्रसिद्ध हुए थे ॥ ३९ ॥
तस्यान्ववाये महति महान् पौरवनन्दनः।
महत्तश्चापि पुत्रस्तु राजा रुक्मरथः स्मृतः ॥ ४०॥
उनके महनीय वंशमें पौरवोंको प्रसन्न करनेवाले महान् नामक राजा हुए। महान्‌के पुत्र राजा रुक्मरथ हुए ॥ ४० ॥
पुत्रो रुक्मरथस्यापि सुपार्श्वो नाम पार्थिवः।
सुपार्श्वतनयश्चापि सुमतिर्नाम धार्मिकः ॥ ४१॥
रुक्मरथके पुत्र राजा सुपार्श्व हुए। सुपार्श्वके पुत्र सुमति हुए, जो बड़े धार्मिक थे ॥ ४१ ॥

हरिवंशपर्व ] विशोऽध्यायः ७१


सुमतिरपि धर्मात्मा संनतिर्नाम वीर्यवान् ।
तस्य वै संनतेः पुत्रः कृतो नाम महाबलः ॥ ४२ ॥
सुमतिके पुत्र संनति हुए, जो वीर्यवान् और धर्मात्मा थे। उन संनतिके पुत्र महाबली कृत हुए ॥ ४२ ॥
शिष्यो हिरण्यनाभस्य कौशलस्य महात्मनः ।
चतुर्विंशतिधा तेन संप्राच्याः सामसंहिताः ॥ ४३ ॥
स्मृतास्ते प्राच्यसामानः कार्त्तयो नाम सामगाः ।
वे कोशलदेशीय महात्मा हिरण्यनाभके शिष्य थे। उन्होंने प्राचीन साम-संहिताके चौबीस विभाग किये थे, जो प्राच्यसाम कहलाते हैं और उन सामोंका गान करनेवाले कीर्ति-सामग कहे जाते हैं ॥ ४३३ ॥
कार्तिरुग्रायुधः सोऽथ वीरः पौरवनन्दनः ॥ ४४ ॥
बभूव येन विक्रम्य पृषतस्य पितामहः ।
नीपो नाम महातेजाः पञ्चालाधिपतिर्हतः ॥ ४५ ॥
इन्हीं कृतके पुत्र पौरवनन्दन वीर उग्रायुध थे, जिन्होंने अपने पराक्रमसे पाञ्चालोंके स्वामी पृषतके पितामह महातेजस्वी नीपको मार डाला था ॥ ४४-४५ ॥
उग्रायुधस्य दायादः क्षेम्यो नाम महायशाः ।
क्षेम्यात् सुवीरो नृपतिः सुवीरात् तु नृपंजयः ॥ ४६ ॥
नृपंजयाद् बहुरथ इत्येते पौरवाः स्मृताः ।
उग्रायुधके पुत्र महायशस्वी क्षेम्य हुए। क्षेम्यके पुत्र राजा सुवीर हुए और सुवीरके पुत्र नृपंजय हुए। नृपंजयके पुत्र बहुरथ हुए वे ही पौरव कहलाते हैं ॥ ४६३ ॥
स चाप्युग्रायुधस्तात दुर्बुद्धिरभवत् तदा ॥ ४७ ॥
प्रवृद्धचक्रो बलवान् नीपान्तकरणो महान् ।
स दर्पपूर्णो हत्वाऽऽजौ नीपानन्यांश्च पार्थिवान् ॥ ४८ ॥
तात ! वे उग्रायुध बड़े दुष्ट स्वभाववाले और बलवान् थे। उनका महान् चक्र चलता था। उन्होंने नीपोंका घोर संहार करा डाला। वे नीपों तथा दूसरे राजाओंका युद्धमें वध करके घमंडसे भर गये ॥ ४७-४८ ॥
पितर्युपरते मह्यं भाषयामास किल्बिषम् ।
माममात्यैः परिवृतं शयानं धरणीतले ॥ ४९ ॥
जिस समय मेरे पिता मर गये थे और मैं मन्त्रियोंसे घिरा हुआ पृथ्वीपर शयन करता था, उसी समय उन्होंने मुझसे बड़ी कुत्सित (पापपूर्ण) बात कहलायी ॥ ४९ ॥
उग्रायुधस्य राजेन्द्र दूतोऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् ।
अद्य त्वं जननीं भीष्म गन्धकालीं यशस्विनीम् ।
स्त्रीरत्नं मम भार्यार्थे प्रयच्छ कुरुपुङ्गव ॥ ५० ॥
राजेन्द्र ! उग्रायुधका दूत मेरे पास आकर कहने लगा—'कुरुपुङ्गव भीष्म ! आज तुम स्त्रियोंमें रत्नरूप अपनी माता यशस्विनी गन्धकालीको मेरी भार्या बननेके लिये दे दो ॥ ५० ॥
एवं राज्यं च ते स्फीतं धनानि च न संशयः ।
प्रदास्यामि यथाकाममहं, वै रत्नभाग् भुवि ॥ ५१ ॥
'यदि तुम ऐसा करोगे तो निस्संदेह मैं तुम्हें इच्छानुसार विशाल राज्य तथा धन दूँगा और मैं (गन्धकालीको पाकर) इस भूतलपर रत्नका भागी हो जाऊँगा ॥ ५१ ॥
मम प्रज्वलितं चक्रं निशम्येदं सुदुर्जयम् ।
शत्रवो विद्रवन्त्याजौ दर्शनादेव भारत ॥ ५२ ॥
'भारत ! मेरे इस परम दुर्जय एवं जाज्वल्यमान चक्रका दर्शन करके शत्रुगण युद्धमें मुझे देखते ही भाग खड़े होते हैं ॥ ५२ ॥
राष्ट्रस्येच्छसि चेत् स्वस्ति प्राणानां वा कुलस्य वा ।
शासने मम तिष्ठस्व न हि ते शान्तिरन्यथा ॥ ५३ ॥
'तुम यदि राज्य, कुल एवं अपने प्राणोंका कल्याण चाहते हो तो मेरी आज्ञा मान लो, नहीं तो चैनसे न रह सकोगे' ॥ ५३ ॥
अधः प्रस्तारशयने शयानस्तेन चोदितः ।
दूतान्तर्हितमेतद् वै वाक्यमग्निशिखोपमम् ॥ ५४ ॥
जब मैं भूमिपर कुशाओंकी शय्यापर सो रहा था, उस समय उसने दूतके द्वारा यह अग्निकी ज्वालके समान (जलानेवाली) बात कहलायी थी ॥ ५४ ॥
ततोऽहं तस्य दुर्बुद्धेर्विज्ञाय मतमच्युत ।
आज्ञापयं वै संग्रामे सेनाध्यक्षांश्च सर्वशः ॥ ५५ ॥
अच्युत ! तब मैंने उस दुर्बुद्धिके अभिप्रायको जानकर अपने सेनापतियोंको सब प्रकारसे संग्राम करनेकी आज्ञा दे दी ॥ ५५ ॥
विचित्रवीर्यं बालं च मदुपाश्रयमेव च ।
दृष्ट्वा क्रोधपरीतात्मा युद्धायैव मनो दधे ॥ ५६ ॥
विचित्रवीर्य मेरे आश्रयमें रहता है तथा यह बालक होनेके कारण युद्ध भी नहीं कर सकता, इस बातको देखकर क्रोधमें भरकर मैंने स्वयं ही युद्ध करनेका विचार किया ॥ ५६ ॥
निगृहीतस्तदाहं तैः सचिवैर्मन्त्रकोविदैः ।
ऋत्विग्भिर्वेदकल्पैश्च सुहृद्भिश्छार्थदर्शिभिः ॥ ५७ ॥
स्निग्धैश्च शास्त्रविद्भिश्च संयुगस्य निवर्तने ।
कारणं भावितश्चास्मि युक्तरूपं तदानघ ॥ ५८ ॥
निष्पाप ! उस समय मन्त्रज्ञ मन्त्रियों, वेदज्ञ ऋत्विजों, तत्त्वदर्शी मित्रों और शास्त्रवेत्ता स्नेही पुरुषोंने मुझे युद्ध करनेसे रोक दिया और इसका उचित कारण भी बताया ॥

मन्त्रिण ऊचुः

प्रवृत्तचक्रः पापोऽसौ त्वं चाशौचगतः प्रभो ।
न चैष प्रथमः कल्पो युद्धं नाम कदाचन ॥ ५९ ॥
मन्त्रियोंने कहा—प्रभो ! उस पापीका चक्र चल रहा है और आपको अशौच लगा हुआ है, अतः यह युद्ध प्रथम कल्प कभी नहीं माना जा सकता ॥ ५९ ॥

७२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


ते वयं सामपूर्वं वै दानं भेदं तथैव च ।
प्रयोक्ष्यामस्ततः शुद्धो दैवतान्यभिवाद्य च ॥ ६० ॥
कृतस्वस्त्ययनो विप्रैर्वह्नीन् सम्पूज्य च द्विजान् ।
ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञातः प्रयास्यसि जयाय वै ॥ ६१ ॥

हम पहले उसपर साम, दान और भेद नीतियोंका प्रयोग करेंगे। तबतक आप शुद्ध भी हो जायेंगे, फिर आप देवताओंको प्रणाम करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर अग्नि और ब्राह्मणोंकी पूजा करनेके बाद ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर विजयके लिये प्रस्थान कीजियेगा ॥ ६०-६१ ॥

अस्त्राणि न प्रयोज्यानि न प्रवेष्टव्यञ्च संगरः ।
अशौचे वर्तमाने तु वृद्धानामिति शासनम् ॥ ६२ ॥

वृद्धोंका कथन है कि जब अशौच चल रहा हो, उस समय अस्त्रोंका प्रयोग और युद्धमे प्रवेश नहीं करना चाहिये ॥ ६२ ॥

