भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 94

हरिवंशपर्व ] विशोऽध्यायः ७१


सुमतिरपि धर्मात्मा संनतिर्नाम वीर्यवान् ।
तस्य वै संनतेः पुत्रः कृतो नाम महाबलः ॥ ४२ ॥
सुमतिके पुत्र संनति हुए, जो वीर्यवान् और धर्मात्मा थे। उन संनतिके पुत्र महाबली कृत हुए ॥ ४२ ॥
शिष्यो हिरण्यनाभस्य कौशलस्य महात्मनः ।
चतुर्विंशतिधा तेन संप्राच्याः सामसंहिताः ॥ ४३ ॥
स्मृतास्ते प्राच्यसामानः कार्त्तयो नाम सामगाः ।
वे कोशलदेशीय महात्मा हिरण्यनाभके शिष्य थे। उन्होंने प्राचीन साम-संहिताके चौबीस विभाग किये थे, जो प्राच्यसाम कहलाते हैं और उन सामोंका गान करनेवाले कीर्ति-सामग कहे जाते हैं ॥ ४३३ ॥
कार्तिरुग्रायुधः सोऽथ वीरः पौरवनन्दनः ॥ ४४ ॥
बभूव येन विक्रम्य पृषतस्य पितामहः ।
नीपो नाम महातेजाः पञ्चालाधिपतिर्हतः ॥ ४५ ॥
इन्हीं कृतके पुत्र पौरवनन्दन वीर उग्रायुध थे, जिन्होंने अपने पराक्रमसे पाञ्चालोंके स्वामी पृषतके पितामह महातेजस्वी नीपको मार डाला था ॥ ४४-४५ ॥
उग्रायुधस्य दायादः क्षेम्यो नाम महायशाः ।
क्षेम्यात् सुवीरो नृपतिः सुवीरात् तु नृपंजयः ॥ ४६ ॥
नृपंजयाद् बहुरथ इत्येते पौरवाः स्मृताः ।
उग्रायुधके पुत्र महायशस्वी क्षेम्य हुए। क्षेम्यके पुत्र राजा सुवीर हुए और सुवीरके पुत्र नृपंजय हुए। नृपंजयके पुत्र बहुरथ हुए वे ही पौरव कहलाते हैं ॥ ४६३ ॥
स चाप्युग्रायुधस्तात दुर्बुद्धिरभवत् तदा ॥ ४७ ॥
प्रवृद्धचक्रो बलवान् नीपान्तकरणो महान् ।
स दर्पपूर्णो हत्वाऽऽजौ नीपानन्यांश्च पार्थिवान् ॥ ४८ ॥
तात ! वे उग्रायुध बड़े दुष्ट स्वभाववाले और बलवान् थे। उनका महान् चक्र चलता था। उन्होंने नीपोंका घोर संहार करा डाला। वे नीपों तथा दूसरे राजाओंका युद्धमें वध करके घमंडसे भर गये ॥ ४७-४८ ॥
पितर्युपरते मह्यं भाषयामास किल्बिषम् ।
माममात्यैः परिवृतं शयानं धरणीतले ॥ ४९ ॥
जिस समय मेरे पिता मर गये थे और मैं मन्त्रियोंसे घिरा हुआ पृथ्वीपर शयन करता था, उसी समय उन्होंने मुझसे बड़ी कुत्सित (पापपूर्ण) बात कहलायी ॥ ४९ ॥
उग्रायुधस्य राजेन्द्र दूतोऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् ।
अद्य त्वं जननीं भीष्म गन्धकालीं यशस्विनीम् ।
स्त्रीरत्नं मम भार्यार्थे प्रयच्छ कुरुपुङ्गव ॥ ५० ॥
राजेन्द्र ! उग्रायुधका दूत मेरे पास आकर कहने लगा—'कुरुपुङ्गव भीष्म ! आज तुम स्त्रियोंमें रत्नरूप अपनी माता यशस्विनी गन्धकालीको मेरी भार्या बननेके लिये दे दो ॥ ५० ॥
