विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
विष्णुपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७२३
वृषभवाहन होकर अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण किया था॥ २७॥
विस्मयो मे महान् ब्रह्मन् दृष्ट्वा तत् परमाद्भुतम्।
एतदाचक्ष्व भगवन् याथातथ्येन सुव्रत॥ २८॥
ब्रह्मन्! उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! वह अद्भुत दृश्य देखकर मुझे महान् विस्मय हुआ। भगवन्! आप इसके रहस्यका यथार्थरूपसे विवेचन करें॥ २८॥
मार्कण्डेय उवाच
शिवाय विष्णुरूपाय विष्णवे शिवरूपिणे।
यथान्तरं न पश्यामि तेन तौ दिशतः शिवम्॥ २९॥
मार्कण्डेयजी बोले—विष्णुरूपधारी शिव और शिवरूपधारी विष्णुको नमस्कार है। मैं इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं देखता, मेरे इस भावसे संतुष्ट होकर वे दोनों मुझे कल्याण प्रदान करें॥ २९॥
अनादिमध्यनिधनमेतदक्षरमव्ययम् ।
तदेव ते प्रवक्ष्यामि रूपं हरिहरात्मकम्॥ ३०॥
आदि, मध्य और अन्तसे रहित जो यह अविनाशी अक्षर ब्रह्म है, उसका स्वरूप हरिहरात्मक है, ब्रह्मन्! मैं आपके समक्ष उसी हरिहरात्मक ब्रह्मका वर्णन करूँगा॥ ३०॥
यो विष्णुः स तु वै रुद्रो यो रुद्रः स पितामहः।
एका मूर्तिस्त्रयो देवा रुद्रविष्णुपितामहाः॥ ३१॥
जो विष्णु हैं, वे ही रुद्र हैं और जो रुद्र हैं, वे ही ब्रह्मा हैं; इनका मूलस्वरूप तो एक ही है, परंतु ये कार्यभेदसे रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा तीन देवता कहलाते हैं॥ ३१॥
वरदा लोककर्तारो लोकनाथाः स्वयम्भुवः।
अर्धनारीश्वरास्ते तु व्रतं तीव्रं समास्थिताः॥ ३२॥
ये सब-के-सब लोकस्रष्टा, वरदायक, जगन्नाथ, स्वयम्भू, अर्धनारीश्वर तथा तीव्र व्रतका आश्रय लेनेवाले हैं॥ ३२॥
यथा जले जलं क्षिप्तं जलमेव तु तद् भवेत्।
रुद्रं विष्णुः प्रविष्टस्तु तथा रुद्रमयो भवेत्॥ ३३॥
जैसे जलमें डाला हुआ जल जलरूप ही हो जाता है, उसी प्रकार रुद्रदेवमें प्रविष्ट हुए भगवान् विष्णु रुद्रमय हो जाते हैं॥ ३३॥
अग्निमग्निः प्रविष्टस्तु अग्नेरेव यथा भवेत्।
तथा विष्णुं प्रविष्टस्तु रुद्रो विष्णुमयो भवेत्॥ ३४॥
जैसे अग्निमे प्रविष्ट हुई अग्नि अग्निरूप ही होती है, उसी प्रकार विष्णुमे प्रविष्ट हुए रुद्रदेव विष्णुरूप ही होते हैं॥ ३४॥
रुद्रमग्निमयं विद्याद् विष्णुः सोमात्मकः स्मृतः।
अग्नीषोमात्मकं चैव जगत् स्थावरजंगमम्॥ ३५॥
रुद्रको अग्निस্বরূপ जाने और भगवान् विष्णु सोमस्वरूप माने गये हैं। इसीलिये यह समस्त चराचर जगत् अग्नीषोमात्मक कहलाता है॥ ३५॥
कर्तारौ चापहर्तारौ स्थावरस्य चरस्य तु।
जगतः शुभकर्तारौ प्रभविष्णू महेश्वरौ॥ ३६॥
यह हरि और हर ही समस्त चराचर जगत्के कर्त्ता, संहारक, शुभकारक तथा प्रभावशाली महेश्वर हैं॥ ३६॥
कर्तृकारणकर्तारौ कर्तृकारणकारकौ।
भूतभव्यभवौ देवौ नारायणमहेश्वरौ॥ ३७॥
ये नारायण और महेश्वरदेव कर्ता और कारणके भी आदि कर्ता हैं तथा कर्ता और कारणसे भी काम करानेवाले हैं। ये ही दोनों भूत, भविष्य और वर्तमानरूप हैं॥ ३७॥
जगतः पालकावेतावेतौ सृष्टिकरी स्मृतौ।
एते चैव प्रवर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च।
एतत् परतरं गुह्यं कथितं ते पितामह॥ ३८॥
ये ही जगत्के पालक और ये ही इसकी सृष्टि करनेवाले माने गये हैं। ये ब्रह्मा, विष्णु और शिव (मेघरूपसे जलकी) वर्षा करते हैं। (सूर्यरूपसे) प्रकाशित होते हैं और (वायुरूपसे) सर्वत्र गतिशील होते हैं। ये ही सृष्टि करते हैं। पितामह! यह मैंने आपसे परम गुह्य रहस्यका वर्णन किया है॥ ३८॥
यश्चैनं पठते नित्यं यश्चैनं शृणुयान्नरः।
प्राप्नोति परमं स्थानं विष्णुरुद्रप्रसादजम्॥ ३९॥
जो प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करता और जो इसे सुनता है, वह मनुष्य भगवान् विष्णु और रुद्रकी कृपासे परम पदको प्राप्त कर लेता है॥ ३९॥
देवौ हरिहरौ स्तोष्ये ब्रह्मणा सह संगतौ।
एतौ च परमौ देवौ जगतः प्रभवाप्ययौ॥ ४०॥
मैं ब्रह्माजीके साथ मिले हुए हरि और हर दोनों देवताओंकी स्तुति करूँगा। ये ही दोनों परम देव हैं और ये ही जगत्की सृष्टि तथा संहारके कारण हैं॥ ४०॥
रुद्रस्य परमो विष्णुर्विष्णोश्च परमः शिवः।
एक एव द्विधाभूतो लोके चरति नित्यशः॥ ४१॥
रुद्रके परमदेव विष्णु हैं और विष्णुके परमदेव शिव हैं। एक ही परमेश्वर दो रूपोंमे व्यक्त होकर सदा समस्त जगत्में विचरते रहते हैं॥ ४१॥
न विना शंकरं विष्णुर्न विना केशवं शिवः।
तस्मादेकत्वमायातो रुद्रोपेन्द्रौ तु तौ पुरा।
नमो रुद्राय कृष्णाय नमः संहतचारिणे॥ ४२॥
भगवान् शङ्करके बिना विष्णु नहीं हैं और विष्णुके
| ७२४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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बिना शिव नहीं हैं। अतः वे दोनों रुद्र और विष्णु पूर्वकालसे ही एकत्वको प्राप्त हैं। संयुक्त अथवा एकरूप होकर विचरनेवाले भगवान् रुद्र एवं श्रीकृष्णको नमस्कार है॥
नमः षडर्धनेत्राय सङ्घिनेत्राय वै नमः।
नमः पिङ्गलनेत्राय पद्मनेत्राय वै नमः॥ ४३॥
त्रिनेत्रधारी शिवको नमस्कार है, साथ ही द्विनेत्रधारी श्रीकृष्णको नमस्कार है; पिङ्गलनेत्रवाले शिवको नमस्कार है और प्रफुल्ल कमलके समान नेत्रवाले श्रीकृष्णको नमस्कार है॥ ४३॥
नमः कुमारगुरवे प्रद्युम्नगुरवे नमः।
नमो धरणीधराय गङ्गाधराय वै नमः॥ ४४॥
कुमार कार्तिकेयके पिता भगवान् शिवको नमस्कार है, प्रद्युम्नके पिता भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है; शेषरूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले श्रीहरिको प्रणाम है तथा सिरपर गङ्गाजीको धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है॥ ४४॥
नमो मयूरपिच्छाय नमः केयूरधारिणे।
नमः कपालमालाय वनमालाय वै नमः॥ ४५॥
मस्तकपर मोरपङ्ख धारण करनेवाले श्रीकृष्णको नमस्कार है। सर्पोंका बाजूबंद धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है। वनमालाधारी श्रीकृष्ण तथा कपालमालाधारी शिवको प्रणाम है॥ ४५॥
नमस्त्रिशूलहस्ताय चक्रहस्ताय वै नमः।
नमः कनकदण्डाय नमस्ते ब्रह्मदण्डिने॥ ४६॥
हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले श्रीशिवको नमस्कार है; एक हाथमें सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले श्रीहरिको नमस्कार है। सोनेका दण्ड धारण करनेवाले श्रीहरिको और ब्रह्मदण्डधारी शिवको नमस्कार है॥ ४६॥
नमश्चर्मनिवासाय नमस्ते पीतवाससे।
नमोऽस्तु लक्ष्मीपतये उमायाः पतये नमः॥ ४७॥
वस्त्रकी जगह व्याघ्रचर्म धारण करनेवाले शिवको प्रणाम है। पीताम्बरधारी श्रीकृष्णको नमस्कार है, लक्ष्मीपति श्रीहरिको प्रणाम है और उमापति महादेवजीको नमस्कार है॥ ४७॥
नमः खट्वाङ्गधाराय नमो मुसलधारिणे।
नमो भस्माङ्गरागाय नमः कृष्णाङ्गधारिणे॥ ४८॥
खट्वाङ्गधारी शिवको प्रणाम है और मुसलधारी बलभद्रस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है, भस्ममय अङ्गराग धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है तथा श्यामसुन्दर शरीरधारी श्रीहरिको प्रणाम है॥ ४८॥
नमः श्मशानवासाय नमः सागरवासिने।
नमो वृषभवाहाय नमो गरुडवाहिने॥ ४९॥
श्मशानवासी हर और समुद्रनिवासी हरिको बारंबार नमस्कार है। वृषभवाहन हर और गरुड़वाहन हरिको नमस्कार है॥ ४९॥
नमस्त्वनेकरूपाय बहुरूपाय वै नमः।
नमः प्रलयकर्त्रे च नमस्त्रैलोक्यधारिणे॥ ५०॥
अनेक अवतार धारण करनेवाले हरि और बहुत-से रूप धारण करनेवाले हरको नमस्कार है। प्रलयंकर रुद्र और त्रैलोक्यरक्षक विष्णुको नमस्कार है॥ ५०॥
नमोऽस्तु सौम्यरूपाय नमो भैरवरूपिणे।
विरूपाक्षाय देवाय नमः सौम्येक्षणाय च॥ ५१॥
सौम्यरूपधारी श्रीहरि और भैरवरूपधारी रुद्रदेवको नमस्कार है। विरूप नेत्रवाले महादेवजी तथा सौम्य दृष्टिवाले श्रीहरिको प्रणाम है॥ ५१॥
दक्षयज्ञविनाशाय बलेर्नियमनाय च।
नमः पर्वतवासाय नमः सागरवासिने॥ ५२॥
दक्षयज्ञका ध्वंस करनेवाले रुद्र तथा बलिको बाँधनेवाले वामनरूपधारी श्रीहरिको नमस्कार है। पर्वत-निवासी शिव और समुद्रवासी विष्णुको नमस्कार है॥ ५२॥
नमः सुररिपुघ्नाय त्रिपुरघ्नाय वै नमः।
नमोऽस्तु नरकघ्नाय नमः कामाङ्गनाशिने॥ ५३॥
देवद्रोहियोंका नाश करनेवाले श्रीहरिको प्रणाम है, त्रिपुरासुरके विनाशक रुद्रदेवको नमस्कार है; नरकासुरका विनाश करनेवाले विष्णुको नमस्कार है और कामदेवके शरीरको दग्ध कर डालनेवाले भगवान् शिवको नमस्कार है॥ ५३॥
नमस्त्वन्धकनाशाय नमः कैटभनाशिने।
नमः सहस्रहस्ताय नमोऽसंख्येयवाहवे॥ ५४॥
अन्धकासुरका नाश करनेवाले रुद्रको नमस्कार है, कैटभका वध करनेवाले विष्णुको नमस्कार है। सहस्रों हाथोंवाले विष्णु और असंख्य भुजाओंवाले शिवको नमस्कार है॥ ५४॥
नमः सहस्रशीर्षाय बहुशीर्षाय वै नमः।
दामोदराय देवाय मुञ्जमेखलिने नमः॥ ५५॥
सहस्रों मस्तकवाले श्रीहरि और बहुत-से मस्तकवाले भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनके उदरमें यशोदा माताके द्वारा रस्सी बाँधी गयी, उन दामोदरदेवको नमस्कार है तथा कटिप्रदेशमें मूँजकी मेखला धारण करनेवाले भगवान् शिवको प्रणाम है॥ ५५॥
नमस्ते भगवन् विष्णो नमस्ते भगवञ्छिव।
नमस्ते भगवन् देव नमस्ते देवपूजित॥ ५६॥
भगवान् ! विष्णो ! आपको नमस्कार है। भगवान् !
विष्णुपर्व ] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७२५
शिव ! आपको प्रणाम है। भगवान् ! महादेव ! आपको नमस्कार है। देवपूजित परमेश्वर ! आपको प्रणाम है ॥ ५६॥
नमस्ते सामभिर्गीत नमस्ते यजुभिः सह ।
नमस्ते सुरशत्रुघ्न नमस्ते सुरपूजित ॥ ५७ ॥
नमस्ते कर्मिणां कर्म नमोऽमितपराक्रम ।
हृषीकेश नमस्तेऽस्तु स्वर्णकेश नमोऽस्तु ते ॥ ५८ ॥
सामवेदके मन्त्रोंद्वारा गाये जानेवाले परमात्मन् ! आपको नमस्कार है। यजुर्वेदके साथ सम्बन्ध रखनेवाले देवता ! आपको प्रणाम है। आप ही कर्मपरायण पुरुषोंके कर्म हैं, आपको नमस्कार है। आपके पराक्रमकी कोई सीमा नहीं है—आपको नमस्कार है। देवद्रोहियोंका नाश करनेवाले श्रीकृष्ण ! आपको नमस्कार है। देवपूजित महादेव ! आपको प्रणाम है। हृषीकेश ! आपको नमस्कार है। सुनहरे केशवाले शिव ! आपको प्रणाम है ॥ ५७-५८ ॥
इमं स्तवं यो रुद्रस्य विष्णोश्चैव महात्मनः ।
समेत्य ऋषिभिः सर्वैः स्तुतौ स्तौति महर्षिभिः ॥ ५९ ॥
व्यासेन वेदविदुषा नारदेन च धीमता ।
भारद्वाजेन गर्गेण विश्वामित्रेण वै तथा ॥ ६० ॥
अगस्त्येन पुलस्त्येन धौम्येन तु महात्मना ।
य इदं पठते नित्यं स्तोत्रं हरिहरात्मकम् ॥ ६१ ॥
अरोगो बलवांश्चैव जायते नात्र संशयः।
श्रियं च लभते नित्यं न च स्वर्गात्निवर्तते ॥ ६२ ॥
वेदवेत्ता व्यास, बुद्धिमान् नारद, भारद्वाज, गर्ग, विश्वामित्र, अगस्त्य, पुलस्त्य और महात्मा धौम्य आदि समस्त ऋषि-महर्षियोंने एकत्र होकर जिनकी स्तुति की थी, उन्हीं भगवान् रुद्र और महात्मा विष्णुके इस स्तोत्रको पढ़कर जो उनकी स्तुति करता है तथा जो प्रतिदिन इस हरिहरात्मक स्तोत्रका पाठ करता है, वह इस जगत्में नीरोग और बलवान् होता है, इसमें संशय नहीं है। वह सदा लक्ष्मी (धन-सम्पत्ति) पाता है और स्वर्गसे कभी पीछे नहीं लौटता है ॥ ५९–६२॥
अपुत्रो लभते पुत्रं कन्या विन्दति सत्पतिम् ।
गुर्विणी शृणुते या तु वरं पुत्रं प्रसूयते ॥ ६३ ॥
पुत्रहीन पुरुष इसके पाठसे पुत्र पाता है, कुमारी कन्या श्रेष्ठ पति प्राप्त कर लेती है तथा जो गर्भवती स्त्री इसका श्रवण करती है, वह उत्तम पुत्रको जन्म देती है ॥ ६३ ॥
राक्षसाश्च पिशाचाश्च विघ्नानि च विनायकः ।
भयं तत्र न कुर्वन्ति यत्रायं पठ्यते स्तवः ॥ ६४ ॥
जहाँ प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ किया जाता है, वहाँ राक्षस, पिशाच, विघ्न और विनायक भय नहीं उपस्थित करते हैं ॥ ६४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि हरिहरात्मकस्तवो नाम पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें 'हरिहरात्मकस्तोत्र' विषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥
षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
स्वामी कार्तिकेय और श्रीकृष्णके युद्धमें स्वामी कार्तिकेयकी पराजय, कोटवीदेवीका कार्तिकेयकी रक्षा करना, बाणासुर और श्रीकृष्णका युद्ध, श्रीकृष्णका बाणासुरकी हजार भुजाओंको काटना, महादेवजीका बाणासुरको महाकाल होनेका वरदान देना
जनमेजय उवाच
अपयाते ततो देवे कृष्णे चैव महात्मनि ।