सामदानादिभिः पूर्वमपि भेदेन वा ततः ।
तं हनिष्यसि विक्रम्य शम्बरं मघवानिव ॥ ६३ ॥

अतः पहले साम, दान, भेदसे इसको वशमें करनेका यत्न किया जाय (तब भी न माने तो) फिर जैसे इन्द्रने शम्बरासुरको मार डाला था, उसी प्रकार पराक्रम करके आप इसको मार डालियेगा ॥ ६३ ॥

प्राज्ञानां वचनं काले वृद्धानां च विशेषतः ।
श्रोतव्यमिति तच्छ्रुत्वा निवृत्तोऽस्मि नराधिप ॥ ६४ ॥

समय पड़नेपर बुद्धिमानों और वृद्धोंकी बात विशेषरूपसे सुननी चाहिये। राजन्! यह सुनकर मैं युद्धसे रुक गया ॥ ६४ ॥

ततस्तैः संक्रमः सर्वैः प्रयुक्तः शास्त्रकोविदैः ।
तस्मिन् काले कुरुश्रेष्ठ कर्म चारब्धमुत्तमम् ॥ ६५ ॥

कुरुश्रेष्ठ ! तब उन शास्त्रज्ञानमें चतुर सम्पूर्ण मन्त्रियोंने साम, दान, भेद आदि दूसरे उपायोंद्वारा शान्ति-स्थापनका प्रयोग किया और इसके लिये उत्तम कार्य आरम्भ कर दिया ॥ ६५ ॥

स सामादिभिरेवाद्याद्युपायैः प्राज्ञचिन्तितैः ।
अनुनीयमानो दुर्बुद्धिरनुनेतुं न शक्यते ॥ ६६ ॥

परंतु वे बुद्धिमानोंके विचारे हुए साम, दान आदि उपायोका प्रयोग करके भी उस दुर्बुद्धिको न समझा सके ॥ ६६ ॥

प्रवृत्तं तस्य तच्चक्रमधर्मनिरतस्य वै ।
परदाराभिलाषेण सद्यस्तात निवर्तितम् ॥ ६७ ॥

तात ! इतने समयमें अधर्ममें मग्न रहनेवाले उग्रायुधका प्रतापचक्र भी पर-स्त्रीकी कामना करनेसे तत्क्षण ही रुक गया ॥ ६७ ॥

न त्वहं तस्य जाने तन्निवृत्तं चक्रमुत्तमम् ।
हतं स्वकर्मणा तं तु पूर्वं सद्भिश्श्च निन्दितम् ॥ ६८ ॥

उसका उत्तम चक्र निवृत्त हो गया है और पहले सत्पुरुषोंसे निन्दित होकर वह अपने कर्मोंद्वारा ही मर गया है; इस बातको मैं नहीं जानता था ॥ ६८ ॥

कृतशौचः शरी चापी रथी निष्क्रम्य वै पुरात् ।
कृतस्वस्त्ययनो विप्रैः प्रायोधयमहं रिपुम् ॥ ६९ ॥

जब मैं अशौच-निवृत्तिके पश्चात् शुद्ध हुआ, तब ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर धनुष-बाण ले रथमें बैठ नगरसे बाहर निकला और शत्रुसे युद्ध करने लगा ॥ ६९ ॥

ततः संसर्गमागम्य बलेनास्त्रबलेन च ।
त्र्यहमुन्मत्तवद् युद्धं देवासुरमिवाभवत् ॥ ७० ॥

तदनन्तर उसके निकट पहुँचकर शरीर-बल और अस्त्र-बलके द्वारा देवासुर-संग्रामकी तरह तीन दिनोंतक हम दोनोंका उन्मत्त-सा युद्ध चलता रहा ॥ ७० ॥

स मयास्त्रप्रतापेन निर्दग्धो रणमूर्धनि ।
पपाताभिमुखः शूरस्त्यक्त्वा प्राणानरिंदम ॥ ७१ ॥

शत्रुदमन ! तत्पश्चात् मेरे अस्त्रके प्रतापसे भस्म होकर वह वीर रणके मुहानेपर अपने प्राणोंको त्यागकर गिर पड़ा ॥ ७१ ॥

एतस्मिन्नन्तरे तात काम्पिल्ये पृषतोऽभ्ययात् ।
हते नीपेश्वरे चैव हते चोग्रायुधे नृपे ॥ ७२ ॥
आहिच्छत्त्रं स्वकं राज्यं पित्र्यं प्राप महाद्युतिः ।
द्रुपदस्य पिता राजन् ममैवानुमते तदा ॥ ७३ ॥

तात ! इसी बीचमें (उग्रायुधद्वारा) नीपेश्वर तथा (मेरे द्वारा) राजा उग्रायुधके मारे जानेपर पृषतने भी काम्पिल्य नगरपर आक्रमण कर दिया। राजन् ! तब मेरी अनुमतिसे महाकान्तिमान् द्रुपदके पिताने अपने पैतृक राज्य अहिच्छत्रपर (पुनः) अधिकार कर लिया ॥ ७२-७३ ॥

ततोऽर्जुनेन तरसा निर्जित्य द्रुपदं रणे ।
आहिच्छत्त्रं सकाम्पिल्यं द्रोणायाथापवर्जितम् ॥ ७४ ॥

तदनन्तर अर्जुनने युद्धमें द्रुपदको बलपूर्वक जीतकर काम्पिल्य और अहिच्छत्रको द्रोणाचार्यके (चरणोंमें) समर्पित कर दिया था ॥ ७४ ॥

प्रतिगृह्य ततो द्रोण उभयं जयतां वरः ।
काम्पिल्यं द्रुपदायैव प्रायच्छद् विदितं तव ॥ ७५ ॥

तब विजय पानेवालोंमें श्रेष्ठ द्रोणने दोनों देशोंको लेकर काम्पिल्यनगर तो द्रुपदको ही वापस कर दिया था, जिसे तुम जानते ही हो ॥ ७५ ॥

एष ते द्रुपदस्यादौ ब्रह्मदत्तस्य चैव ह ।
वंशः कात्स्न्र्येन वै प्रोक्तो नीपस्योग्रायुधस्य च ॥ ७६ ॥

इस प्रकार मैंने तुमसे द्रुपद, ब्रह्मदत्त, नीप और उग्रायुधके वंशका पूर्णरूपसे वर्णन कर दिया ॥ ७६ ॥

हरिवंशपर्व ] [ विंशोऽध्यायः ] ७३


युधिष्ठिर उवाच

किमर्थं ब्रह्मदत्तस्य पूजनीया शकुन्तिका।
अन्धं चकार गाङ्गेय ज्येष्ठं पुत्रं पुरा विभो ॥ ७७ ॥

युधिष्ठिरने पूछा—समर्थ गङ्गानन्दन ! पहले पूजनीया चिड़ियाने ब्रह्मदत्तके ज्येष्ठ पुत्रको अंधा क्यों कर दिया था ? ॥ ७७ ॥

चिरोषिता गृहे चापि किमर्थं चैव यस्य सा ।
चकार विप्रियमिदं तस्य राज्ञो महात्मनः ॥ ७८ ॥

वह जिसके महलमें बहुत समयसे रहती थी, उसी महात्मा राजाका उसने ऐसा अनिष्ट क्यों किया? ॥ ७८ ॥

पूजनीया चकारासौ किं सख्यं तेन चैव ह।
एतन्मे संशयं छिन्धि सर्वमुक्तवा यथातथम् ॥ ७९ ॥

उस पूजनीयाने उनके साथ मित्रता क्यों की थी ? आप इन सब बातोंको यथार्थ रीतिसे बताकर मेरे सारे संदेहोंको दूर कर दें ॥ ७९ ॥

भीष्म उवाच

शृणु सर्वं महाराज यथावृत्तमभूत् पुरा।
ब्रह्मदत्तस्य भवने तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ८० ॥

भीष्मजीने कहा—महाराज युधिष्ठिर ! प्राचीनकालमें ब्रह्मदत्तके महलमें जो घटना घटी थी, उसे तुम पूर्णरूपसे सुनो ॥ ८० ॥

काविच्छकुन्तिका राजन् ब्रह्मदत्तस्य वै सखी ।
शितिपक्षा शोणशिराः शितिपृष्ठा शितोदरी ॥ ८१ ॥

राजन् ! एक चिड़िया थी, जिसका राजा ब्रह्मदत्तसे स्नेह हो जानेके कारण वह उनकी सहचरी बन गयी थी। उसके दोनों पंख, पीठ और उदरका भाग तो काला था; परंतु मस्तकका रंग लाल था ॥ ८१ ॥

सखी सा ब्रह्मदत्तस्य सुदृढं बद्धसौहृदा ।
तस्याः कुलायमभवद् गेहे तस्य नरोत्तम ॥ ८२ ॥

नरोत्तम ! राजा ब्रह्मदत्तकी वह सहचरी उनके सुदृढ़ स्नेहपाशमें बँध गयी थी; अतः उन्हींके महलमें उसका घोंसला था ॥ ८२ ॥

सा सदाहनि निर्गत्य तस्य राज्ञो गृहोत्तमात् ।
चचाराम्भोधितीरेषु पल्वलेषु सरस्सु च ॥ ८३ ॥

वह दिनमें निरन्तर उस राजाके उत्तम महलसे निकलकर समुद्रके किनारे तथा तालाबों और तलैयाँपर विचरती थी ॥ ८३ ॥

नदीपर्वतकुञ्जेषु वनेषूपवनेषु च।
प्रफुल्लेषु तडागेषु कह्लारेषु सुगन्धिषु ॥ ८४ ॥
कुमुदोत्पलकिञ्जल्कसुरभीकृतवायुषु ।
हंससारसघुष्टेषु कारण्डवरुतेषु च ॥ ८५ ॥
चरित्वा तेषु सा राजन् निशि काम्पिल्यमागमत् ।

