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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

हरिवंशपर्व ] विशोऽध्यायः ७१


सुमतिरपि धर्मात्मा संनतिर्नाम वीर्यवान् ।
तस्य वै संनतेः पुत्रः कृतो नाम महाबलः ॥ ४२ ॥
सुमतिके पुत्र संनति हुए, जो वीर्यवान् और धर्मात्मा थे। उन संनतिके पुत्र महाबली कृत हुए ॥ ४२ ॥
शिष्यो हिरण्यनाभस्य कौशलस्य महात्मनः ।
चतुर्विंशतिधा तेन संप्राच्याः सामसंहिताः ॥ ४३ ॥
स्मृतास्ते प्राच्यसामानः कार्त्तयो नाम सामगाः ।
वे कोशलदेशीय महात्मा हिरण्यनाभके शिष्य थे। उन्होंने प्राचीन साम-संहिताके चौबीस विभाग किये थे, जो प्राच्यसाम कहलाते हैं और उन सामोंका गान करनेवाले कीर्ति-सामग कहे जाते हैं ॥ ४३३ ॥
कार्तिरुग्रायुधः सोऽथ वीरः पौरवनन्दनः ॥ ४४ ॥
बभूव येन विक्रम्य पृषतस्य पितामहः ।
नीपो नाम महातेजाः पञ्चालाधिपतिर्हतः ॥ ४५ ॥
इन्हीं कृतके पुत्र पौरवनन्दन वीर उग्रायुध थे, जिन्होंने अपने पराक्रमसे पाञ्चालोंके स्वामी पृषतके पितामह महातेजस्वी नीपको मार डाला था ॥ ४४-४५ ॥
उग्रायुधस्य दायादः क्षेम्यो नाम महायशाः ।
क्षेम्यात् सुवीरो नृपतिः सुवीरात् तु नृपंजयः ॥ ४६ ॥
नृपंजयाद् बहुरथ इत्येते पौरवाः स्मृताः ।
उग्रायुधके पुत्र महायशस्वी क्षेम्य हुए। क्षेम्यके पुत्र राजा सुवीर हुए और सुवीरके पुत्र नृपंजय हुए। नृपंजयके पुत्र बहुरथ हुए वे ही पौरव कहलाते हैं ॥ ४६३ ॥
स चाप्युग्रायुधस्तात दुर्बुद्धिरभवत् तदा ॥ ४७ ॥
प्रवृद्धचक्रो बलवान् नीपान्तकरणो महान् ।
स दर्पपूर्णो हत्वाऽऽजौ नीपानन्यांश्च पार्थिवान् ॥ ४८ ॥
तात ! वे उग्रायुध बड़े दुष्ट स्वभाववाले और बलवान् थे। उनका महान् चक्र चलता था। उन्होंने नीपोंका घोर संहार करा डाला। वे नीपों तथा दूसरे राजाओंका युद्धमें वध करके घमंडसे भर गये ॥ ४७-४८ ॥
पितर्युपरते मह्यं भाषयामास किल्बिषम् ।
माममात्यैः परिवृतं शयानं धरणीतले ॥ ४९ ॥
जिस समय मेरे पिता मर गये थे और मैं मन्त्रियोंसे घिरा हुआ पृथ्वीपर शयन करता था, उसी समय उन्होंने मुझसे बड़ी कुत्सित (पापपूर्ण) बात कहलायी ॥ ४९ ॥
उग्रायुधस्य राजेन्द्र दूतोऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् ।
अद्य त्वं जननीं भीष्म गन्धकालीं यशस्विनीम् ।
स्त्रीरत्नं मम भार्यार्थे प्रयच्छ कुरुपुङ्गव ॥ ५० ॥
राजेन्द्र ! उग्रायुधका दूत मेरे पास आकर कहने लगा—'कुरुपुङ्गव भीष्म ! आज तुम स्त्रियोंमें रत्नरूप अपनी माता यशस्विनी गन्धकालीको मेरी भार्या बननेके लिये दे दो ॥ ५० ॥
एवं राज्यं च ते स्फीतं धनानि च न संशयः ।
प्रदास्यामि यथाकाममहं, वै रत्नभाग् भुवि ॥ ५१ ॥
'यदि तुम ऐसा करोगे तो निस्संदेह मैं तुम्हें इच्छानुसार विशाल राज्य तथा धन दूँगा और मैं (गन्धकालीको पाकर) इस भूतलपर रत्नका भागी हो जाऊँगा ॥ ५१ ॥
मम प्रज्वलितं चक्रं निशम्येदं सुदुर्जयम् ।
शत्रवो विद्रवन्त्याजौ दर्शनादेव भारत ॥ ५२ ॥
'भारत ! मेरे इस परम दुर्जय एवं जाज्वल्यमान चक्रका दर्शन करके शत्रुगण युद्धमें मुझे देखते ही भाग खड़े होते हैं ॥ ५२ ॥
राष्ट्रस्येच्छसि चेत् स्वस्ति प्राणानां वा कुलस्य वा ।
शासने मम तिष्ठस्व न हि ते शान्तिरन्यथा ॥ ५३ ॥
'तुम यदि राज्य, कुल एवं अपने प्राणोंका कल्याण चाहते हो तो मेरी आज्ञा मान लो, नहीं तो चैनसे न रह सकोगे' ॥ ५३ ॥
अधः प्रस्तारशयने शयानस्तेन चोदितः ।
दूतान्तर्हितमेतद् वै वाक्यमग्निशिखोपमम् ॥ ५४ ॥
जब मैं भूमिपर कुशाओंकी शय्यापर सो रहा था, उस समय उसने दूतके द्वारा यह अग्निकी ज्वालके समान (जलानेवाली) बात कहलायी थी ॥ ५४ ॥
ततोऽहं तस्य दुर्बुद्धेर्विज्ञाय मतमच्युत ।
आज्ञापयं वै संग्रामे सेनाध्यक्षांश्च सर्वशः ॥ ५५ ॥
अच्युत ! तब मैंने उस दुर्बुद्धिके अभिप्रायको जानकर अपने सेनापतियोंको सब प्रकारसे संग्राम करनेकी आज्ञा दे दी ॥ ५५ ॥
विचित्रवीर्यं बालं च मदुपाश्रयमेव च ।
दृष्ट्वा क्रोधपरीतात्मा युद्धायैव मनो दधे ॥ ५६ ॥
विचित्रवीर्य मेरे आश्रयमें रहता है तथा यह बालक होनेके कारण युद्ध भी नहीं कर सकता, इस बातको देखकर क्रोधमें भरकर मैंने स्वयं ही युद्ध करनेका विचार किया ॥ ५६ ॥
निगृहीतस्तदाहं तैः सचिवैर्मन्त्रकोविदैः ।
ऋत्विग्भिर्वेदकल्पैश्च सुहृद्भिश्छार्थदर्शिभिः ॥ ५७ ॥
स्निग्धैश्च शास्त्रविद्भिश्च संयुगस्य निवर्तने ।
कारणं भावितश्चास्मि युक्तरूपं तदानघ ॥ ५८ ॥
निष्पाप ! उस समय मन्त्रज्ञ मन्त्रियों, वेदज्ञ ऋत्विजों, तत्त्वदर्शी मित्रों और शास्त्रवेत्ता स्नेही पुरुषोंने मुझे युद्ध करनेसे रोक दिया और इसका उचित कारण भी बताया ॥

मन्त्रिण ऊचुः

प्रवृत्तचक्रः पापोऽसौ त्वं चाशौचगतः प्रभो ।
न चैष प्रथमः कल्पो युद्धं नाम कदाचन ॥ ५९ ॥
मन्त्रियोंने कहा—प्रभो ! उस पापीका चक्र चल रहा है और आपको अशौच लगा हुआ है, अतः यह युद्ध प्रथम कल्प कभी नहीं माना जा सकता ॥ ५९ ॥

७२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


ते वयं सामपूर्वं वै दानं भेदं तथैव च ।
प्रयोक्ष्यामस्ततः शुद्धो दैवतान्यभिवाद्य च ॥ ६० ॥
कृतस्वस्त्ययनो विप्रैर्वह्नीन् सम्पूज्य च द्विजान् ।
ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञातः प्रयास्यसि जयाय वै ॥ ६१ ॥

हम पहले उसपर साम, दान और भेद नीतियोंका प्रयोग करेंगे। तबतक आप शुद्ध भी हो जायेंगे, फिर आप देवताओंको प्रणाम करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर अग्नि और ब्राह्मणोंकी पूजा करनेके बाद ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर विजयके लिये प्रस्थान कीजियेगा ॥ ६०-६१ ॥

अस्त्राणि न प्रयोज्यानि न प्रवेष्टव्यञ्च संगरः ।
अशौचे वर्तमाने तु वृद्धानामिति शासनम् ॥ ६२ ॥

वृद्धोंका कथन है कि जब अशौच चल रहा हो, उस समय अस्त्रोंका प्रयोग और युद्धमे प्रवेश नहीं करना चाहिये ॥ ६२ ॥

सामदानादिभिः पूर्वमपि भेदेन वा ततः ।
तं हनिष्यसि विक्रम्य शम्बरं मघवानिव ॥ ६३ ॥

अतः पहले साम, दान, भेदसे इसको वशमें करनेका यत्न किया जाय (तब भी न माने तो) फिर जैसे इन्द्रने शम्बरासुरको मार डाला था, उसी प्रकार पराक्रम करके आप इसको मार डालियेगा ॥ ६३ ॥

प्राज्ञानां वचनं काले वृद्धानां च विशेषतः ।
श्रोतव्यमिति तच्छ्रुत्वा निवृत्तोऽस्मि नराधिप ॥ ६४ ॥

समय पड़नेपर बुद्धिमानों और वृद्धोंकी बात विशेषरूपसे सुननी चाहिये। राजन्! यह सुनकर मैं युद्धसे रुक गया ॥ ६४ ॥

ततस्तैः संक्रमः सर्वैः प्रयुक्तः शास्त्रकोविदैः ।
तस्मिन् काले कुरुश्रेष्ठ कर्म चारब्धमुत्तमम् ॥ ६५ ॥

कुरुश्रेष्ठ ! तब उन शास्त्रज्ञानमें चतुर सम्पूर्ण मन्त्रियोंने साम, दान, भेद आदि दूसरे उपायोंद्वारा शान्ति-स्थापनका प्रयोग किया और इसके लिये उत्तम कार्य आरम्भ कर दिया ॥ ६५ ॥

स सामादिभिरेवाद्याद्युपायैः प्राज्ञचिन्तितैः ।
अनुनीयमानो दुर्बुद्धिरनुनेतुं न शक्यते ॥ ६६ ॥

परंतु वे बुद्धिमानोंके विचारे हुए साम, दान आदि उपायोका प्रयोग करके भी उस दुर्बुद्धिको न समझा सके ॥ ६६ ॥

प्रवृत्तं तस्य तच्चक्रमधर्मनिरतस्य वै ।
परदाराभिलाषेण सद्यस्तात निवर्तितम् ॥ ६७ ॥

तात ! इतने समयमें अधर्ममें मग्न रहनेवाले उग्रायुधका प्रतापचक्र भी पर-स्त्रीकी कामना करनेसे तत्क्षण ही रुक गया ॥ ६७ ॥

न त्वहं तस्य जाने तन्निवृत्तं चक्रमुत्तमम् ।
हतं स्वकर्मणा तं तु पूर्वं सद्भिश्श्च निन्दितम् ॥ ६८ ॥

उसका उत्तम चक्र निवृत्त हो गया है और पहले सत्पुरुषोंसे निन्दित होकर वह अपने कर्मोंद्वारा ही मर गया है; इस बातको मैं नहीं जानता था ॥ ६८ ॥

कृतशौचः शरी चापी रथी निष्क्रम्य वै पुरात् ।
कृतस्वस्त्ययनो विप्रैः प्रायोधयमहं रिपुम् ॥ ६९ ॥

जब मैं अशौच-निवृत्तिके पश्चात् शुद्ध हुआ, तब ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर धनुष-बाण ले रथमें बैठ नगरसे बाहर निकला और शत्रुसे युद्ध करने लगा ॥ ६९ ॥

ततः संसर्गमागम्य बलेनास्त्रबलेन च ।
त्र्यहमुन्मत्तवद् युद्धं देवासुरमिवाभवत् ॥ ७० ॥

तदनन्तर उसके निकट पहुँचकर शरीर-बल और अस्त्र-बलके द्वारा देवासुर-संग्रामकी तरह तीन दिनोंतक हम दोनोंका उन्मत्त-सा युद्ध चलता रहा ॥ ७० ॥

स मयास्त्रप्रतापेन निर्दग्धो रणमूर्धनि ।
पपाताभिमुखः शूरस्त्यक्त्वा प्राणानरिंदम ॥ ७१ ॥

शत्रुदमन ! तत्पश्चात् मेरे अस्त्रके प्रतापसे भस्म होकर वह वीर रणके मुहानेपर अपने प्राणोंको त्यागकर गिर पड़ा ॥ ७१ ॥

एतस्मिन्नन्तरे तात काम्पिल्ये पृषतोऽभ्ययात् ।
हते नीपेश्वरे चैव हते चोग्रायुधे नृपे ॥ ७२ ॥
आहिच्छत्त्रं स्वकं राज्यं पित्र्यं प्राप महाद्युतिः ।
द्रुपदस्य पिता राजन् ममैवानुमते तदा ॥ ७३ ॥

तात ! इसी बीचमें (उग्रायुधद्वारा) नीपेश्वर तथा (मेरे द्वारा) राजा उग्रायुधके मारे जानेपर पृषतने भी काम्पिल्य नगरपर आक्रमण कर दिया। राजन् ! तब मेरी अनुमतिसे महाकान्तिमान् द्रुपदके पिताने अपने पैतृक राज्य अहिच्छत्रपर (पुनः) अधिकार कर लिया ॥ ७२-७३ ॥

ततोऽर्जुनेन तरसा निर्जित्य द्रुपदं रणे ।
आहिच्छत्त्रं सकाम्पिल्यं द्रोणायाथापवर्जितम् ॥ ७४ ॥

तदनन्तर अर्जुनने युद्धमें द्रुपदको बलपूर्वक जीतकर काम्पिल्य और अहिच्छत्रको द्रोणाचार्यके (चरणोंमें) समर्पित कर दिया था ॥ ७४ ॥

प्रतिगृह्य ततो द्रोण उभयं जयतां वरः ।
काम्पिल्यं द्रुपदायैव प्रायच्छद् विदितं तव ॥ ७५ ॥

तब विजय पानेवालोंमें श्रेष्ठ द्रोणने दोनों देशोंको लेकर काम्पिल्यनगर तो द्रुपदको ही वापस कर दिया था, जिसे तुम जानते ही हो ॥ ७५ ॥

एष ते द्रुपदस्यादौ ब्रह्मदत्तस्य चैव ह ।
वंशः कात्स्न्र्येन वै प्रोक्तो नीपस्योग्रायुधस्य च ॥ ७६ ॥

इस प्रकार मैंने तुमसे द्रुपद, ब्रह्मदत्त, नीप और उग्रायुधके वंशका पूर्णरूपसे वर्णन कर दिया ॥ ७६ ॥

हरिवंशपर्व ] [ विंशोऽध्यायः ] ७३


युधिष्ठिर उवाच

किमर्थं ब्रह्मदत्तस्य पूजनीया शकुन्तिका।
अन्धं चकार गाङ्गेय ज्येष्ठं पुत्रं पुरा विभो ॥ ७७ ॥

युधिष्ठिरने पूछा—समर्थ गङ्गानन्दन ! पहले पूजनीया चिड़ियाने ब्रह्मदत्तके ज्येष्ठ पुत्रको अंधा क्यों कर दिया था ? ॥ ७७ ॥

चिरोषिता गृहे चापि किमर्थं चैव यस्य सा ।
चकार विप्रियमिदं तस्य राज्ञो महात्मनः ॥ ७८ ॥

वह जिसके महलमें बहुत समयसे रहती थी, उसी महात्मा राजाका उसने ऐसा अनिष्ट क्यों किया? ॥ ७८ ॥

पूजनीया चकारासौ किं सख्यं तेन चैव ह।
एतन्मे संशयं छिन्धि सर्वमुक्तवा यथातथम् ॥ ७९ ॥

उस पूजनीयाने उनके साथ मित्रता क्यों की थी ? आप इन सब बातोंको यथार्थ रीतिसे बताकर मेरे सारे संदेहोंको दूर कर दें ॥ ७९ ॥

भीष्म उवाच

शृणु सर्वं महाराज यथावृत्तमभूत् पुरा।
ब्रह्मदत्तस्य भवने तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ८० ॥

भीष्मजीने कहा—महाराज युधिष्ठिर ! प्राचीनकालमें ब्रह्मदत्तके महलमें जो घटना घटी थी, उसे तुम पूर्णरूपसे सुनो ॥ ८० ॥

काविच्छकुन्तिका राजन् ब्रह्मदत्तस्य वै सखी ।
शितिपक्षा शोणशिराः शितिपृष्ठा शितोदरी ॥ ८१ ॥

राजन् ! एक चिड़िया थी, जिसका राजा ब्रह्मदत्तसे स्नेह हो जानेके कारण वह उनकी सहचरी बन गयी थी। उसके दोनों पंख, पीठ और उदरका भाग तो काला था; परंतु मस्तकका रंग लाल था ॥ ८१ ॥