पुनश्चासीत् कथं युद्धं परेषां लोमहर्षणम् ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन् ! जब महादेवजी तथा महात्मा श्रीकृष्ण युद्धसे हट गये, तब पुनः शत्रुओंका रोमाञ्चकारी युद्ध किस प्रकार हुआ ? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
कुम्भाण्डसंगृहीते तु रथे तिष्ठन् गुहस्तदा ।
अभिदुद्राव कृष्णं च बलं प्रद्युम्नमेव च ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! तब कुम्भाण्डद्वारा नियन्त्रित रथपर बैठे हुए कार्तिकेयजीने श्रीकृष्ण, बलराम तथा प्रद्युम्नपर एक साथ ही धावा किया ॥ २ ॥
ततः शरशतैरुग्रैस्तान् विव्याध रणे गुहः ।
अमर्षरोषसंक्रुद्धः कुमारः प्रवरो नदन् ॥ ३ ॥
अमर्ष और रोषसे अत्यन्त कुपित हुए सर्वश्रेष्ठ देवता कुमार कार्तिकेयने उस समय सिंहनाद करके सैकड़ों उग्र बाणोंद्वारा उन सबको रणभूमिमें घायल कर दिया ॥ ३ ॥
शरसंवृतगात्रास्ते त्रयस्त्रय इवाग्नयः ।
शोणितौघप्लुतैर्गात्रैः प्रायुध्यन्त गुहं ततः ॥ ४ ॥
उन तीनोंके सारे अङ्ग बाणोंसे आवृत हो गये। वे तीनों त्रिविध अग्नियोंके समान रक्तस्रवित अङ्गोंद्वारा ही कुमार कार्तिकेयके साथ युद्ध करने लगे ॥ ४ ॥
७२६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
ततस्ते युद्धमार्गज्ञास्त्रयस्त्रिभिरनुत्तमैः।
वायव्याग्नेयपार्जन्यैर्बिभिदुर्दिततेजसः ॥ ५ ॥
युद्धके मार्गोंका ज्ञान रखनेवाले उन तीनों उद्दीप्त तेजस्वी वीरोंने क्रमशः वायव्य, आग्नेय और पार्जन्यास्त्रोंका प्रयोग करके कुमारको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ५ ॥
तानस्त्रांस्त्रिभिरेवास्त्रैर्विनिवार्य स पावकिः।
शैलवारुणसावित्रैस्तान स विव्याध कोपवान् ॥ ६ ॥
परंतु क्रोधमें भरे हुए अग्निनन्दन कार्तिकेयने पार्वत, वारुण और सावित्र नामक तीन अस्त्रोंद्वारा उक्त तीनों अस्त्रोंको निवारण करके पुनः उन तीनों वीरोंको घायल कर दिया ॥ ६ ॥
तस्य दीप्तशरौघस्य दीप्तचापधरस्य च।
शरौधानस्त्रमायाभिर्ग्रसन्ति स्म महात्मनः।
यदा तदा गुहः क्रुद्धः प्रज्वलन्निव तेजसा ॥ ७ ॥
स्कन्दके बाणसमूह बड़े तेजस्वी थे। उन्होंने दीप्तिमान् धनुष धारण कर रखा था तो भी जब उन महात्माके चलाये हुए शर-समूहोंको वे तीनों वीर अपने अस्त्रोंकी मायासे नष्ट करने लगे, तब कार्तिकेयको बड़ा क्रोध हुआ। वे तेजसे प्रज्वलित-से हो उठे ॥ ७ ॥
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम कालकल्पं दुरासदम्।
संदष्टौष्ठपुटः संख्ये जगृहे पावकिः प्रभुः ॥ ८ ॥
प्रभावशाली पावकनन्दन स्कन्दने युद्धस्थलमें अपने ओठको दाँतोंसे दबा लिया और ब्रह्मशिर नामक अस्त्र उठाया, जो कालके समान दुर्जय था ॥ ८ ॥
प्रयुक्ते ब्रह्मशिरसि सहस्रांशुसमप्रभे।
उग्रे परमदुर्घर्षे लोकक्षयकरे तथा ॥ ९ ॥
हाहाभूतेषु सर्वेषु प्रधावत्सु समन्ततः।
अस्त्रतेजःप्रमूढे तु विषण्णे जगति प्रभुः।
केशवः केशिमथनश्चक्रं जग्राह वीर्यवान् ॥ १० ॥
सर्वेषामस्त्रवीर्याणां वारणं घातनं तथा।
चक्रमप्रतिचक्रस्य लोके ख्यातं महात्मनः ॥ ११ ॥
सूर्यदेवके तुल्य तेजस्वी ब्रह्मशिर नामक परम दुर्जय लोकसंहारकारी उग्र अस्त्रका प्रयोग होनेपर सब ओर हाहाकार मच गया। सब लोग इधर-उधर भागने लगे और उस अस्त्रके तेजसे मोहित हुए सारे जगत्में विषाद छा गया। तब परम पराक्रमी केशिहन्ता भगवान् केशवने चक्र हाथमें लिया, जो सभी अस्त्रोंके बलका निवारण तथा नाश करनेवाला है, जिनके सामने विरोधियोंका मण्डल ठहर नहीं सकता है, उन महात्मा श्रीकृष्णका चक्र सारे संसारमें विख्यात है ॥ ९–११ ॥
अस्त्रं ब्रह्मशिरस्तेन निष्प्रभं कृतमोजसः।
घनैरिवातपापाये सवितुर्मण्डलं यथा ॥ १२ ॥
उस चक्रने अपने बलसे उस ब्रह्मशिरनामक अस्त्रको उसी प्रकार निस्तेज कर दिया, जैसे वर्षाकालमें मेघोंके छा जानेसे सूर्यमण्डल प्रभाहीन प्रतीत होता है ॥ १२ ॥
ततो निष्प्रभतां याते नष्टवीर्ये महौजसि।
तस्मिन् ब्रह्मशिरस्यस्त्रे क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ १३ ॥
गुहः प्रजज्वाल रणे हविषेवाग्निरुल्बणः।
तदनन्तर उस महान् शक्तिशाली ब्रह्मशिर अस्त्रके निस्तेज और निर्बल हो जानेपर कार्तिकेयके नेत्र क्रोधसे लाल हो उठे। जैसे घीकी आहुति पाकर अग्नि प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार वे रणभूमिमें रोषसे जल उठे ॥ १३ ॥
शत्रुघ्नीं ज्वलितां दिव्यां शक्तिं जग्राह काञ्चनीम् १४
अमोघां दयितां घोरां सर्वलोकभयावहाम्।
तांप्रदीप्तां महोल्काभां युगान्ताग्निसमप्रभाम्।
घण्टामालाकुलां दिव्यां चिक्षेप रुषितो गुहः ॥ १५ ॥
ननाद बलवच्चापि नादं शत्रुभयंकरम्।
फिर तो उन्होंने सम्पूर्ण लोकोंको भय देनेवाली अपनी प्रिय शक्ति हाथमें ली, जो दिव्य सुवर्णमयी, अमोघ, भयङ्कर, सब ओरसे प्रज्वलित तथा शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ थी, वह दिव्य शक्ति आकाशमें बड़ी भारी उल्काके समान प्रज्वलित हो उठती थी, प्रलयकालके संवर्तक अग्निकी भाँति प्रकाशित होती थी तथा वह घण्टाओंकी मालाओंसे अलंकृत थी, रोषमें भरे हुए कार्तिकेयने उस शक्तिको चला दिया और बड़े जोरसे सिंहनाद किया, जो शत्रुओंके मनमें भय उत्पन्न करने-वाला था ॥ १४-१५ १/२ ॥
सा च क्षिप्ता तदा तेन ब्रह्मण्येन महात्मना ॥ १६ ॥
जृम्भमाणेव गगने सम्प्रदीप्तमुखी तदा।
अधावत महाशक्तिः कृष्णस्य वधकाङ्क्षिणी ॥ १७ ॥
उन ब्राह्मणभक्त महात्मा कार्तिकेयके द्वारा चलायी गयी वह शक्ति आकाशमें बढ़ने-सी लगी, उसका मुखभाग प्रज्वलित हो उठा, वह महाशक्ति श्रीकृष्णका वध करनेकी इच्छासे उनकी ओर दौड़ी ॥ १६-१७ ॥
भृशं विषण्णः शक्रोऽपि सर्वामरगणैर्वृतः।
शक्तिं प्रज्वलितां दृष्ट्वा दग्धः कृष्णेति चाब्रवीत् ॥ १८ ॥
उस समय प्रज्वलित होती हुई उस शक्तिको देखकर समस्त देवगणोंसे घिरे हुए इन्द्र भी अत्यन्त खिन्न हो गये और बोले—'हाय ! श्रीकृष्ण दग्ध हो गये' ॥ १८ ॥
तां समीपमनुप्राप्तां महाशक्तिं महामृधे।
हुङ्कारेणैव निर्भर्त्स्य पातयामास भूतले ॥ १९ ॥
परंतु श्रीकृष्णने उस महासमरमें अपने पास आयी हुई उस महाशक्तिको हुङ्कारसे ही तिरस्कृत करके पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ १९ ॥
विष्णुपर्व ] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७२७
पतितायां महाशक्त्यां साधुसाध्विति सर्वशः ।