राजन् ! वह नदी, पर्वत, कुञ्ज, वन और उपवनोंमें तथा जिनमें सुगन्धित कमल खिले हुए थे, जहाँकी वायु कुमुद, उत्पल और किञ्जल्ककी सुगन्धसे वासित थी एवं जो हंस, सारस और कारण्डवके कलरवोंसे गुंजायमान थे—ऐसे तड़ागोंपर घूम-घामकर वह रात्रिके समय काम्पिल्यनगरमें लौट आती थी ॥ ८४-८५ १/२ ॥

नृपतेर्भवनं प्राप्य ब्रह्मदत्तस्य धीमतः ॥ ८६ ॥
राज्ञा तेन सदा राजन् कथायोगं चकार सा ।

राजन् ! वह बुद्धिमान् राजा ब्रह्मदत्तके महलमें पहुँचकर उस राजासे प्रतिदिन बातें किया करती थी ॥ ८६ १/२ ॥

आश्चर्याणि च दृष्टानि यानि वृत्तानि कानिचित् ॥ ८७ ॥
चरित्वा विविधान् देशान् कथयामास सा निशि ।

वह बहुत-से देशोंमें घूमकर जो कुछ आश्चर्यजनक घटनाएँ देखती थी, रात्रिके समय उन्हें (राजासे) कहा करती थी ॥ ८७ १/२ ॥

कदाचित् तस्य नृपतेर्ब्रह्मदत्तस्य कौरव ॥ ८८ ॥
पुत्रोऽभूद् राजशार्दूल सर्वसेनेति विश्रुतः।
पूजनीयाथ सा तस्मिन् प्रसूताण्डमथापि च ॥ ८९ ॥

कुरुवंशी राजशार्दूल ! एक समय राजा ब्रह्मदत्तके पुत्र हुआ, जिसका नाम सर्वसेन रखा गया । उसी समय उस पूजनीयाने भी वहाँ एक अंडा दिया ॥ ८८-८९ ॥

तस्मिन् नीडे पुरा ह्येकं तत्किल प्रास्फुटत् तदा ।
स्फुटितो मांसपिण्डस्तु बाहुपादास्र्यसंयुतः ॥ ९० ॥
बभूवक्त्रश्चक्षुर्हीनो बभूव पृथिवीपते ।
चक्षुष्मानप्यभूत् पश्चाद्दीप्तपक्षोत्थितश्च ह ॥ ९१ ॥

पृथिवीपते ! एक दिन उस घोंसलेमें उसका वह एक अण्डा फूटा और उसमेंसे एक मांस-पिण्ड निकला, जो हाथ-पैर और मुखसे युक्त था । उसका मुँह भूरे रंगका था; परंतु नेत्र नहीं प्रकट हुए थे। कुछ समय बाद उसके नेत्र खुल गये और उसमें छोटे-छोटे पंख भी निकल आये ॥ ९०-९१ ॥

अथ सा पूजनीया वै राजपुत्रस्वपुत्रयोः ।
तुल्यस्नेहात् प्रीतिमती दिवसे दिवसेऽभवत् ॥ ९२ ॥

तदनन्तर वह पूजनीया अपने बच्चे और राजकुमारपर समान स्नेह होनेके कारण प्रतिदिन एक-सी प्रीति रखने लगी ॥ ९२ ॥

आजहार सदा सायं चञ्च्वामृतफलद्वयम् ।
अमृतास्वादसदृशं सर्वसेनतनूजयोः ॥ ९३ ॥

वह सदा सायंकालमें अमृतके समान स्वादिष्ट रससे भरे हुए दो फल सर्वसेन और अपने बच्चेके लिये अपनी चोंचमें लाया करती थी ॥ ९३ ॥

७४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

स बालो ब्रह्मदत्तस्य पूजनीयासुतश्च ह।
ते फले भक्षयित्वा च पृथकौ प्रीतमानसौ ॥ ९४ ॥
अभूतां नित्यमेवेह खादन्तौ तौ च ते फले।
ब्रह्मदत्तका बालक और पूजनीयाका बच्चा—ये दोनों उन फलोंको खाकर बड़े प्रसन्न होते थे। इस प्रकार वे दोनों नित्य ऐसे फलोंको खाया करते थे ॥ ९४॥

तस्यां गतायामथ च पूजन्यां वै सदाहनि ॥ ९५ ॥
शिशुना चटकेनाथ धात्री तं तु शिशुं नृप।
तेन प्रक्रीडयामास ब्रह्मदत्तात्मजं सदा ॥ ९६ ॥
नीडात् तमाकृष्य तदा पूजनीयाकृतात् ततः।
राजन् ! प्रतिदिन उस पूजनीके चले जानेपर राजकुमारकी धाय उस चिड़ियाके बनाये हुए घोंसलेसे उसके बच्चेको खींचकर उसके द्वारा ब्रह्मदत्तके शिशु पुत्रको खेलाया करती थी ॥ ९५-९६॥

क्रीडता राजपुत्रेण कदाचिच्चटकः स तु ॥ ९७ ॥
निगृहीतः कन्धरायां शिशुना दृढमुष्टिना।
दुर्भेद्यमुष्टिना राजन्रसूनू सद्यस्त्वजीजहत् ॥ ९८ ॥
एक समय उस शिशु राजकुमारने खेलते-खेलते अपनी सुदृढ़ मुट्ठीमें उस बच्चेका गला पकड़ लिया। राजन् ! राजकुमारकी मुट्ठी बड़ी कठिनतासे खुल सकती थी। (अतएव दबाव पड़नेके कारण) उस चिड़ियाके बच्चेने तत्काल ही अपने प्राण त्याग दिये ॥ ९७-९८ ॥

तं तु पञ्चत्वमापन्नं व्यात्तास्यं बालघातितम्।
कथंचिन्मोचितं दृष्ट्वा नृपतिर्दुःखितोऽभवत् ॥ ९९ ॥
राजा ब्रह्मदत्तने उसको किसी प्रकार अपने पुत्रके हाथसे छुड़ाया; परंतु उसे मरा, मुख फैलाकर पड़ा हुआ तथा अपने बालकके द्वारा मारा गया देखकर वे दुखी हो गये ॥ ९९ ॥

धात्रीं तस्य जगर्हे तां तदाश्रुपरमो नृपः।
तस्थौ शोकान्वितो राजञ्छोचंस्तं चटकं तदा ॥१००॥
राजन् ! तब ब्रह्मदत्तने शोकाकुल हो नेत्रोंमें आँसू भरकर उस धायकी निन्दा की। फिर वे खड़े-खड़े उस बच्चेके लिये शोक करने लगे ॥ १०० ॥

पूजनीयापि तत्काले गृहीत्वा तु फलद्वयम्।
ब्रह्मदत्तस्य भवनमाजगाम वनेचरी ॥१०१॥
उसी समय वनमें विचरण करनेवाली पूजनीया भी दो फलोंको लेकर ब्रह्मदत्तके भवनमें आ पहुँची ॥ १०१ ॥

अथापश्यत् तमागम्य गृहे तस्मिन् नराधिप।
पञ्चभूतपरित्यक्तं शावं तं स्वतनुद्भवम् ॥१०२॥
राजन् ! उस भवनमें आकर उसने अपने शरीरसे उत्पन्न हुए बच्चेको पञ्चभूतोंसे रहित मुर्देके रूपमें देखा ॥ १०२ ॥

सुमोह दृष्ट्वा तं पुत्रं पुनः संज्ञामथालभत्।
लब्धसंज्ञा च सा राजन् विललाप तपस्विनी ॥१०३॥
राजन् ! पुत्रकी ऐसी दशा देखकर वह मूर्च्छित हो गयी। कुछ देर बाद उसे फिर चेतना आयी, तब वह तपस्विनी विलाप करने लगी ॥ १०३ ॥

पूजनीयोवाच
न तु त्वमागतां पुत्र वाशन्तीं परिसर्पसि।
कुर्वंश्चाटुसहस्त्राणि अव्यक्तकलया गिरा ॥१०४॥
पूजनीया बोली-पुत्र ! मैं आकर कूँ-कूँ शब्द कर रही हूँ, तब भी तू अस्फुट (तोतली) होनेसे मनोहर लगनेवाली वाणीमें हजारों बातें करता हुआ मेरे सामने क्यों नहीं आता ? ॥ १०४ ॥

व्यादितास्यः क्षुधार्तश्च पीतेनास्येन पुत्रक।
शोणेन तालुना पुत्र कथमद्य न सर्पसि ॥१०५॥
पुत्र ! क्षुधासे पीड़ित होकर अपने लाल-लाल तालु तथा पीली चोंचवाले मुखको खोलकर तू मेरे पास आज क्यों नहीं आता ? ॥ १०५ ॥

पक्षाभ्यां त्वां परिष्वज्य ननु वाशामिचाप्यहम्।
चीचीकूचीति वाशन्तं त्वामद्य न शृणोमि किम् ॥१०६॥
मैं तुझे अपने पंखोंसे लपेटकर रो रही हूँ, तब भी मैं तुझे चीं-चीं, कूँ-कूँ शब्द करता हुआ क्यों नहीं सुनती ? ॥

मनोरथो यस्तु मम पश्येयं पुत्रकं कदा।
व्यात्तास्यं वारि याचन्तं स्फुरत्पक्षं ममाग्रतः ॥१०७॥
स मे मनोरथो भग्नस्त्वयि पञ्चत्वमागते।
विलप्यैवं बहुविधं राजानमथ साब्रवीत् ॥१०८॥
मेरे मनमें जो यह अभिलाषा थी कि मैं अपने सामने अपने पुत्रको परोंको फटफटाकर चोंच फैलाकर जल माँगता हुआ कब देखूँगी, सो मेरा वह मनोरथ तेरे मरनेसे नष्ट हो गया—यों अनेक तरहसे विलाप करके वह राजासे बोली ॥ १०७-१०८ ॥