सखी सा ब्रह्मदत्तस्य सुदृढं बद्धसौहृदा ।
तस्याः कुलायमभवद् गेहे तस्य नरोत्तम ॥ ८२ ॥

नरोत्तम ! राजा ब्रह्मदत्तकी वह सहचरी उनके सुदृढ़ स्नेहपाशमें बँध गयी थी; अतः उन्हींके महलमें उसका घोंसला था ॥ ८२ ॥

सा सदाहनि निर्गत्य तस्य राज्ञो गृहोत्तमात् ।
चचाराम्भोधितीरेषु पल्वलेषु सरस्सु च ॥ ८३ ॥

वह दिनमें निरन्तर उस राजाके उत्तम महलसे निकलकर समुद्रके किनारे तथा तालाबों और तलैयाँपर विचरती थी ॥ ८३ ॥

नदीपर्वतकुञ्जेषु वनेषूपवनेषु च।
प्रफुल्लेषु तडागेषु कह्लारेषु सुगन्धिषु ॥ ८४ ॥
कुमुदोत्पलकिञ्जल्कसुरभीकृतवायुषु ।
हंससारसघुष्टेषु कारण्डवरुतेषु च ॥ ८५ ॥
चरित्वा तेषु सा राजन् निशि काम्पिल्यमागमत् ।

राजन् ! वह नदी, पर्वत, कुञ्ज, वन और उपवनोंमें तथा जिनमें सुगन्धित कमल खिले हुए थे, जहाँकी वायु कुमुद, उत्पल और किञ्जल्ककी सुगन्धसे वासित थी एवं जो हंस, सारस और कारण्डवके कलरवोंसे गुंजायमान थे—ऐसे तड़ागोंपर घूम-घामकर वह रात्रिके समय काम्पिल्यनगरमें लौट आती थी ॥ ८४-८५ १/२ ॥

नृपतेर्भवनं प्राप्य ब्रह्मदत्तस्य धीमतः ॥ ८६ ॥
राज्ञा तेन सदा राजन् कथायोगं चकार सा ।

राजन् ! वह बुद्धिमान् राजा ब्रह्मदत्तके महलमें पहुँचकर उस राजासे प्रतिदिन बातें किया करती थी ॥ ८६ १/२ ॥

आश्चर्याणि च दृष्टानि यानि वृत्तानि कानिचित् ॥ ८७ ॥
चरित्वा विविधान् देशान् कथयामास सा निशि ।

वह बहुत-से देशोंमें घूमकर जो कुछ आश्चर्यजनक घटनाएँ देखती थी, रात्रिके समय उन्हें (राजासे) कहा करती थी ॥ ८७ १/२ ॥

कदाचित् तस्य नृपतेर्ब्रह्मदत्तस्य कौरव ॥ ८८ ॥
पुत्रोऽभूद् राजशार्दूल सर्वसेनेति विश्रुतः।
पूजनीयाथ सा तस्मिन् प्रसूताण्डमथापि च ॥ ८९ ॥

कुरुवंशी राजशार्दूल ! एक समय राजा ब्रह्मदत्तके पुत्र हुआ, जिसका नाम सर्वसेन रखा गया । उसी समय उस पूजनीयाने भी वहाँ एक अंडा दिया ॥ ८८-८९ ॥

तस्मिन् नीडे पुरा ह्येकं तत्किल प्रास्फुटत् तदा ।
स्फुटितो मांसपिण्डस्तु बाहुपादास्र्यसंयुतः ॥ ९० ॥
बभूवक्त्रश्चक्षुर्हीनो बभूव पृथिवीपते ।
चक्षुष्मानप्यभूत् पश्चाद्दीप्तपक्षोत्थितश्च ह ॥ ९१ ॥

पृथिवीपते ! एक दिन उस घोंसलेमें उसका वह एक अण्डा फूटा और उसमेंसे एक मांस-पिण्ड निकला, जो हाथ-पैर और मुखसे युक्त था । उसका मुँह भूरे रंगका था; परंतु नेत्र नहीं प्रकट हुए थे। कुछ समय बाद उसके नेत्र खुल गये और उसमें छोटे-छोटे पंख भी निकल आये ॥ ९०-९१ ॥

अथ सा पूजनीया वै राजपुत्रस्वपुत्रयोः ।
तुल्यस्नेहात् प्रीतिमती दिवसे दिवसेऽभवत् ॥ ९२ ॥

तदनन्तर वह पूजनीया अपने बच्चे और राजकुमारपर समान स्नेह होनेके कारण प्रतिदिन एक-सी प्रीति रखने लगी ॥ ९२ ॥

आजहार सदा सायं चञ्च्वामृतफलद्वयम् ।
अमृतास्वादसदृशं सर्वसेनतनूजयोः ॥ ९३ ॥

वह सदा सायंकालमें अमृतके समान स्वादिष्ट रससे भरे हुए दो फल सर्वसेन और अपने बच्चेके लिये अपनी चोंचमें लाया करती थी ॥ ९३ ॥

७४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

स बालो ब्रह्मदत्तस्य पूजनीयासुतश्च ह।
ते फले भक्षयित्वा च पृथकौ प्रीतमानसौ ॥ ९४ ॥
अभूतां नित्यमेवेह खादन्तौ तौ च ते फले।
ब्रह्मदत्तका बालक और पूजनीयाका बच्चा—ये दोनों उन फलोंको खाकर बड़े प्रसन्न होते थे। इस प्रकार वे दोनों नित्य ऐसे फलोंको खाया करते थे ॥ ९४॥

तस्यां गतायामथ च पूजन्यां वै सदाहनि ॥ ९५ ॥
शिशुना चटकेनाथ धात्री तं तु शिशुं नृप।
तेन प्रक्रीडयामास ब्रह्मदत्तात्मजं सदा ॥ ९६ ॥
नीडात् तमाकृष्य तदा पूजनीयाकृतात् ततः।
राजन् ! प्रतिदिन उस पूजनीके चले जानेपर राजकुमारकी धाय उस चिड़ियाके बनाये हुए घोंसलेसे उसके बच्चेको खींचकर उसके द्वारा ब्रह्मदत्तके शिशु पुत्रको खेलाया करती थी ॥ ९५-९६॥

क्रीडता राजपुत्रेण कदाचिच्चटकः स तु ॥ ९७ ॥
निगृहीतः कन्धरायां शिशुना दृढमुष्टिना।
दुर्भेद्यमुष्टिना राजन्रसूनू सद्यस्त्वजीजहत् ॥ ९८ ॥
एक समय उस शिशु राजकुमारने खेलते-खेलते अपनी सुदृढ़ मुट्ठीमें उस बच्चेका गला पकड़ लिया। राजन् ! राजकुमारकी मुट्ठी बड़ी कठिनतासे खुल सकती थी। (अतएव दबाव पड़नेके कारण) उस चिड़ियाके बच्चेने तत्काल ही अपने प्राण त्याग दिये ॥ ९७-९८ ॥

तं तु पञ्चत्वमापन्नं व्यात्तास्यं बालघातितम्।
कथंचिन्मोचितं दृष्ट्वा नृपतिर्दुःखितोऽभवत् ॥ ९९ ॥
राजा ब्रह्मदत्तने उसको किसी प्रकार अपने पुत्रके हाथसे छुड़ाया; परंतु उसे मरा, मुख फैलाकर पड़ा हुआ तथा अपने बालकके द्वारा मारा गया देखकर वे दुखी हो गये ॥ ९९ ॥

धात्रीं तस्य जगर्हे तां तदाश्रुपरमो नृपः।
तस्थौ शोकान्वितो राजञ्छोचंस्तं चटकं तदा ॥१००॥
राजन् ! तब ब्रह्मदत्तने शोकाकुल हो नेत्रोंमें आँसू भरकर उस धायकी निन्दा की। फिर वे खड़े-खड़े उस बच्चेके लिये शोक करने लगे ॥ १०० ॥

पूजनीयापि तत्काले गृहीत्वा तु फलद्वयम्।
ब्रह्मदत्तस्य भवनमाजगाम वनेचरी ॥१०१॥
उसी समय वनमें विचरण करनेवाली पूजनीया भी दो फलोंको लेकर ब्रह्मदत्तके भवनमें आ पहुँची ॥ १०१ ॥

अथापश्यत् तमागम्य गृहे तस्मिन् नराधिप।
पञ्चभूतपरित्यक्तं शावं तं स्वतनुद्भवम् ॥१०२॥
राजन् ! उस भवनमें आकर उसने अपने शरीरसे उत्पन्न हुए बच्चेको पञ्चभूतोंसे रहित मुर्देके रूपमें देखा ॥ १०२ ॥

सुमोह दृष्ट्वा तं पुत्रं पुनः संज्ञामथालभत्।
लब्धसंज्ञा च सा राजन् विललाप तपस्विनी ॥१०३॥
राजन् ! पुत्रकी ऐसी दशा देखकर वह मूर्च्छित हो गयी। कुछ देर बाद उसे फिर चेतना आयी, तब वह तपस्विनी विलाप करने लगी ॥ १०३ ॥

पूजनीयोवाच
न तु त्वमागतां पुत्र वाशन्तीं परिसर्पसि।
कुर्वंश्चाटुसहस्त्राणि अव्यक्तकलया गिरा ॥१०४॥
पूजनीया बोली-पुत्र ! मैं आकर कूँ-कूँ शब्द कर रही हूँ, तब भी तू अस्फुट (तोतली) होनेसे मनोहर लगनेवाली वाणीमें हजारों बातें करता हुआ मेरे सामने क्यों नहीं आता ? ॥ १०४ ॥

व्यादितास्यः क्षुधार्तश्च पीतेनास्येन पुत्रक।
शोणेन तालुना पुत्र कथमद्य न सर्पसि ॥१०५॥
पुत्र ! क्षुधासे पीड़ित होकर अपने लाल-लाल तालु तथा पीली चोंचवाले मुखको खोलकर तू मेरे पास आज क्यों नहीं आता ? ॥ १०५ ॥

पक्षाभ्यां त्वां परिष्वज्य ननु वाशामिचाप्यहम्।
चीचीकूचीति वाशन्तं त्वामद्य न शृणोमि किम् ॥१०६॥
मैं तुझे अपने पंखोंसे लपेटकर रो रही हूँ, तब भी मैं तुझे चीं-चीं, कूँ-कूँ शब्द करता हुआ क्यों नहीं सुनती ? ॥

मनोरथो यस्तु मम पश्येयं पुत्रकं कदा।
व्यात्तास्यं वारि याचन्तं स्फुरत्पक्षं ममाग्रतः ॥१०७॥
स मे मनोरथो भग्नस्त्वयि पञ्चत्वमागते।
विलप्यैवं बहुविधं राजानमथ साब्रवीत् ॥१०८॥
मेरे मनमें जो यह अभिलाषा थी कि मैं अपने सामने अपने पुत्रको परोंको फटफटाकर चोंच फैलाकर जल माँगता हुआ कब देखूँगी, सो मेरा वह मनोरथ तेरे मरनेसे नष्ट हो गया—यों अनेक तरहसे विलाप करके वह राजासे बोली ॥ १०७-१०८ ॥

ननु मूर्धाभिषिक्तस्त्वं धर्मं वेत्सि सनातनम्।
अथ कस्मान्मम सुतं धात्र्या घातितवानसि ॥१०९॥
तव पुत्रेण चाकृष्य क्षत्रियाधम शंस मे।
'हे क्षत्रियाधम ! तू तो मूर्धाभिषिक्त (सम्राट्) राजा है और सनातनधर्मको जाननेवाला है, तो भी तूने मेरे बच्चेको धायसे और अपने पुत्रसे खिंचवाकर क्यों मरवा डाला ? इस बातका तू उत्तर दे ॥ १०९॥

न च नूनं श्रुता तेऽभूदियमाङ्गिरसी श्रुतिः ॥११०॥
शरणागतः क्षुधार्तश्च शत्रुभिश्वाभ्युपद्रुतः।
चिरोषितश्च स्वगृहे पातव्यः सर्वदा भवेत् ॥१११॥
'क्या तूने यह आङ्गिरसी श्रुति नहीं सुनी है कि 'शरणमें आये हुए, भूखसे व्याकुल, शत्रुओंद्वारा पीछा किये

हरिवंशपर्व ] विंशोऽध्यायः [ ७५


जाते हुए और चिरकालसे अपने घरमें रहनेवालेकी रक्षा सदा करनी चाहिये ॥ ११०-१११ ॥

अपालयन्नरो याति कुम्भीपाकमसंशयम्।
कथमस्य हविर्देवा गृह्णन्ति पितरः स्वधाम् ॥११२॥

'यदि मनुष्य इनकी रक्षा नहीं करता है तो वह निस्सन्देह कुम्भीपाक नरकमें पड़ता है। देवता ऐसे पुरुषकी हविको और पितर स्वधाको भला कैसे ग्रहण कर सकते हैं' ॥

एवमुक्त्वा महाराज दशधर्मगता सती।
शोकार्ता तस्य बालस्य चक्षुषी निर्बिभेद सा ॥११३॥
कराभ्यां राजपुत्रस्य ततस्तच्चक्षुरस्फुटत्।
कृत्वा चान्धं नृपसुतमुत्पपात ततोऽम्बरम् ॥११४॥

महाराज ! राजासे यों कहकर शोकसे आतुर होनेके कारण दशधर्म* को प्राप्त हुई उस पूजनीयाने अपने दोनों पञ्जोंसे उस राजकुमारके दोनों नेत्रोंको विदीर्ण कर दिया, जिससे उसकी आँखें फूट गयीं। इस प्रकार राजकुमारको अन्धा कर देनेके पश्चात् पूजनीया आकाशमें उड़ गयी ॥ ११३-११४ ॥

अथ राजा सुतं दृष्ट्वा पूजनीयामुवाच ह।
विशोका भव कल्याणि कृतं ते भीरु शोभनम् ॥११५॥

तब राजाने पुत्रकी ओर देखकर पूजनीयासे कहा—'कल्याणि ! अब तू शोकरहित हो जा। भीरु ! तूने बहुत अच्छा किया ॥ ११५ ॥

गतशोका निवर्तस्व अजर्यं सख्यमस्तु ते।
पुरेव वस भद्रं ते निवर्तस्व रमस्व च ॥११६॥

'अब तू शोकरहित होकर लौट आ। तेरी मैत्री सुदृढ़ बनी रहे। तेरा कल्याण हो, तू लौट आ और आनन्दपूर्वक पहलेकी भाँति यहीं रह ॥ ११६ ॥

पुत्रपीडोद्भवश्चापि न कोपः परमस्त्वयि।
ममास्ति सखि भद्रं ते कर्तव्यं च कृतं त्वया ॥११७॥

'सखि ! तेरा कल्याण हो। पुत्रको पीड़ा देनेपर भी मैं तेरे ऊपर कुपित नहीं हुआ हूँ। तूने वही किया, जो करना चाहिये था' ॥ ११७ ॥

पूजनीयोवाच

आत्मौपम्येन जानामि पुत्रस्नेहं तवाप्यहम्।
न चाहं वस्तुमिच्छामि तव पुत्रमचक्षुषम्।
कृत्वा वै राजशार्दूल त्वद् गृहे कृतकिल्बिषा ॥११८॥

नृपश्रेष्ठ ! मैं अपने ही समान तुम्हारे पुत्र-प्रेमको भी जानती हूँ, अतः तुम्हारे पुत्रको नेत्रहीन करनेके कारण अपराधिनी होकर तुम्हारे घरमें रहना नहीं चाहती ॥ ११८ ॥


* मनुष्यको व्याकुल और विवेकहीन बना देनेवाली जो क्रोध आदिकी दश दशायें हैं, उनको दशधर्म कहते हैं। देखिये पृ० ४९ की टिप्पणी।


गाथाश्चाप्युशनोगीता इमाः शृणु मयेरिताः।
कुमित्रं च कुदेशं च कुराजानं कुसौहृदम्।
कुपुत्रं च कुभार्यां च दूरतः परिवर्जयेत् ॥११९॥

आप मुझसे शुक्राचार्यकी गायी हुई इन गाथाओंको सुनें, 'खोटे मित्र, खोटे देश, खोटे राजा, खोटे सुहृद्-बन्धु, खोटे पुत्र तथा खोटी भार्याको दूरसे ही त्याग देना चाहिये' ॥ ११९॥

कुमित्रे सौहृदं नास्ति कुभार्यायां कुतो रतिः।
कुतः पिण्डः कुपुत्रे वै नास्ति सत्यं कुराजनि ॥१२०॥

खोटे मित्रमें प्रेम नहीं होता, कुभार्यासे सुख नहीं मिल सकता, कुपुत्रसे पिण्ड मिलना कठिन है और कुराजासे सत्य (न्याय) की आशा नहीं की जा सकती है ॥ १२० ॥

कुसौहृदे क विश्वासः कुदेशे न तु जीव्यते।
कुराजनि भयं नित्यं कुपुत्रे सर्वतोऽसुखम् ॥१२१॥

कुमित्रपर भला विश्वास कैसे हो सकता है और कुदेशमें जीना भी सम्भव नहीं है। खोटे राजासे सर्वदा भय बना रहता है और कुपुत्रसे तो सब प्रकारसे दुःख ही मिलता है ॥ १२१ ॥