सिंहनादं ततश्चक्रुः सर्वे देवाः सवासवाः ॥ २० ॥
उस महाशक्तिके धराशायिनी हो जानेपर सब ओर साधु ! साधु !! (वाह ! वाह !!) की ध्वनि होने लगी। उस समय इन्द्रसहित समस्त देवता सिंहनाद करने लगे ॥ २० ॥
ततो देवेषु नर्दत्सु वासुदेवः प्रतापवान् ।
पुनश्चक्रं स जग्राह दैत्यान्तकरणं रणे ॥ २१ ॥
तदनन्तर जब देवता सिंहनाद कर रहे थे, उसी समय प्रतापी वासुदेवने पुनः चक्र हाथमें लिया, जो रणभूमिमें दैत्योंका विनाश करनेवाला है ॥ २१ ॥
व्याविध्यमाने चक्रे तु कृष्णेनाप्रतिमौजसा ।
कुमाररक्षणार्थाय बिभ्रती सुतनुं तदा ॥ २२ ॥
दिग्वासा देववचनात् प्रविष्टा तत्र कोटवी ।
लम्बमाना महाभागा भागो देव्यास्तथाष्टमः ।
चित्रा कनकशक्तिस्तु सा च नग्ना स्थितान्तरे ॥ २३ ॥
परंतु अप्रतिम बलशाली श्रीकृष्ण ज्यों ही चक्र घुमाने लगे, त्यों ही कुमारकी रक्षाके लिये महादेवजीकी आज्ञासे महाभागा कोटवी, जो देवी पार्वतीका आठवाँ भाग थी, सुन्दर शरीर धारण किये श्रीकृष्ण और कुमारके बीचमें आकर नंगी खड़ी हो गयी। वह आकाशमें निराधार लटक रही थी। वह विचित्र सुवर्णमयी शक्ति तथा वह देवी कोटवी दोनों ही (श्रीकृष्ण और कुमारके) बीचमें विद्यमान थीं ॥ २२-२३ ॥
अथान्तरात् कुमारस्य देवीं दृष्ट्वा महाभुजः ।
पराङ्मुखस्ततो वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ २४ ॥
अपने और कुमारके बीचमें देवीको खड़ी हुई देख महाबाहु मधुसूदनने अपना मुख दूसरी ओर फेर लिया और कहा ॥ २४ ॥
श्रीभगवानुवाच
अपगच्छापगच्छ त्वं धिक् त्वामितिवचोऽब्रवीत्।
किमेवं कुरुषे विघ्नं निश्चितस्य वधं प्रति ॥ २५ ॥
**श्रीभगवान् बोले—**अरी ! हटो ! हटो !! तुम्हें धिक्कार. है। शत्रु का वध करनेके लिये दृढ़ निश्चय किये हुए मेरे उद्देश्यकी सिद्धिमें तुम इस प्रकार विघ्न क्यों डाल रही हो ॥ २५ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वैवं वचनं तस्य कोटवी तु तदा विभोः ।
नैव वासः समाधत्ते कुमारपरिरक्षणात् ॥ २६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! भगवान्की यह बात सुनकर भी कोटवीने उस समय कुमारकी रक्षाके लिये अपने अङ्गोंपर वस्त्र नहीं धारण किया ॥ २६ ॥
श्रीभगवानुवाच
अपवाह्य गुहं शीघ्रमपयाहि रणाजिरात् ।
स्वस्ति ह्येवं भवेदद्य योत्स्यतो योत्स्यता मया ॥ २७ ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**अरी ! तुम कार्तिकेयको शीघ्र हटाकर स्वयं भी समराङ्गणसे दूर चली जाओ, ऐसा करने-पर ही आज मेरे साथ युद्ध करते हुए कार्तिकेयका कल्याण होगा ॥ २७ ॥
तां च दृष्ट्वा स्थितां देवो हरिः संग्राममूर्धनि ।
संजहार ततश्चक्रं भगवान् वासवानुजः ॥ २८ ॥
कोटवीको युद्धके मुहानेपर खड़ी देख इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीहरिने अपने चक्रको पीछे लौटा लिया ॥ २८ ॥
एवं कृते तु कृष्णेन देवदेवेन धीमता ।
अपवाह्य गुहं देवी हरसांनिध्यमागता ॥ २९ ॥
देवाधिदेव बुद्धिमान् श्रीकृष्णके ऐसा करनेपर देवी कोटवी कार्तिकेयको वहाँसे हटाकर स्वयं भगवान् शङ्करके समीप चली गयी ॥ २९ ॥
एतस्मिन्नन्तरे चैव वर्तमाने महाभये ।
कुमारे रक्षिते देव्या बाणस्तं देशमाययौ ॥ ३० ॥
इसी बीचमें जब वह महान् भय उपस्थित हुआ और देवीने कुमारकी रक्षा कर ली, तब बाणासुर उस स्थानपर आया ॥
अपयान्तं गुहं दृष्ट्वा मुक्तं कृष्णेन संयुगात् ।
बाणश्चिन्तयते तत्र स्वयं योत्स्यामि माधवम् ॥ ३१ ॥
श्रीकृष्णके हाथोंसे जीवित छूटकर कुमार कार्तिकेय युद्ध-स्थलसे दूर हटे जा रहे हैं, यह देखकर बाणासुरने वहाँ यह निश्चय किया कि मैं स्वयं ही माधवके साथ युद्ध करूँगा ॥
वैशम्पायन उवाच
भूतयक्षगणाश्चैव बाणानीकं च सर्वशः ।
दिशं प्रदुद्रुवुः सर्वे भयमोहितलोचनाः ॥ ३२ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! उस समय भूतों और यक्षोंके समुदाय तथा बाणासुरके समस्त सैनिक भयसे कातर नेत्र होकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भागने लगे ॥
प्रमाथगणभूयिष्ठे सैन्ये दीर्णे महासुरः ।
निर्जगाम ततो बाणो युद्धायाभिमुखस्त्वरन् ॥ ३३ ॥
जिसमें प्रमथगणोंकी अधिकता थी, उस सेनामें भी दरार पड़ जानेपर बाणासुर युद्धके लिये उत्सुक हो बड़ी उतावलीके साथ निकला ॥ ३३ ॥
भीमप्रहरणैर्घोरैर्दैत्येन्द्रैः सुमहारथैः ।
महाबलैर्महावीर्यैर्वज्रीव सुरसत्तमैः ॥ ३४ ॥
जैसे वज्रधारी इन्द्र श्रेष्ठ देवताओंसे घिरे होते हैं, उसी प्रकार वह भयंकर आयुध धारण करनेवाले, घोर, महाबली, महावीर एवं महारथी दैत्यपतियोंसे घिरा हुआ था ॥ ३४ ॥
| ७२८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
पुरोहिताः शत्रुवधं वदन्त- स्तथैव चान्ये श्रुतशीलवृद्धाः। जपैश्च मन्त्रैश्च तथौषधीभि- र्महात्मनः स्वस्त्ययनं प्रचक्रुः ॥ ३५ ॥ उस समय शास्त्रज्ञान और शीलमें बढ़े-चढ़े पुरोहित तथा दूसरे ब्राह्मणोंने उसके लिये शत्रुवधका आशीर्वाद देते हुए जप, मन्त्र और ओषधियोंद्वारा उस महामना दैत्यराजके लिये स्वस्तिवाचन किया ॥ ३५ ॥
ततस्तूर्यप्रणादैश्च भेरीणां तु महास्वनैः। सिंहनादैश्च दैत्यानां बाणः कृष्णमभिद्रवत् ॥ ३६ ॥ तदनन्तर वाद्योंकी ध्वनि, रणभेरियोंकी बड़ी भारी आवाज तथा दैत्योंके सिंहनादके साथ बाणासुरने श्रीकृष्णपर आक्रमण किया ॥ ३६ ॥
दृष्ट्वा बाणं तु निर्यातं युद्धायैव व्यवस्थितम्। आरुह्य गरुडं कृष्णो बाणायाभिमुखो ययौ ॥ ३७ ॥ बाणासुरको युद्धका ही निश्चय करके घरसे निकला देख गरुड़पर आरूढ़ हुए श्रीकृष्ण उसके सामने गये ॥ ३७ ॥
आयान्तमथ तं दृष्ट्वा यदूनामृषभं रणे। वैनतेयमथारूढं कृष्णमप्रतिमौजसम् ॥ ३८ ॥ अथ बाणस्तु तं दृष्ट्वा प्रमुखे प्रत्युपस्थितम्। उवाच वचनं क्रुद्धो वासुदेवं तरस्विनम् ॥ ३९ ॥ उस रणभूमिमें अप्रतिम बलशाली यदुकुलतिलक श्रीकृष्णको गरुड़पर आरूढ़ होकर आते देख बाणासुरने अपने सामने उपस्थित हुए उन वेगशाली भगवान् वासुदेवसे कुपित होकर कहा ॥ ३८-३९ ॥
बाण उवाच तिष्ठ तिष्ठ न मेऽद्य त्वं जीवन् प्रतिगमिष्यसि। द्वारकां द्वारकास्थांश्च सुहृदो द्रक्ष्यसे न च ॥ ४० ॥ बाणासुर बोला— अरे ! खड़े रहो ! खड़े रहो ! आज तुम जीवित नहीं लौट सकोगे और न द्वारका तथा द्वारकावासी सुहृदोंको ही देख सकोगे ॥ ४० ॥