ननु मूर्धाभिषिक्तस्त्वं धर्मं वेत्सि सनातनम्।
अथ कस्मान्मम सुतं धात्र्या घातितवानसि ॥१०९॥
तव पुत्रेण चाकृष्य क्षत्रियाधम शंस मे।
'हे क्षत्रियाधम ! तू तो मूर्धाभिषिक्त (सम्राट्) राजा है और सनातनधर्मको जाननेवाला है, तो भी तूने मेरे बच्चेको धायसे और अपने पुत्रसे खिंचवाकर क्यों मरवा डाला ? इस बातका तू उत्तर दे ॥ १०९॥

न च नूनं श्रुता तेऽभूदियमाङ्गिरसी श्रुतिः ॥११०॥
शरणागतः क्षुधार्तश्च शत्रुभिश्वाभ्युपद्रुतः।
चिरोषितश्च स्वगृहे पातव्यः सर्वदा भवेत् ॥१११॥
'क्या तूने यह आङ्गिरसी श्रुति नहीं सुनी है कि 'शरणमें आये हुए, भूखसे व्याकुल, शत्रुओंद्वारा पीछा किये

हरिवंशपर्व ] विंशोऽध्यायः [ ७५


जाते हुए और चिरकालसे अपने घरमें रहनेवालेकी रक्षा सदा करनी चाहिये ॥ ११०-१११ ॥

अपालयन्नरो याति कुम्भीपाकमसंशयम्।
कथमस्य हविर्देवा गृह्णन्ति पितरः स्वधाम् ॥११२॥

'यदि मनुष्य इनकी रक्षा नहीं करता है तो वह निस्सन्देह कुम्भीपाक नरकमें पड़ता है। देवता ऐसे पुरुषकी हविको और पितर स्वधाको भला कैसे ग्रहण कर सकते हैं' ॥

एवमुक्त्वा महाराज दशधर्मगता सती।
शोकार्ता तस्य बालस्य चक्षुषी निर्बिभेद सा ॥११३॥
कराभ्यां राजपुत्रस्य ततस्तच्चक्षुरस्फुटत्।
कृत्वा चान्धं नृपसुतमुत्पपात ततोऽम्बरम् ॥११४॥

महाराज ! राजासे यों कहकर शोकसे आतुर होनेके कारण दशधर्म* को प्राप्त हुई उस पूजनीयाने अपने दोनों पञ्जोंसे उस राजकुमारके दोनों नेत्रोंको विदीर्ण कर दिया, जिससे उसकी आँखें फूट गयीं। इस प्रकार राजकुमारको अन्धा कर देनेके पश्चात् पूजनीया आकाशमें उड़ गयी ॥ ११३-११४ ॥

अथ राजा सुतं दृष्ट्वा पूजनीयामुवाच ह।
विशोका भव कल्याणि कृतं ते भीरु शोभनम् ॥११५॥

तब राजाने पुत्रकी ओर देखकर पूजनीयासे कहा—'कल्याणि ! अब तू शोकरहित हो जा। भीरु ! तूने बहुत अच्छा किया ॥ ११५ ॥

गतशोका निवर्तस्व अजर्यं सख्यमस्तु ते।
पुरेव वस भद्रं ते निवर्तस्व रमस्व च ॥११६॥

'अब तू शोकरहित होकर लौट आ। तेरी मैत्री सुदृढ़ बनी रहे। तेरा कल्याण हो, तू लौट आ और आनन्दपूर्वक पहलेकी भाँति यहीं रह ॥ ११६ ॥

पुत्रपीडोद्भवश्चापि न कोपः परमस्त्वयि।
ममास्ति सखि भद्रं ते कर्तव्यं च कृतं त्वया ॥११७॥

'सखि ! तेरा कल्याण हो। पुत्रको पीड़ा देनेपर भी मैं तेरे ऊपर कुपित नहीं हुआ हूँ। तूने वही किया, जो करना चाहिये था' ॥ ११७ ॥

पूजनीयोवाच

आत्मौपम्येन जानामि पुत्रस्नेहं तवाप्यहम्।
न चाहं वस्तुमिच्छामि तव पुत्रमचक्षुषम्।
कृत्वा वै राजशार्दूल त्वद् गृहे कृतकिल्बिषा ॥११८॥

नृपश्रेष्ठ ! मैं अपने ही समान तुम्हारे पुत्र-प्रेमको भी जानती हूँ, अतः तुम्हारे पुत्रको नेत्रहीन करनेके कारण अपराधिनी होकर तुम्हारे घरमें रहना नहीं चाहती ॥ ११८ ॥


* मनुष्यको व्याकुल और विवेकहीन बना देनेवाली जो क्रोध आदिकी दश दशायें हैं, उनको दशधर्म कहते हैं। देखिये पृ० ४९ की टिप्पणी।


गाथाश्चाप्युशनोगीता इमाः शृणु मयेरिताः।
कुमित्रं च कुदेशं च कुराजानं कुसौहृदम्।
कुपुत्रं च कुभार्यां च दूरतः परिवर्जयेत् ॥११९॥

आप मुझसे शुक्राचार्यकी गायी हुई इन गाथाओंको सुनें, 'खोटे मित्र, खोटे देश, खोटे राजा, खोटे सुहृद्-बन्धु, खोटे पुत्र तथा खोटी भार्याको दूरसे ही त्याग देना चाहिये' ॥ ११९॥

कुमित्रे सौहृदं नास्ति कुभार्यायां कुतो रतिः।
कुतः पिण्डः कुपुत्रे वै नास्ति सत्यं कुराजनि ॥१२०॥

खोटे मित्रमें प्रेम नहीं होता, कुभार्यासे सुख नहीं मिल सकता, कुपुत्रसे पिण्ड मिलना कठिन है और कुराजासे सत्य (न्याय) की आशा नहीं की जा सकती है ॥ १२० ॥

कुसौहृदे क विश्वासः कुदेशे न तु जीव्यते।
कुराजनि भयं नित्यं कुपुत्रे सर्वतोऽसुखम् ॥१२१॥

कुमित्रपर भला विश्वास कैसे हो सकता है और कुदेशमें जीना भी सम्भव नहीं है। खोटे राजासे सर्वदा भय बना रहता है और कुपुत्रसे तो सब प्रकारसे दुःख ही मिलता है ॥ १२१ ॥

अपकारिणि विश्रम्भं यः करोति नराधमः।
अनाथो दुर्बलो यद्वन्न चिरं स तु जीवति ॥१२२॥

जो अधम मनुष्य अपराधीपर विश्वास करता है, वह अनाथ और दुर्बल मनुष्यकी भाँति चिरकालतक जीवित नहीं रह सकता ॥ १२२ ॥

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।
विश्वासाद् भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ॥१२३॥

अविश्वासीका विश्वास न करे और विश्वासीपर भी अधिक विश्वास न करे; क्योंकि ऐसे लोगोंपर विश्वास करनेसे जो भय उत्पन्न होता है, वह जड़को भी काट डालता है ॥ १२३ ॥

राजसेविषु विश्वासं गर्भसंकरितेषु च।
यः करोति नरो मूढो न चिरं स तु जीवति ॥१२४॥

जो मनुष्य राजसेवकों तथा संकर जातियोंपर विश्वास करता है, वह मूढ चिरकालतक जीवित नहीं रह सकता ॥ १२४ ॥

अप्युन्नतिं प्राप्य नरः प्रावारः कीटको यथा।
स विनश्यत्यसंदेहमाहैवमुशना नृप ॥१२५॥

राजन् ! जैसे पंख निकलनेपर ऊपरको उड़ा हुआ चींटा मौतके मुखमें चला जाता है, उसी प्रकार ऐसे पुरुषोंपर विश्वास रखनेवाला पुरुष भी मारा जाता है, इसमें कुछ संदेह नहीं है—ऐसा शुक्राचार्यका कथन है ॥ १२५ ॥

७६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

अपि मार्दवभावेन गात्रं संलीय बुद्धिमान् ।
अरिं नाशयते नित्यं यथा वल्लीर्महाद्रुमम् ॥१२६॥
जैसे लता अपने शरीरको बचाये रखकर कोमलतासे महावृक्षका आलिङ्गन करके उसे सुखा देती है, उसी प्रकार बुद्धिमान् पुरुष भी अपने शरीरकी सदा रक्षा करते हुए नम्रता-पूर्वक शत्रु का नाश कर देते हैं ॥ १२६ ॥

मृदुराद्र्रः कृशो भूत्वा शनैः संलीयते रिपुः ।
वल्मीक इव वृक्षस्य पश्चान्मूलानि कृन्तति ॥१२७॥
जैसे दीमक कृश होनेपर भी आर्द्र (स्निग्ध) हो वृक्षमें लगकर शनैः-शनैः उसकी जड़को काट डालता है, इसी प्रकार शत्रु दुर्बल होनेपर भी स्निग्ध बनकर (स्नेह दिखाकर) शरीरमें घुस आता (और अवसर पानेपर) जड़से उखाड़ फेंकता है ॥ १२७ ॥

अद्रोहसमयं कृत्वा मुनीनामग्रतो हरिः।
जघान नमुचिं पश्चादपां फेनेन पार्थिव ॥१२८॥
राजन् ! इन्द्रने मुनियोंके सामने द्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा करके भी पीछे जलके फेनसे नमुचिको मार डाला था ॥ १२८ ॥

