विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 745, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७२३
वृषभवाहन होकर अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण किया था॥ २७॥
विस्मयो मे महान् ब्रह्मन् दृष्ट्वा तत् परमाद्भुतम्।
एतदाचक्ष्व भगवन् याथातथ्येन सुव्रत॥ २८॥
ब्रह्मन्! उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! वह अद्भुत दृश्य देखकर मुझे महान् विस्मय हुआ। भगवन्! आप इसके रहस्यका यथार्थरूपसे विवेचन करें॥ २८॥
मार्कण्डेय उवाच
शिवाय विष्णुरूपाय विष्णवे शिवरूपिणे।
यथान्तरं न पश्यामि तेन तौ दिशतः शिवम्॥ २९॥
मार्कण्डेयजी बोले—विष्णुरूपधारी शिव और शिवरूपधारी विष्णुको नमस्कार है। मैं इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं देखता, मेरे इस भावसे संतुष्ट होकर वे दोनों मुझे कल्याण प्रदान करें॥ २९॥
अनादिमध्यनिधनमेतदक्षरमव्ययम् ।
तदेव ते प्रवक्ष्यामि रूपं हरिहरात्मकम्॥ ३०॥
आदि, मध्य और अन्तसे रहित जो यह अविनाशी अक्षर ब्रह्म है, उसका स्वरूप हरिहरात्मक है, ब्रह्मन्! मैं आपके समक्ष उसी हरिहरात्मक ब्रह्मका वर्णन करूँगा॥ ३०॥
यो विष्णुः स तु वै रुद्रो यो रुद्रः स पितामहः।
एका मूर्तिस्त्रयो देवा रुद्रविष्णुपितामहाः॥ ३१॥
जो विष्णु हैं, वे ही रुद्र हैं और जो रुद्र हैं, वे ही ब्रह्मा हैं; इनका मूलस्वरूप तो एक ही है, परंतु ये कार्यभेदसे रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा तीन देवता कहलाते हैं॥ ३१॥
वरदा लोककर्तारो लोकनाथाः स्वयम्भुवः।
अर्धनारीश्वरास्ते तु व्रतं तीव्रं समास्थिताः॥ ३२॥
ये सब-के-सब लोकस्रष्टा, वरदायक, जगन्नाथ, स्वयम्भू, अर्धनारीश्वर तथा तीव्र व्रतका आश्रय लेनेवाले हैं॥ ३२॥
यथा जले जलं क्षिप्तं जलमेव तु तद् भवेत्।
रुद्रं विष्णुः प्रविष्टस्तु तथा रुद्रमयो भवेत्॥ ३३॥
जैसे जलमें डाला हुआ जल जलरूप ही हो जाता है, उसी प्रकार रुद्रदेवमें प्रविष्ट हुए भगवान् विष्णु रुद्रमय हो जाते हैं॥ ३३॥
अग्निमग्निः प्रविष्टस्तु अग्नेरेव यथा भवेत्।
तथा विष्णुं प्रविष्टस्तु रुद्रो विष्णुमयो भवेत्॥ ३४॥
जैसे अग्निमे प्रविष्ट हुई अग्नि अग्निरूप ही होती है, उसी प्रकार विष्णुमे प्रविष्ट हुए रुद्रदेव विष्णुरूप ही होते हैं॥ ३४॥
रुद्रमग्निमयं विद्याद् विष्णुः सोमात्मकः स्मृतः।
अग्नीषोमात्मकं चैव जगत् स्थावरजंगमम्॥ ३५॥
रुद्रको अग्निस্বরূপ जाने और भगवान् विष्णु सोमस्वरूप माने गये हैं। इसीलिये यह समस्त चराचर जगत् अग्नीषोमात्मक कहलाता है॥ ३५॥
कर्तारौ चापहर्तारौ स्थावरस्य चरस्य तु।
जगतः शुभकर्तारौ प्रभविष्णू महेश्वरौ॥ ३६॥
यह हरि और हर ही समस्त चराचर जगत्के कर्त्ता, संहारक, शुभकारक तथा प्रभावशाली महेश्वर हैं॥ ३६॥
कर्तृकारणकर्तारौ कर्तृकारणकारकौ।
भूतभव्यभवौ देवौ नारायणमहेश्वरौ॥ ३७॥
ये नारायण और महेश्वरदेव कर्ता और कारणके भी आदि कर्ता हैं तथा कर्ता और कारणसे भी काम करानेवाले हैं। ये ही दोनों भूत, भविष्य और वर्तमानरूप हैं॥ ३७॥
जगतः पालकावेतावेतौ सृष्टिकरी स्मृतौ।
एते चैव प्रवर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च।
एतत् परतरं गुह्यं कथितं ते पितामह॥ ३८॥
ये ही जगत्के पालक और ये ही इसकी सृष्टि करनेवाले माने गये हैं। ये ब्रह्मा, विष्णु और शिव (मेघरूपसे जलकी) वर्षा करते हैं। (सूर्यरूपसे) प्रकाशित होते हैं और (वायुरूपसे) सर्वत्र गतिशील होते हैं। ये ही सृष्टि करते हैं। पितामह! यह मैंने आपसे परम गुह्य रहस्यका वर्णन किया है॥ ३८॥
यश्चैनं पठते नित्यं यश्चैनं शृणुयान्नरः।
प्राप्नोति परमं स्थानं विष्णुरुद्रप्रसादजम्॥ ३९॥
जो प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करता और जो इसे सुनता है, वह मनुष्य भगवान् विष्णु और रुद्रकी कृपासे परम पदको प्राप्त कर लेता है॥ ३९॥
देवौ हरिहरौ स्तोष्ये ब्रह्मणा सह संगतौ।
एतौ च परमौ देवौ जगतः प्रभवाप्ययौ॥ ४०॥
मैं ब्रह्माजीके साथ मिले हुए हरि और हर दोनों देवताओंकी स्तुति करूँगा। ये ही दोनों परम देव हैं और ये ही जगत्की सृष्टि तथा संहारके कारण हैं॥ ४०॥
रुद्रस्य परमो विष्णुर्विष्णोश्च परमः शिवः।
एक एव द्विधाभूतो लोके चरति नित्यशः॥ ४१॥
रुद्रके परमदेव विष्णु हैं और विष्णुके परमदेव शिव हैं। एक ही परमेश्वर दो रूपोंमे व्यक्त होकर सदा समस्त जगत्में विचरते रहते हैं॥ ४१॥
न विना शंकरं विष्णुर्न विना केशवं शिवः।
तस्मादेकत्वमायातो रुद्रोपेन्द्रौ तु तौ पुरा।
नमो रुद्राय कृष्णाय नमः संहतचारिणे॥ ४२॥
भगवान् शङ्करके बिना विष्णु नहीं हैं और विष्णुके