सुवर्णवर्णान् वृक्षाग्रानद्य द्रक्ष्यसि माधव। मयाभिभूतः समरे मुमूर्षुः कालनोदितः ॥ ४१ ॥ माधव ! आज समरभूमिमें मेरे द्वारा पराजित हो तुम कालसे प्रेरित एवं मरणासन्न होकर वृक्षोंके अग्रभागको सुनहरे रंगका देखोगे ॥ ४१ ॥
अद्य बाहुसहस्रेण कथमष्टभुजो रणे। मया सह समागम्य योत्स्यसे गरुडध्वज ॥ ४२ ॥ गरुड़ध्वज ! तुम्हारे तो आठ ही भुजाएँ हैं, रणभूमिमें तुम मुझ सहस्रबाहुके साथ भिड़कर कैसे युद्ध करोगे ॥ ४२ ॥
अद्य त्वं वै मया युद्धे निर्जितः सहबान्धवः। द्वारकां शोणितपुरे निहतः संस्मरिष्यसि ॥ ४३ ॥ आज युद्धमें भाई-बन्धुओंसहित तुम मेरे द्वारा पराजित हो शोणितपुरमें मारे जाकर द्वारकाका स्मरण करोगे ॥ ४३ ॥
नानाप्रहरणोपेतं नानाङ्गदविभूषितम्। अद्य बाहुसहस्रं मे कोटिभूतं निशामय ॥ ४४ ॥ देखना, भाँति-भाँतिके आयुधोंसे युक्त और नाना प्रकारके बाजूबंदोंसे विभूषित ये मेरी सहस्र भुजाएँ आज किस तरह करोड़ों भुजाओंके समान हो जाती हैं ॥ ४४ ॥
गर्जतस्तस्य वाक्यौघा जलौघा इव सिन्धुतः। निश्चरन्ति महाघोरा वातोद्धूता इवोर्मयः ॥ ४५ ॥ गर्ज॑ना करते हुए उस दैत्यराजके मुखसे वे प्रवाहपूर्ण महाभयंकर वाक्यसमूह उसी तरह निकल रहे थे, जैसे प्रचण्ड पवनकी प्रेरणा पाकर समुद्रसे जलके प्रवाह और उत्ताल तरङ्गें उठती रहती हैं ॥ ४५ ॥
रोषपर्याकुले चैव नेत्रे तस्य वभूवतुः। जगद्विधक्षन्निव खे महासूर्य इवोदितः ॥ ४६ ॥ उसके दोनों नेत्र रोषसे व्याप्त हो उठे। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमें सम्पूर्ण जगत्को दग्ध कर डालनेकी इच्छा लेकर महान् सूर्य उदित हुआ हो ॥ ४६ ॥
तच्छ्रुत्वा नारदस्तस्य बाणस्यात्यूर्जितं वचः। जहास सुमहाहासं भिन्दन्निव नभस्तलम् ॥ ४७ ॥ बाणासुरका वह अत्यन्त ओजस्वी वचन सुनकर देवर्षि नारद आकाशको विदीर्ण करते हुए-से बड़े जोर-जोरसे अट्टहास करने लगे ॥ ४७ ॥
योगपट्टमुपाश्रित्य तस्थौ युद्धदिदृक्षया। कौतूहलोत्फुल्लदृशः कुर्वन् पर्यटते मुनिः ॥ ४८ ॥ वे मुनि योगपट्टका आश्रय लेकर युद्ध देखनेकी इच्छासे आकाशमें ठहरे हुए थे। वे अपने नेत्रोंको कौतूहलसे उत्फुल्ल (चकित) करते हुए वहाँ सब ओर घूमते थे ॥ ४८ ॥
श्रीकृष्ण उवाच बाण किं गर्जसे मोहाच्छूराणां नास्ति गर्जितम्। एह्येहि युध्यस्व रणे किं वृथा गर्जितेन ते ॥ ४९ ॥ श्रीकृष्ण बोले— बाण ! तू मोहवश क्यों गर्जना कर रहा है ? शूरवीर इस तरह गर्जते नहीं हैं। आ ! आ !! रण-भूमिमें युद्ध कर। तेरी इस व्यर्थ गर्जनासे क्या लाभ है ? ॥
यदि युद्धानि वचनैः सिद्ध्येयुर्दितिनन्दन। भवानेव जयेन्नित्यं बह्वबद्धं प्रजल्पति ॥ ५० ॥ दितिनन्दन ! यदि बातोंसे ही युद्धोंमें सफलता मिल जाय तो सदा तू ही विजयी हुआ करे; क्योंकि तू बहुत अंट-संट बातें बक रहा है ॥ ५० ॥
विष्णुपर्व ] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७२९
एहोहि जय मां बाण जितो वा वसुधातले ।
चिरायावाङ्मुखो दीनः पतितः शेष्यसेऽसुरैः ॥ ५१ ॥
बाण ! आ ! आ !! मुझे युद्धमें जीत ले अथवा मेरे द्वारा पराजित हो तू ही पृथ्वीपर नीचे मुँह किये दीन-हीन हो चिरकालके लिये गिरकर असुरोंके साथ सो जायगा ॥ ५१ ॥
इत्येवमुक्त्वा बाणं तु मर्मभेदिभिराशुगैः ।
निर्बिभेद तदा कृष्णस्तममोघैर्महाशरैः ॥ ५२ ॥
ऐसा कहकर श्रीकृष्णने उस समय मर्मस्थानोंका भेदन करनेवाले शीघ्रगामी अमोघ महाबाणोंद्वारा बाणासुरको घायल कर दिया ॥ ५२ ॥
विनिर्भिन्नस्तु कृष्णेन मार्गणैर्मर्मभेदिभिः ।
स्मयन् बाणस्ततः कृष्णं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ५३ ॥
श्रीकृष्णके मर्मभेदी बाणोंद्वारा क्षत विक्षत हुए बाणासुरने मुसकराकर उन्हें भी बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ ५३ ॥
ज्वलद्भिरिव संयुक्तं तस्मिन् युद्धे सुदारुणे ।
ततः परिघनिस्त्रिंशैर्गदातोमरशक्तिभिः ॥ ५४ ॥
मुसलैः पट्टिशैश्चैव छादयामास केशवम् ।
उस अत्यन्त भयानक युद्धमें उन प्रज्वलित बाणोंसे विंधे हुए श्रीकृष्णको बाणासुरने फिर परिघ, खङ्ग, गदा, तोमर, शक्ति, मूसल और पट्टिशोंसे आच्छादित कर दिया ॥ ५४॥
स तु बाहुसहस्रेण गर्वितो दैत्यसत्तमः ॥ ५५ ॥
योधयामास समरे द्विबाहुमथ लीलया ।
अपनी सहस्र भुजाओंसे घमंडमें भरा हुआ दैत्यप्रवर बाणासुर लीलापूर्वक द्विबाहु बने हुए श्रीकृष्णके साथ समराङ्गणमें युद्ध करने लगा ॥ ५५॥
लाघवात्तु तस्य कृष्णस्य बलिसूनू रुषान्वितः ॥ ५६ ॥
ततोऽस्त्रं परमं दिव्यं तपसा निर्मितं महत् ।
यदप्रतिहतं युद्धे सर्वामित्रविनाशनम् ॥ ५७ ॥
ब्रह्मणा विहितं दिव्यं तन्मुमोच दितेः सुतः ।
श्रीकृष्णकी फुर्तीसे बलिपुत्र बाणासुरको बड़ा रोष हुआ। उस दैत्यने तपस्याद्वारा निर्मित एक परम दिव्य एवं महान् अस्त्रको, जो ब्रह्माजीके द्वारा रचा गया था, युद्धमे कभी प्रतिहत नहीं होता था और समस्त शत्रुओंका विनाश करनेमें समर्थ था, श्रीकृष्णपर छोड़ दिया ॥ ५६-५७॥
तस्मिन् मुक्ते दिशः सर्वास्तमःपिहितमण्डलाः॥ ५८ ॥
प्रादुरासन् सहस्राणि सुघोराणि च सर्वशः ।
उस अस्त्रके छूटते ही सम्पूर्ण दिशाओंका मण्डल अन्धकारसे आच्छन्न हो गया। सब ओर अत्यन्त भयंकर सहस्रों (अपशकुन) प्रकट होने लगे ॥ ५८॥
तमसा संवृते लोके न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५९ ॥
साधु साध्विति वाणं तु पूजयन्ति स्म दानवाः ।
हा हा धिगिति देवानां श्रूयते वागुदीरिता ॥ ६० ॥
वहाँका सारा जगत् अन्धकारसे ढक जानेके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं होता था। उस समय समस्त दानव 'साधु ! साधु !!' कहकर बाणासुरकी प्रशंसा करने लगे और देवताओंके मुखसे निकली हुई वाणी—'हाय ! हाय !! धिक्कार है।' इत्यादि रूपसे सुनायी देने लगी ॥ ५९-६० ॥
ततोऽस्त्रबलवेगेन सार्चिष्मन्त्यः सुदारुणाः ।
घोररूपा महावेगा निपेतुर्बाणवृष्टयः ॥ ६१ ॥
तत्पश्चात् उस अस्त्रके बल और वेगसे आगकी लपटोंसे युक्त परम दारुण बाणोंकी अत्यन्त वेगपूर्वक घोर वर्षा होने लगी ॥६१॥
नैव वाताः प्रवायंन्ति न मेघाः संचरन्ति च ।
अस्त्रे विसृष्टे बाणेन दह्यमाने च केशवे ॥ ६२ ॥
बाणासुरके उस अस्त्रके छूटते ही भगवान् केशव दग्ध-से होने लगे। उस समय आकाशमें न तो हवा चलती थी और न मेघोंका ही संचार होता था ॥ ६२ ॥
ततोऽस्त्रं सुमहावेगं जग्राह मधुसूदनः ।