अपकारिणि विश्रम्भं यः करोति नराधमः।
अनाथो दुर्बलो यद्वन्न चिरं स तु जीवति ॥१२२॥

जो अधम मनुष्य अपराधीपर विश्वास करता है, वह अनाथ और दुर्बल मनुष्यकी भाँति चिरकालतक जीवित नहीं रह सकता ॥ १२२ ॥

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।
विश्वासाद् भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ॥१२३॥

अविश्वासीका विश्वास न करे और विश्वासीपर भी अधिक विश्वास न करे; क्योंकि ऐसे लोगोंपर विश्वास करनेसे जो भय उत्पन्न होता है, वह जड़को भी काट डालता है ॥ १२३ ॥

राजसेविषु विश्वासं गर्भसंकरितेषु च।
यः करोति नरो मूढो न चिरं स तु जीवति ॥१२४॥

जो मनुष्य राजसेवकों तथा संकर जातियोंपर विश्वास करता है, वह मूढ चिरकालतक जीवित नहीं रह सकता ॥ १२४ ॥

अप्युन्नतिं प्राप्य नरः प्रावारः कीटको यथा।
स विनश्यत्यसंदेहमाहैवमुशना नृप ॥१२५॥

राजन् ! जैसे पंख निकलनेपर ऊपरको उड़ा हुआ चींटा मौतके मुखमें चला जाता है, उसी प्रकार ऐसे पुरुषोंपर विश्वास रखनेवाला पुरुष भी मारा जाता है, इसमें कुछ संदेह नहीं है—ऐसा शुक्राचार्यका कथन है ॥ १२५ ॥

७६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

अपि मार्दवभावेन गात्रं संलीय बुद्धिमान् ।
अरिं नाशयते नित्यं यथा वल्लीर्महाद्रुमम् ॥१२६॥
जैसे लता अपने शरीरको बचाये रखकर कोमलतासे महावृक्षका आलिङ्गन करके उसे सुखा देती है, उसी प्रकार बुद्धिमान् पुरुष भी अपने शरीरकी सदा रक्षा करते हुए नम्रता-पूर्वक शत्रु का नाश कर देते हैं ॥ १२६ ॥

मृदुराद्र्रः कृशो भूत्वा शनैः संलीयते रिपुः ।
वल्मीक इव वृक्षस्य पश्चान्मूलानि कृन्तति ॥१२७॥
जैसे दीमक कृश होनेपर भी आर्द्र (स्निग्ध) हो वृक्षमें लगकर शनैः-शनैः उसकी जड़को काट डालता है, इसी प्रकार शत्रु दुर्बल होनेपर भी स्निग्ध बनकर (स्नेह दिखाकर) शरीरमें घुस आता (और अवसर पानेपर) जड़से उखाड़ फेंकता है ॥ १२७ ॥

अद्रोहसमयं कृत्वा मुनीनामग्रतो हरिः।
जघान नमुचिं पश्चादपां फेनेन पार्थिव ॥१२८॥
राजन् ! इन्द्रने मुनियोंके सामने द्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा करके भी पीछे जलके फेनसे नमुचिको मार डाला था ॥ १२८ ॥

सुप्तं मत्तं प्रमत्तं वा घातयन्ति रिपुं नराः ।
विषेण वह्निना वापि शस्त्रेणाप्यथ मायया ॥१२९॥
मनुष्य सोये हुए, मतवाले तथा उन्मत्त शत्रुको विष, अग्नि, शस्त्र अथवा छल-कपटसे भी मार डालते हैं ॥ १२९ ॥

न च शेषं प्रकुर्वन्ति पुनर्बैरभयान्नराः ।
घातयन्ति समूलं हि श्रुत्वेमामुपमां नृप ॥१३०॥
राजन् ! मनुष्य बार-बारके वैर होनेके भयसे शत्रुको शेष नहीं रखते, वे तो इस निम्नाङ्कित उपमाको सुनकर शत्रुको जड़से ही नष्ट कर डालते हैं ॥ १३० ॥

शत्रुशेषमृणाच्छेषं शेषमग्नेश्च भूमिप ।
पुनर्वर्धेत सम्भूय तस्माच्छेषं न शेषयेत् ॥१३१॥
भूपाल ! यदि शत्रुको, ऋणको अथवा अग्निको (थोड़ा-सा भी) बाकी रहने दिया जाय तो ये फिर इकट्ठा होकर बढ़ने लगते हैं, अतः इनके शेषको भी शेष न रहने दे ॥ १३१ ॥

हसते जल्पते वैरी एकपात्रे भुनक्ति च ।
एकासनं चारोहति स्मरते तच्च किल्बिषम् ॥१३२॥
शत्रु यद्यपि एक साथ हँसता है, बोलता है, एक ही पात्रमें साथ-साथ भोजन भी करता है और एक ही आसनपर साथ-साथ बैठता है, तथापि पूर्व वैरका स्मरण तो करता ही रहता है ॥ १३२ ॥

कृत्वा सम्बन्धकं चापि विश्वसेच्छत्रुणा न हि ।
पुलोमानं जघानाजौ जामाता सन्शतक्रतुः ॥१३३॥
शत्रुसे सम्बन्ध करके भी उसके ऊपर विश्वास न करे; क्योंकि इन्द्रने जामाता (दामाद) होकर भी पुलोमाको युद्धमें मार डाला था ॥ १३३ ॥

निधाय मनसा वैरं प्रियं वक्तीह यो नरः।
उपसर्पेन्न तं प्राज्ञः कुरङ्ग इव लुब्धकम् ॥१३४॥
जो मनुष्य मनमें वैरको छिपाये हुए प्रिय बातें करता है, बुद्धिमान् पुरुष (उसपर विश्वास करके) उसके पास न जाय; ठीक उसी तरह, जैसे मृग बहेलियेके निकट नहीं जाता ॥ १३४ ॥

न चासन्ने निवस्तव्यं सवैरे वर्धिते रिपौ।
पातयेत् तं समूलं हि नदीरय इव द्रुमम् ॥१३५॥
यदि वैर रखनेवाला शत्रु बढ़ रहा हो तो उसके पास निवास नहीं करना चाहिये; क्योंकि जैसे बढ़ती हुई नदीका वेग वृक्षको गिरा देता है, इसी प्रकार वह उसको जड़से उखाड़ डालता है ॥ १३५ ॥

अमित्रादुन्नतिं प्राप्य नोन्नतोऽस्मीति विश्वसेत्।
तस्मात् प्राप्योन्नतिं नश्येत् प्रावार इव कीटकः ॥१३६॥
शत्रुसे उन्नति पानेपर 'मैं भी उन्नत हो गया हूँ' ऐसा विश्वास न करे। उससे उन्नति पानेपर भी मनुष्य प्रावार-कीट (पाँखवाले चींटे) की तरह नष्ट हो जाता है ॥ १३६ ॥

इत्येता ह्युशनोगीता गाथा धार्या विपश्चिता ।
कुर्वता चात्मरक्षां वै नरेण पृथिवीपते ॥१३७॥
पृथिवीनाथ ! विद्वान् पुरुष आत्मरक्षा करता हुआ शुक्राचार्यकी गायी हुई इन गाथाओंको अपने मनमें स्मरण रखे॥

मया सकिल्बिषं तुभ्यं प्रयुक्तमतिदारुणम् ।
पुत्रमन्धं प्रकुर्वन्त्या तस्मान्नो विश्वसे त्वयि ॥१३८॥
मैंने आपके पुत्रको अंधा बनाकर अति दारुण अपराध किया है, अतः अब मैं आपका विश्वास नहीं करूँगी ॥ १३८ ॥

एवमुक्त्वा प्रदुद्राव तदाऽऽकाशं पतत्रिणी ।
इत्येतत् ते मयाख्यातं पुराभूतमिदं नृप ॥१३९॥
ब्रह्मदत्तस्य राजेन्द्र यद् वृत्तं पूजनीयया ।
राजन् ! इस प्रकार कहकर वह चिड़िया आकाशमें उड़ गयी। राजेन्द्र ! प्राचीन कालमें ब्रह्मदत्तका पूजनीयाके साथ जो संवाद हुआ था, वह मैंने तुमसे कह दिया ॥ १३९½ ॥

श्राद्धं च पृच्छसे यन्मां युधिष्ठिर महामते ॥१४०॥
अतस्ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम् ।
गीतं सनत्कुमारेण मार्कण्डेयाय पृच्छते ॥१४१॥
महामति युधिष्ठिर ! अब तुम जिस श्राद्ध-विषयको मुझसे पूछ रहे थे, उसे सुनाता हूँ। मार्कण्डेयजीके पूछनेपर सनत्कुमारजीने जो कुछ कहा था, उसी प्राचीन इतिहास

हरिवंशपर्व ] एकविंशोऽध्यायः ७७


(के शेष भाग) को मैं तुमसे कहूँगा ॥ १४०-१४१ ॥

श्राद्धस्य फलमुद्दिश्य नियतं सुकृतस्य च ।
तन्निबोध महाराज सप्तजातिषु भारत ॥ १४२॥
सगालवस्य चरितं कण्डरीकस्य चैव हि ।
ब्रह्मदत्ततृतीयानां योगिनां ब्रह्मचारिणाम् ॥ १४३॥

महाराज ! भरतनन्दन ! भलीभाँति किये गये श्राद्धके नियत पुण्यफलको लक्ष्यमें रखकर कहे गये, गालव, कण्डरीक और तीसरे ब्रह्मदत्त—इन ब्रह्मचारी योगियोंके सातों जन्मोंके चरित्रको तुम सावधान होकर सुनो ॥ १४२-१४३॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पूजनीयोपाख्याने चटकाख्यानं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पूजनीयोपाख्यानमें चटक (चिड़िये) की कथा नामक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥


एकविंशोऽध्यायः

पितृकल्प—मार्कण्डेयजीद्वारा श्राद्धकी महिमाका वर्णन, श्राद्धके फलसे कौशिक-पुत्रोंको उत्तम जन्मकी प्राप्ति

मार्कण्डेय उवाच
श्राद्धे प्रतिष्ठितो लोकः श्राद्धे योगः प्रवर्तते ।
हन्त ते वर्तयिष्यामि श्राद्धस्य फलमुत्तमम् ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी बोले— यह सारा संसार श्राद्धमें ही प्रतिष्ठित है और श्राद्धसे ही योग सम्पन्न होता है। अतः मैं तुमसे श्राद्धके उत्तम फलका वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥

ब्रह्मदत्तेन यत् प्राप्तं सप्तजातिषु भारत ।
तत एव हि धर्मस्य बुद्धिर्निर्वर्तते शनैः ॥ २ ॥

भारत ! ब्रह्मदत्तने (भारद्वाज, कौशिक, व्याध, मृग, चक्रवाक, हंस और श्रोत्रिय—इन) सात जन्मोंमें जो (श्राद्ध) धर्मका फल पाया था, उसको सुननेसे शनैः-शनैः धर्म-बुद्धि प्राप्त हो जाती है ॥ २ ॥

पीडयाप्यथ धर्मस्य कृते श्राद्धे परानघ ।
यत् प्राप्तं ब्राह्मणैः पूर्वं तन्निबोध महामते ॥ ३ ॥

निष्पाप महामते ! प्राचीन कालमें कुछ ब्राह्मणोंने (हिंसारूपी अधर्मके द्वारा) धर्मको पीड़ित करनेपर भी श्राद्ध करके जो फल पाया था, उसे तुम सुनो ॥ ३ ॥

ततोऽहं तानधर्मिष्ठान् कुरुक्षेत्रे पितृव्रतान् ।
सनत्कुमारनिर्दिष्टानपश्यं सप्त वै द्विजान् ॥ ४ ॥
दिव्येन चक्षुषा तेन यानुवाच पुरा विभुः ।

विभु सनत्कुमारजीने जिनका वर्णन किया था, मैने अपने दिव्य नेत्रसे सनत्कुमारजीके बताये हुए उन सात ब्राह्मणोंको अधर्ममे परायण होनेपर भी कुरुक्षेत्रमें श्राद्ध करते देखा ॥ ४½ ॥

वाग्दुष्टः क्रोधनो हिंस्रः पिशुनः कविरेव च ।
खसृमः पितृवर्ती च नामभिः कर्मभिस्तथा ॥ ५ ॥

उनके नाम इस प्रकार थे—वाग्दुष्ट, क्रोधन, हिंस्र, पिशुन, कवि, खसृम (ख अर्थात् आकाशमें सरण करने—विचरनेके स्वभाववाला परलोकार्थी) और पितृवर्ती। जैसे उनके नाम थे, वैसे ही उनके कर्म थे ॥ ५ ॥

कौशिकस्य सुतास्तात शिष्या गार्ग्यस्य भारत ।
पितुर्युपरते सर्वे व्रतवन्तस्तदाभवन् ॥ ६ ॥

तात ! भारत ! वे कौशिक (विश्वामित्र) के पुत्र थे और जब इनके पिता विश्वामित्र* शाप देकर उदासीन हो गये, तब वे सभी गार्ग्यके शिष्य बनकर (ब्रह्मचर्य) व्रतका पालन करनेके लिये उनके यहाँ रहने लगे ॥ ६ ॥

विनियोगाद् गुरोस्तस्य गां दोग्ध्रीं समकालयन् ।
समानवत्सां कपिलां सर्वे न्यायागतां तदा ॥ ७ ॥
तेषां पथि क्षुधार्तानां बाल्यान्मोहाच्च भारत ।
क्रूरा बुद्धिः सम्भवत् तां गां वै हिंसितुं तदा ॥ ८ ॥

भारत ! एक समय वे सब गुरुके आज्ञा देनेपर उनकी दुधार कपिला गौ और उसके कपिल वर्णके बछड़ेको वनमे चरानेके लिये ले गये। वह गौ गुरु गार्ग्यको न्यायतः प्राप्त हुई थी। मार्गमें क्षुधासे पीड़ित होनेके कारण उन्होंने मोह और मूर्खताके कारण गौको मारनेका क्रूर विचार किया ॥ ७-८ ॥

तान् कविः खसृमश्चैव याचेते नेति वै तदा ।
न चाशक्नुवन्त ते ताभ्यां तदा वारयितुं द्विजाः ॥ ९ ॥


* विश्वामित्रने अपने पचास पुत्रोंको शाप देते हुए कहा था—तुम्हारे वंशका अन्त हो जाय, तुम अपनी प्रजाका भक्षण करो अर्थात् अब तुम्हारे पुत्र आदि ब्राह्मण नहीं कहलायेंगे। इस प्रकार तुम अपनी प्रजा (के ब्राह्मणत्व) का भक्षण करोगे। उन पचास पुत्रोंमेंसे ये वाग्दुष्ट आदि भी हैं। सुना जाता है कि अन्ध्र, पुण्ड्र आदि भी इनकी ही संतानें हैं। (नीलकण्ठी)

७८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

उस समय कवि और खसने उनसे ऐसा न करनेकी प्रार्थना की; परंतु वे ब्राह्मण इनके द्वारा किसी प्रकार भी रोके न जा सके ॥ ९ ॥

पितृवर्ती तु यस्तेषां नित्यं श्राद्धाहिको द्विजः।
स सर्वानब्रवीद् भ्रातृन् कोपाद्धर्मे समाहितः ॥ १० ॥

तब उनमें जो प्रतिदिन श्राद्ध करनेवाला धर्मात्मा पितृवर्ती नामक द्विज था, वह उन सब भाइयोंसे बिगड़कर बोला ॥ १० ॥

यद्यवश्यं प्रहन्तव्या पितॄनुद्दिश्य साध्विमाम्।
प्रकुर्वीमहि गां सम्यक् सर्व एव समाहिताः ॥ ११ ॥

'यदि इसे अवश्य ही मारना है तो हमें चित्तको सावधान-कर इसे पितरोंके निमित्त ही मारना चाहिये ॥ ११ ॥

एवमेषापि गौर्धर्मं प्राप्स्यते नात्र संशयः।
पितॄनभ्यर्च्य धर्मेण नाधर्मोऽस्मान् भविष्यति ॥ १२ ॥

'ऐसा करनेसे इस गौको भी निस्संदेह धर्मकी प्राप्ति होगी और धर्मपूर्वक पितरोंका पूजन कर देनेसे हमें भी अधर्म न लगेगा' ॥ १२ ॥

तथेत्युक्त्वा च ते सर्वे प्रोक्षयित्वा च गां ततः।
पितृभ्यः कल्पयित्वैनामुपायुञ्जत भारत ॥ १३ ॥

भारत ! तब उन सबने 'तथास्तु' कहकर गौका प्रोक्षण किया और उसको पितरोंके निमित्त अर्पित करके उसका मनमाना उपयोग किया ॥ १३ ॥

उपयुज्य च गां सर्वे गुरोस्तस्य न्यवेदयन्।
शार्दूलेन हता धेनुर्वत्सोऽयं गृह्यतामिति ॥ १४ ॥

गौको उपयोगमें लाकर उन सबोंने गुरुजीसे निवेदन किया कि 'गायको तो सिंहने मार डाला, यह उसका बछड़ा है, इसे आप ग्रहण कीजिये' ॥ १४ ॥