सुप्तं मत्तं प्रमत्तं वा घातयन्ति रिपुं नराः ।
विषेण वह्निना वापि शस्त्रेणाप्यथ मायया ॥१२९॥
मनुष्य सोये हुए, मतवाले तथा उन्मत्त शत्रुको विष, अग्नि, शस्त्र अथवा छल-कपटसे भी मार डालते हैं ॥ १२९ ॥

न च शेषं प्रकुर्वन्ति पुनर्बैरभयान्नराः ।
घातयन्ति समूलं हि श्रुत्वेमामुपमां नृप ॥१३०॥
राजन् ! मनुष्य बार-बारके वैर होनेके भयसे शत्रुको शेष नहीं रखते, वे तो इस निम्नाङ्कित उपमाको सुनकर शत्रुको जड़से ही नष्ट कर डालते हैं ॥ १३० ॥

शत्रुशेषमृणाच्छेषं शेषमग्नेश्च भूमिप ।
पुनर्वर्धेत सम्भूय तस्माच्छेषं न शेषयेत् ॥१३१॥
भूपाल ! यदि शत्रुको, ऋणको अथवा अग्निको (थोड़ा-सा भी) बाकी रहने दिया जाय तो ये फिर इकट्ठा होकर बढ़ने लगते हैं, अतः इनके शेषको भी शेष न रहने दे ॥ १३१ ॥

हसते जल्पते वैरी एकपात्रे भुनक्ति च ।
एकासनं चारोहति स्मरते तच्च किल्बिषम् ॥१३२॥
शत्रु यद्यपि एक साथ हँसता है, बोलता है, एक ही पात्रमें साथ-साथ भोजन भी करता है और एक ही आसनपर साथ-साथ बैठता है, तथापि पूर्व वैरका स्मरण तो करता ही रहता है ॥ १३२ ॥

कृत्वा सम्बन्धकं चापि विश्वसेच्छत्रुणा न हि ।
पुलोमानं जघानाजौ जामाता सन्शतक्रतुः ॥१३३॥
शत्रुसे सम्बन्ध करके भी उसके ऊपर विश्वास न करे; क्योंकि इन्द्रने जामाता (दामाद) होकर भी पुलोमाको युद्धमें मार डाला था ॥ १३३ ॥

निधाय मनसा वैरं प्रियं वक्तीह यो नरः।
उपसर्पेन्न तं प्राज्ञः कुरङ्ग इव लुब्धकम् ॥१३४॥
जो मनुष्य मनमें वैरको छिपाये हुए प्रिय बातें करता है, बुद्धिमान् पुरुष (उसपर विश्वास करके) उसके पास न जाय; ठीक उसी तरह, जैसे मृग बहेलियेके निकट नहीं जाता ॥ १३४ ॥

न चासन्ने निवस्तव्यं सवैरे वर्धिते रिपौ।
पातयेत् तं समूलं हि नदीरय इव द्रुमम् ॥१३५॥
यदि वैर रखनेवाला शत्रु बढ़ रहा हो तो उसके पास निवास नहीं करना चाहिये; क्योंकि जैसे बढ़ती हुई नदीका वेग वृक्षको गिरा देता है, इसी प्रकार वह उसको जड़से उखाड़ डालता है ॥ १३५ ॥

अमित्रादुन्नतिं प्राप्य नोन्नतोऽस्मीति विश्वसेत्।
तस्मात् प्राप्योन्नतिं नश्येत् प्रावार इव कीटकः ॥१३६॥
शत्रुसे उन्नति पानेपर 'मैं भी उन्नत हो गया हूँ' ऐसा विश्वास न करे। उससे उन्नति पानेपर भी मनुष्य प्रावार-कीट (पाँखवाले चींटे) की तरह नष्ट हो जाता है ॥ १३६ ॥

इत्येता ह्युशनोगीता गाथा धार्या विपश्चिता ।
कुर्वता चात्मरक्षां वै नरेण पृथिवीपते ॥१३७॥
पृथिवीनाथ ! विद्वान् पुरुष आत्मरक्षा करता हुआ शुक्राचार्यकी गायी हुई इन गाथाओंको अपने मनमें स्मरण रखे॥

मया सकिल्बिषं तुभ्यं प्रयुक्तमतिदारुणम् ।
पुत्रमन्धं प्रकुर्वन्त्या तस्मान्नो विश्वसे त्वयि ॥१३८॥
मैंने आपके पुत्रको अंधा बनाकर अति दारुण अपराध किया है, अतः अब मैं आपका विश्वास नहीं करूँगी ॥ १३८ ॥

एवमुक्त्वा प्रदुद्राव तदाऽऽकाशं पतत्रिणी ।
इत्येतत् ते मयाख्यातं पुराभूतमिदं नृप ॥१३९॥
ब्रह्मदत्तस्य राजेन्द्र यद् वृत्तं पूजनीयया ।
राजन् ! इस प्रकार कहकर वह चिड़िया आकाशमें उड़ गयी। राजेन्द्र ! प्राचीन कालमें ब्रह्मदत्तका पूजनीयाके साथ जो संवाद हुआ था, वह मैंने तुमसे कह दिया ॥ १३९½ ॥

श्राद्धं च पृच्छसे यन्मां युधिष्ठिर महामते ॥१४०॥
अतस्ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम् ।
गीतं सनत्कुमारेण मार्कण्डेयाय पृच्छते ॥१४१॥
महामति युधिष्ठिर ! अब तुम जिस श्राद्ध-विषयको मुझसे पूछ रहे थे, उसे सुनाता हूँ। मार्कण्डेयजीके पूछनेपर सनत्कुमारजीने जो कुछ कहा था, उसी प्राचीन इतिहास

हरिवंशपर्व ] एकविंशोऽध्यायः ७७


(के शेष भाग) को मैं तुमसे कहूँगा ॥ १४०-१४१ ॥

श्राद्धस्य फलमुद्दिश्य नियतं सुकृतस्य च ।
तन्निबोध महाराज सप्तजातिषु भारत ॥ १४२॥
सगालवस्य चरितं कण्डरीकस्य चैव हि ।
ब्रह्मदत्ततृतीयानां योगिनां ब्रह्मचारिणाम् ॥ १४३॥

महाराज ! भरतनन्दन ! भलीभाँति किये गये श्राद्धके नियत पुण्यफलको लक्ष्यमें रखकर कहे गये, गालव, कण्डरीक और तीसरे ब्रह्मदत्त—इन ब्रह्मचारी योगियोंके सातों जन्मोंके चरित्रको तुम सावधान होकर सुनो ॥ १४२-१४३॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पूजनीयोपाख्याने चटकाख्यानं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पूजनीयोपाख्यानमें चटक (चिड़िये) की कथा नामक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥


एकविंशोऽध्यायः

पितृकल्प—मार्कण्डेयजीद्वारा श्राद्धकी महिमाका वर्णन, श्राद्धके फलसे कौशिक-पुत्रोंको उत्तम जन्मकी प्राप्ति

मार्कण्डेय उवाच
श्राद्धे प्रतिष्ठितो लोकः श्राद्धे योगः प्रवर्तते ।
हन्त ते वर्तयिष्यामि श्राद्धस्य फलमुत्तमम् ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी बोले— यह सारा संसार श्राद्धमें ही प्रतिष्ठित है और श्राद्धसे ही योग सम्पन्न होता है। अतः मैं तुमसे श्राद्धके उत्तम फलका वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥

ब्रह्मदत्तेन यत् प्राप्तं सप्तजातिषु भारत ।
तत एव हि धर्मस्य बुद्धिर्निर्वर्तते शनैः ॥ २ ॥

भारत ! ब्रह्मदत्तने (भारद्वाज, कौशिक, व्याध, मृग, चक्रवाक, हंस और श्रोत्रिय—इन) सात जन्मोंमें जो (श्राद्ध) धर्मका फल पाया था, उसको सुननेसे शनैः-शनैः धर्म-बुद्धि प्राप्त हो जाती है ॥ २ ॥

पीडयाप्यथ धर्मस्य कृते श्राद्धे परानघ ।
यत् प्राप्तं ब्राह्मणैः पूर्वं तन्निबोध महामते ॥ ३ ॥

निष्पाप महामते ! प्राचीन कालमें कुछ ब्राह्मणोंने (हिंसारूपी अधर्मके द्वारा) धर्मको पीड़ित करनेपर भी श्राद्ध करके जो फल पाया था, उसे तुम सुनो ॥ ३ ॥

ततोऽहं तानधर्मिष्ठान् कुरुक्षेत्रे पितृव्रतान् ।
सनत्कुमारनिर्दिष्टानपश्यं सप्त वै द्विजान् ॥ ४ ॥
दिव्येन चक्षुषा तेन यानुवाच पुरा विभुः ।

विभु सनत्कुमारजीने जिनका वर्णन किया था, मैने अपने दिव्य नेत्रसे सनत्कुमारजीके बताये हुए उन सात ब्राह्मणोंको अधर्ममे परायण होनेपर भी कुरुक्षेत्रमें श्राद्ध करते देखा ॥ ४½ ॥

वाग्दुष्टः क्रोधनो हिंस्रः पिशुनः कविरेव च ।
खसृमः पितृवर्ती च नामभिः कर्मभिस्तथा ॥ ५ ॥

उनके नाम इस प्रकार थे—वाग्दुष्ट, क्रोधन, हिंस्र, पिशुन, कवि, खसृम (ख अर्थात् आकाशमें सरण करने—विचरनेके स्वभाववाला परलोकार्थी) और पितृवर्ती। जैसे उनके नाम थे, वैसे ही उनके कर्म थे ॥ ५ ॥

कौशिकस्य सुतास्तात शिष्या गार्ग्यस्य भारत ।
पितुर्युपरते सर्वे व्रतवन्तस्तदाभवन् ॥ ६ ॥