पार्जन्यं नाम भगवान् कालान्तकनिभं रणे ॥ ६३ ॥
तब भगवान् मधुसूदनने उस रणभूमिमें काल और अन्तकके समान भयंकर तथा महान् वेगशाली पार्जन्यनामक अस्त्र उठाया और चला दिया ॥ ६३ ॥
ततो वितिमिरे लोके शराग्निः प्रशमं गतः ।
दानवा मोघसंकल्पाः सर्वेऽभूवंस्तदा भृशम् ॥ ६४ ॥
फिर तो जगत्का अन्धकार दूर हो गया, बाणासुरके बाणोंकी आग बुझ गयी और समस्त दानवोंके मनसूबे उस समय व्यर्थ हो गये ॥ ६४ ॥
दानवास्त्रं प्रशान्तं तु पर्जन्यास्त्रेऽभिमन्त्रिते ।
ततो देवगणाः सर्वे नदन्ति च हसन्ति च ॥ ६५ ॥
पार्जन्यास्त्रके अभिमन्त्रित होनेपर उस दानवास्त्रको शान्त हुआ देख समस्त देवता सिंहनाद करने और हँसने लगे॥
हते शस्त्रे महाराज दैतेयः क्रोधमूर्च्छितः ।
भूयः स छादयामास केशवं गरुडे स्थितम् ॥ ६६ ॥
मुसलैः पट्टिशैश्चैव च्छादयामास केशवम् ।
महाराज ! अपने अस्त्रके नष्ट हो जानेपर वह दैत्य क्रोधसे अचेत-सा हो गया। उसने गरुड़पर बैठे हुए श्रीकृष्णको पुनः मूसलों और पट्टिशोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ ६६॥
तस्य तां तरसा सर्वो वाणवृष्टिं समुद्यताम् ॥ ६७ ॥
प्रहसन् वारयामास केशवः शत्रुसूदनः ।
शत्रुसूदन केशवने उसके द्वारा वेगपूर्वक की हुई उस सारी बाणवर्षाका हँसते-हँसते निवारण कर दिया ॥ ६७॥
| ७३० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
केशवस्य तु बाणेन वर्तमाने महाहवे ॥ ६८ ॥
तस्य शार्ङ्गविनिर्मुक्तैः शरैरशनिसंनिभैः ।
तिलशस्तद्रथं चक्रे सोऽश्वध्वजपताकिनम् ॥ ६९ ॥
श्रीकृष्णका जब बाणासुरके साथ महान् युद्ध होने लगा, उस समय उन्होंने अपने शार्ङ्गधनुषसे छूटे हुए वज्र-तुल्य बाणोंद्वारा उसके अश्व, ध्वज और पताकासहित रथको तिल-तिल करके काट डाला ॥ ६८-६९ ॥
चिच्छेद कवचं कायान्मुकुटं च महाप्रभम् ।
कार्मुकं च महातेजा हस्तावापं च केशवः ॥ ७० ॥
विव्याध चैनमुरसि नाराचेन स्मयन्निव ।
तदनन्तर महातेजस्वी केशवने उसके शरीरसे कवचको, मस्तकसे महातेजस्वी मुकुटको तथा हाथसे धनुष और दस्तानेको काट गिराया; साथ ही हँसते हुए-से उन्होंने एक नाराचद्वारा उसकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ७०१/२ ॥
स मर्माभिहतः संख्ये प्रमुमोहाल्पचेतनः ॥ ७१ ॥
तं दृष्ट्वा मूर्च्छितं बाणं प्रहारपरिपीडितम् ।
प्रासादवरशृंगस्थो नारदो मुनिपुङ्गवः ॥ ७२ ॥
उत्थायापश्यत तदा कक्ष्यास्फोटनतत्परः ।
वादयानोनखांश्चैव दिष्ट्या दिष्ट्येति चाब्रवीत् ॥ ७३॥
युद्धस्थलमें वह मर्मभेदी आघात लगनेपर उसकी चेतना क्षीण हो चली और वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। बाणासुरको श्रीकृष्णके प्रहारसे अत्यन्त पीड़ित एवं मूर्च्छित हुआ देख उसके महलके ऊँचे शिखरपर खड़े हुए मुनिवर नारद बार-बार उठकर उसकी ओर देखने लगे। उस समय वे अपनी भुजाओंपर ताल ठोंकते और नख बजाते हुए इस प्रकार कहने लगे—'अहोभाग्य ! अहोभाग्य !' ॥७१-७३॥
अहो मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम् ।
दृष्टं मे यदिदं चित्रं दामोदरपराक्रमम् ॥ ७४ ॥
'अहो ! आज मेरा जन्म सफल है ! यह जीवन उत्तम जीवन है; क्योंकि मैंने श्रीकृष्णका यह अद्भुत पराक्रम अपनी आँखों देख लिया ॥ ७४ ॥
जय बाणं महाबाहो दैतेयं देवकिल्बिषम् ।
यदर्थमवतीर्णोऽसि तत् कर्म सफलीकुरु ॥ ७५ ॥
'महाबाहो ! आप इस देवद्रोही दैत्य बाणासुरको पराजित कीजिये और जिसके लिये आपका अवतार हुआ है, उस कर्मको सफल बनाइये' ॥ ७५ ॥
एवं स्तुत्वा तदा देवं बाणैः खं द्योतयञ्छितैः ।
इतस्ततः सम्पतद्भिर्नारदो व्यचरद् रणे ॥ ७६ ॥
इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करके उस समय आकाशको प्रकाशित करते हुए नारदजी इधर-उधर पड़ते हुए तीखे बाणोंके साथ रणक्षेत्रमें विचरने लगे ॥ ७६ ॥
केशवस्य तु बाणेन वर्तमाने महाभये ।
प्रयुध्येतां ध्वजौ तत्र तावन्योन्यमभिद्रुतौ ।
युद्धं त्वभूद् वाहनयोरुभयोर्देवदैत्ययोः ॥ ७७ ॥
जब श्रीकृष्णका बाणासुरके साथ वह महाभयंकर संग्राम चल रहा था, उस समय वहाँ उन दोनोंके ध्वजचिह्न-वाहन एक दूसरेपर टूट पड़े और युद्ध करने लगे। भगवान् तथा दैत्य दोनोंके उन वाहनोंमें गहरी भिड़न्त हुई ॥ ७७ ॥
गरुडस्य च संग्रामो मयूरस्य च धीमतः ।
पक्षतुण्डप्रहारैस्तु चरणाग्रनखैस्तथा ॥ ७८ ॥
बुद्धिमान् गरुड़ और मयूरमें पंख, चोंच, पंजे, मुख और नखोंके प्रहारद्वारा युद्ध होने लगा ॥ ७८ ॥
अन्योन्यं जघ्नतुः क्रुद्धौ मयूरगरुडावुभौ ।
वैनतेयस्ततः क्रुद्धो मयूरं दीप्ततेजसम् ॥ ७९ ॥
जग्राह शिरसि क्षिप्रं तुण्डेनाभिपतंस्तदा ।
उत्क्षिप्य चैव पक्षाभ्यां निजघान महाबलः ॥ ८० ॥
मयूर और गरुड़ दोनों एक दूसरेपर क्रोधपूर्वक आघात करने लगे। तदनन्तर कुपित हुए महाबली गरुड़ने उड़कर अपनी चोंचसे उद्दीप्त तेजवाले मोरका मस्तक शीघ्रतापूर्वक पकड़ लिया और उसे उछाल-उछालकर दोनों पाँखोंसे मारना आरम्भ किया ॥ ७९-८० ॥
पद्भ्यां पार्श्वाभिघाताभ्यां कृत्वा घातान्यनेकशः।
आकृष्य चैनं तरसा विक्षिप्य च महाबलः ॥ ८१
निःसंज्ञं पातयामास गगनादिव भास्करम् ।
दोनों पैरोंसे अगल-बगलमें आघात करके महाबली गरुड़ने उसपर वारंवार प्रहार किये। वे उसे कभी वेगपूर्वक अपनी ओर खींचते और कभी पीछे ढकेलते थे, इस तरह उसे मूर्च्छित करके उन्होंने नीचे गिरा दिया, मानो आकाशसे सूर्यको धराशायी कर दिया गया हो ॥ ८११/२ ॥
मयूरे पतिते तस्मिन् पपातातिबलो भुवि ॥ ८२ ॥
बाणः समरसंविग्नश्चिन्तयन् कार्यमात्मनः ।
मोरके गिर जानेपर अत्यन्त बलशाली बाणासुर भी उस युद्धसे घबराकर अपने कर्तव्यका विचार करता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ८२१/२ ॥
मयातिबलमत्तेन न कृतं सुहृदां वचः ॥ ८३ ॥
पश्यतां देवदैत्यानां प्राप्तोऽस्म्यापदमुत्तमाम् ।
(वह सोचने लगा—) 'अहो ! मैंने अत्यन्त बलके घमंडमें आकर अपने हितैषी सुहृदोंकी बात नहीं मानी, इसलिये आज देवताओं और दैत्योंके देखते-देखते मैं इस भारी विपत्तिमे फँस गया हूँ' ॥ ८३१/२ ॥
[विष्णुपर्व] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७३१
तं दीनमनसं ज्ञात्वा रणे बाणं सुविक्लवम् ॥ ८४ ॥
चिन्तयद् भगवान् रुद्रो बाणरक्षणमातुरः ।
रणभूमिमें बाणासुरको अत्यन्त व्याकुल और दीन-चित्त हुआ जान भगवान् रुद्र आतुर हो उसकी रक्षाका उपाय सोचने लगे ॥ ८४॥