आर्जवात् स तु तं वत्सं प्रतिजग्राह वै द्विजः।
मिथ्योपचर्य ते तं तु गुरुमन्यायतो द्विजाः।
कालेन समयुज्यन्त सर्व एवायुषः क्षये ॥ १५ ॥

सरलस्वभाव होनेके कारण उन ब्राह्मणने भी उस बछड़ेको ग्रहण कर लिया । इस प्रकार वे ब्राह्मण अन्यायद्वारा अपने गुरुको धोखा देकर आयु समाप्त होनेपर मृत्युको प्राप्त हुए ॥ १५ ॥

ते वै क्रूरतया हिंस्रा अनार्यत्वाद् गुरौ तथा।
उग्रा हिंसाविहाराश्च सत्ताजायन्त सोदराः ॥ १६ ॥

तत्पश्चात् अपनी क्रूरता और गुरुसे अनार्यताका व्यवहार करनेके कारण वे सात भाई उग्र स्वभाववाले, हिंसाविहारी व्याध बनकर उत्पन्न हुए ॥ १६ ॥

लुब्धकस्यात्मजास्तात बलवन्तो मनस्विनः।
पितॄनभ्यर्च्य धर्मेण प्रोक्षयित्वा च गां तदा ॥ १७ ॥
स्मृतिः प्रत्यवमर्शश्च तेषां जात्यन्तरेऽभवत्।
जाता व्याधा दशार्णेषु सप्त धर्मविचक्षणाः ॥ १८ ॥

तात ! उस समय वे एक बहेलियेके बलवान् एवं मनस्वी पुत्र हुए । उन्होंने धर्मतः पितरोंका पूजनकर गौका प्रोक्षण किया था; इसलिये दूसरा जन्म पानेपर भी उनको अपने पूर्वजन्म और पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंका स्मरण बना रहा। वे सातों दशार्ण देशमें धर्मकुशल व्याध बनकर उत्पन्न हुए थे ॥ १७-१८ ॥

स्वकर्मनिरताः सर्वे लोभानृतविवर्जिताः।
तावन्मात्रं प्रकुर्वन्ति यावता प्राणधारणम् ॥ १९ ॥

वे सब लोभ और असत्यसे दूर रहते हुए अपने कर्ममें तत्पर रहते थे और उतना ही भोजन करते थे, जिससे प्राण टिके रहें ॥ १९ ॥

शेषं ध्यानपराः कालमनुध्यायन्ति कर्म तत् ।
नामधेयानि चाप्येषामिमान्यासन्नराधिप ॥ २० ॥

राजन् ! उनके पास जो समय बचता था, उसमें ध्यानमग्न हो वे अपने (पूर्वजन्मके) कर्मका चिन्तन करते रहते थे। इस जन्ममें उनके नाम इस प्रकार थे— ॥ २० ॥

निर्वैरो निर्वृतिः शान्तो निर्मन्युः कृतिरेव च।
वैधसो मातृवर्ती च व्याधाः परमधार्मिकाः ॥ २१ ॥

निर्वैर, निर्वृति, शान्त, निर्मन्यु, कृति, वैधस और मातृवर्ती। ये सभी व्याध परम धार्मिक थे ॥ २१ ॥

तैरवसुषितैस्तात हिंसाधर्मरतैः सदा।
माता च पूजिता वृद्धा पिता च परितोषितः ॥ २२ ॥

तात ! इस प्रकार वे दशार्णदेशमें रहकर हिंसा में भी धर्मका पालन करते रहते थे। वे अपनी वृद्धा माताका सत्कार करते थे और पिताको भी संतुष्ट रखते थे ॥ २२ ॥

यदा माता पिता चैव संयुक्तौ कालधर्मणा।
तदा धनूंषि ते त्यक्त्वा वने प्राणानवासृजन् ॥ २३ ॥

जब उनके माता-पिता मर गये, तब उन्होंने अपने-अपने धनुषका परित्याग कर वनमें (अनशन आदिके द्वारा) अपने प्राण त्याग दिये ॥ २३ ॥

शुभेन कर्मणा तेन जाता जातिस्मरा मृगाः।
त्रासानुत्पाद्य संविग्ना रम्ये कालञ्जरे गिरौ ॥ २४ ॥

(माता-पिताकी सेवारूप) शुभ कर्मके कारण वे पूर्व-जन्मका स्मरण रखनेवाले मृग बनकर उत्पन्न हुए। (पहले हिंसाके द्वारा दूसरोंको) त्रास देनेके कारण वे रमणीय कालञ्जर पर्वतपर सदा उद्विग्न रहते थे ॥ २४ ॥

उन्मुखो नित्यवित्रस्तः स्तब्धकर्णो विलोचनः।
पण्डितो घस्मरो नादी नामतस्तेऽभवन् मृगाः ॥ २५ ॥

हरिवंशपर्व ] एकविंशोऽध्यायः [ ७९

उन मृगोंके नाम उन्मुख, नित्यवित्त्रस्त, स्तब्धकर्ण, विलोचन, पण्डित, घसमर और नादी थे ॥ २५ ॥
तमेवार्थमनुध्यायन्तो जातिस्मरणसम्भवम् ।
आसन् वनचराः शान्ता निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः॥ २६ ॥

( उस जन्ममें भी ) पूर्व जन्मकी स्मृति होनेसे याद आये हुए उन्हीं कर्मों और उनके फलोंका स्मरण करते हुए वे मृग धैर्यपूर्वक कष्ट सहन करते, शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंकी परवा नहीं करते और परिग्रह ( हिरनियोंके संग ) से दूर रहकर वनमें घूमते रहते थे ॥ २६ ॥
ते सर्वे शुभकर्माणः सधर्माणो वनेचराः ।
योगधर्ममनुप्राप्ता विहरन्ति स्म तत्र ह ॥ २७ ॥

वे सब समानरूपसे धर्मका पालन करते और शुभकर्मोंमें तत्पर रहते थे एवं योगधर्मका आश्रय लेकर ( आत्मविचार करते हुए ) वनमें इधर-उधर घूमते रहते थे ॥ २७ ॥
जहुः प्रांणान्मरुं साध्यं लघ्वाहारास्तपस्विनः ।
तेषां मरुं साधयतां पदस्थानानि भारत ।
तथैवाद्यापि दृश्यन्ते गिरौ कालञ्जरे नृप ॥ २८ ॥

भारत ! उन मृगोंने हल्का आहार तथा मरु ( निर्जल रहने ) की साधना करके तपस्यामे तत्पर हो वहाँ अपने प्राण त्याग दिये । राजन् ! जल न पीनेकी साधना करनेवाले उन मृगोंके पैरोंके चिह्न कालञ्जर पर्वतपर अब भी पूर्ववत् दिखायी देते हैं ॥ २८ ॥
कर्मणा तेन ते तात शुभेनाशुभवर्जिताः ।
शुभाच्छुभतरां योनिं चक्रवाकत्वमागताः ॥ २९ ॥

तात ! इस शुभ कर्मके कारण वे अशुभ योनिसे छूटकर अतिशुभ चक्रवाककी योनिमें उत्पन्न हुए ॥ २९ ॥
शुभे देशे शरद्वीपे सप्तैवासञ्जलौकसः ।
त्यक्त्वा सहचरीधर्मं मुनयो ब्रह्मचारिणः ॥ ३० ॥

वे सातों कल्याणमय शरद्वीप ( जलद्वीप ) में जलचर पक्षी बनकर उत्पन्न हुए । वहाँ भी वे सहचरीधर्म अर्थात् सहवासका त्यागकर ब्रह्मचारी मुनि बनकर रहने लगे ॥ ३० ॥
निःस्पृहो निर्ममः क्षान्तो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।
निर्वृत्तिर्निभृतश्चैव शकुना नामतः स्मृताः ॥ ३१ ॥

( इस चक्रवाक-जन्ममें ) उनके नाम निःस्पृह, निर्मम, क्षान्त, निर्द्वन्द्व, निष्परिग्रह, निर्वृत्ति और निभृत थे ॥ ३१ ॥
ते तत्र पक्षिणः सर्वे शकुना धर्मचारिणः ।
निराहारा जहुः प्राणांस्तपोयुक्ताः सरित्तटे ॥ ३२ ॥

उन सब धर्माचारी पक्षियोंने नदीके किनारेपर निराहार रहकर तप करते-करते अपने प्राणोंको त्याग दिया ॥ ३२ ॥
अथ ते सोदरा जाता हंसा मानसचारिणः ।
जातिस्मराः सुसंयुक्ताः सप्तैव ब्रह्मचारिणः ॥ ३३ ॥

तदनन्तर वे सातो सहोदर भाई मानसरोवरपर विचरने-वाले हंसके रूपमें उत्पन्न हुए । इस जन्ममें भी उनको अपने ( पूर्व ) जन्मोंका स्मरण बना रहता था । अतः वे सातों ही सदा साथ रहकर पूर्णरूपसे ब्रह्मचर्यका पालन करते थे ॥ ३३ ॥
विप्रयोनौ यतो मोहान्मिथ्योपचरितो गुरुः ।
तिर्यग्योनौ ततो जाताः संसारे परिवभ्रमुः ॥ ३४ ॥

उन्होंने ब्राह्मणयोनिमें मोहवश अपने गुरुसे मिथ्या-भाषण किया था, इसलिये वे तिर्यग्योनिमे उत्पन्न होकर संसारमे भटक रहे थे ॥ ३४ ॥
यतश्च पितृवाक्यार्थः कृतः स्वार्थे व्यवस्थितैः ।
ततो ज्ञानंच जातिं च ते हि प्रापुर्गुणोत्तराम् ॥ ३५ ॥

स्वार्थमें तत्पर रहनेपर भी उन्होंने पितरोंके श्राद्धनिमित्त संकल्प बोलकर कार्य किया था, इसलिये उन्हें उत्तरोत्तर उत्कृष्ट गुणसे युक्त ज्ञान और जन्म मिलता गया ॥ ३५ ॥
सुमनाः शुचिवाक्छुद्धः पञ्चमश्छिद्रदर्शनः ।
सुनेत्रश्च स्वतन्त्रश्च शकुना नामतः स्मृताः ॥ ३६ ॥

( इस जन्ममे ) उन हंसोंके नाम थे—सुमना, शुचिवाक्, शुद्ध, पञ्चम, छिद्रदर्शन, सुनेत्र और स्वतन्त्र ॥ ३६ ॥
पञ्चमः पाञ्चिकस्तत्र सप्तजातिष्वजायत ।
षष्ठस्तु कण्डरीकोऽभूद् ब्रह्मदत्तस्तु सप्तमः ॥ ३७ ॥

उन ( वाग्दुष्ट आदि कौशिक-पुत्रों ) में जो पाँचवाँ ( कवि ) था, वह भावी सातवें जन्ममे पाञ्चिक ( नामक राजमन्त्री ) हुआ । छठा ( खसम भावी मनुष्य-जन्ममे ) कण्डरीक हुआ और सातवाँ ( पितृवर्ती भावी सातवें जन्ममे ) ब्रह्मदत्त हुआ ॥ ३७ ॥
तेषां तु तपसा तेन सप्तजातिकृतेन वै ।
योगस्य चापि निर्वृत्त्या प्रतिभानाच्च शोभनात् ॥ ३८ ॥
पूर्वजातिषु यद् ब्रह्म श्रुतं गुरुकुलेषु वै ।
तथैवावस्थिता बुद्धिः संसारेष्वपि वर्तताम् ॥ ३९ ॥

उन्होंने सातों जन्मोंमें जो तप किया, उससे, योग-सिद्धिसे, पूर्वजन्मके कर्मोंकी स्मृति होनेसे तथा पूर्वजन्ममें गुरुकुलमें रहकर जो वेदाध्ययन किया गया था, उसके प्रभावसे संसारमें भ्रमण करनेपर भी उनकी बुद्धि वैसी ही बनी रही, बदली नहीं ॥३८-३९॥
ते ब्रह्मचारिणः सर्वे विहङ्गा ब्रह्मवादिनः ।
योगधर्ममनुध्यायन्तो विहरन्ति स्म तत्र ह ॥ ४० ॥

वे सभी आकाशचारी हंस ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मवादी होकर योगधर्मका पालन करते हुए विचरते रहे ॥ ४० ॥
तेषां तत्र विहङ्गानां चरतां सहचारिणाम् ।
नीपानामेश्वरो राजा विभ्राजः पौरवान्वयः ॥ ४१ ॥

८०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

विभ्राजमानो वपुषा प्रभावेन समन्वितः।
श्रीमानन्तःपुरवृतो वनं तत्रप्रविवेश ह ॥ ४२ ॥

इस प्रकार वे सब पक्षी वहाँ साथ-साथ विचर रहे थे, इतनेहीमें नीपोंका स्वामी पौरववंशी श्रीमान् विभ्राज अपने शरीरकी कान्तिसे प्रकाशित होता और अपना प्रभाव दिखाता हुआ अपने अन्तःपुरको लेकर उस वनमें आया ॥ ४१-४२ ॥

स्वतन्त्रश्च विहङ्गोऽसौ स्पृहयामास तं नृपम् ।
दृष्ट्वाऽऽयान्तं श्रियोपेतं भवेयमहमीदृशः ॥ ४३ ॥

यद्यस्ति सुकृतं किञ्चित्तपो वा नियमोऽपि वा ।
खिन्नोऽस्मि ह्युपवासेन तपसा निष्फलेन च ॥ ४४ ॥

तब स्वतन्त्र नामवाले हंसने वहाँ आये हुए उस लक्ष्मीवान् राजाको देखकर उसके समान बननेकी कामना की । ( वह विचारने लगा कि ) यदि मेरे पास कुछ भी पुण्य, तप या नियम हो, तो मैं इस राजाके समान हो जाऊँ । अब मैं इस उपवास और निष्फल तपसे खिन्न हो रहा हूँ ॥ ४३-४४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलेषु हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीमद्भारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥


द्वाविंशोऽध्यायः

पितृकल्प, शुचिवाक् पक्षीका स्वतन्त्र आदि तीन पक्षियोंको शाप देना, सुमना पक्षीका अनुग्रहपूर्वक उन्हें शापसे मुक्त करना

मार्कण्डेय उवाच

ततस्तं चक्रवाकौ द्वावूचतुः सहचारिणौ ।
आवां ते सचिवौ स्यावस्तव प्रियहितैषिणौ ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी बोले---उस समय उस स्वतन्त्र पक्षीके साथमें रहनेवाले दो चक्रवाकोंने उससे कहा,—हम आपका प्रिय एवं हित चाहनेवाले आपके मन्त्री बनेंगे ॥ १ ॥

तथेत्युक्त्वा च तस्यासीत् तदा योगात्मिका मतिः ।
एवं ते समयं चक्रुः शुचिवाक् तमुवाच ह ॥ २ ॥

तब स्वतन्त्रने कहा, 'बहुत अच्छा' । यों कहकर वह पुनः अपने योगधर्मका विचार करने लगा । जब इस प्रकार उन तीनोंने प्रतिज्ञा कर ली, तब शुचिवाकने उस (स्वतन्त्र) से कहा ॥ २ ॥

यस्मात् कामप्रधानस्त्वं योगधर्ममपास्य वै ।
एवं वरं प्रार्थयसे तस्माद् वाक्यं निबोध मे ॥ ३ ॥

तू योगधर्मको छोड़कर कामप्रधान धर्मकी कामनासे ऐसा वर माँग रहा है, इसलिये तू मेरा यह शाप सुन ले ॥ ३ ॥

राजा त्वं भविता तात काम्पिल्ये नात्र संशयः ।
भविष्यतः सखायौ च द्वाविमौ सचिवौ तव ॥ ४ ॥

तात ! तू काम्पिल्य नगरका राजा बनकर उत्पन्न होगा, इसमें संदेह नहीं । तेरे ये दोनों मित्र भी तेरे मन्त्री बनकर उत्पन्न होंगे ॥ ४ ॥

शप्त्वा चानभिभाष्यांस्तांश्चत्वारश्चकुरण्डजाः ।
तांस्त्रीनभीप्सतो राज्यं व्यभिचारप्रदर्शितान् ॥ ५ ॥

(इस प्रकार) शेष चार पक्षियोंने राज्यकी इच्छा करके योगधर्मसे भ्रष्ट होनेवाले उन तीन पक्षियोंको शाप देकर उनसे बोलना भी छोड़ दिया ॥ ५ ॥

शस्ताः खगास्त्रयस्ते तु योगभ्रष्टा विचेतसः ।
तानयाचन्त चतुरस्त्रयस्ते सहचारिणः ॥ ६ ॥

इस प्रकार योगभ्रष्ट होनेके कारण शापसे ग्रस्त हुए वे तीनों पक्षी डरके मारे अचेत हो गये। उन तीनों साथियोंने चारों पक्षियोंसे ( शापका अनुग्रह करनेकी ) प्रार्थना की ॥ ६ ॥

तेषां प्रसादं ते चक्रुरथैतान् सुमनाऽब्रवीत् ।
सर्वेषामेव वचनात्प्रसादानुगतं वचः ॥ ७ ॥

तब उन्होंने उनके ऊपर कृपाकी और सबकी सम्मतिसे सुमनाने अनुग्रहपूर्वक यह बात कही—॥ ७ ॥

