भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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५८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

सदा आत्ममीमांसा करनेमें लगे रहते हैं, ऐसे शान्त चित्तवाले, क्रोधको जीतनेवाले, मान तथा अहंकाररहित मनुष्योंको योग-सिद्धि मिलती है; क्योंकि पृथ्वीमें योगकी प्राप्ति अति दुर्लभ है॥

कल्याणभाजनं ये तु ते भवन्ति यतव्रताः।
एवंविधास्तु ते तात ब्राह्मणा ह्यभवंस्तदा ॥ १६ ॥

ऐसे व्रतोंका पालन करनेवाले मनुष्य ही कल्याणके पात्र होते हैं। तात! वे (भरद्वाजपुत्र) ऐसे ही ब्राह्मण बनकर उत्पन्न हुए हैं॥ १६॥

स्मरन्ति ह्यात्मनो दोषं प्रमादकृतमेव तु।
ध्यानाध्ययनयुक्ताश्च शान्ते वर्त्मनि संस्थिताः ॥ १७ ॥

वे अपने प्रमादवश हुए दोषका स्मरण करते रहते हैं और ध्यान तथा स्वाध्यायमें लगे रहकर शान्त मार्गमें स्थित रहते थे॥

योगधर्माद्धि धर्मज्ञ न धर्मोऽस्ति विशेषवान्।
वरिष्ठः सर्वधर्माणां तमेवाचर भार्गव ॥ १८ ॥

धर्मज्ञ भार्गव! योगधर्मसे श्रेष्ठ और कोई धर्म नहीं है। वह सभी धर्मोंसे श्रेष्ठ है, अतः तुम उसीका आचरण करो॥ १८॥

कालस्य परिणामेन लघ्वाहारो जितेन्द्रियः।
तत्परः प्रयतः श्राद्धी योगधर्ममवाप्स्यसि ॥ १९ ॥

यदि तुम श्रद्धापूर्वक प्रयत्नशील एवं योगधर्ममें परायण रहकर हलका भोजन करते हुए जितेन्द्रिय रहोगे तो कालक्रमसे तुम्हें योगसिद्धि प्राप्त हो जायगी ॥ १९ ॥

इत्युक्त्वा भगवान् देवस्तत्रैवान्तरधीयत।
अष्टादशैव वर्षाणि त्वेकाहमिव मेऽभवत् ॥ २० ॥

(मार्कण्डेयजी कहते हैं कि) इतनी बातें कहकर भगवान् सनत्कुमार वहीं अन्तर्धान हो गये। ये (सनत्कुमारकी सेवामें बीते हुए) अठारह वर्ष मुझे एक दिनके समान प्रतीत हुए॥ २०॥

उपासतस्तं देवेशं वर्षाण्यष्टादशैव मे।
प्रसादात् तस्य देवस्य न ग्लानिरभवत् तदा ॥ २१ ॥

अठारह वर्षतक उन देवेशकी उपासना करते रहनेपर भी उनकी कृपाके कारण उस समय मुझे कुछ भी ग्लानि नहीं हुई ॥ २१ ॥

न क्षुत्पिपासे कालं वा जानामि स्म तदानघ।
पश्चाच्छिष्यसकाशात् तु कालः संविदितो मया ॥ २२ ॥

निष्पाप! मुझे भूख, प्यास और समय आदि कुछ न मालूम हुआ। बादमें शिष्यके द्वारा मुझे समयका पता लगा॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥


विंशोऽध्यायः

पितृकल्प—ब्रह्मदत्त और उग्रायुधके वंश तथा पूजनीया चिड़ियाद्वारा शुक्रनीतिका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

तस्मिन्नन्तर्हिते देवे वचनात् तस्य वै प्रभोः।
चक्षुर्दिव्यं सविज्ञानं प्रादुरासीत् तदा मम ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी बोले— उन सनत्कुमारदेवके अन्तर्धान होनेपर उन्हीं प्रभुके वरदानसे मुझे दिव्य विज्ञानमय नेत्र प्राप्त हो गया ॥ १ ॥

ततोऽहं तानपश्यं वै ब्राह्मणान् कौशिकात्मजान्।
आपगेय कुरुक्षेत्रे यानुवाच विभुर्मम ॥ २ ॥

गङ्गानन्दन भीष्म! तब मैंने उन कौशिकपुत्र ब्राह्मणोंको कुरुक्षेत्रमें देखा, जिनका विभु सनत्कुमारजीने मुझसे वर्णन किया था॥ २॥

ब्रह्मदत्तोऽभवद् राजा यस्तेषां सप्तमो द्विजः।
पितृवर्तीति विख्यातो नाम्ना शीलेन कर्मणा ॥ ३ ॥

उन कौशिकपुत्रोंमें जो सातवाँ पितृवर्ती नामसे विख्यात ब्राह्मण था, वह अपने शील और कर्मसे (सातवें जन्ममें) ब्रह्मदत्त नामक राजा हुआ॥ ३॥

शुकस्य कन्या कृत्वी तं जनयामास पार्थिवम्।
अणुहात् पार्थिवश्रेष्ठात् काम्पिल्ये नगरोत्तमे ॥ ४ ॥

काम्पिल्यनामक श्रेष्ठ नगरमें पार्थिवश्रेष्ठ अणुहके यहाँ शुककी कन्या कृत्वीके उदरसे राजा ब्रह्मदत्त उत्पन्न हुआ॥ ४॥

भीष्म उवाच

यथोवाच महाभागो मार्कण्डेयो महातपाः।
तस्य वंशमहं राजन् कीर्तयिष्यामि तच्छृणु ॥ ५ ॥

भीष्मजी बोले— राजन्! महाभाग्यवान् एवं महातपस्वी मार्कण्डेयजीने जिस प्रकार मुझसे कहा था, (उसी तरह) मैं उस राजाके वंशका वर्णन करूँगा, तुम सुनो—॥ ५॥

युधिष्ठिर उवाच

अणुहः कस्य वै पुत्रः कस्मिन् काले बभूव ह।
राजा धर्मभृतां श्रेष्ठो यस्य पुत्रो महायशाः ॥ ६ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— (पितामह!) जिनके पुत्र महायशस्वी (ब्रह्मदत्त) थे, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ वे राजा अणुह किनके पुत्र थे और किस समय उत्पन्न हुए थे? ॥ ६॥