भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 76

हरिवंशपर्व ] 'पञ्चदशोऽध्यायः ५३


उन्हें (कपिलरूपी) विष्णु हरिनारायण भगवान्ने यह वरदान दिया था कि इक्ष्वाकुका वंश अक्षय रहेगा और राजा सगरकी कीर्ति कभी नष्ट नहीं होगी। समुद्र उनका पुत्र कहा जायगा (अर्थात् भविष्यमें यह सागर नामसे प्रसिद्ध होगा) और उन्हें अक्षय स्वर्गवास मिलेगा। कपिलजीने अपने नेत्रके तेजसे भस्म हुए सगर-पुत्रोंको भी अक्षयलोकोंकी प्राप्ति होनेका वर दिया ॥ २७-२८ ॥

समुद्रश्चार्घ्यमादाय ववन्दे तं महीपतिम् ।
सागरत्वं च लेभे स कर्मणा तेन तस्य वै ॥ २९ ॥

(उस समय) समुद्रने अर्घ्य लेकर उन राजा (सगर) को प्रणाम किया और सगरके इस कर्मके कारण समुद्रका सागर नाम पड़ गया ॥ २९ ॥

तं चाश्वमेधिकं सोऽश्वं समुद्रादुपलब्धवान् ।
आजहाराश्वमेधानां शतं स सुमहायशाः ।
पुत्राणां च सहस्राणि षष्टिस्तस्येति नः श्रुतम् ॥ ३० ॥

उन्होंने अश्वमेधयज्ञके घोड़ेको भी समुद्रसे प्राप्त किया। इस तरह उन महायशस्वी राजाने सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे—ऐसा सुना जाता है। इन महाराजके पुत्रोंकी संख्या साठ हजार थी ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि सगरोत्पत्तिर्नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें सगरकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥


पञ्चदशोऽध्यायः

सूर्यवंशका वर्णन

जनमेजय उवाच<br>सगरस्यात्मजा वीराः कथं जाता महात्मनः ।<br>विक्रान्ताः षष्टिसहस्रा विधिना केन वा द्विज ॥ १ ॥<br>जनमेजयने कहा—द्विज ! महात्मा सगरके साठ हजार वीर और पराक्रमी पुत्र किस प्रकार उत्पन्न हुए थे ? ॥ १ ॥तत्रैका जगृहे पुत्राँल्लुब्धा शूरान् बहूंस्तथा ॥ ५ ॥<br>एकं वंशधरं त्वेका तथेत्याह च तां मुनिः ।<br>केशिन्यसूत सगरादसमञ्जसमात्मजम् ॥ ६ ॥<br>उनमेंसे एक पुत्रलोभिनी स्त्रीने तो बहुतसे शूरवीर पुत्रोंको माँग लिया तथा एकने एक ही वंशधर पुत्रको माँगा। तब मुनिने तथास्तु—ऐसा ही होगा, कहकर वरदान दे दिया। केशिनीके सगरसे असमञ्जस नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ५-६ ॥
वैशम्पायन उवाच<br>द्वे भार्ये सगरस्यास्तां तपसा दग्धकिल्बिषे ।<br>ज्येष्ठा विदर्भदुहिता केशिनी नाम विश्रुता ॥ २ ॥<br>वैशम्पायनजीने उत्तर दिया—सगरकी दो रानियाँ थीं। तपसे उनके पाप नष्ट हो गये थे। उनमें बड़ी रानी विदर्भ-नरेशकी पुत्री थीं और केशिनी नामसे प्रसिद्ध थीं ॥ २ ॥राजा पञ्चजनो नाम बभूव सुमहाबलः ।<br>इतरा सुषुवे तुम्बीं बीजपूर्णामिति श्रुतिः ॥ ७ ॥<br>वह पञ्चजन नामसे प्रसिद्ध महाबलवान् राजा था। दूसरीने बीजोंसे भरी हुई एक तूंबी उत्पन्न की, यह बात प्रसिद्ध है ॥ ७ ॥
कनीयसी तु या तस्य पत्नी परमधर्मिणी ।<br>अरिष्टनेमिदुहिता रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥ ३ ॥<br>उन राजाकी जो छोटी पत्नी थी, वह बड़ी ही धर्मात्मा थी। वह अरिष्टनेमि (कश्यप) की पुत्री थी। उसके समान पृथिवीपर कोई भी दूसरी रूपवती स्त्री नहीं थी ॥ ३ ॥तत्र षष्टिसहस्राणि गर्भास्ते तिलसम्मिताः ।<br>सम्बभूवुर्यथाकालं ववृधुश्च यथाक्रमम् ॥ ८ ॥<br>उस तूंबीमें तिलके समान साठ हजार गर्भ थे, जो समय आनेपर उत्पन्न हुए और क्रमशः बढ़ने लगे ॥ ८ ॥
और्वस्ताभ्यां वरं प्रादात् तं निबोध जनाधिप ।<br>षष्टिं पुत्रसहस्राणि गृह्णात्वेका तपस्विनी ॥ ४ ॥<br>एकं वंशधरं त्वेका यथेष्टं वरयत्विति ।<br>जनाधिप ! और्वने उन दोनोंको जो वर दिया था, उसे सुनो। (और्वने कहा था) दोनोंमेंसे कोई एक तपस्विनी रानी तो साठ हजार पुत्र माँग ले और एक वंश चलानेवाले एक ही पुत्रको माँगे। अब जिसे जो वर अच्छा लगता हो वह उस वरको माँग ले ॥ ४½ ॥घृतपूर्णेषु कुम्भेषु तान् गर्भान् निदधे पिता ।<br>धात्रीश्चैकैकशः प्रादात् तावतीरेव पोषणे ॥ ९ ॥<br>पिताने उन गर्भोको घृतसे भरे हुए घड़ोंमें डाल दिया और उनका पोषण करनेके लिये एक-एक घड़ेपर एक-एक करके उतनी ही धाइयोंको नियुक्त कर दिया ॥ ९ ॥<br><br>ततो दशसु मासेषु समुत्तस्थुर्यथासुखम् ।<br>कुमारास्ते यथाकालं सगरप्रीतिवर्धनाः ॥ १० ॥
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