अन्तवान् भविता शापो युष्माकं नात्र संशयः ।
इतश्च्युताश्च मानुष्यं प्राप्य योगमवाप्स्यथ ॥ ८ ॥

'इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे इस शापका शीघ्र ही अन्त होगा। यहाँ योगसे भ्रष्ट होकर तुम मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होगे और अन्तमें फिर तुम्हें योगज्ञान प्राप्त होगा ॥ ८ ॥

सर्वसत्त्वरुतज्ञश्च स्वतन्त्रोऽयं भविष्यति ।
पितृप्रसादो ह्यस्माभिरस्य प्रातः कृतेन वै ॥ ९ ॥
गां प्रोक्षयित्वा धर्मेण पितृभ्य उपकल्प्यताम् ।
अस्माकं ज्ञानसंयोगः सर्वेषां योगसाधनः ॥ १० ॥

'यह स्वतन्त्र नामक हंस सब जीवोंकी बोली समझनेवाला होगा । पूर्वजन्ममें इसीके कथनानुसार कार्य करनेसे हमें पितरोंकी कृपा प्राप्त हुई । इसने कहा था कि 'गौका प्रोक्षण करके इसे पितरोंको अर्पित किया जाय ।' इसीके पालनसे हम सबको योगसाधक ज्ञानकी प्राप्ति हुई है ॥ ९-१० ॥

हरिवंशपर्व ] त्रयोविंशतितमोऽध्यायः [ ८१


इमं च वाक्यसंदर्भश्लोकमेकमुदाहृतम्।
पुरुषान्तरितं श्रुत्वा ततो योगमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥

उस मनुष्य-जन्ममें जब कोई पुरुष तुम्हें यह आगे बताया जानेवाला वाक्य संदर्भरूप ( 'सप्तव्याधा दशार्णेषु' आदि)* श्लोक सुनावेगा, तब तुम्हें यह मोक्ष देनेवाला ज्ञानमय योग-धर्म फिर प्राप्त हो जायगा ॥ ११ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥


त्रयोविंशतितमोऽध्यायः

हंसोंका काम्पिल्यनगरमें ब्रह्मदत्त आदिके रूपमें उत्पन्न होना और चार हंसोंका अपने पितासे आज्ञा लेकर मुक्त हो जाना

मार्कण्डेय उवाच

ते योगधर्मनिरताः सप्त मानसचारिणः।
पद्मगर्भोऽरविन्दाक्षः क्षीरगर्भः सुलोचनः ॥ १ ॥
उरुविन्दुः सुविन्दुश्च हैमगर्भस्तु सप्तमः।
वाय्वम्बुभक्षाः सततं शरीराण्युपशोषयन् ॥ २ ॥

मार्कण्डेयजीने कहा— तदनन्तर, योगधर्ममें निरत रहनेवाले उन सात मानसचारी हंसोंने, जो पद्मगर्भ, अरविन्दाक्ष, क्षीरगर्भ, सुलोचन, उरुविन्दु, सुविन्दु और हैमगर्भ नाम धारण करते थे, केवल जल और वायुका ही भक्षण करके अपने शरीरको सुखाना आरम्भ कर दिया ॥ १-२ ॥

राजा विभ्राजमानस्तु वपुषा तद् वनं तदा।
चचारान्तःपुरवृतो नन्दनं मघवानिव ॥ ३ ॥

इधर वह राजा अपने शरीरसे प्रकाश फैलाता हुआ अपनी स्त्रियोंको साथ ले उस वनमें इस प्रकार घूमने लगा, जैसे नन्दनवनमें इन्द्र घूमते हों ॥ ३ ॥

स तानपश्यत्खचरान् योगधर्मात्मकान् नृप।
निर्वेदाच्च तमेवार्थमनुध्यायन् पुरं ययौ ॥ ४ ॥

राजन् ! उस राजाने उन पक्षियोंको (एकाग्रता आदि बाह्य लक्षणोंसे) योगधर्ममें परायण देखा। इससे वह (पक्षी भी योगसाधन करते हैं। हाय ! मैं मनुष्य होकर भी योग-साधन न कर सका। इस प्रकार) कुछ निर्विण्ण होकर, उसी बातको सोचता हुआ अपने नगरको चला गया ॥ ४ ॥

अणुहो नाम तस्याऽऽसीत्पुत्रः परमधार्मिकः।
अणुधर्मरतिर्नित्यमणुं सोऽप्यगमत्पदम् ॥ ५ ॥

उसके अणुह† नामक परम धार्मिक पुत्र था ! वह अणुह धर्मके सूक्ष्म तत्त्वके चिन्तनमें अनुरक्त था। इसलिये उसे अणुपद (ब्रह्मके सूक्ष्म स्वरूपका बोध) प्राप्त हुआ था ॥ ५ ॥

प्रादात्कन्यां शुकस्तस्मै कृत्वीं पूजितलक्षणाम्।
सत्यशीलगुणोपेतां योगधर्मरतां सदा ॥ ६ ॥

उसको शुकने श्रेष्ठ लक्षणोंवाली सत्यशील एवं अन्यान्य गुणोंसे सम्पन्न और सदा योगधर्मका पालन करनेवाली अपनी कन्या कृत्त्वी अर्पित की थी ॥ ६ ॥

सा ह्युद्दिष्टा पुरा भीष्म पितृकन्या मनीषिणी।
सनत्कुमारेण तदा संनिधौ मम शोभना ॥ ७ ॥

भीष्म ! जैसा कि सनत्कुमारजीने पहले मुझे बताया था, वह सुन्दरी कन्या कृत्त्वी पितरोंकी ही बुद्धिमती कन्या (पीवरी) थी ॥ ७ ॥

सत्यधर्मभृतां श्रेष्ठा दुर्विज्ञेया कृतात्मभिः।
योगा च योगपत्नी च योगमाता तथैव च ॥ ८ ॥

वह सत्यधर्मका पालन करनेवाली नारियोंमें श्रेष्ठ थी। पुण्यात्मा पुरुष भी उसके स्वरूपको बड़ी कठिनतासे समझ सकते थे। वह स्वयं तो योगिनी थी ही, योगीकी ही पत्नी और योगीकी ही माता भी थी ॥ ८ ॥

यथा ते कथितं पूर्वं पितृकल्पेषु वै मया।
विभ्राजस्त्वणुहं राज्ये स्थापयित्वा नरेश्वरः ॥ ९ ॥
आमन्त्र्य पौरान् प्रीतात्मा ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च।
प्रायात् सरस्तत्प्रभृतं यत्र ते सहचारिणः ॥ १० ॥

मैंने पहले पितृ-कल्पके समय ये सब बातें तुम्हें बतायी थीं। राजा विभ्राज अणुहको राज्यसिंहासनपर बैठाकर प्रसन्नचित्त हो पुरवासियोंसे विदा ले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर जहाँ वे सहचारी हंस रहते थे, उस सरोवरपर तप करनेके लिये चले गये ॥ ९-१० ॥

स वै तत्र निराहारो वायुभक्षो महातपाः।
त्यक्त्वा कामांस्तपस्तेपे सरसस्तस्य पार्श्वतः ॥ ११ ॥

वे उस सरोवरके तटपर सब कामनाओंको त्याग निराहार रह वायुको ही पीकर तपस्या करने लगे ॥ ११ ॥


* 'सप्तव्याधा दशार्णेषु' आदि वाक्य चौबीसवें अध्यायका बीसवाँ और इक्कीसवाँ श्लोक है।
† अणुह शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—(अणून्-सूक्ष्मान् धर्मान् इन्ति प्राप्नोतीति अणुहः-सूक्ष्म तत्त्वोंको समझनेकी शक्तिवाला)

८२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तस्य संकल्प आसीच्च तेषामेकतरस्य वै।
पुत्रत्वं प्राप्य योगेन युज्येयमिति भारत ॥ १२ ॥

भारत ! उनका यह संकल्प था कि मैं इन (योगी हंसोंमेंसे) किसी एकका पुत्र बनकर उत्पन्न होऊँ तो मैं भी योगधर्मका पालन कर सकूँगा ॥ १२ ॥

कृत्वाभिसन्धिं तपसा महता स समन्वितः।
महातपाः स विभ्राजो विरराजांशुमानिव ॥ १३ ॥

इस प्रकार विचार करके वे महातपस्वी विभ्राज बड़ा भारी तप करके सूर्यके समान सुशोभित होने लगे ॥ १३ ॥

ततो विभ्राजितं तेन वैभ्राजं नाम तद्वनम्।
सरस्तच्च कुरुश्रेष्ठ वैभ्राजमिति संज्ञितम् ॥ १४ ॥

कुरुश्रेष्ठ ! उन्होंने (अपने तपसे) उस वनको विभ्राजित (प्रकाशित) कर दिया। इसलिये वह सरोवर और वह वन भी वैभ्राज सरोवर और वैभ्राज वनके नामसे प्रसिद्ध हो गये ॥ १४ ॥

तत्र ते शकुना राजंश्चत्वारो योगधर्मिणः।
योगभ्रष्टास्त्रयश्चैव देहन्यासकृतोऽभवन् ॥ १५ ॥

राजन् ! (इसी समय) उस सरोवरपर उन योगधर्मका पालन करनेवाले चार हंसोंने तथा योगभ्रष्ट तीन हंसोंने भी अपने शरीरको त्याग दिया ॥ १५ ॥

काम्पिल्ये नगरे ते तु ब्रह्मदत्तपुरोगमाः।
जाताः सप्त महात्मानः सर्वे विगतकल्मषाः ॥ १६ ॥

वे सातों निष्पाप महात्मा काम्पिल्य नगरमें ब्रह्मदत्त आदि (नामोंसे) उत्पन्न हुए ॥ १६ ॥

ज्ञानध्यानतपःपूजावेदवेदाङ्गपारगाः ।
स्मृतिमन्तोऽत्र चत्वारस्त्रयस्तु परिमोहिताः ॥ १७ ॥

ये सब ज्ञान, ध्यान, तप और पूजामें लगे रहते थे और वेद-वेदाङ्गके पारगामी विद्वान् थे। इनमें चारको तो अपने पूर्व-जन्मोंका स्मरण था और तीन शापसे मोहित होनेके कारण अपने पूर्वजन्मकी स्मृतिसे वञ्चित थे ॥ १७ ॥

स्वतन्त्रस्त्वणुहाज्जज्ञे ब्रह्मदत्तो महायशाः।
यथा ह्यासीत्पक्षिभावे संकल्पः पूर्वचिन्तितः !
ज्ञानध्यानतपःपूतो वेदवेदाङ्गपारगः ॥ १८ ॥

स्वतन्त्रने अपने पक्षी-शरीरमें जैसा संकल्प किया था, उसीके अनुसार वह अणुहके महायशस्वी पुत्र ब्रह्मदत्तके रूपमें उत्पन्न हुआ। वह ज्ञान, ध्यान और तप करके पवित्र हो गया था तथा वेद और वेदाङ्गका पारगामी विद्वान् था ॥ १८ ॥

छिद्रदर्शी सुनेत्रश्च तथा वाभ्रव्यवत्स्ययोः।
जातौ श्रोत्रियदायादौ वेदवेदाङ्गपारगौ ॥ १९ ॥

वाभ्रव्य और वत्स—(ये दोनों वहाँ राजा अणुहके मन्त्री तथा श्रोत्रिय ब्राह्मण थे।) छिद्रदर्शन और सुनेत्र नामक हंस उन्हीं श्रोत्रिय राजमन्त्रियोंके कुलमें वेद-वेदाङ्गके पारगामी श्रोत्रिय पुत्र बनकर उत्पन्न हुए ॥ १९ ॥

सहायौ ब्रह्मदत्तस्य पूर्वजातिसहोपितौ।
पाञ्चालः पञ्चिकश्चैव कण्डरीकस्तथापरः ॥ २० ॥

ये दोनों पहले जन्ममें ब्रह्मदत्तके साथ रहे थे और उनकी सहायता करनेके लिये उत्पन्न हुए थे। (इनमें जो पूर्ववर्ती छः जन्मोंमें अपने सात भाइयोंमेंसे) पाँचवाँ (होकर उत्पन्न हुआ था, वह कवि सातवें जन्ममें) पाञ्चाल नामक श्रोत्रिय हुआ और छठा (खद्युम) कण्डरीक नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ २० ॥

पाञ्चालो बह्वृचस्त्वासीदाचार्यत्वं चकार ह।
द्विवेदः कण्डरीकस्तु छन्दोगोऽध्वर्यु रेव च ॥ २१ ॥

इनमें पाञ्चाल बह्वृच अर्थात् ऋग्वेदी था। वह आचार्य (पुरोहित) का काम करने लगा और कण्डरीक छन्दोंका गान करनेवाला सामवेदी तथा अध्वर्यु (यजुर्वेदी) हुआ, इस प्रकार वह दो वेदोंका ज्ञाता था ॥ २१ ॥

सर्वसत्त्वरुतज्ञस्तु राजाऽऽसीदणुहात्मजः ।
पाञ्चालकण्डरीकाभ्यां तस्य सख्यमभूत् तदा ॥ २२ ॥

अणुहका पुत्र राजा ब्रह्मदत्त सब प्राणियोंकी बोलीको समझ लेता था। उसकी पाञ्चाल और कण्डरीकसे मित्रता हो गयी ॥ २२ ॥

ते ग्राम्यधर्माभिरताः कामस्य वशवर्तिनः।
पूर्वजातिकृतेनासन् धर्मकामार्थकोविदाः ॥ २३ ॥

ये तीनों ग्राम्यधर्म (संसारी पुरुषोंके धर्म) में मग्न रहते थे और काम (इच्छा) के वशमें होकर चलते थे। इन्होंने पूर्वजन्ममें जो सत्कर्म किया था, उसके फलसे ये धर्म, अर्थ और कामके तत्त्वज्ञ हुए ॥ २३ ॥

अणुहस्तु नृपश्रेष्ठो ब्रह्मदत्तमकल्मषम्।
राज्येऽभिषिच्य योगात्मा परां गतिमवाप्तवान् ॥ २४ ॥

राजाओंमें श्रेष्ठ अणुह निष्पाप ब्रह्मदत्तका राज्यपर अभिषेक करके स्वयं योग-साधन कर परम गतिको प्राप्त हो गये ॥ २४ ॥

ब्रह्मदत्तस्य भार्या तु देवलस्यात्मजाभवत्।
असितस्य हि दुर्धर्षा संनतिर्नाम नामतः ॥ २५ ॥

असित देवलकी पुत्री, जिसका नाम संनति था तथा जिसका तिरस्कार करना किसीके लिये भी बहुत कठिन था, राजा ब्रह्मदत्तकी धर्मपत्नी हुई ॥ २५ ॥

तामेकभावसम्पन्नां लेभे कन्यामनुत्तमाम्।
संनतिं संनतिमर्ती देवलाद् योगधर्मिणीम् ॥ २६ ॥

उस एक-भाव (ब्रह्मभाव) से सम्पन्न, नम्रताकी मूर्ति, योग-धर्मका पालन करनेवाली संनति नामकी श्रेष्ठ कन्याको ब्रह्मदत्तने देवल ऋषिसे पत्नीके रूपमें प्राप्त किया था ॥ २६ ॥

पञ्चमः पाञ्चिकस्तत्र सप्तजातिषु भारत ।

हरिवंशपर्व ] चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ८३


पञ्चमः पाञ्चिकस्तत्र सप्तजातिषु भारत ।
षष्ठस्तु कण्डरीकोऽभूद् ब्रह्मदत्तस्तु सप्तमः ॥ २७ ॥
भारत ! जन्मोंमें पाँचवाँ होकर उत्पन्न होनेवाला पाञ्चिक (कवि) पाञ्चाल हुआ, छठा कण्डरीक हुआ और सातवाँ ब्रह्मदत्त हुआ ॥ २७ ॥

शेषा विहङ्गमा ये वै काम्पिल्ये सहचारिणः ।
ते जाताः श्रोत्रियकुले सुदरिद्रे सहोदराः ॥ २८ ॥
जो शेष सहचारी पक्षी थे, वे काम्पिल्य नगरमें अत्यन्त दरिद्र श्रोत्रियकुलमें सगे भाई बनकर उत्पन्न हुए ॥ २८ ॥

धृतिमान् सुमना विद्वांस्तत्त्वदर्शी च नामतः ।
वेदाध्ययनसम्पन्नाश्चत्वारश्छिद्रदर्शिनः ॥ २९ ॥
वे चारों धृतिमान्, सुमना, विद्वान् और तत्त्वदर्शीके नामसे प्रसिद्ध थे और वेदोंके अध्ययन करनेमें लगे रहते थे। साथ ही योगसाधनके लिये गृह-त्यागका अवसर ढूँढ़ते थे अथवा अपने सहचारियोंके भोगासक्ति रूप दूषणपर भी दृष्टि रखते थे ॥ २९ ॥

तेषां संवित्स्थोत्पन्ना पूर्वजातिकृता तदा ।
ये योगनिरताः सिद्धाः प्रस्थिताः सर्व एव हि ॥ ३० ॥
इनकी पूर्व जन्मोंमें जैसी वैराग्यपूर्ण बुद्धि थी, वैसी ही इस जन्ममें प्रकट हुई। अतः वे सब सिद्धपुरुष योगपरायण हो घरसे चलनेके लिये उद्यत हुए ॥ ३० ॥