ततो नन्दीं महादेवः प्राह गम्भीरया गिरा ॥ ८५ ॥
नन्दिकेश्वर याहि त्वं यतो बाणो रणे स्थितः ।
रथेनानेन दिव्येन सिंहयुक्तेन भास्वता ॥ ८६ ॥
बाणं संयोजयाशु त्वमलं युद्धाय बानघ ।
तत्पश्चात् महादेवजीने गम्भीर वाणीद्वारा नन्दीसे कहा— 'नन्दिकेश्वर ! जहाँ बाणासुर रणभूमिमें स्थित है, वहाँ जाओ और उसे सिंहोंद्वारा जुते हुए इस तेजस्वी दिव्य रथसे शीघ्र संयुक्त करो। निष्पाप नन्दिकेश्वर ! यह रथ युद्धके लिये पर्याप्त है ॥ ८५-८६॥
प्रमाथगणमध्येऽहं स्थास्यामि न हि मे मनः ॥ ८७ ॥
योद्धुं प्रभवते ह्यद्य बाणं संरक्ष गम्यताम् ।
'मैं यहाँ प्रमथगणोंके बीचमें रहूँगा। अब मेरा मन युद्ध करनेके लिये उत्साहित नहीं हो रहा है। तुम जाओ, बाणासुरकी रक्षा करो' ॥ ८७॥
तथेत्युक्त्वा ततो नन्दी रथेन रथिनां वरः ॥ ८८ ॥
यतो बाणस्ततो गत्वा बाणमाह शनैरिदम् ।
दैत्यामुं रथमातिष्ठ शीघ्रमेहि महाबल ॥ ८९ ॥
ततो युध्यस्व कृष्णं वै दानवान्तकरं रणे ।
तब 'बहुत अच्छा' कहकर रथियोंमें श्रेष्ठ नन्दी रथके द्वारा उस स्थानपर गये जहाँ बाणासुर विद्यमान था। वहाँ पहुँचकर उन्होंने बाणासुरसे धीरे-धीरे इस प्रकार कहा, 'महाबली दैत्य ! तुम शीघ्र आओ और इस रथपर आरूढ़ हो जाओ। तदनन्तर दानवोंका विनाश करनेवाले श्रीकृष्णके साथ समराङ्गणमे युद्ध करो' ॥ ८८-८९॥
आरुरोह रथं बाणो महादेवस्य धीमतः ॥ ९० ॥
आरूढः स तु बाणश्च तं रथं ब्रह्मनिर्मितम् ।
तं स्यन्दनमधिष्ठाय भवस्यामिततेजसः ॥ ९१ ॥
प्रादुश्चक्रे महारौद्रमस्त्रं सर्वास्त्रघातनम् ।
दीप्तं ब्रह्मशिरो नाम बाणः क्रुद्धोऽतिवीर्यवान् ॥ ९२ ॥
नन्दीकी यह बात सुनकर बाणासुर बुद्धिमान् महादेवजीके रथपर आरूढ़ हुआ। उन तेजस्वी महादेवजीके उस रथका निर्माण साक्षात् ब्रह्माजीने किया था, उसपर बैठे हुए अत्यन्त पराक्रमी बाणासुरने कुपित हो ब्रह्मशिर नामक महाभयंकर प्रज्वलित अस्त्रका प्रयोग किया, जो सम्पूर्ण अस्त्रोंका विनाश करनेवाला था ॥ ९०-९२ ॥
प्रदीप्ते ब्रह्मशिरसि लोकः क्षोभमुपागमत् ।
लोकसंरक्षणार्थं वै तत् सृष्टं ब्रह्मयोनिना ॥ ९३ ॥
तच्चक्रेण निहत्यास्त्रं प्राह कृष्णस्तरस्विनम् ।
लोके प्रख्यातयशसं बाणमप्रतिमं रणे ॥ ९४ ॥
उस ब्रह्मशिर अस्त्रके प्रज्वलित होते ही यह सम्पूर्ण जगत् क्षुब्ध हो उठा। ब्रह्मयोनि ब्रह्माने जगत्की रक्षाके लिये ही उस अस्त्रकी सृष्टि की थी। श्रीकृष्णने अपने चक्रद्वारा उस अस्त्रका विनाश करके वेगशाली विश्वविख्यात यशस्वी तथारणक्षेत्रमें अनुपम शक्तिशाली बाणासुरसे इस प्रकार कहा—॥
कत्थितानि क ते तात बाण किं न विकत्थसे ।
अयमस्मि स्थितो युद्धे युद्ध्यस्व पुरुषो भव ॥ ९५ ॥
'तात ! तुम्हारी वे बहकी-बहकी बातें कहाँ गयीं ? बाणासुर ! अब तुम बढ़-चढ़कर बातें क्यों नहीं बनाते हो ? देखो, यह मैं युद्धके लिये खड़ा हूँ, तुम मेरे साथ युद्ध करो और मर्द बनो ॥ ९५ ॥
कार्तवीर्यार्जुनो नाम पूर्वं बाहुसहस्रवान् ।
महाबलः स रामेण द्विबाहुः समरे कृतः ॥ ९६ ॥
'पूर्वकालमें कृतवीर्यका पुत्र अर्जुन सहस्र भुजाओंसे सम्पन्न था, किंतु परशुरामजीने समराङ्गणमें उस महाबली वीरको दो बाँहवाला बना दिया था ॥ ९६ ॥
तथा तवापि दर्पोऽयं बाहूनां वीर्यसम्भवः ।
एष ते दर्पशमनं करोमि रणमूर्धनि ॥ ९७ ॥
'उसी प्रकार तुम्हारा भी जो यह घमंड है, यह तुम्हारी सहस्र भुजाओंके बल-पराक्रमसे ही उत्पन्न हुआ है, अतः यह मैं युद्धके मुहानेपर तुम्हारा सारा घमंड चूर किये देता हूँ ॥
यावत् ते दर्पशमनं करोम्यद्य स्वबाहुना ।
तिष्ठेदानीं न मेऽद्य त्वं मोक्ष्यसे रणमूर्धनि ॥ ९८ ॥
'आज मैं अपनी एक बाँहसे जबतक तुम्हारा घमंड दूर न कर दूँ, तबतक इस समय तुम यहीं ठहरे रहो। आज युद्धके मुहानेपर तुम मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकोगे' ॥
अथ तद् दुर्लभं दृष्ट्वा युद्धं परमदारुणम् ।
तत्र देवासुरसमे युद्धे नृत्यति नारदः ॥ ९९ ॥
तदनन्तर देवासुर-संग्रामके समान उस समराङ्गणमें वह अत्यन्त भयंकर और दुर्लभ युद्ध देखकर देवर्षि नारदजी नृत्य करने लगे ॥ ९९ ॥
निर्जिताश्च गणाः सर्वे प्रद्युम्नेन महात्मना ।
निष्क्षिप्तवादा युद्धस्य देवदेवं गताः पुनः ॥ १०० ॥
महात्मा प्रद्युम्नने वहाँ समस्त रुद्रगणोंको पराजित कर दिया, वे युद्धकी बातचीत करना छोड़कर पुनः देवाधिदेव महादेवजीके पास चले गये ॥ १०० ॥
७३२ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे
स तच्चक्रं सहस्रारं नदन् मेघ इवोष्णगे।
जग्राह कृष्णस्त्वरितो वाणान्तकरणं रणे ॥१०१॥
तत्पश्चात् श्रीकृष्णने तुरंत ही वर्षाकालके मेघकी भाँति गर्जना करके अपना वह सहस्रार चक्र हाथमें ले लिया, जो रणभूमिमें बाणासुरका अन्त करनेमें समर्थ था ॥ १०१ ॥
तेजो यज्ज्योतिषां चैव तेजो वज्राशनेस्तथा।
सुरेशस्य च यत् तेजस्तच्चक्रे पर्यवस्थितम् ॥१०२॥
उस समय जो ग्रहों और नक्षत्रोंका तेज था, जो वज्र और अशनिका प्रभाव था तथा जो देवेश्वर इन्द्रका तेज था, वह सब उस चक्रमें स्थापित हो गया ॥ १०२ ॥
त्रेताग्नेश्चैव यत् तेजो यच्च वै ब्रह्मचारिणाम्।
ऋषीणां च ततो ज्ञानं तच्चक्रे समवस्थितम् ॥१०३॥
तीनों अग्नियों और ब्रह्मचारियोंका जो तेज है तथा ऋषियोंका जो ज्ञान है, वह सब उस चक्रमें स्थित हो गया ॥
पतिव्रतानां यत् तेजः प्राणाश्च मृगपक्षिणाम्।
यच्च चक्रधरेष्वस्ति तच्चक्रे संनिवेशितम् ॥१०४॥
पतिव्रताओंका जो तेज है, पशुओं और पक्षियोंके जो प्राण हैं तथा चक्रधारियोंमें जो बल है, वह सब उस चक्रमें समाविष्ट हो गया ॥ १०४ ॥
नागराक्षसयक्षाणां गन्धर्वाप्सरसामपि ।
त्रैलोक्यस्य च यत् प्राणं सर्वं चक्रे व्यवस्थितम् ॥१०५॥
नाग, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व और अप्सराओंकी तथा त्रिलोकीकी जो प्राणशक्ति है, वह सब उस चक्रमें प्रतिष्ठित हुई ॥ १०५ ॥
तेजसा तेन संयुक्तं ज्वलन्निव च भास्करः।
वपुषा तेज आदत्ते बाणस्य प्रमुखे स्थितम् ॥१०६॥
उस तेजसे संयुक्त होकर वह चक्र जाज्वल्यमान सूर्यके समान उदीप्त हो उठा और सामने स्थित होकर अपने शरीरसे बाणासुरके तेजको ग्रहण करने लगा ॥ १०६ ॥
ज्ञात्वातितेजसा चक्रं कृष्णेनाभ्युदितं रणे।
अप्रमेयं ह्यविहतं रुद्राणी चाब्रवीच्छिवम् ॥१०७॥
