विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तेषां वंशकरो राजा नीपानां कीर्तिवर्धनः।
काम्पिल्ये समरो नाम सस्नेहसमरोऽभवत् ॥ २४॥
काम्पिल्य नगरमें उन नीपोंके वंशप्रवर्तक एवं कीर्तिवर्धक राजा समर हुए। उनको संग्राम बहुत प्रिय था ॥ २४ ॥
समरस्य परः पारः सदश्व इति ते त्रयः।
पुत्राः परमधर्मज्ञाः परपुत्रः पृथुर्बभौ ॥ २५॥
समरके पर, पार और सदश्व—ये तीन परम धर्मज्ञ पुत्र हुए। परके पुत्र पृथु हुए ॥ २५ ॥
पृथोरस्तु सुकृतो नाम सुकृतेनेह कर्मणा।
जज्ञे सर्वगुणोपेतो विभ्राजस्तस्य चात्मजः ॥ २६॥
संसारमें पुण्यकर्म (सुकृत) करनेके कारण पृथुके सर्वगुणसम्पन्न सुकृत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और सुकृतके पुत्र विभ्राज हुए ॥ २६ ॥
विभ्राजस्य तु पुत्रोऽभूदणुहो नाम पार्थिवः।
बभौ शुकस्य जामाता कृत्वीभर्ता महायशाः ॥ २७॥
विभ्राजके पुत्र अणूह हुए। वे महायशस्वी राजा शुकके जामाता और कृत्वीके भर्ताके रूपमें वे सुशोभित हुए ॥
पुत्रोऽणूहस्य राजर्षिर्ब्रह्मदत्तोऽभवत् प्रभुः।
योगात्मा तस्य तनयो विष्वक्सेनः परंतपः ॥ २८॥
विभ्राजः पुनरायातः सुकृतेनेह कर्मणा।
अणूहके पुत्र राजर्षि ब्रह्मदत्त हुए। उनके पुत्र योगात्मा विष्वक्सेन हुए, जो बड़े प्रभावशाली और शत्रुओंको संतप्त करनेवाले थे। विभ्राज अपने कर्मके कारण ब्रह्मदत्तके पुत्र (विष्वक्सेन) बनकर फिर उत्पन्न हुए थे ॥ २८१/२॥
ब्रह्मदत्तस्य पुत्रोऽन्यः सर्वसेन इति श्रुतः ॥ २९॥
चक्षुषी तस्य निर्भिन्ने पक्षिण्या पूजनीयया।
सुचिरोषिता या राजन् ब्रह्मदत्तस्य वेश्मनि ॥ ३०॥
ब्रह्मदत्तके दूसरे पुत्र सर्वसेन नामसे प्रसिद्ध थे। राजन्! उनके दोनों नेत्रोंको बहुत समयसे ब्रह्मदत्तके महलमें रहनेवाली पूजनीया नामकी पक्षिणी (चिड़िया) ने फोड़ दिया था॥ २९-३० ॥
अथास्य पुत्रस्त्वपरो ब्रह्मदत्तस्य जज्ञिवान्।
विष्वक्सेन इति ख्यातो महाबलपराक्रमः ॥ ३१॥
तदनन्तर ब्रह्मदत्तके दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ। यह महाबली एवं पराक्रमी (विभ्राजावतार) विष्वक्सेनके नामसे प्रसिद्ध था ॥ ३१ ॥
विष्वक्सेनस्य पुत्रोऽभूद् दण्डसेनो महीपतिः।
भल्लाटोऽस्य कुमारोऽभूद् राधेयेन हतः पुरा ॥ ३२॥
विष्वक्सेनके पुत्र राजा दण्डसेन हुए। इनका पुत्र भल्लाट हुआ, जिसे राधापुत्र कर्णने मार डाला था ॥ ३२ ॥
दण्डसेनात्मजः शूरो महात्मा कुलवर्धनः।
भल्लाटपुत्रो दुर्बुद्धिरभवद्युधिष्ठिर ॥ ३३॥
युधिष्ठिर ! दण्डसेनका पुत्र भल्लाट शूरवीर, महात्मा और कुलको बढ़ानेवाला था; परंतु भल्लाटका पुत्र बड़ा दुर्बुद्धि निकला ॥ ३३ ॥
स तेषामभवद् राजा नीपानामन्तकृन्नृप।
तेन उग्रायुधस्यार्थे सर्वे नीपा विनाशिताः ॥ ३४॥
राजन् ! वह उन नीपोंका अन्त करनेवाला राजा हुआ। उसने उग्रायुधकेलिये समस्त नीपोंका विनाश करवा दिया था ॥
उग्रायुधो मदोत्सिक्तो मया विनिहतो युधि।
दर्पान्वितो दर्परुचिः सततं चानये रतः ॥ ३५॥
निरन्तर अनीतिमें लगे रहनेवाले और दर्पमें रुचि रखनेवाले उस अभिमानी मदोन्मत्त उग्रायुधको मैंने ही युद्धमें मार डाला था ॥
युधिष्ठिर उवाच
उग्रायुधः कस्य सुतः कस्मिन् वंशेऽथ जज्ञिवान्।
किमर्थं चैव भवता निहतस्तद् ब्रवीहि मे ॥ ३६॥
युधिष्ठिरने पूछा—(दादाजी!) उग्रायुध किसका पुत्र था, किस वंशमें उत्पन्न हुआ था और आपने उसे क्यों मार डाला ? यह मुझे बताइये ॥ ३६ ॥
भीष्म उवाच
अजमीढस्य दायादो विद्वान् राजा यवीनरः।
धृतिमांस्तस्य पुत्रस्तु तस्य सत्यधृतिः सुतः ॥ ३७॥
भीष्मजीने कहा—अजमीढके पुत्र विद्वान् राजा यवीनर थे। उनके पुत्र धृतिमान् हुए और धृतिमान्के पुत्र सत्यधृति थे ॥ ३७ ॥
जज्ञे सत्यधृतेः पुत्रो दृढनेमिः प्रतापवान्।
दृढनेमिसुतश्चापि सुधर्मा नाम पार्थिवः ॥ ३८॥
सत्यधृतिके प्रतापी पुत्र दृढनेमि हुए। दृढनेमिके पुत्र राजा सुधर्मा थे ॥ ३८ ॥
आसीत् सुधर्मणः पुत्रः सार्वभौमः प्रजेश्वरः।
सार्वभौम इति ख्यातः पृथिव्यामेकराड् विभुः ॥ ३९॥
सुधर्माके पुत्र प्रजापालक सार्वभौम हुए, जो समस्त पृथ्वीके एकच्छत्र सम्राट् थे। इसीलिये सार्वभौम नामसे प्रसिद्ध हुए थे ॥ ३९ ॥
तस्यान्ववाये महति महान् पौरवनन्दनः।
महत्तश्चापि पुत्रस्तु राजा रुक्मरथः स्मृतः ॥ ४०॥
उनके महनीय वंशमें पौरवोंको प्रसन्न करनेवाले महान् नामक राजा हुए। महान्के पुत्र राजा रुक्मरथ हुए ॥ ४० ॥
पुत्रो रुक्मरथस्यापि सुपार्श्वो नाम पार्थिवः।
सुपार्श्वतनयश्चापि सुमतिर्नाम धार्मिकः ॥ ४१॥
रुक्मरथके पुत्र राजा सुपार्श्व हुए। सुपार्श्वके पुत्र सुमति हुए, जो बड़े धार्मिक थे ॥ ४१ ॥