आमन्त्र्य पितरं तात पिता तानब्रवीत् तदा ।
अधर्म एष युष्माकं यन्मां त्यक्त्वा गमिष्यथ ॥ ३१ ॥
तात ! जब उन्होंने अपने पितासे पूछकर जानेका विचार किया, तब पिताने उनसे यह बात कही—'तुमलोग यदि मुझको छोड़कर वनमें जाओगे तो यह तुम्हारे लिये अधर्म ही होगा ॥

दारिद्र्यमपनाकृत्य पुत्रार्थोश्चैव पुष्कलान् ।
शुश्रूषामप्रयुज्यैव कथं वै गन्तुमर्हथ ॥ ३२ ॥
तुमलोग मेरी दरिद्रता दूर न करके तथा पुत्रद्वारा सिद्ध होनेवाले प्रचुर प्रयोजनोंकी भी सिद्धि एवं मेरी सेवा भी न करके कैसे चले जाना चाहते हो? क्या यही उचित है ? ॥ ३२॥

ते तमूचुर्द्विजाः सर्वे पितरं पुनरेव च ।
करिष्यामो विधानं ते येन त्वं वर्तयिष्यसि ॥ ३३ ॥
तब उन सब द्विजोंने अपने पितासे कहा—'हमलोग ऐसा उपाय करेंगे जिससे आप जीवन-निर्वाह कर सकेंगे (तथा हम-जैसे पुत्रोंको पाकर आपको अपने उद्धारके लिये भी चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है) ॥ ३३ ॥

इमं श्लोकं महार्थं त्वं राजानं सहमन्त्रिणम् ।
श्रावयेथाः समागम्य ब्रह्मदत्तमकल्मषम् ॥ ३४ ॥
'आप निष्पाप राजा ब्रह्मदत्तसे मिलकर यह महत्त्वपूर्ण ('सप्तव्याधा दशार्णेषु' इत्यादि) श्लोक उनको और उनके मन्त्रियोंको सुनाइयेगा ॥ ३४ ॥

प्रीतात्मा दास्यति स ते ग्रामान् भोगांश्च पुष्कलान् ।
यथेप्सितांश्च सर्वार्थान् गच्छ तात यथेप्सितम् ॥ ३५ ॥
'तात ! इससे प्रसन्न होकर वे आपको बहुत-से ग्राम, प्रचुर भोग और आपकी इच्छानुसार सब पदार्थ देंगे। आपकी जब इच्छा हो तब (ब्रह्मदत्तके पास) चले जायें' ॥

एतावदुक्त्वा ते सर्वे पूजयित्वा च तं गुरुम् ।
योगधर्ममनुप्राप्य परां निर्वृतिमाययुः ॥ ३६ ॥
इतनी बातें कहकर उन सबोंने अपने पिताकी पूजा की और योगधर्मका साधन कर वे परमानन्दमय मोक्षको प्राप्त हो गये ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलेषु हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥


चतुर्विंशतितमोऽध्यायः

विभ्राजका ब्रह्मदत्तका पुत्र बनकर उत्पन्न होना, रानी संनतिका ब्रह्मदत्तसे रूठना, एक ब्राह्मणके कहे हुए श्लोकोंसे ब्रह्मदत्त, पाञ्चाल्य और कण्डरीकको अपने पूर्वजन्मका ज्ञान होना तथा ब्रह्मदत्त आदिका तप करके मुक्त हो जाना

मार्कण्डेय उवाच
ब्रह्मदत्तस्य तनयः स विभ्राजस्त्वजायत ।
योगात्मा तपसा युक्तो विष्वक्सेन इति श्रुतः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजीने कहा—**जिसके मनमें योग-साधन-विषयक संकल्प हुआ था, वह तपस्वी राजा विभ्राज ब्रह्मदत्तका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ और (उस जन्ममें) वह विष्वक्सेन नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १ ॥

कदाचिद् ब्रह्मदत्तस्तु भार्यया सहितो वने ।
विजहार प्रहृष्टात्मा यथा शच्या शचीपतिः ॥ २ ॥
एक समयकी बात है, राजा ब्रह्मदत्त प्रसन्नचित्तसे अपनी

८४ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


भार्याको साथमें लिये उपवनमें इस प्रकार विहार कर रहे थे, जैसे इन्द्र इन्द्राणीके साथ विहार कर रहे हों ॥ २ ॥

ततः पिपीलिकरुतं स शुश्राव नराधिपः।
कामिनीं कामिनस्तस्य याचतः क्रोशतो भृशम् ॥ ३ ॥

उसी समय राजाने एक चींटेका स्वर सुना, जो कामके वशमें होकर अपनी कामिनी चींटीसे बहुत गिड़गिड़ाकर प्रार्थना कर रहा था ॥ ३ ॥

श्रुत्वा तु याच्यमानां तां क्रुद्धां सूक्ष्मां पिपीलिकाम्।
ब्रह्मदत्तो महाहासमकस्मादेव चाहसत् ॥ ४ ॥

छोटी-सी चींटी कुपित हो मान किये बैठी है और चींटा उससे याचना कर रहा है, यह देख-सुनकर ब्रह्मदत्त अचानक ही बड़े जोरसे हँस पड़े ॥ ४ ॥

ततः सा संनतिर्दीना व्रीडितेवाभवत् तदा।
निराहारा बहुतिथं बभूव वरवर्णिनी ॥ ५ ॥

उस समय सुन्दरी रानी संनति लज्जित-सी हो गयी और दीन होकर बहुत दिनोंतक उसने खाना-पीना तक छोड़ दिया ॥

प्रसाद्यमाना भर्त्रा सा तमुवाच शुचिस्मिता।
त्वया च हसिता राजन् नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ ६ ॥

जब पतिदेव उसे मनाने लगे, तब पवित्र मुसकानवाली संनतिने उनसे कहा—'राजन् ! आपने मेरी हँसी उड़ायी है, अतः मैं जीवित रहना नहीं चाहती' ॥ ६ ॥

स तत्कारणमाचख्यौ न च सा श्रद्दधाति तत्।
उवाच चैनं कुपिता नैष भावोऽस्ति मानुषे ॥ ७ ॥

तब राजाने हँसनेका कारण बताया, परंतु संनतिने उस बातपर विश्वास नहीं किया और कोपमें भरकर कहा—'मनुष्यमें ऐसी शक्ति (सब प्राणियोंकी बोलीको समझनेकी शक्ति) नहीं हो सकती ॥ ७ ॥

को वै पिपीलिकरुतं मानुषो वेत्तुमर्हति।
ऋते देवप्रसादाद् वा पूर्वजातिकृतेन वा ॥ ८ ॥
तपोबलेन वा राजन् विद्यया वा नराधिप।

'राजन् ! देवताओंकी कृपा, पूर्वजन्ममें किये हुए तप अथवा विद्या (योगशक्ति) के बिना ऐसा कौन मनुष्य है, जो चींटीकी बोलीको समझ सके ॥ ८½ ॥

यद्येष वै प्रभावस्ते सर्वसत्त्वरुतज्ञता ॥ ९ ॥
यथाहमेतज्जानीयां तथा प्रत्याययस्व माम्।

'यदि आपमें सब प्राणियोंकी भाषाको समझनेकी शक्ति है, तो मैं जिस प्रकार इस बातको समझ सकूँ, उस प्रकार मुझे विश्वास दिलाइये ॥ ९½ ॥

प्राणान् वापि परित्यक्ष्ये राजन् सत्येन ते शपे ॥ १० ॥

'राजन् ! यदि आप ऐसा न करेंगे तो मैं आपसे सत्यकी शपथ खाकर कहती हूँ, अपने प्राण त्याग दूँगी' ॥ १० ॥

तत् तस्या वचनं श्रुत्वा महिष्याः परुषाक्षरम्।
स राजा परमापन्नो देवश्रेष्ठमगात् ततः ॥ ११ ॥
शरण्यं सर्वभूतेशं भक्त्या नारायणं हरिम्।
समाहितो निराहारः षड्रात्रेण महायशाः ॥ १२ ॥

रानीके इन कठोर शब्दोंको सुनकर राजा बड़ी विपत्तिमें पड़ गये। तब उन्होंने शरणागत-रक्षक, समस्त प्राणियोंके स्वामी, देवश्रेष्ठ भगवान् नारायण हरिकी शरण ली। उन महायशस्वी महात्मा राजाको निराहार रह भक्तिपूर्वक समाहितचित्तसे उपासना करते हुए छः रातें बीत गयीं ॥ ११-१२ ॥

ददर्श दर्शने राजा देवं नारायणं प्रभुम्।
उवाच चैनं भगवान् सर्वभूतानुकम्पकः ॥ १३ ॥

छठी रातमें राजाने प्रभु नारायणदेवका दर्शन किया। समस्त प्राणियोंपर अकारण दया करनेवाले भगवान्‌ने राजासे कहा—॥ १३ ॥

ब्रह्मदत्त प्रभाते त्वं कल्याणं समवाप्स्यसि।
इत्युक्त्वा भगवान् देवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १४ ॥

'ब्रह्मदत्त ! प्रातःकाल होनेपर तुझे कल्याणकी प्राप्ति होगी।' इतनी बात कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये ॥

चतुर्णां तु पिता योऽसौ ब्राह्मणानां महात्मनाम्।
श्लोकं सोऽधीत्य पुत्रेभ्यः कृतकृत्य इवाभवत् ॥ १५ ॥

इधर जो चारों महात्मा ब्राह्मणोंके पिता थे, वे पुत्रोंसे श्लोक सीखकर कृतकृत्य-से हो गये ॥ १५ ॥

स राजानमथान्विच्छन्सहमन्त्रिणमच्युतम्।
न ददर्शान्तरं किंचिच्छ्लोकं श्रावयितुं तदा ॥ १६ ॥

वे धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले राजा ब्रह्मदत्त तथा उसके मन्त्रियोंको खोजने लगे, परंतु उन्हें श्लोक सुनानेका कोई अवसर न मिला ॥ १६ ॥

अथ राजा सरःस्नातो लब्ध्वा नारायणाद् वरम्।
प्रविवेश पुरीं प्रीतो रथमारुह्य काञ्चनम् ॥ १७ ॥

इतनेमें भगवान् नारायणसे वर पाकर राजा सरोवरमें स्नान करके सुवर्णजटित रथमें बैठे और प्रसन्नतापूर्वक अपनी नगरीमें प्रवेश करने लगे ॥ १७ ॥

तस्य रश्मीन् प्रत्यगृह्णात् कण्डरीको द्विजर्षभः।
चामरं व्यजनं चापि बाभ्रव्यः समवीक्षिपत् ॥ १८ ॥

उस समय ब्राह्मणश्रेष्ठ कण्डरीकने अपने हाथमें ब्रह्मदत्तके घोड़ोंकी वागडोर ले रखी थी और बाभ्रव्य-पुत्र पाञ्चाल उनके ऊपर चँवर और व्यजन (पंखा) डुला रहे थे ॥ १८ ॥

इदमन्तरमित्येव ततः स ब्राह्मणस्तदा।
श्रावयामास राजानं श्लोकं तं सचिवौ च तौ ॥ १९ ॥

हरिवंशपर्व ] चतुर्विंशतितमोऽध्यायः [ ८५


'यही अवसर है' यह समझकर वे ब्राह्मण राजाको और उनके दोनों मन्त्रियोंको उसी समय श्लोक सुनाने लगे ॥१९॥

सप्त व्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ ।
चक्रवाकाः शरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे ॥ २० ॥
तेऽभिजाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
प्रस्थिता दीर्घमध्वानं यूयं किमवसीदथ ॥ २१ ॥

'जो दशार्ण देशमें व्याध, कालञ्जर पर्वतपर मृग, शरद्वीपमें चक्रवाक तथा मानस-सरोवरमें हंस हुए थे, उनमेंसे हम चार तो कुरुक्षेत्रमें वेद-पारगामी कुलीन ब्राह्मण होकर दीर्घमार्गपर चले आये हैं, (अर्थात् योगसाधना करके मुक्त हो गये। अब शेष बचे हुए) तुम (तीन व्यक्ति योगमार्गसे भ्रष्ट होकर) क्यों कष्ट पा रहे हो ?' ॥ २०-२१ ॥

तच्छ्रुत्वा मोहमगमद् ब्रह्मदत्तो नराधिपः ।
सचिवश्चास्य पाञ्चाल्यः कण्डरीकश्च भारत ॥ २२ ॥

भारत ! राजा ब्रह्मदत्त वह श्लोक सुनकर मूर्च्छित हो गये और उनके मन्त्री पाञ्चाल तथा कण्डरीककी भी वही दशा हुई ॥ २२ ॥

स्रस्तरश्मिप्रतोदौ तौ पतितव्यजनावुभौ ।
दृष्ट्वा बभूवुरस्वस्थाः पौराश्च सुहृदस्तथा ॥ २३ ॥

कण्डरीकके हाथमेंसे चाबुक और बागडोर छूट गयीं तथा पाञ्चालके हाथमेंसे भी चँवर और पंखा छूटकर नीचे गिर पड़े। नगरनिवासी और मित्रवर्ग राजा तथा दोनों मन्त्रियोंकी इस दशाको देखकर खिन्न हो गये ॥ २३ ॥

मुहूर्तमिव राजा स सह ताभ्यां रथे स्थितः ।
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां प्रत्यागच्छदरिंदमः ॥ २४ ॥

दोनों मन्त्रियोंसहित शत्रुदमन राजा ब्रह्मदत्त रथमें दो घड़ीतक मूर्च्छित पड़े रहे । तत्पश्चात् उन्हें होश आया और ये अपने नगरमें लौट आये ॥ २४ ॥

ततस्ते तत्सरः स्मृत्वा योगं तमुपलभ्य च ।
ब्राह्मणं विपुलैरर्थैर्भोगैश्च समयोजयन् ॥ २५ ॥

तदनन्तर उन तीनोंको उस सरोवरका ध्यान आ गया और अपने पूर्व-जन्मके योगका भी स्मरण होने लगा। तब उन्होंने उस ब्राह्मणको बहुत-सा धन और भोग-पदार्थ दिये ॥ २५ ॥

अभिषिच्य स्वराज्ये तु विष्वक्सेनमरिंदमम् ।
जगाम ब्रह्मदत्तोऽथ सदारो वनमेव ह ॥ २६ ॥

फिर ब्रह्मदत्तने अपने राज्यपर शत्रुदमन विष्वक्सेनका अभिषेक किया और अपनी स्त्रीको साथमें लेकर वनको चल दिये ॥ २६ ॥

अथैनं संततिर्धीरा देवलस्य सुता तदा ।
उवाचं परमप्रीता योगाद् वनगतं नृपम् ॥ २७ ॥

तदनन्तर योग-साधन करनेके लिये वनमें आये हुए राजा ब्रह्मदत्तसे देवलकी पुत्री धीरस्वभावा संततिने परम प्रसन्न होकर कहा— ॥ २७ ॥

जानन्त्या ते महाराज पिपीलिकरुतज्ञताम् ।
चोदितः क्रोधमुद्दिश्य सक्तः कामेषु वै मया ॥ २८ ॥

महाराज ! मैं यह बात जानती थी कि आप चींटीकी बोलीको समझ सकते हैं, तब भी मैंने आपको संसारके भोगोंमें आसक्त देख यह क्रोधका नाटक रचकर आपको योगकी ओर प्रेरित किया है ॥ २८ ॥

इतो वयं गमिष्यामो गतिमिष्टामनुत्तमाम् ।
तव चान्तर्हितो योगस्ततः संस्मारितो मया ॥ २९ ॥

अब हम परम उत्तम अभीष्ट गतिको प्राप्त करेंगे, इसी उद्देश्यसे मैंने आपको भूले हुए योगका स्मरण दिलाया है ॥ २९ ॥

स राजा परमप्रीतः पत्न्याः श्रुत्वा वचस्तदा ।
प्राप्य योगं बलादेव गतिं प्राप सुदुर्लभाम् ॥ ३० ॥

तब अपनी पत्नीकी यह बात सुनकर राजा बड़े प्रसन्न हुए और योग-साधना करके उन्होंने उसके बलसे ही परम दुर्लभ गति पायी ॥ ३० ॥

कण्डरीकोऽपि धर्मात्मा सांख्ययोगमनुत्तमम् ।
प्राप्य योगगतिः सिद्धो विशुद्धस्तेन कर्मणा ॥ ३१ ॥

धर्मात्मा कण्डरीक भी परमश्रेष्ठ सांख्ययोगका ज्ञान पाकर योगका आश्रय ले उसके साधनसे शुद्ध एवं सिद्ध (मुक्त) हो गये ॥ ३१ ॥

क्रमं प्रणीय पाञ्चाल्यः शिक्षां चोत्पाद्य केवलाम् ।
योगाचार्यगतिं प्राप यशश्चाग्र्यं महातपाः ॥ ३२ ॥

महातपस्वी पाञ्चालने भी वैदिकोंमें प्रसिद्ध क्रमपाठकी विधि एवं विशुद्ध 'शिक्षा' (नामक वेदाङ्ग अथवा योगविषयक शिक्षा) की रचना करके योगाचार्यकी गति (मोक्ष) तथा उत्तम यश प्राप्त किया ॥ ३२ ॥