तात ! भारत ! वे कौशिक (विश्वामित्र) के पुत्र थे और जब इनके पिता विश्वामित्र* शाप देकर उदासीन हो गये, तब वे सभी गार्ग्यके शिष्य बनकर (ब्रह्मचर्य) व्रतका पालन करनेके लिये उनके यहाँ रहने लगे ॥ ६ ॥

विनियोगाद् गुरोस्तस्य गां दोग्ध्रीं समकालयन् ।
समानवत्सां कपिलां सर्वे न्यायागतां तदा ॥ ७ ॥
तेषां पथि क्षुधार्तानां बाल्यान्मोहाच्च भारत ।
क्रूरा बुद्धिः सम्भवत् तां गां वै हिंसितुं तदा ॥ ८ ॥

भारत ! एक समय वे सब गुरुके आज्ञा देनेपर उनकी दुधार कपिला गौ और उसके कपिल वर्णके बछड़ेको वनमे चरानेके लिये ले गये। वह गौ गुरु गार्ग्यको न्यायतः प्राप्त हुई थी। मार्गमें क्षुधासे पीड़ित होनेके कारण उन्होंने मोह और मूर्खताके कारण गौको मारनेका क्रूर विचार किया ॥ ७-८ ॥

तान् कविः खसृमश्चैव याचेते नेति वै तदा ।
न चाशक्नुवन्त ते ताभ्यां तदा वारयितुं द्विजाः ॥ ९ ॥


* विश्वामित्रने अपने पचास पुत्रोंको शाप देते हुए कहा था—तुम्हारे वंशका अन्त हो जाय, तुम अपनी प्रजाका भक्षण करो अर्थात् अब तुम्हारे पुत्र आदि ब्राह्मण नहीं कहलायेंगे। इस प्रकार तुम अपनी प्रजा (के ब्राह्मणत्व) का भक्षण करोगे। उन पचास पुत्रोंमेंसे ये वाग्दुष्ट आदि भी हैं। सुना जाता है कि अन्ध्र, पुण्ड्र आदि भी इनकी ही संतानें हैं। (नीलकण्ठी)

७८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

उस समय कवि और खसने उनसे ऐसा न करनेकी प्रार्थना की; परंतु वे ब्राह्मण इनके द्वारा किसी प्रकार भी रोके न जा सके ॥ ९ ॥

पितृवर्ती तु यस्तेषां नित्यं श्राद्धाहिको द्विजः।
स सर्वानब्रवीद् भ्रातृन् कोपाद्धर्मे समाहितः ॥ १० ॥

तब उनमें जो प्रतिदिन श्राद्ध करनेवाला धर्मात्मा पितृवर्ती नामक द्विज था, वह उन सब भाइयोंसे बिगड़कर बोला ॥ १० ॥

यद्यवश्यं प्रहन्तव्या पितॄनुद्दिश्य साध्विमाम्।
प्रकुर्वीमहि गां सम्यक् सर्व एव समाहिताः ॥ ११ ॥

'यदि इसे अवश्य ही मारना है तो हमें चित्तको सावधान-कर इसे पितरोंके निमित्त ही मारना चाहिये ॥ ११ ॥

एवमेषापि गौर्धर्मं प्राप्स्यते नात्र संशयः।
पितॄनभ्यर्च्य धर्मेण नाधर्मोऽस्मान् भविष्यति ॥ १२ ॥

'ऐसा करनेसे इस गौको भी निस्संदेह धर्मकी प्राप्ति होगी और धर्मपूर्वक पितरोंका पूजन कर देनेसे हमें भी अधर्म न लगेगा' ॥ १२ ॥

तथेत्युक्त्वा च ते सर्वे प्रोक्षयित्वा च गां ततः।
पितृभ्यः कल्पयित्वैनामुपायुञ्जत भारत ॥ १३ ॥

भारत ! तब उन सबने 'तथास्तु' कहकर गौका प्रोक्षण किया और उसको पितरोंके निमित्त अर्पित करके उसका मनमाना उपयोग किया ॥ १३ ॥

उपयुज्य च गां सर्वे गुरोस्तस्य न्यवेदयन्।
शार्दूलेन हता धेनुर्वत्सोऽयं गृह्यतामिति ॥ १४ ॥

गौको उपयोगमें लाकर उन सबोंने गुरुजीसे निवेदन किया कि 'गायको तो सिंहने मार डाला, यह उसका बछड़ा है, इसे आप ग्रहण कीजिये' ॥ १४ ॥

आर्जवात् स तु तं वत्सं प्रतिजग्राह वै द्विजः।
मिथ्योपचर्य ते तं तु गुरुमन्यायतो द्विजाः।
कालेन समयुज्यन्त सर्व एवायुषः क्षये ॥ १५ ॥

सरलस्वभाव होनेके कारण उन ब्राह्मणने भी उस बछड़ेको ग्रहण कर लिया । इस प्रकार वे ब्राह्मण अन्यायद्वारा अपने गुरुको धोखा देकर आयु समाप्त होनेपर मृत्युको प्राप्त हुए ॥ १५ ॥

ते वै क्रूरतया हिंस्रा अनार्यत्वाद् गुरौ तथा।
उग्रा हिंसाविहाराश्च सत्ताजायन्त सोदराः ॥ १६ ॥

तत्पश्चात् अपनी क्रूरता और गुरुसे अनार्यताका व्यवहार करनेके कारण वे सात भाई उग्र स्वभाववाले, हिंसाविहारी व्याध बनकर उत्पन्न हुए ॥ १६ ॥

लुब्धकस्यात्मजास्तात बलवन्तो मनस्विनः।
पितॄनभ्यर्च्य धर्मेण प्रोक्षयित्वा च गां तदा ॥ १७ ॥
स्मृतिः प्रत्यवमर्शश्च तेषां जात्यन्तरेऽभवत्।
जाता व्याधा दशार्णेषु सप्त धर्मविचक्षणाः ॥ १८ ॥

तात ! उस समय वे एक बहेलियेके बलवान् एवं मनस्वी पुत्र हुए । उन्होंने धर्मतः पितरोंका पूजनकर गौका प्रोक्षण किया था; इसलिये दूसरा जन्म पानेपर भी उनको अपने पूर्वजन्म और पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंका स्मरण बना रहा। वे सातों दशार्ण देशमें धर्मकुशल व्याध बनकर उत्पन्न हुए थे ॥ १७-१८ ॥

स्वकर्मनिरताः सर्वे लोभानृतविवर्जिताः।
तावन्मात्रं प्रकुर्वन्ति यावता प्राणधारणम् ॥ १९ ॥

वे सब लोभ और असत्यसे दूर रहते हुए अपने कर्ममें तत्पर रहते थे और उतना ही भोजन करते थे, जिससे प्राण टिके रहें ॥ १९ ॥

शेषं ध्यानपराः कालमनुध्यायन्ति कर्म तत् ।
नामधेयानि चाप्येषामिमान्यासन्नराधिप ॥ २० ॥

राजन् ! उनके पास जो समय बचता था, उसमें ध्यानमग्न हो वे अपने (पूर्वजन्मके) कर्मका चिन्तन करते रहते थे। इस जन्ममें उनके नाम इस प्रकार थे— ॥ २० ॥

निर्वैरो निर्वृतिः शान्तो निर्मन्युः कृतिरेव च।
वैधसो मातृवर्ती च व्याधाः परमधार्मिकाः ॥ २१ ॥

निर्वैर, निर्वृति, शान्त, निर्मन्यु, कृति, वैधस और मातृवर्ती। ये सभी व्याध परम धार्मिक थे ॥ २१ ॥

तैरवसुषितैस्तात हिंसाधर्मरतैः सदा।
माता च पूजिता वृद्धा पिता च परितोषितः ॥ २२ ॥

तात ! इस प्रकार वे दशार्णदेशमें रहकर हिंसा में भी धर्मका पालन करते रहते थे। वे अपनी वृद्धा माताका सत्कार करते थे और पिताको भी संतुष्ट रखते थे ॥ २२ ॥

यदा माता पिता चैव संयुक्तौ कालधर्मणा।
तदा धनूंषि ते त्यक्त्वा वने प्राणानवासृजन् ॥ २३ ॥

जब उनके माता-पिता मर गये, तब उन्होंने अपने-अपने धनुषका परित्याग कर वनमें (अनशन आदिके द्वारा) अपने प्राण त्याग दिये ॥ २३ ॥

शुभेन कर्मणा तेन जाता जातिस्मरा मृगाः।
त्रासानुत्पाद्य संविग्ना रम्ये कालञ्जरे गिरौ ॥ २४ ॥

(माता-पिताकी सेवारूप) शुभ कर्मके कारण वे पूर्व-जन्मका स्मरण रखनेवाले मृग बनकर उत्पन्न हुए। (पहले हिंसाके द्वारा दूसरोंको) त्रास देनेके कारण वे रमणीय कालञ्जर पर्वतपर सदा उद्विग्न रहते थे ॥ २४ ॥

उन्मुखो नित्यवित्रस्तः स्तब्धकर्णो विलोचनः।
पण्डितो घस्मरो नादी नामतस्तेऽभवन् मृगाः ॥ २५ ॥

हरिवंशपर्व ] एकविंशोऽध्यायः [ ७९

उन मृगोंके नाम उन्मुख, नित्यवित्त्रस्त, स्तब्धकर्ण, विलोचन, पण्डित, घसमर और नादी थे ॥ २५ ॥
तमेवार्थमनुध्यायन्तो जातिस्मरणसम्भवम् ।
आसन् वनचराः शान्ता निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः॥ २६ ॥

( उस जन्ममें भी ) पूर्व जन्मकी स्मृति होनेसे याद आये हुए उन्हीं कर्मों और उनके फलोंका स्मरण करते हुए वे मृग धैर्यपूर्वक कष्ट सहन करते, शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंकी परवा नहीं करते और परिग्रह ( हिरनियोंके संग ) से दूर रहकर वनमें घूमते रहते थे ॥ २६ ॥
ते सर्वे शुभकर्माणः सधर्माणो वनेचराः ।
योगधर्ममनुप्राप्ता विहरन्ति स्म तत्र ह ॥ २७ ॥