एवं राज्यं च ते स्फीतं धनानि च न संशयः ।
प्रदास्यामि यथाकाममहं, वै रत्नभाग् भुवि ॥ ५१ ॥
'यदि तुम ऐसा करोगे तो निस्संदेह मैं तुम्हें इच्छानुसार विशाल राज्य तथा धन दूँगा और मैं (गन्धकालीको पाकर) इस भूतलपर रत्नका भागी हो जाऊँगा ॥ ५१ ॥
मम प्रज्वलितं चक्रं निशम्येदं सुदुर्जयम् ।
शत्रवो विद्रवन्त्याजौ दर्शनादेव भारत ॥ ५२ ॥
'भारत ! मेरे इस परम दुर्जय एवं जाज्वल्यमान चक्रका दर्शन करके शत्रुगण युद्धमें मुझे देखते ही भाग खड़े होते हैं ॥ ५२ ॥
राष्ट्रस्येच्छसि चेत् स्वस्ति प्राणानां वा कुलस्य वा ।
शासने मम तिष्ठस्व न हि ते शान्तिरन्यथा ॥ ५३ ॥
'तुम यदि राज्य, कुल एवं अपने प्राणोंका कल्याण चाहते हो तो मेरी आज्ञा मान लो, नहीं तो चैनसे न रह सकोगे' ॥ ५३ ॥
अधः प्रस्तारशयने शयानस्तेन चोदितः ।
दूतान्तर्हितमेतद् वै वाक्यमग्निशिखोपमम् ॥ ५४ ॥
जब मैं भूमिपर कुशाओंकी शय्यापर सो रहा था, उस समय उसने दूतके द्वारा यह अग्निकी ज्वालके समान (जलानेवाली) बात कहलायी थी ॥ ५४ ॥
ततोऽहं तस्य दुर्बुद्धेर्विज्ञाय मतमच्युत ।
आज्ञापयं वै संग्रामे सेनाध्यक्षांश्च सर्वशः ॥ ५५ ॥
अच्युत ! तब मैंने उस दुर्बुद्धिके अभिप्रायको जानकर अपने सेनापतियोंको सब प्रकारसे संग्राम करनेकी आज्ञा दे दी ॥ ५५ ॥
विचित्रवीर्यं बालं च मदुपाश्रयमेव च ।
दृष्ट्वा क्रोधपरीतात्मा युद्धायैव मनो दधे ॥ ५६ ॥
विचित्रवीर्य मेरे आश्रयमें रहता है तथा यह बालक होनेके कारण युद्ध भी नहीं कर सकता, इस बातको देखकर क्रोधमें भरकर मैंने स्वयं ही युद्ध करनेका विचार किया ॥ ५६ ॥
निगृहीतस्तदाहं तैः सचिवैर्मन्त्रकोविदैः ।
ऋत्विग्भिर्वेदकल्पैश्च सुहृद्भिश्छार्थदर्शिभिः ॥ ५७ ॥
स्निग्धैश्च शास्त्रविद्भिश्च संयुगस्य निवर्तने ।
कारणं भावितश्चास्मि युक्तरूपं तदानघ ॥ ५८ ॥
निष्पाप ! उस समय मन्त्रज्ञ मन्त्रियों, वेदज्ञ ऋत्विजों, तत्त्वदर्शी मित्रों और शास्त्रवेत्ता स्नेही पुरुषोंने मुझे युद्ध करनेसे रोक दिया और इसका उचित कारण भी बताया ॥

मन्त्रिण ऊचुः

प्रवृत्तचक्रः पापोऽसौ त्वं चाशौचगतः प्रभो ।
न चैष प्रथमः कल्पो युद्धं नाम कदाचन ॥ ५९ ॥
मन्त्रियोंने कहा—प्रभो ! उस पापीका चक्र चल रहा है और आपको अशौच लगा हुआ है, अतः यह युद्ध प्रथम कल्प कभी नहीं माना जा सकता ॥ ५९ ॥