भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 92
[ हरिवंशपर्व ]विंशोऽध्यायः६९

ब्रह्मदत्तो नरपतिः किंवीर्यः स बभूव ह।
कथं च सप्तमस्तेषां स बभूव नराधिपः ॥ ७ ॥
राजा ब्रह्मदत्तका पराक्रम कैसा था? और वे उन (भरद्वाजपुत्रों) में सातवें कैसे थे? ॥ ७ ॥

न ह्यल्पवीर्याय शुको भगवाँल्लोकपूजितः।
कन्यां प्रदद्याद् योगात्मा कृत्वीं कीर्तिमतीं प्रभुः॥ ८ ॥
लोकोंमें पूजनीय योगकी मूर्ति सर्वशक्तिसम्पन्न भगवान् शुकदेवजीने अपनी कीर्तिमती कन्या कृत्वीको किसी साधारण शक्तिवाले पुरुषके हाथमें नहीं दिया होगा ॥ ८ ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महाद्युते ।
ब्रह्मदत्तस्य चरितं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ९ ॥
महाद्युते ! मैं ब्रह्मदत्तके इस चरित्रको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ, अतः आप उसका वर्णन कीजिये ॥ ९ ॥

यथा च वर्तमानास्ते संसारे च द्विजातयः।
मार्कण्डेयेन कथितास्तद् भवान् प्रब्रवीतु मे ॥ १० ॥
मार्कण्डेयजीने उन द्विजोके संसारमे विचरण करनेका वृत्तान्त जिस प्रकार कहा हो, उसे आप उसी भाँति मुझसे कहिये ॥ १० ॥

भीष्म उवाच
प्रतीपस्य तु राजर्षेस्तुल्यकालो नराधिपः।
पितामहस्य मे राजन् बभूवेति मया श्रुतम् ॥ ११ ॥
भीष्मजीने कहा—राजन् ! मैंने सुना है कि राजा ब्रह्मदत्त मेरे पितामह राजर्षि प्रतीपके समयमें ही हुए थे ॥

ब्रह्मदत्तो महाभागो योगी राजर्षिसत्तमः।
रुतज्ञः सर्वभूतानां सर्वभूतहिते रतः ॥ १२ ॥
ब्रह्मदत्त सब प्राणियोके हितमे लगे रहनेवाले, राजर्षियोंमें श्रेष्ठ, महाभाग्यवान् और योगी थे। वे सभी प्राणियोंकी बोली समझ लेते थे ॥ १२ ॥

सखाऽऽस गालवो यस्य योगाचार्यो महायशाः।
शिक्षामुत्पाद्य तपसा क्रमो येन प्रवर्तितः।
कण्डरीकश्च योगात्मा तस्यैव सचिवो महान् ॥ १३ ॥
जिन्होंने तपोवलसे वेदाङ्गभूत शिक्षाका आविर्भाव करके वैदिक संहिताके मन्त्रोका क्रमपाठ प्रचलित किया था, वे महायशस्वी योगाचार्य गालव ब्रह्मदत्तके सखा थे । तथा योगात्मा कण्डरीक इन्हीं राजाके प्रधान मन्त्री थे ॥ १३ ॥

जात्यन्तरेषु सर्वेषु सखायः सर्व एव ते।
सप्तजातिषु सप्तैव बभूवुरमितौजसः।
यथोवाच महाभागो मार्कण्डेयो महातपाः ॥ १४ ॥
तस्य वंशमहं राजन् कीर्तयिष्यामि तच्छृणु ।
ब्रह्मदत्तस्य पौराणं पौरवस्य महात्मनः ॥ १५ ॥
इन सात भरद्वाजपुत्रोंके सात जातियोंमें सात वार जन्म हुए थे और ये सभी अमिततेजस्वी द्विज उन सम्पूर्ण जन्मान्तरोंमे एक दूसरेके मित्र बने रहते थे। राजन् ! महाभाग्यवान् एवं महातपस्वी मार्कण्डेयजीने जिस प्रकार मुझसे कहा था, उसी प्रकार मैं पुरुवंशियों एवं पुरुवंशी महात्मा ब्रह्मदत्तके वंशका वर्णन करता हूँ, उसे सुनो ॥ १४-१५ ॥

बृहत्क्षत्रस्य दायादः सुहोत्रो नाम धार्मिकः।
सुहोत्रस्यापि दायादो हस्ती नाम बभूव ह ॥ १६ ॥
बृहत्क्षत्रके पुत्र धार्मिक सुहोत्र हुए और सुहोत्रके भी पुत्र हस्ती हुए ॥ १६ ॥

तेनेदं निर्मितं पूर्वं हस्तिनापुरमुत्तमम्।
हस्तिनश्चापि दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः ॥ १७ ॥
अजमीढो द्विमीढश्च पुरुमीढस्तथैव च।
अजमीढस्य धूमिन्यां जज्ञे बृहदिषुनृप ।
बृहद्धनुर्वृहदिषोः पुत्रस्तस्य महायशाः ॥ १८ ॥
राजन् ! उन्होंने ही इस उत्तम हस्तिनापुरको बसाया था। हस्तीके भी अजमीढ, द्विमीढ और पुरुमीढ नामवाले परम धार्मिक तीन पुत्र हुए । अजमीढके धूमिनी नामकी पत्नीके गर्भसे बृहदिषु उत्पन्न हुए और बृहदिषुके पुत्र महायशस्वी बृहद्धनु हुए ॥ १७-१८ ॥

बृहद्धर्मेति विख्यातो राजा परमधार्मिकः।
सत्यजित् तनयस्तस्य विश्वजित् तस्य चात्मजः ॥ १९ ॥
वे परम धर्मात्मा राजा बृहद्धर्मा नामसे भी प्रसिद्ध थे। उनके पुत्र सत्यजित् हुए और सत्यजित्के पुत्र विश्वजित् हुए ॥

पुत्रो विश्वजितश्चापि सेनजित् पृथिवीपतिः।
पुत्राः सेनजितश्चासंश्चत्वारो लोकविश्रुताः ॥ २० ॥
विश्वजित्के भी पुत्र राजा सेनजित् हुए और सेनजित्के चार पुत्र हुए, जो समस्त विश्वमे विख्यात थे ॥ २० ॥

रुचिरः श्वेतकेतुश्च महिम्नारस्तथैव च।
वत्सश्चावन्तको राजा यस्यैते परिवत्सकाः ॥ २१॥
राजा (सेनजित्) अवन्तीमे रहते थे। उनके रुचिर, श्वेतकेतु, महिम्नार और वत्स नामक (चार) पुत्र थे ॥२१॥

रुचिरस्य तु दायादः पृथुसेनो महायशाः।
पृथुसेनस्य पारस्तु पारान्नीपस्तु जज्ञिवान् ॥ २२ ॥
रुचिरके पुत्र महायशस्वी पृथुसेन हुए। पृथुसेनके पार और पारके पुत्र नीप हुए॥ २२ ॥

नीपस्यैकशतं तात पुत्राणाममितौजसाम् ।
महारथानां राजेन्द्र शूराणां बाहुशालिनाम्।
नीपा इति समाख्याता राजानः सर्व एव ते ॥ २३ ॥
तात ! नीपके परम पराक्रमी, बाहुशाली एवं महारथी सौ वीर पुत्र उत्पन्न हुए। राजेन्द्र ! वे सब नीपवंशी राजा कहलाते थे ॥ २३ ॥