वे सब समानरूपसे धर्मका पालन करते और शुभकर्मोंमें तत्पर रहते थे एवं योगधर्मका आश्रय लेकर ( आत्मविचार करते हुए ) वनमें इधर-उधर घूमते रहते थे ॥ २७ ॥
जहुः प्रांणान्मरुं साध्यं लघ्वाहारास्तपस्विनः ।
तेषां मरुं साधयतां पदस्थानानि भारत ।
तथैवाद्यापि दृश्यन्ते गिरौ कालञ्जरे नृप ॥ २८ ॥

भारत ! उन मृगोंने हल्का आहार तथा मरु ( निर्जल रहने ) की साधना करके तपस्यामे तत्पर हो वहाँ अपने प्राण त्याग दिये । राजन् ! जल न पीनेकी साधना करनेवाले उन मृगोंके पैरोंके चिह्न कालञ्जर पर्वतपर अब भी पूर्ववत् दिखायी देते हैं ॥ २८ ॥
कर्मणा तेन ते तात शुभेनाशुभवर्जिताः ।
शुभाच्छुभतरां योनिं चक्रवाकत्वमागताः ॥ २९ ॥

तात ! इस शुभ कर्मके कारण वे अशुभ योनिसे छूटकर अतिशुभ चक्रवाककी योनिमें उत्पन्न हुए ॥ २९ ॥
शुभे देशे शरद्वीपे सप्तैवासञ्जलौकसः ।
त्यक्त्वा सहचरीधर्मं मुनयो ब्रह्मचारिणः ॥ ३० ॥

वे सातों कल्याणमय शरद्वीप ( जलद्वीप ) में जलचर पक्षी बनकर उत्पन्न हुए । वहाँ भी वे सहचरीधर्म अर्थात् सहवासका त्यागकर ब्रह्मचारी मुनि बनकर रहने लगे ॥ ३० ॥
निःस्पृहो निर्ममः क्षान्तो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।
निर्वृत्तिर्निभृतश्चैव शकुना नामतः स्मृताः ॥ ३१ ॥

( इस चक्रवाक-जन्ममें ) उनके नाम निःस्पृह, निर्मम, क्षान्त, निर्द्वन्द्व, निष्परिग्रह, निर्वृत्ति और निभृत थे ॥ ३१ ॥
ते तत्र पक्षिणः सर्वे शकुना धर्मचारिणः ।
निराहारा जहुः प्राणांस्तपोयुक्ताः सरित्तटे ॥ ३२ ॥

उन सब धर्माचारी पक्षियोंने नदीके किनारेपर निराहार रहकर तप करते-करते अपने प्राणोंको त्याग दिया ॥ ३२ ॥
अथ ते सोदरा जाता हंसा मानसचारिणः ।
जातिस्मराः सुसंयुक्ताः सप्तैव ब्रह्मचारिणः ॥ ३३ ॥

तदनन्तर वे सातो सहोदर भाई मानसरोवरपर विचरने-वाले हंसके रूपमें उत्पन्न हुए । इस जन्ममें भी उनको अपने ( पूर्व ) जन्मोंका स्मरण बना रहता था । अतः वे सातों ही सदा साथ रहकर पूर्णरूपसे ब्रह्मचर्यका पालन करते थे ॥ ३३ ॥
विप्रयोनौ यतो मोहान्मिथ्योपचरितो गुरुः ।
तिर्यग्योनौ ततो जाताः संसारे परिवभ्रमुः ॥ ३४ ॥

उन्होंने ब्राह्मणयोनिमें मोहवश अपने गुरुसे मिथ्या-भाषण किया था, इसलिये वे तिर्यग्योनिमे उत्पन्न होकर संसारमे भटक रहे थे ॥ ३४ ॥
यतश्च पितृवाक्यार्थः कृतः स्वार्थे व्यवस्थितैः ।
ततो ज्ञानंच जातिं च ते हि प्रापुर्गुणोत्तराम् ॥ ३५ ॥

स्वार्थमें तत्पर रहनेपर भी उन्होंने पितरोंके श्राद्धनिमित्त संकल्प बोलकर कार्य किया था, इसलिये उन्हें उत्तरोत्तर उत्कृष्ट गुणसे युक्त ज्ञान और जन्म मिलता गया ॥ ३५ ॥
सुमनाः शुचिवाक्छुद्धः पञ्चमश्छिद्रदर्शनः ।
सुनेत्रश्च स्वतन्त्रश्च शकुना नामतः स्मृताः ॥ ३६ ॥

( इस जन्ममे ) उन हंसोंके नाम थे—सुमना, शुचिवाक्, शुद्ध, पञ्चम, छिद्रदर्शन, सुनेत्र और स्वतन्त्र ॥ ३६ ॥
पञ्चमः पाञ्चिकस्तत्र सप्तजातिष्वजायत ।
षष्ठस्तु कण्डरीकोऽभूद् ब्रह्मदत्तस्तु सप्तमः ॥ ३७ ॥

उन ( वाग्दुष्ट आदि कौशिक-पुत्रों ) में जो पाँचवाँ ( कवि ) था, वह भावी सातवें जन्ममे पाञ्चिक ( नामक राजमन्त्री ) हुआ । छठा ( खसम भावी मनुष्य-जन्ममे ) कण्डरीक हुआ और सातवाँ ( पितृवर्ती भावी सातवें जन्ममे ) ब्रह्मदत्त हुआ ॥ ३७ ॥
तेषां तु तपसा तेन सप्तजातिकृतेन वै ।
योगस्य चापि निर्वृत्त्या प्रतिभानाच्च शोभनात् ॥ ३८ ॥
पूर्वजातिषु यद् ब्रह्म श्रुतं गुरुकुलेषु वै ।
तथैवावस्थिता बुद्धिः संसारेष्वपि वर्तताम् ॥ ३९ ॥

उन्होंने सातों जन्मोंमें जो तप किया, उससे, योग-सिद्धिसे, पूर्वजन्मके कर्मोंकी स्मृति होनेसे तथा पूर्वजन्ममें गुरुकुलमें रहकर जो वेदाध्ययन किया गया था, उसके प्रभावसे संसारमें भ्रमण करनेपर भी उनकी बुद्धि वैसी ही बनी रही, बदली नहीं ॥३८-३९॥
ते ब्रह्मचारिणः सर्वे विहङ्गा ब्रह्मवादिनः ।
योगधर्ममनुध्यायन्तो विहरन्ति स्म तत्र ह ॥ ४० ॥

वे सभी आकाशचारी हंस ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मवादी होकर योगधर्मका पालन करते हुए विचरते रहे ॥ ४० ॥
तेषां तत्र विहङ्गानां चरतां सहचारिणाम् ।
नीपानामेश्वरो राजा विभ्राजः पौरवान्वयः ॥ ४१ ॥

८०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

विभ्राजमानो वपुषा प्रभावेन समन्वितः।
श्रीमानन्तःपुरवृतो वनं तत्रप्रविवेश ह ॥ ४२ ॥

इस प्रकार वे सब पक्षी वहाँ साथ-साथ विचर रहे थे, इतनेहीमें नीपोंका स्वामी पौरववंशी श्रीमान् विभ्राज अपने शरीरकी कान्तिसे प्रकाशित होता और अपना प्रभाव दिखाता हुआ अपने अन्तःपुरको लेकर उस वनमें आया ॥ ४१-४२ ॥

स्वतन्त्रश्च विहङ्गोऽसौ स्पृहयामास तं नृपम् ।
दृष्ट्वाऽऽयान्तं श्रियोपेतं भवेयमहमीदृशः ॥ ४३ ॥

यद्यस्ति सुकृतं किञ्चित्तपो वा नियमोऽपि वा ।
खिन्नोऽस्मि ह्युपवासेन तपसा निष्फलेन च ॥ ४४ ॥

तब स्वतन्त्र नामवाले हंसने वहाँ आये हुए उस लक्ष्मीवान् राजाको देखकर उसके समान बननेकी कामना की । ( वह विचारने लगा कि ) यदि मेरे पास कुछ भी पुण्य, तप या नियम हो, तो मैं इस राजाके समान हो जाऊँ । अब मैं इस उपवास और निष्फल तपसे खिन्न हो रहा हूँ ॥ ४३-४४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलेषु हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीमद्भारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥


द्वाविंशोऽध्यायः

पितृकल्प, शुचिवाक् पक्षीका स्वतन्त्र आदि तीन पक्षियोंको शाप देना, सुमना पक्षीका अनुग्रहपूर्वक उन्हें शापसे मुक्त करना

मार्कण्डेय उवाच

ततस्तं चक्रवाकौ द्वावूचतुः सहचारिणौ ।
आवां ते सचिवौ स्यावस्तव प्रियहितैषिणौ ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी बोले---उस समय उस स्वतन्त्र पक्षीके साथमें रहनेवाले दो चक्रवाकोंने उससे कहा,—हम आपका प्रिय एवं हित चाहनेवाले आपके मन्त्री बनेंगे ॥ १ ॥

तथेत्युक्त्वा च तस्यासीत् तदा योगात्मिका मतिः ।
एवं ते समयं चक्रुः शुचिवाक् तमुवाच ह ॥ २ ॥

तब स्वतन्त्रने कहा, 'बहुत अच्छा' । यों कहकर वह पुनः अपने योगधर्मका विचार करने लगा । जब इस प्रकार उन तीनोंने प्रतिज्ञा कर ली, तब शुचिवाकने उस (स्वतन्त्र) से कहा ॥ २ ॥

