भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 744
७२२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

अविषह्यामिमं भारं चिन्तयस्व पितामह।
लघ्वीभूता यथा देव धारयेयं चराचरम्॥ १४॥

पितामह! मैं इस भारको अपने लिये असह्य मानती हूँ, आप इसपर विचार कीजिये। देव! ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे मैं हलकी होकर चराचर जगत्‌को धारण कर सकूँ॥ १४॥

ततस्तु काश्यपीं देवीं प्रत्युवाच पितामहः।
मुहूर्तं धारयात्मानमाशु लघ्वी भविष्यसि॥ १५॥

तब पितामह ब्रह्माजीने काश्यपीदेवी (पृथ्वी) से इस प्रकार कहा—‘तू दो घड़ीतक किसी प्रकार अपने आपको रोके रह; फिर शीघ्र ही हलकी हो जायगी’॥ १५॥

वैशम्पायन उवाच
दृष्ट्वा तु भगवान् ब्रह्मा रुद्रं वचनमब्रवीत्।
स्पृष्टो महासुरवधः किं भूयः परिरक्ष्यते॥ १६॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब भगवान् ब्रह्माने रुद्रदेवसे मिलकर यह बात कही—‘(आपकी सम्मतिसे ही तो) बड़े-बड़े असुरोंका वध आरम्भ किया गया है, फिर आप स्वयं ही असुरवृन्दकी रक्षा क्यों करते हैं?॥१६॥

न च युद्धं महाबाहो तव कृष्णेन रोचते।
न च बुध्यसि कृष्णं त्वमात्मानं तु द्विधा कृतम्॥ १७॥

‘महाबाहो! श्रीकृष्णके साथ आपका युद्ध मुझे अच्छा नहीं लगता। आप श्रीकृष्णको समझ नहीं रहे हैं, आपका आत्मा ही (श्रीकृष्ण बनकर) दो रूपोंमें विभक्त हो गया है’॥ १७॥

ततः शरीरयोगाद्धि भगवानव्ययः प्रभुः।
प्रविश्य पश्यते कृत्स्नांस्त्रींल्लोकान् सचराचरान्॥ १८॥

ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर अविनाशी प्रभु भगवान् शिव शरीरके भीतर अन्तःकरणमें ध्यान लगाकर हृदयस्थित ब्रह्ममें प्रविष्ट हो, तीनों लोकोंके समस्त चराचर प्राणियोंका साक्षात्कार करने लगे॥ १८॥

प्रविश्य योगं योगात्मा वरांस्ताननुचिन्तयन्।
द्वारवत्यां यदुक्तं च तदनुस्मृत्य सर्वशः।
जगाद नोत्तरं किंचिन्निवृत्तो ह्यभवत् तदा॥ १९॥

योगस्वरूप भगवान् शङ्कर योगमें प्रवेश करके (समाधि लगाकर) पहलेके दिये हुए उन वरोंका चिन्तन करने लगे तथा द्वारकामें जो कुछ कहा था, उन सब बातोंका वारंवार स्मरण करके उन्होंने ब्रह्माजीको कोई उत्तर नहीं दिया; वे उस समय युद्धसे निवृत्त हो गये॥ १९॥

आत्मानं कृष्णयोनिस्थं पश्यत ह्येकयोनिजम्।
ततो निःसृत्य रुद्रस्तु न्यस्तवादोऽभवन्मृधे॥ २०॥

उन्होंने अपने-आपको सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्णमय योनि (परब्रह्म) में स्थित देखा और अपनेको एक-अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप योनिसे प्रकट हुआ जाना। तत्पश्चात् रुद्रदेव वहाँसे निकलकर युद्धसे अलग हो गये। उन्होंने उस रणक्षेत्रमें श्रीकृष्णके साथ वाद-विवाद या युद्धकी भावनाका परित्याग कर दिया॥ २०॥

ब्रह्माणं चाब्रवीद् रुद्रो न योत्स्ये भगवन्निति।
कृष्णेन सह संग्रामे लघ्वी भवतु मेदिनी॥ २१॥

तत्पश्चात् रुद्रने ब्रह्माजीसे कहा—‘भगवन्! अब मैं संग्रामभूमिमें श्रीकृष्णके साथ युद्ध नहीं करूँगा, अब यह पृथ्वी हलकी हो जाय’॥ २१॥

ततः कृष्णोऽथ रुद्रश्च परिष्वज्य परस्परम्।
परां प्रीतिमुपागम्य संग्रामादपजग्मतुः॥ २२॥

इसके बाद श्रीकृष्ण और रुद्र एक दूसरेसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए और आपसके संग्रामसे हट गये॥२२॥

न च तौ पश्यते कश्चिद् योगिनौ योगमागतौ।
एको ब्रह्मा तथा कृत्वा पश्यँल्लोकान् पितामहः॥ २३॥
उवाचैतन् समुद्दिश्य मार्कण्डेयं सनारदम्।
पार्श्वस्थं परिपप्रच्छ ज्ञात्वा वै दीर्घदर्शिनम्॥ २४॥

श्रीकृष्ण और रुद्र दोनों योगी हैं तथा दोनों एक दूसरेसे अभेद-सम्बन्धको प्राप्त हैं, इस बातको वहाँ दूसरे किसीने नहीं समझा; एकमात्र पितामह ब्रह्माने उन दोनोंका अभेद सम्बन्ध स्थापित करके उन्हें उसी भावसे देखा और सब लोगोंकी ओर देखते हुए इसी विषयको लेकर अपने बगलमें खड़े हुए नारद तथा मार्कण्डेयको दीर्घदर्शी जानकर इस प्रकार पूछा॥ २३-२४॥

पितामह उवाच
मन्दरस्य गिरेः पार्श्वे नलिन्यां भवकेशवौ।
रात्रौ स्वप्नान्तरे ब्रह्मन् मया दृष्टौ हराच्युतौ॥ २५॥

पितामह बोले—ब्रह्मन्! मैंने मन्दराचल पर्वतके पार्श्वभागमें रातको सोते समय सपनेमें एक सरोवरके तटपर श्रीकृष्ण और भगवान् शङ्करको देखा, जो तत्काल ही एक दूसरेके रूपमें बदल गये थे (अर्थात् श्रीकृष्णकी जगह शिव और शिवकी जगह श्रीकृष्ण हो गये थे)॥ २५॥

हरं च हरिरूपेण हरिं च हररूपिणम्।
शङ्खचक्रगदापाणिं पीताम्बरधरं हरम्॥ २६॥

मैंने हरको हरिरूपमें देखा और हरिको हररूपमें; भगवान् हरने हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा ले रखी थी और उनके अङ्गोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था॥ २६॥

त्रिशूलपट्टिशधरं व्याघ्रचर्मधरं हरिम्।
गरुडस्थं चापि हरं हरिं च वृषभध्वजम्॥ २७॥

उधर श्रीहरि त्रिशूल और पट्टिश धारण किये वाघम्बर पहने हुए थे; भगवान् शङ्कर गरुड़पर बैठे थे और श्रीहरिने