एवमेतत् पुरावृत्तं मम प्रत्यक्षर्माच्युत ।
तद् धारयस्व गाङ्गेय श्रेयसा योक्ष्यसे ततः ॥ ३३ ॥

(मार्कण्डेयजी कहते हैं—) अच्युत भीष्म ! प्राचीन कालमें घटित हुआ यह श्राद्ध-माहात्म्य-सूचक वृत्तान्त मैंने प्रत्यक्ष देखा है। तुम भी इसे धारण करो तो तुम्हारा कल्याण होगा ॥ ३३ ॥

ये चान्ये धारयिष्यन्ति तेषां चरितमुत्तमम् ।
तिर्यग्योनिषु ते जातु न गमिष्यन्ति कर्हिचित् ॥ ३४ ॥

८६श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

जो दूसरे सज्जन भी इन वाग् दुष्ट आदिके उत्तम चरित्रको सुनेंगे, वे भी कभी तिर्यग्-योनिमें उत्पन्न न होंगे ॥ ३४ ॥

श्रुत्वा चेदमुपाख्यानं महार्थं महतां गतिम्।
योगधर्मो हृदि सदा परिवर्तति भारत ॥ ३५ ॥

भारत ! महात्माओंकी सद्गति देनेवाले इस महत्त्वमय उपाख्यानको सुननेसे हृदयमें योग-धर्म पूर्णरूपसे प्रकाशित होने लगता है ॥ ३५ ॥

स तेनैवानुबन्धेन कदाचिल्लभते शमम्।
ततो योगगतिं याति शुद्धां तां भुवि दुर्लभाम् ॥ ३६ ॥

हृदयमें उस योगधर्मको धारण करनेसे ही मनुष्य कभी शान्ति-लाभ करता है; फिर उसे पृथ्वीमें दुर्लभ योगियोंकी शुद्ध-गति प्राप्त होती है ॥ ३६ ॥


वैशम्पायन उवाच

एवमेतत् पुरा गीतं मार्कण्डेयेन धीमता।
श्राद्धस्य फलमुद्दिश्य सोमस्याप्यायनाय वै ॥ ३७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—प्राचीन कालमें बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीने श्राद्धके फलको लक्ष्यमें रखकर सोम (चन्द्रमा) का आप्यायन (पोषण) करनेके लिये यह ऐसी कथा कही थी ॥ ३७ ॥

सोमो हि भगवान् देवो लोकस्याप्यायनं परम्।
वृष्णिवंशप्रसङ्गेन तस्य वंशं निबोध मे ॥ ३८ ॥

भगवान् सोम ही लोकोंको परम तृप्ति देनेवाले हैं। अब वृष्णिवंशके प्रसङ्गमें तुम चन्द्रवंशका वर्णन सुनो—॥ ३८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलेषु हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पसमाप्तिर्नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पका उपसंहारनामक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२४॥


पञ्चविंशतितमोऽध्यायः

चन्द्रमाकी उत्पत्ति और राजसूय यज्ञ, देवासुरसंग्राम तथा बुधकी उत्पत्ति

वैशम्पायन उवाच

पिता सोमस्य वै राजन् जज्ञेऽत्रिर्भगवानृषिः।
ब्रह्मणो मानसात् पूर्वं प्रजासर्गं विधित्सतः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! प्राचीन कालमें ब्रह्माजीने प्रजाकी सृष्टि करनेका विचार किया। उस समय उनके मानसिक संकल्पसे सोम (चन्द्रमा) के पिता भगवान् अत्रि ऋषि उत्पन्न हुए ॥ १ ॥

तत्रात्रिः सर्वभूतानां तस्थौ स्वतनयैर्युतः।
कर्मणा मनसा वाचा शुभान्येव चचार सः ॥ २ ॥

अत्रि ऋषि भी प्रजाकी सृष्टिमें ही संलग्न हुए। वे तथा उनके पुत्र मन, वाणी और कर्मसे सब प्राणियोंका कल्याण करनेवाले कार्य ही करते थे ॥ २ ॥

अहिंस्रः सर्वभूतेषु धर्मात्मा संशितव्रतः।
काष्ठकुड्यशिलाभूत ऊर्ध्वबाहुर्महाद्युतिः ॥ ३ ॥
अनुत्तरं नाम तपो येन तप्तं महत् पुरा।
त्रीणि वर्षसहस्राणि दिव्यानीति हि नः श्रुतम् ॥ ४ ॥

हमने सुना है कि प्राचीन कालमें प्रशंसनीय व्रतका पालन करनेवाले, महातेजस्वी, धर्मात्मा अत्रि ऋषिने तीन हजार दिव्य वर्षोंतक अपनी भुजाएँ ऊपर उठाकर काष्ठ, दीवार और पत्थरके समान निश्चल रहकर किसी प्राणीको तनिक भी कष्ट पहुँचाये बिना ही अनुत्तर* नामक महान् तप किया था ॥ ३-४ ॥


* १. जिससे उत्कृष्ट दूसरा कोई तप नहीं है, उसे 'अनुत्तर' कहते हैं।


तत्रोध्वंरेतसस्तस्य स्थितस्यानिनिमिपस्य ह।
सोमत्वं तनुरापेदे महासत्त्वस्य भारत ॥ ५ ॥

भारत ! अत्रि ऋषि महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न थे। वे एक-टक देखते हुए ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी) रहकर सोमकी भावनासे खड़े-खड़े तपस्या करते थे, अतः उनका शरीर सोमरूपमें परिणत हो गया ॥ ५ ॥

ऊर्ध्वमाचक्रमे तस्य सोमत्वं भावितात्मनः।
नेत्राभ्यां वारि सुस्राव दशधा द्योतयद् दिशः ॥ ६ ॥

शुद्ध अन्तःकरणवाले मुनिके नेत्रोंसे वह सोमरूप तेज, जलरूपमें बह निकला और दसों दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ आकाशमें चढ़ने लगा ॥ ६ ॥

तं गर्भं विधिना दृष्ट्वा दश देव्यो दधुस्तदा।
समेत्य धारयामासुर्न च ताः समशक्नुवन् ॥ ७ ॥

तब प्रसन्नतामें भरी हुई दस दिशारूपी देवियोंने सम्मिलित हो उस तेजको अपने गर्भमें विधिपूर्वक धारण किया, परंतु वे उस तेजको धारण करनेमें समर्थ न हो सकीं ॥ ७ ॥

स ताभ्यः सहसैवाथ दिग्भ्यो गर्भः प्रभान्वितः।
पपात भासयँल्लोकाञ्छीतांशुः सर्वभावनः ॥ ८ ॥

तब (औषध आदिके द्वारा) सब लोकोंको पुष्ट करनेवाला शीतल किरणोंसे सुशोभित वह प्रकाशमान गर्भ लोकोंको

हरिवंशपर्व ] पञ्चविंशतितमोऽध्यायः [ ८७


प्रकाशित करता हुआ दिग्देवियोंके उदरसे सहसा गिर पड़ा ॥ ८ ॥

यदा न धारणे शक्तास्तस्य गर्भस्य ता दिशः।
ततस्ताभिः सहैवाशु निपपात वसुंधराम् ॥ ९ ॥

जब दिशाएँ उस गर्भके तेजको न रोक सकीं, तो वह गर्भ उनके साथ ही पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ९ ॥

पतितं सोममालोक्य ब्रह्मा लोकपितामहः।
रथमारोपयामास लोकानां हितकाम्यया ॥ १० ॥

सोमको गिरा हुआ देख लोकपितामह ब्रह्माजीने संसारका हित करनेकी भावनासे उसे रथपर रख लिया ॥ १० ॥

स हि वेदमयस्तात धर्मात्मा सत्यसंग्रहः।
युक्तो वाजिसहस्रेण सितेनेति हि नः श्रुतम् ॥ ११ ॥

तात ! हमने सुना है कि वह रथ वेदमय, धर्मस्वरूप तथा सत्यसे नियन्त्रित था। उसमें एक हजार श्वेत घोड़े जुते हुए थे ॥ ११ ॥

तस्मिन् निपतिते देवाः पुत्रेऽत्रेः परमात्मनि।
तुष्टुवुर्ब्रह्मणः पुत्रा मानसाः सप्त ये श्रुताः ॥ १२ ॥

अत्रिपुत्र भगवान् सोमके गिरनेपर ब्रह्माजीके सुप्रसिद्ध सात मानस पुत्र उनकी स्तुति करने लगे ॥ १२ ॥

तथैवाङ्गिरसस्तत्र भृगोरेवात्मजैः सह।
ऋग्भिर्यजुर्भिर्बहुभैरथर्वाङ्गिरसैरपि ॥ १३ ॥

अङ्गिरा-गोत्री भृगु ऋषि और उनके पुत्र ऋग्वेद, यजुर्वेद (सामवेद) और अथर्ववेदकी अनेक श्रुतियोंसे सोमकी स्तुति करने लगे ॥ १३ ॥

तस्य संस्तूयमानस्य तेजः सोमस्य भास्वतः।
आप्यायमानं लोकांस्त्रीन् भासयामास सर्वशः ॥ १४ ॥

( १. 'अंशुंरंशुष्टे देव सोमाप्यायताम्' इत्यादि मन्त्रोंके द्वारा ) स्तुति करनेपर पुष्ट हुआ प्रकाशमान सोमका तेज तीनों लोकोंको सर्वथा प्रकाशित करने लगा ॥ १४ ॥

स तेन रथमुख्येन सागरान्तां वसुंधराम्।
त्रिःसप्तकृत्वोऽतिशयाच्चकाराभिप्रदक्षिणम् ॥ १५ ॥

तब उन परम यशस्वी (ब्रह्माजी) ने उस (सोमवान्) श्रेष्ठ रथमें बैठकर समुद्रतककी पृथ्वीकी इक्कीस बार प्रदक्षिणा की ॥ १५ ॥

तस्य यच्च्यावितं तेजः पृथिवीमन्वपद्यत।
ओषध्यस्ताः समुद्भूतास्तेजसा प्रज्वलन्त्युत ॥ १६ ॥

उस समय (रथके वेगसे छलककर) सोमका जो तेज पृथ्वीपर टपकने लगा, उस तेजसे प्रकाशपूर्ण ओषधियाँ उत्पन्न हुईं ॥ १६ ॥


१. अर्थात् हे चन्द्रदेव ! आपकी प्रत्येक किरण परिपुष्ट हो।


ताभिर्धार्यन्तस्त्रयो लोकाः प्रजाश्चैव चतुर्विधाः।
पोष्टा हि भगवान् सोमो जगतो जगतीपते ॥ १७ ॥

उन ओषधियोंसे भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक—इन तीनों लोकोंका और जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—इन चार प्रकारकी प्रजाओंका पालन होता रहता है। राजन् ! इस प्रकार भगवान् सोम सम्पूर्ण जगत्‌का पोषण करते हैं ॥ १७ ॥

स लब्धतेजा भगवान् संस्तवैस्तैश्च कर्मभिः।
तपस्तेपे महाभाग पद्मानां दशतीर्दश ॥ १८ ॥

महाभाग ! उन स्तुतिरूप कर्मोंसे तेजस्वी होकर भगवान् सोमने एक हजार पद्म वर्षोंतक तप किया ॥ १८ ॥

हिरण्यवर्णा या देव्यो धारयन्त्यात्मना जगत्।
निधिस्तासामभूद्देवः प्रख्यातः स्वेन कर्मणा ॥ १९ ॥

चाँदीके समान शुक्ल वर्णवाली जो जलकी अधिष्ठात्री देवियाँ अपने स्वरूपभूत जलसे जगत्‌का पालन करती हैं, चन्द्रदेव उनकी निधि हुए। वे अपने कर्मोंसे विख्यात हैं ॥ १९ ॥

ततस्तस्मै ददौ राज्यं ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।
बीजौषधीनां विप्राणामपां च जनमेजय ॥ २० ॥

जनमेजय ! तदनन्तर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजीने चन्द्रमाको बीज, ओषधि, ब्राह्मण और जलका राजा बना दिया ॥ २० ॥

सोऽभिषिक्तो महाराज राजराज्येन राजराट्।
लोकांस्त्रीन् भासयामास स्वभासा भास्वतां वरः ॥ २१ ॥

महाराज ! जब प्रकाशवानोंमें श्रेष्ठ चन्द्रमाका इन चारोंके राज्यपर सम्राट्‌के रूपमें अभिषेक हो गया, तब (सम्राट्) चन्द्रमा अपनी कान्तिसे तीनों लोकोंको प्रकाशित करने लगे ॥ २१ ॥

सप्तविंशतिमिन्दोस्तु दाक्षायण्यो महाव्रताः।
ददौ प्राचेतसो दक्षो नक्षत्राणीति या विदुः ॥ २२ ॥

उस समय प्रचेताओंद्वारा दक्षने अपनी महाव्रतधारिणी सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको ब्याह दीं, जिन्हें विद्वान् पुरुष सत्ताईस नक्षत्रोंके रूपमें जानते हैं ॥ २२ ॥

स तत् प्राप्य महद्राज्यं सोमः सोमवतां वरः।
समाजह्रे राजसूयं सहस्रशतदक्षिणम् ॥ २३ ॥

इस बड़े भारी राज्यको पाकर पितृदेवताओंमें श्रेष्ठ सोमने राजसूय यज्ञका अनुष्ठान किया, जिसमें उन्होंने एक लाख गौएँ दक्षिणामें दी थीं ॥ २३ ॥

होतास्य भगवानत्रिरध्वर्युर्भगवान् भृगुः।
हिरण्यगर्भश्चोद्गाता ब्रह्मा ब्रह्मत्वमेयिवान् ॥ २४ ॥

सोमके (उस यज्ञमें) भगवान् अत्रि होता बने। भगवान् भृगु अध्वर्यु, हिरण्यगर्भ उद्गाता तथा वसिष्ठजी ब्रह्मा बने ॥ २४ ॥

८८ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

सदस्यस्तत्र भगवान् हरिनारायणः स्वयम्।
सनत्कुमारप्रमुखैराद्यैर्ब्रह्मर्षिभिर्वृतः ॥ २५॥
उस यज्ञमें सनत्कुमार आदि प्राचीन ब्रह्मर्षियोंने स्वयं भगवान् नारायण हरिको ही सदस्य बनाया था॥ २५॥

दक्षिणामददात् सोमस्त्रील्लोकानिति नः श्रुतम्।
तेभ्यो ब्रह्मर्षिमुख्येभ्यः सदस्येभ्यश्च भारत ॥ २६॥
भारत ! हमने सुना है कि उन ब्रह्मर्षियोंमें श्रेष्ठ सदस्योंको सोमने तीनों लोक दक्षिणामें दे दिये थे॥ २६॥

तं सिनिञ्च कुहूश्चैव द्युतिः पुष्टिः प्रभा वसुः।
कीर्तिर्धृतिश्च लक्ष्मीश्च नव देव्यः सिषेविरे॥ २७॥
उस समय सिनोवाली, कुहू, द्युति, पुष्टि, प्रभा, वसु, कीर्ति, धृति और लक्ष्मी (शोभा)—ये नौ देवियाँ नित्यप्रति चन्द्रमाकी सेवामे लगी रहती थीं॥ २७॥

प्राप्यावभृथमव्यग्रः सर्वदेवर्षिपूजितः।
विरराजाधिराजेन्द्रो दशधा भासयन् दिशः॥ २८॥
इस प्रकार सभी ऋषि और देवताओंसे सत्कार पाकर द्विजराज चन्द्रमाने अवभृथ स्नान किया, फिर वे दसों दिशाओंको प्रकाशित करने लगे॥ २८॥

तस्य तत् प्राप्य दुष्प्राप्यमैश्वर्यं मुनिसत्कृतम्।
विवभ्राम मतिस्तात विनयादनयाऽऽहता॥ २९॥
तात ! मुनियोंद्वारा सम्मानित उस दुर्लभ ऐश्वर्यको पाकर चन्द्रमाकी बुद्धि विनयसे भ्रष्ट हो गयी और उसे अनीतिने घेर दबाया॥ २९॥

बृहस्पतेः स वै भार्यां तारां नाम यशस्विनीम्।
जहार तरसा सर्वानवमत्याङ्गिरःसुतान्॥ ३०॥
तब उन्होंने अङ्गिराके सब पुत्रोंका तिरस्कार करके बृहस्पतिकी यशस्विनी भार्या ताराका बलपूर्वक अपहरण कर लिया॥ ३०॥

स याच्यमानो देवैश्च तथा देवर्षिभिः सह।
नैव व्यसर्जयत् तारां तस्मा आङ्गिरसे तदा।
स संरब्धस्ततस्तस्मिन् देवाचार्यो बृहस्पतिः॥ ३१॥
देवताओं तथा देवर्षियोंके याचना करनेपर भी उन्होंने बृहस्पतिकी स्त्री उनको नहीं लौटायी। तब तो देवताओंके आचार्य बृहस्पतिजी उनके ऊपर अत्यन्त कुपित हो उठे॥

