भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 75
५२श्रीमहाभारते खिलेभागे[ हरिवंशे

आग्नेयं तु महाघोरममरैरपि दुःसहम्।
स तेनास्त्रबलेनाजी बलेन च समन्वितः ॥ १० ॥
हैहयान्निजघानाशु क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव ।
आजहार च लोकेषु कीर्तिं कीर्तिमंतां वरः ॥ ११ ॥

उन्होंने सगरको देवताओंके लिये भी असह्य महाघोर आग्नेय अस्त्र दिया था। जब वे अस्त्र-बल और शारीरिक बलसे सम्पन्न हो गये, तब क्रोधमें भरकर रुद्र जैसे शीघ्रतासे पशुओंका संहार करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने हैहयोंका संहार कर डाला। इस प्रकार कीर्तिमानोंमें श्रेष्ठ उन वीर पुरुषने संसारमें (अद्भुत) कीर्ति पायी थी ॥ १०-११ ॥

ततः शकान् सयवनान् काम्बोजान् पारदांस्तथा।
पह्लवांश्चैव निःशेषान् कर्तुं व्यवसितस्तदा ॥ १२ ॥

इसके अनन्तर उन्होंने शक, यवन, काम्बोज, पारद और पह्लवोंको भी निःशेष (सर्वथा नष्ट) करनेका निश्चय किया॥ १२ ॥

ते बध्यमाना वीरेण सगरेण महात्मना ।
वसिष्ठं शरणं गत्वा प्रणिपेतुर्मनीषिणम् ॥ १३ ॥

जब वीर और महात्मा सगर उनका सर्वनाश करने लगे, तब वे (शक, यवनादि) बुद्धिमान् वसिष्ठजीकी शरणमें गये और उनके पैरोंमें गिर पड़े ॥ १३ ॥

वसिष्ठस्त्वथ तान् दृष्ट्वा समयेन महाद्युतिः ।
सगरं वारयामास तेषां दत्त्वाभयं तदा ॥ १४ ॥

परम यशस्वी वसिष्ठजीने कुछ विशेष शर्तोंपर उनको अभयदान दिया और सगरको (उन्हें मारनेसे) रोका ॥ १४ ॥

सगरः स्वां प्रतिज्ञां च गुरोर्वाक्यं निशम्य च ।
धर्मं जघान तेषां वै वेषान्यत्वं चकार ह ॥ १५ ॥

सगरने अपनी प्रतिज्ञा और गुरुके वाक्यकी ओर ध्यान देकर (उनके प्राण नहीं लिये) उनके धर्मको नष्ट कर दिया; और उनका वेष बदल दिया ॥ १५ ॥

अर्द्धं शकानां शिरसो मुण्डं कृत्वा व्यसर्जयत्।
यवनानां शिरः सर्वं काम्बोजानां तथैव च ॥ १६ ॥

उन्होंने शकोंके आधे शिरको मूँड़कर छोड़ दिया, यवनोंके सारे शिरको मूँड़ दिया, और पह्लवोंके भी शिरको मुँड़वा दिया ॥ १६ ॥

पारदा मुक्तकेशाश्च पह्लवाः श्मश्रुधारिणः ।
निःस्वाध्यायवषट्काराः कृतास्तेन महात्मना ॥ १७ ॥

उन महात्मा नरेशने पारदोंके शिरको मुक्तकेश (खुले हुए केशोंवाला) कर दिया और पह्लवोंको श्मश्रुधारी (केवल दाढ़ीवाला) बना दिया और सबको स्वाध्याय तथा वषट्कारसे रहित कर दिया ॥ १७ ॥

शका यवनकाम्बोजाः पारदाश्च विशाम्पते ।
कोलिसर्पाः समहिषा दार्वाश्चोलाः सकेरलाः ॥ १८ ॥
सर्वे ते क्षत्रियास्तात धर्मस्तेषां निराकृतः ।
वसिष्ठवचनाद् राजन् सगरेण महात्मना ॥ १९ ॥

तात ! जनेश्वर ! शक, यवन, काम्बोज, पारद, कोलिसर्प, महिष, दर्द, चोल और केरल—ये सब क्षत्रिय ही थे। वसिष्ठजीके वचनसे महात्मा सगरने (इन सबका संहार न करके केवल) इनके धर्मको ही नष्ट कर दिया था ॥ १८-१९ ॥

खसांस्तुपारान्द्रांश्चोलांश्च मद्रान् किष्किन्धकांस्तथा।
कौन्तलांश्च तथा वङ्गान् साल्वान् कौद्रुणकांस्तथा ॥ २० ॥
स धर्मविजयी राजा विजित्येमां वसुंधराम् ।
अश्वं वै प्रेरयामास वाजिमेधाय दीक्षितः ॥ २१ ॥

उन धर्मविजयी राजाने अश्वमेधकी दीक्षा लेकर खस, तुषार, चोल, मद्र, किष्किन्धक, कौन्तल, वङ्ग, साल्व तथा कौद्रुण देशके राजाओंको जीता। इस प्रकार पृथ्वीका विजय करते हुए उन्होंने अश्वमेध यज्ञके लिये अपना घोड़ा छोड़ा ॥

तस्य चारयतः सोऽश्वः समुद्रे पूर्वदक्षिणे ।
वेलासमीपेऽपहृतो भूमिं चैव प्रवेशितः ॥ २२ ॥

जब उनका घोड़ा घुमाया जा रहा था, उस समय पूर्व-दक्षिणमें समुद्रके किनारे किसीने उस घोड़ेको चुरा लिया और उसे भूमिमें छिपा दिया ॥ २२ ॥

स तं देशं तदा पुत्रैः खानयामास पार्थिवः ।
आसेदुस्ते ततस्तत्र खन्यमाने महार्णवे ॥ २३ ॥
तमादिपुरुषं देवं हरिं कृष्णं प्रजापतिम् ।
विष्णुं कपिलरूपेण स्वपन्तं पुरुषोत्तमम् ॥ २४ ॥

उस समय राजा (सगर) ने अपने पुत्रोंसे उस स्थानको खुदवाया। समुद्रके खोदनेपर उनके पुत्रोंने आदिपुरुष, हरि (अविद्याको हरनेवाले), कृष्ण (सच्चिदानन्दस्वरूप) प्रजापति पुरुषोत्तम, (कपिलरूपी विष्णुको वहाँ सोते हुए समाधिमें स्थित) देखा ॥ २३-२४ ॥

तस्य चक्षुःसमुत्थेन तेजसा प्रतिबुध्यतः ।
दग्धास्ते वै महाराज चत्वारस्त्ववशेषिताः ॥ २५ ॥
बर्हकेतुः सुकेतुश्च तथा धर्मरथो नृपः ।
शूरः पञ्चजनश्चैव तस्य वंशकरो नृपः ॥ २६ ॥

उनके योगनिद्राको त्यागनेपर उनके नेत्रमोंसे निकलते हुए तेजसे वे सब (राजकुमार) भस्म हो गये। महाराज ! केवल बर्हकेतु, सुकेतु, राजा धर्मरथ और वंशको चलानेवाला शूर पञ्चजन—ये चार राजकुमार ही जीवित बच सके थे ॥ २५-२६ ॥

प्रादाच्च तस्मै भगवान् हरिनारायणो वरान् ।
अक्षयं वंशमिक्ष्वाकोः कीर्तिं चाप्यनिवर्तनीम् ॥ २७ ॥
पुत्रं समुद्रं च विभुः स्वर्गवासं तथाक्षयम् ।
पुत्राणां चाक्षयाँल्लोकांस्तस्य ये चक्षुषा हताः ॥ २८ ॥