यस्मात् कामप्रधानस्त्वं योगधर्ममपास्य वै ।
एवं वरं प्रार्थयसे तस्माद् वाक्यं निबोध मे ॥ ३ ॥

तू योगधर्मको छोड़कर कामप्रधान धर्मकी कामनासे ऐसा वर माँग रहा है, इसलिये तू मेरा यह शाप सुन ले ॥ ३ ॥

राजा त्वं भविता तात काम्पिल्ये नात्र संशयः ।
भविष्यतः सखायौ च द्वाविमौ सचिवौ तव ॥ ४ ॥

तात ! तू काम्पिल्य नगरका राजा बनकर उत्पन्न होगा, इसमें संदेह नहीं । तेरे ये दोनों मित्र भी तेरे मन्त्री बनकर उत्पन्न होंगे ॥ ४ ॥

शप्त्वा चानभिभाष्यांस्तांश्चत्वारश्चकुरण्डजाः ।
तांस्त्रीनभीप्सतो राज्यं व्यभिचारप्रदर्शितान् ॥ ५ ॥

(इस प्रकार) शेष चार पक्षियोंने राज्यकी इच्छा करके योगधर्मसे भ्रष्ट होनेवाले उन तीन पक्षियोंको शाप देकर उनसे बोलना भी छोड़ दिया ॥ ५ ॥

शस्ताः खगास्त्रयस्ते तु योगभ्रष्टा विचेतसः ।
तानयाचन्त चतुरस्त्रयस्ते सहचारिणः ॥ ६ ॥

इस प्रकार योगभ्रष्ट होनेके कारण शापसे ग्रस्त हुए वे तीनों पक्षी डरके मारे अचेत हो गये। उन तीनों साथियोंने चारों पक्षियोंसे ( शापका अनुग्रह करनेकी ) प्रार्थना की ॥ ६ ॥

तेषां प्रसादं ते चक्रुरथैतान् सुमनाऽब्रवीत् ।
सर्वेषामेव वचनात्प्रसादानुगतं वचः ॥ ७ ॥

तब उन्होंने उनके ऊपर कृपाकी और सबकी सम्मतिसे सुमनाने अनुग्रहपूर्वक यह बात कही—॥ ७ ॥

अन्तवान् भविता शापो युष्माकं नात्र संशयः ।
इतश्च्युताश्च मानुष्यं प्राप्य योगमवाप्स्यथ ॥ ८ ॥

'इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे इस शापका शीघ्र ही अन्त होगा। यहाँ योगसे भ्रष्ट होकर तुम मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होगे और अन्तमें फिर तुम्हें योगज्ञान प्राप्त होगा ॥ ८ ॥

सर्वसत्त्वरुतज्ञश्च स्वतन्त्रोऽयं भविष्यति ।
पितृप्रसादो ह्यस्माभिरस्य प्रातः कृतेन वै ॥ ९ ॥
गां प्रोक्षयित्वा धर्मेण पितृभ्य उपकल्प्यताम् ।
अस्माकं ज्ञानसंयोगः सर्वेषां योगसाधनः ॥ १० ॥

'यह स्वतन्त्र नामक हंस सब जीवोंकी बोली समझनेवाला होगा । पूर्वजन्ममें इसीके कथनानुसार कार्य करनेसे हमें पितरोंकी कृपा प्राप्त हुई । इसने कहा था कि 'गौका प्रोक्षण करके इसे पितरोंको अर्पित किया जाय ।' इसीके पालनसे हम सबको योगसाधक ज्ञानकी प्राप्ति हुई है ॥ ९-१० ॥

हरिवंशपर्व ] त्रयोविंशतितमोऽध्यायः [ ८१


इमं च वाक्यसंदर्भश्लोकमेकमुदाहृतम्।
पुरुषान्तरितं श्रुत्वा ततो योगमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥

उस मनुष्य-जन्ममें जब कोई पुरुष तुम्हें यह आगे बताया जानेवाला वाक्य संदर्भरूप ( 'सप्तव्याधा दशार्णेषु' आदि)* श्लोक सुनावेगा, तब तुम्हें यह मोक्ष देनेवाला ज्ञानमय योग-धर्म फिर प्राप्त हो जायगा ॥ ११ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥


त्रयोविंशतितमोऽध्यायः

हंसोंका काम्पिल्यनगरमें ब्रह्मदत्त आदिके रूपमें उत्पन्न होना और चार हंसोंका अपने पितासे आज्ञा लेकर मुक्त हो जाना

मार्कण्डेय उवाच

ते योगधर्मनिरताः सप्त मानसचारिणः।
पद्मगर्भोऽरविन्दाक्षः क्षीरगर्भः सुलोचनः ॥ १ ॥
उरुविन्दुः सुविन्दुश्च हैमगर्भस्तु सप्तमः।
वाय्वम्बुभक्षाः सततं शरीराण्युपशोषयन् ॥ २ ॥

मार्कण्डेयजीने कहा— तदनन्तर, योगधर्ममें निरत रहनेवाले उन सात मानसचारी हंसोंने, जो पद्मगर्भ, अरविन्दाक्ष, क्षीरगर्भ, सुलोचन, उरुविन्दु, सुविन्दु और हैमगर्भ नाम धारण करते थे, केवल जल और वायुका ही भक्षण करके अपने शरीरको सुखाना आरम्भ कर दिया ॥ १-२ ॥

राजा विभ्राजमानस्तु वपुषा तद् वनं तदा।
चचारान्तःपुरवृतो नन्दनं मघवानिव ॥ ३ ॥

इधर वह राजा अपने शरीरसे प्रकाश फैलाता हुआ अपनी स्त्रियोंको साथ ले उस वनमें इस प्रकार घूमने लगा, जैसे नन्दनवनमें इन्द्र घूमते हों ॥ ३ ॥

स तानपश्यत्खचरान् योगधर्मात्मकान् नृप।
निर्वेदाच्च तमेवार्थमनुध्यायन् पुरं ययौ ॥ ४ ॥

राजन् ! उस राजाने उन पक्षियोंको (एकाग्रता आदि बाह्य लक्षणोंसे) योगधर्ममें परायण देखा। इससे वह (पक्षी भी योगसाधन करते हैं। हाय ! मैं मनुष्य होकर भी योग-साधन न कर सका। इस प्रकार) कुछ निर्विण्ण होकर, उसी बातको सोचता हुआ अपने नगरको चला गया ॥ ४ ॥

अणुहो नाम तस्याऽऽसीत्पुत्रः परमधार्मिकः।
अणुधर्मरतिर्नित्यमणुं सोऽप्यगमत्पदम् ॥ ५ ॥

उसके अणुह† नामक परम धार्मिक पुत्र था ! वह अणुह धर्मके सूक्ष्म तत्त्वके चिन्तनमें अनुरक्त था। इसलिये उसे अणुपद (ब्रह्मके सूक्ष्म स्वरूपका बोध) प्राप्त हुआ था ॥ ५ ॥

प्रादात्कन्यां शुकस्तस्मै कृत्वीं पूजितलक्षणाम्।
सत्यशीलगुणोपेतां योगधर्मरतां सदा ॥ ६ ॥

उसको शुकने श्रेष्ठ लक्षणोंवाली सत्यशील एवं अन्यान्य गुणोंसे सम्पन्न और सदा योगधर्मका पालन करनेवाली अपनी कन्या कृत्त्वी अर्पित की थी ॥ ६ ॥

सा ह्युद्दिष्टा पुरा भीष्म पितृकन्या मनीषिणी।
सनत्कुमारेण तदा संनिधौ मम शोभना ॥ ७ ॥

भीष्म ! जैसा कि सनत्कुमारजीने पहले मुझे बताया था, वह सुन्दरी कन्या कृत्त्वी पितरोंकी ही बुद्धिमती कन्या (पीवरी) थी ॥ ७ ॥

सत्यधर्मभृतां श्रेष्ठा दुर्विज्ञेया कृतात्मभिः।
योगा च योगपत्नी च योगमाता तथैव च ॥ ८ ॥

वह सत्यधर्मका पालन करनेवाली नारियोंमें श्रेष्ठ थी। पुण्यात्मा पुरुष भी उसके स्वरूपको बड़ी कठिनतासे समझ सकते थे। वह स्वयं तो योगिनी थी ही, योगीकी ही पत्नी और योगीकी ही माता भी थी ॥ ८ ॥

यथा ते कथितं पूर्वं पितृकल्पेषु वै मया।
विभ्राजस्त्वणुहं राज्ये स्थापयित्वा नरेश्वरः ॥ ९ ॥
आमन्त्र्य पौरान् प्रीतात्मा ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च।
प्रायात् सरस्तत्प्रभृतं यत्र ते सहचारिणः ॥ १० ॥

मैंने पहले पितृ-कल्पके समय ये सब बातें तुम्हें बतायी थीं। राजा विभ्राज अणुहको राज्यसिंहासनपर बैठाकर प्रसन्नचित्त हो पुरवासियोंसे विदा ले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर जहाँ वे सहचारी हंस रहते थे, उस सरोवरपर तप करनेके लिये चले गये ॥ ९-१० ॥

स वै तत्र निराहारो वायुभक्षो महातपाः।
त्यक्त्वा कामांस्तपस्तेपे सरसस्तस्य पार्श्वतः ॥ ११ ॥

वे उस सरोवरके तटपर सब कामनाओंको त्याग निराहार रह वायुको ही पीकर तपस्या करने लगे ॥ ११ ॥


* 'सप्तव्याधा दशार्णेषु' आदि वाक्य चौबीसवें अध्यायका बीसवाँ और इक्कीसवाँ श्लोक है।
† अणुह शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—(अणून्-सूक्ष्मान् धर्मान् इन्ति प्राप्नोतीति अणुहः-सूक्ष्म तत्त्वोंको समझनेकी शक्तिवाला)