उशना तस्य जग्राह पाष्णििमाङ्गिरसस्तदा।
स हि शिष्यो महातेजाः पितुः पूर्वो बृहस्पतेः॥ ३२॥
उस समय शुक्राचार्यने चन्द्रमाका पक्ष लिया और रुद्रने बृहस्पतिका; क्योंकि महातेजस्वी रुद्र बृहस्पतिके पिता अङ्गिराके शिष्य थे॥ ३२॥

तेन स्नेहेन भगवान् रुद्रस्तस्य बृहस्पतेः।
पाष्णिग्राहोऽभवद् देवः प्रगृह्याजगवं धनुः॥ ३३॥
उसी गुरुभाईके स्नेहसे भगवान् शिव अपना आजगव नामक धनुष लेकर बृहस्पतिजीके पाष्णिग्राह (सहायक) बने थे॥ ३३॥

तेन ब्रह्मशिरो नाम परमास्त्रं महात्मना।
उद्दिश्य दैत्यानुत्सृष्टं येनैषां नाशितं यशः॥ ३४॥
महात्मा रुद्रने दैत्योंको लक्ष्य करके ब्रह्मशिर नामक श्रेष्ठ अस्त्र छोड़ा, जिसने उन (दैत्यों) के सारे यशपर ही पानी फेर दिया॥ ३४॥

तत्र तद् युद्धमभवत् प्रख्यातं तारकामयम्।
देवानां दानवानां च लोकक्षयकरं महत्॥ ३५॥
वहाँ ताराके लिये देवताओं और दानवोंमें बड़ा भारी युद्ध हुआ, जो तारकामय महासंग्रामके नामसे प्रसिद्ध है। इसमें संसारका बड़ा भारी संहार हुआ॥ ३५॥

तत्र शिष्टास्तु ये देवास्तुषिताश्चैव भारत।
ब्रह्माणं शरणं जग्मुरादिदेवं सनातनम्॥ ३६॥
भारत ! इस युद्धमें मरनेसे बचे हुए देवता और तुषितगण आदिदेव सनातन ब्रह्माजीकी शरणमें गये॥ ३६॥

ततो निवार्योशनसं रुद्रं ज्येष्ठं च शङ्करम्।
ददावङ्गिरसे तारां स्वयमेव पितामहः॥ ३७॥
तब ब्रह्माजीने शुक्राचार्य तथा रुद्रोंमें ज्येष्ठ शङ्करको भी समझा-बुझाकर युद्ध करनेसे रोका; फिर उन्होंने स्वयं ही ताराको लाकर बृहस्पतिजीको दिया॥ ३७॥

तामन्तःप्रसवां दृष्ट्वा तारां प्राह बृहस्पतिः।
मदीयायां न ते योनौ गर्भो धार्यः कथंचन॥ ३८॥
उस समय ताराको गर्भवती देख बृहस्पतिजीने कहा—'तुझे मेरे क्षेत्रमें किसी तरह पराया गर्भ नहीं धारण करना चाहिये'॥ ३८॥

अयोनावुत्सृजन् तं सा कुमारं दस्युहन्तमम्।
इषीकास्तम्बमासाद्य ज्वलन्तमिव पावकम्॥ ३९॥
तब ताराने अयोग्य स्थान—सींकोंके झुरमुटमें जाकर प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी उस भारी दस्युहन्ता कुमारको उत्पन्न किया॥ ३९॥

जातमात्रः स भगवान् देवानामक्षिपद् वपुः।
ततः संशयमापन्ना इमामकथयन् सुराः॥ ४०॥
उस ऐश्वर्यवान् कुमारने उत्पन्न होते ही अपने शरीरकी कान्तिसे देवताओंका तेज फीका कर दिया। तब तो देवता संदेहमें पड़कर तारासे कहने लगे—॥ ४०॥

सत्यं ब्रूहि सुतः कस्य सोमस्याथ बृहस्पतेः।
पृच्छ्यमाना यदा देवैर्नाह सा साध्वसाधु वा॥ ४१॥
तदा तां शप्तुमारब्धः कुमारो दस्युहन्तमः।
तं निवार्य ततो ब्रह्मा तारां पप्रच्छ संशयम्॥ ४२॥

हरिवंशपर्व ] षड्विंशोऽध्यायः [ ८९

'अरी ! सच बता, यह पुत्र चन्द्रमाका है अथवा बृहस्पतिका ?' परंतु देवताओंके पूछनेपर भी जब उसने भला-बुरा कुछ उत्तर न दिया, तब वह दस्युहन्ता कुमार उसे शाप देनेके लिये तैयार हो गया । उस समय ब्रह्माजीने उसे रोककर तारासे इस संदेहको पूछा—॥४१-४२॥

यदन्न तथ्यं तद् ब्रूहि तारे कस्य सुतस्त्वयम् ।
सा प्राञ्जलिरुवाचेदं ब्रह्माणं वरदं प्रभुम् ॥ ४३ ॥

'तारे ! यह किसका पुत्र है—इस बातको तू ठीक-ठीक बता।' तब उसने दोनों हाथ जोड़कर वर देनेवाले प्रभु ब्रह्माजीसे कहा—॥ ४३ ॥

सोमस्येति महात्मानं कुमारं दस्युहन्तमम् ।
ततस्तं मूर्ख्युपाघ्राय सोमो धाता प्रजापतिः ॥ ४४ ॥
बुध इत्यकरोन्नाम तस्य पुत्रस्य धीमतः ।
प्रतिकूलं च गगने समभ्युत्तिष्ठते बुधः ॥ ४५ ॥

'प्रभो ! यह सोमका ही पुत्र है।' तब उस गर्भको धारण करानेवाले प्रजापति चन्द्रमाने उस महामना दस्युहन्ता कुमारका मस्तक सूँघकर उस बुद्धिमान् पुत्रका नाम 'बुध' रखा । यह बुध जब आकाशमें उदय होता है, तब प्रतिकूल चेष्टा (उत्पात) किया करता है ॥ ४४-४५ ॥

उत्पादयामास ततः पुत्रं वै राजपुत्रिका ।
तस्यापत्यं महाराजो बभूवैलः पुरूरवाः ॥ ४६ ॥

तदनन्तर वैराज मनुकी पुत्री इलाने बुधसे एक पुत्र उत्पन्न किया । उनके वे पुत्र महाराज पुरूरवा हुए ॥ ४६ ॥

उर्वश्यां जज्ञिरे यस्य पुत्राः सप्त महात्मनः ।
प्रसह्य धर्षितस्तत्र सोमो वै राजयक्ष्मणा ॥ ४७ ॥

महात्मा पुरूरवाके उर्वशीके गर्भसे सात पुत्र उत्पन्न हुए । इधर सोमको हठात् राजयक्ष्माने धर दबाया ॥ ४७ ॥

ततो यक्ष्माभिभूतस्तु सोमः प्रक्षीणमण्डलः ।
जगाम शरणार्थाय पितरं सोऽत्रिमेव तु ॥ ४८ ॥

यक्ष्मासे ग्रस्त होनेपर चन्द्रमाका मण्डल क्षीण होने लगा, तब वे अपने पिता अत्रिकी शरणमें पहुँचे ॥४८॥

तस्य तत्तापशमनं चकारात्रिर्महातपाः ।
स राजयक्ष्मणा मुक्तः श्रिया जज्वल सर्वतः ॥ ४९ ॥

महातपस्वी अत्रिने उनके तापको दूर कर दिया । वे (चन्द्रमा) राजयक्ष्मा रोगसे मुक्त होकर सब ओरसे प्रकाशित हो उठे ॥ ४९ ॥

एवं सोमस्य वै जन्म कीर्तितं कीर्तिवर्धनम् ।
वंशमस्य महाराज कीर्त्यमानं च मे शृणु ॥ ५० ॥

महाराज ! इस प्रकार मैंने तुमसे चन्द्रमाके जन्मका वर्णन किया, जो कीर्तिको बढ़ानेवाला है । अब मेरे द्वारा चन्द्रमाके वंशका वर्णन सुनो ॥ ५० ॥

धन्यमारोग्यमायुष्यं पुण्यं संकल्पसाधनम् ।
सोमस्य जन्म श्रुत्वैव पापेभ्यो विप्रमुच्यते ॥ ५१ ॥

मनुष्य चन्द्रमाके जन्मको सुनते ही सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । यह चन्द्रमाके जन्मकी कथा धन, आयु, आरोग्य और पुण्य देनेवाली है । इसे सुननेसे मनुष्यके सारे संकल्प—मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं ॥ ५१ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि सोमोत्पत्तिकथने पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें चन्द्रमाकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥


षड्विंशोऽध्यायः

महाराज पुरूरवाके चरित्र और वंशका वर्णन, राजा पुरूरवाका त्रेताग्निकी रचना करना और गन्धर्वोंके लोकमें जाना

वैशम्पायन उवाच

बुधस्य तु महाराज विद्वान् पुत्रः पुरूरवाः ।
तेजस्वी दानशीलश्च यज्वा विपुलदक्षिणः ॥ १ ॥
ब्रह्मवादी पराक्रान्तः शत्रुभिर्युधि दुर्जयः ।
आहर्ता चाग्निहोत्रस्य यज्ञानां च महीपतिः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज ! बुधके विद्वान् पुत्र पुरूरवा हुए, जो तेजस्वी, दानशील, यज्ञकर्ता, बहुत-सी दक्षिणा देनेवाले, ब्रह्मवादी, युद्धमें पराक्रम दिखानेवाले और शत्रुओंसे दुर्जय थे । वे राजा अग्निहोत्र और यज्ञोंके अनुष्ठान करनेवाले थे ॥ १-२ ॥

सत्यवादी पुण्यमतिः काम्यः संवृतमैथुनः ।
अतीव त्रिषु लोकेषु यशसाप्रतिमस्तदा ॥ ३ ॥

राजा पुरूरवा सत्यभाषी और पवित्र विचारवाले थे । उनका रूप बड़ा सुन्दर था और वे गुप्त रूपसे सहवास करनेवाले थे । वे अपने समयमें तीनों लोकोंमें अनुपम यशस्वी थे ॥ ३ ॥

तं ब्रह्मवादिनं क्षान्तं धर्मज्ञं सत्यवादिनम् ।
उर्वशी वरयामास हित्वा मानं यशस्विनी ॥ ४ ॥

९०श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

उन ब्रह्मवादी, क्षमापरायण, धर्मज्ञ तथा सत्यभाषी राजा-को यशस्विनी उर्वशी अप्सराने गर्वका परित्याग करके पतिरूपमें वरण कर लिया था ॥ ४ ॥

तया सहावसद् राजा वर्षाणि दश पञ्च च ।
पञ्च षट् सप्त चाष्टौ च दश चाष्टौ च भारत ॥ ५ ॥
वने चैत्ररथे रम्ये तथा मन्दाकिनीतटे ।
अलकायां विशालायां नन्दने च वनोत्तमे ॥ ६ ॥
उत्तरांश्च कुरून् प्राप्य मनोरथफलद्रुमान् ।
गन्धमादनपादेषु मेरुपृष्ठे तथोत्तरे ॥ ७ ॥

भारत ! राजा पुरूरवा उस अप्सराके साथ दस वर्षतक रमणीय चैत्ररथ वनमें, पाँच वर्षतक मन्दाकिनीके तटपर बसी हुई अलकापुरीमें, पाँच वर्षतक बदरीनारायणके वनोंमें, छः वर्षतक उत्तम उपवन नन्दनवनमें, सात वर्षतक मनोरथरूप फलको देनेवाले वृक्षोंसे परिपूर्ण उत्तरकुरुदेशमें, आठ वर्षतक गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर, दस वर्षतक मेरुपर्वतपर तथा आठ वर्षतक उत्तरांचलपर विहार करते रहे ॥ ५-७ ॥

एतेषु वनमुख्येषु सुरैराचरितेषु च ।
उर्वश्या सहितो राजा रेमे परमया मुदा ॥ ८ ॥

राजा पुरूरवा उर्वशीको साथमें लेकर देवताओंसे सेवित इन मुख्य-मुख्य वनोंमें बड़े आनन्दके साथ विहार किया करते थे ॥ ८ ॥

देशे पुण्यतमे चैव महर्षिभिरभिष्टुते ।
राज्यं च कारयामास प्रयागे पृथिवीपतिः ॥ ९ ॥

पृथिवीपति पुरूरवा (उर्वशीके साथ) महर्षियोंसे प्रशंसित परम पवित्र देश प्रयागमें राज्य करते थे ॥ ९ ॥

तस्य पुत्रा बभूवुस्ते सप्त देवसुतोपमाः ।
दिवि जाता महात्मान आयुर्धीमानमावसुः ॥ १० ॥
विश्वायुश्चैव धर्मात्मा श्रुतायुश्च तथापरः ।
दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः ॥ ११ ॥

राजाके द्वारा उर्वशीके गर्भसे स्वर्गमें देव-पुत्रोंके तुल्य आयु, बुद्धिमान् अमावसु, धर्मात्मा विश्वायु, श्रुतायु, दृढायु, वनायु और शतायु नामक सात पुत्र उत्पन्न हुए, जो सभी महान् आत्मबलसे सम्पन्न थे ॥ १०-११ ॥

जनमेजय उवाच
गान्धर्वी चोर्वशी देवी राजानं मानुषं कथम् ।
देवानुत्सृज्य सम्प्राप्ता तन्मे ब्रूहि बहुश्रुत ॥ १२ ॥

जनमेजयने पूछा—बहुश्रुत वैशम्पायनजी ! उर्वशीदेवी तो अप्सरा थी, फिर देवताओंका परित्याग कर वह मनुष्य राजाके पास क्योंकर आयी ? यह मुझे बताइये ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच
ब्रह्मशापाभिभूता सा मानुषं समपद्यत ।
ऐलं तु सा वरारोहा समयात् समुपस्थिता ॥ १३ ॥

वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! ब्रह्मशापके कारण उर्वशीको मनुष्यलोकमें आना पड़ा था। वह सुन्दर अङ्गोंवाली उर्वशी कुछ शर्तोंके साथ इला-नन्दन पुरूरवाके पास रही थी ॥ १३ ॥

आत्मनः शापमोक्षार्थं समयं सा चकार ह ।
अनग्नदर्शनं चैव सकामायां च मैथुनम् ॥ १४ ॥
द्वौ मेषौ शयनाभ्याशे सदा बद्धौ च तिष्ठतः ।
घृतमात्रो तथाऽऽहारः कालमेकं तु पार्थिव ॥ १५ ॥

भूपाल ! उसने अपने शापसे छूटनेके लिये यह शर्त करा ली थी कि 'मैं आपको नंगा न देखूँ, मेरे सकाम होनेपर ही आप सहवास करें, मेरे पलंगके पास सदा दो मेंढ़ बँधे रहेंगे और मैं दिनमें एक बार थोड़ा-सा घृतमात्र भोजन करूँगी ॥१४-१५॥

यद्येष समयो राजन् यावत्कालं च ते दृढः ।
तावत्कालं तु वत्स्यामि त्वत्तः समय एष नः ॥ १६ ॥

'राजन् ! जबतक इन प्रतिज्ञाओंका आप दृढ़ताके साथ पालन करते रहेंगे, तबतक मैं आपके पास रहूँगी—यह मैं आपसे प्रतिज्ञा करती हूँ' ॥ १६ ॥

तस्यास्तं समयं सर्वं स राजा समपालयत् ।
एवं सा वसते तत्र पुरूरवसि भामिनी ॥ १७ ॥

राजा उसकी सब शर्तोंका पालन करने लगे। इस प्रकार वह श्रेष्ठ अप्सरा पुरूरवाके यहाँ रहने लगी ॥ १७ ॥

वर्षाण्येकोनषष्टिस्तु तत्सक्ता शापमोहिता ।
उर्वश्यां मानुषस्थायां गन्धर्वाश्चिन्तयान्विताः ॥ १८ ॥

शापके कारण उर्वशीको जब राजामें आसक्त होकर रहते हुए उनसठ वर्ष बीत गये, तब गन्धर्वोंको मनुष्योंके बीच बसनेवाली उर्वशीकी चिन्ता हुई ॥ १८ ॥

गन्धर्वा ऊचुः
चिन्तयध्वं महाभागा यथा सा तु वराङ्गना ।
समागच्छेत् पुनर्देवानुर्वशी स्वर्गभूषणम् ॥ १९ ॥

गन्धर्वोंने कहा—महाभागो ! वराङ्गना उर्वशी देवताओंमें फिर किस प्रकार आवे ? इसका उपाय सोचो; क्योंकि वह स्वर्गका भूषण है ॥ १९ ॥

ततो विश्वावसुर्नाम तत्राह वदतां वरः ।
मया तु समयस्ताभ्यां क्रियमाणः श्रुतः पुरा ॥ २० ॥

तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ विश्वावसु नामक गन्धर्वने कहा—'उन दोनोंने पहले जो प्रतिज्ञाएँ की थीं, उन्हें मैंने सुना है ॥

व्युत्क्रान्तसमयं सा वै राजानं त्यक्ष्यते यथा ।
तदहं वेद्म्यशेषेण यथा भेत्स्यत्यसौ नृपः ॥ २१ ॥

'राजाके प्रतिज्ञा भङ्ग करनेपर वह उसे छोड़ देगी। उस राजाकी प्रतिज्ञा जिस प्रकार टूटेगी, मैं उसे भी भलीभाँति जानता हूँ ॥ २१ ॥