रणक्षेत्रमें अति तेजस्वी श्रीकृष्णने अप्रमेय एवं अमोघ चक्र उठा लिया है, यह जानकर रुद्राणीने शिवजीसे कहा-॥
अजेयमेतत् त्रैलोक्ये चक्रं कृष्णेन धार्यते।
बाणं त्रायस्व देव त्वं यावच्चक्रं न मुञ्चति ॥१०८॥
'देव ! श्रीकृष्ण जिस चक्रको धारण करते हैं, वह तीनों लोकोंमें अजेय है, अतः जबतक वे उस चक्रको छोड़ नहीं देते हैं, तबतक ही यत्न करके बाणासुरकी रक्षा कीजिये' ॥१०८॥
ततस्त्र्यक्षो वचः श्रुत्वा देवीं लम्बामथाब्रवीत् ।
गच्छैहि लम्बे शीघ्रं त्वं बाणसंरक्षणं प्रति ॥१०९॥
पार्वतीजीका यह वचन सुनकर भगवान् त्रिलोचनने देवी लम्बासे कहा—'लम्बे ! तुम बाणासुरकी रक्षाके लिये शीघ्र जाओ' ॥ १०९ ॥
ततो योगं समाधाय अदृश्या हिमवत्सुता ।
कृष्णस्यैकस्य तद्रूपं दर्शन्ती पार्श्वमागता ॥११०॥
तब हिमवान्की पुत्री उमा योगका आश्रय ले अदृश्य हो श्रीकृष्णके पास गयीं, वे अपने उस स्वरूपका दर्शन एकमात्र श्रीकृष्णको ही करा रही थीं ॥ ११० ॥
चक्रोद्यतकरं दृष्ट्वा भगवन्तं रणाजिरे ॥
अन्तर्धानमुपागम्य त्यज्य सा वाससी पुनः ॥१११॥
परित्राणाय बाणस्य विजयाधिष्ठिता ततः।
प्रमुखे वासुदेवस्य दिग्वासाः कोटवी स्थिता ॥११२॥
समराङ्गणमें भगवान् श्रीकृष्णको हाथमें चक्र उठाये देख वे पुनः अदृश्य हो अपने वस्त्रका परित्याग करके बाणासुरकी रक्षाके लिये विजयाधिष्ठित हो कोटवी या लम्बाके रूपमें वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके समक्ष नंगी खड़ी हो गयीं ॥
तां दृष्ट्वा पुनः प्राप्तां देवीं रुद्रस्य सम्मताम् ।
लम्बाद्वितीयां तिष्ठन्तीं कृष्णो वचनमब्रवीत् ॥११३॥
भूयः सामर्षताम्राक्षी दिग्वस्त्रावस्थिता रणे।
बाणसंरक्षणपरा हन्मि बाणं न संशयः ॥११४॥
रुद्रप्रिया पार्वती देवीको पुनः लम्बाके साथ आकर सामने खड़ी हुई देख श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा—'फिर तुम अमर्षसे लाल आँखें किये रणभूमिमें आकर नंगी खड़ी हो गयीं और बाणासुरकी रक्षाके प्रयत्नमें लग गयीं, परंतु मैं बाणासुरको मारूँगा, इसमें संशय नहीं है' ॥ ११३-११४॥
एवमुक्ता तु कृष्णेन भूयो देव्यब्रवीदिदम् ।
जाने त्वां सर्वभूतानां स्रष्टारं पुरुषोत्तमम् ।
महाभागं महादेवमनन्तं नीलमव्ययम् ॥११५॥
पद्मनाभं हृषीकेशं लोकानामादिसम्भवम् ।
नार्हसे देव हन्तुं वै बाणमप्रतिमं रणे ॥११६॥
श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर देवीने फिर इस प्रकार कहा—'प्रभो ! मैं आपको जानती हूँ, आप समस्त प्राणियोंके स्रष्टा, पुरुषोत्तम, महान् सौभाग्यशाली, महादेव, अनन्त, श्यामवर्णवाले तथा अविनाशी पुरुष हैं, आपकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है, आप समस्त इन्द्रियोंके नियन्ता हैं तथा सम्पूर्ण जगत्के आदि कारण हैं। देव ! यह बाणासुर रणभूमिमें अप्रतिम वीरता दिखानेवाला है, अतः आपको इसका वध नहीं करना चाहिये ॥ ११५-११६ ॥
विष्णुपर्व ] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७३३
प्रयच्छ ह्यभयं बाणे जीवपुत्रीत्वमेव च ।
मया दत्तवरो ह्येष भूयश्च परिरक्ष्यते ॥ ११७ ॥
न मे मिथ्या समुद्योगं कर्तुमर्हसि माधव ।
'भगवन् ! बाणासुरको अभयदान दीजिये और मुझे जीवित पुत्रकी जननी बनाइये। मैंने इसे वर दे रखा है, इसीलिये पुनः मेरे द्वारा इसकी रक्षा की जा रही है। माधव ! आप मेरे उद्योगको मिथ्या न कीजिये' ॥ ११७ १/२ ॥
एवमुक्ते तु वचने देव्या परपुरंजयः ॥ ११८ ॥
कृष्णः प्रभाषते वाक्यं शृणु सत्यं तु भामिनि ।
देवीके ऐसी बात कहनेपर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले श्रीकृष्ण इस प्रकार बोले—'भामिनि ! तुम मेरी सच्ची बात सुनो ॥ ११८ १/२ ॥
बाणो बाहुसहस्रेण नर्दते दर्पमाश्रितः ॥ ११९ ॥
एतेषां छेदनं त्वद्य कर्तव्यं नात्र संशयः ।
द्विबाहुना च बाणेन जीवपुत्री भविष्यसि ॥ १२० ॥
आसुरं दर्पमाश्रित्य न च मां संश्रयिष्यति ।
'बाणासुर अपनी सहस्र भुजाओंके कारण घमंडमें भरकर गर्जता रहता है, अतः आज इन भुजाओंका छेदन करना कर्तव्य है, इसमे संशय नहीं है। देवि ! तुम दो बाँहवाले बाणासुरके द्वारा ही जीवित पुत्रवाली बनोगी। यह बाणासुर आसुर अभिमानका आश्रय लेनेके कारण कभी मेरी शरणमे नहीं आयेगा' ॥ ११९-१२० १/२ ॥
एवमुक्ते तु वचने कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ॥ १२१ ॥
प्रोवाच देवी बाणोऽयं देवदत्तो भवेदिति ।
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णके इस तरह कहनेपर देवी बोली—'प्रभो ! यह बाणासुर महादेवजीका दिया हुआ मेरा दत्तक पुत्र हो' ॥ १२१ १/२ ॥
अथ तां कार्तिकेयस्य मातरं सोऽभिभाष्य वै ।
ततः क्रुद्धो महाबाहुः कृष्णः प्रवदतां वरः ॥ १२२ ॥
प्रोवाच बाणं समरे वदतां प्रवरः प्रभुः ।
कार्तिकेयकी मातासे इस प्रकार बातचीत करके वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण समराङ्गणमें कुपित हो बाणासुरसे यों बोले— ॥ १२२ १/२ ॥
युध्यतां युध्यतां संख्ये भवतां कोटवी स्थिता ॥ १२३ ॥
अशक्तानामिव रणे धिग् बाण तव पौरुषम् ।
'बाण ! संग्रामभूमिमें युद्ध करो। युद्ध करो !! असमर्थ पुरुषोंकी भाँति तुम्हारी रक्षाके लिये माता कोटवी इस रणक्षेत्रमें खड़ी है, तुम्हारे पुरुषार्थको धिक्कार है' ॥ १२३ १/२ ॥
एवमुक्त्वा ततः कृष्णस्तच्चक्रं परमात्मवान् ॥ १२४ ॥
निमीलिताक्षो व्यसृजद् बाणं प्रति महाबलः ।
ऐसा कहकर अपने मनको वशमें रखनेवाले महाबली श्रीकृष्णने बाणासुरपर वह उत्तम चक्र छोड़ दिया; उस समय (नग्न खड़ी हुई देवीपर दृष्टि न पड़े, इसके लिये) उन्होंने अपने दोनों नेत्र बंद कर लिये थे ॥ १२४ १/२ ॥
क्षेपणाद्यस्य मुह्यन्ति लोकाः सस्थाणुजङ्गमाः ॥ १२५ ॥
क्रव्यादानि च भूतानि तृप्तिं यान्ति महामृधे ।
तमप्रतिमकर्माणं समानं सूर्यवर्चसा ॥ १२६ ॥
चक्रमुद्यम्य समरे कोपदीप्तो गदाधरः ।
स मुष्णन् दानवं तेजः समरे स्वेन तेजसा ॥ १२७ ॥
चिच्छेद बाहूंचक्रेण श्रीधरः परमौजसा ।
महासमरमें जिसके प्रयोगसे चराचर प्राणियोंसहित समस्त लोक मोहित हो जाते हैं और मांसभक्षी प्राणियोंको तृप्ति प्राप्त होती है, उस अनुपम कर्म करनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी चक्रको उठाकर क्रोधसे बढ़े हुए तेजवाले गदाधारी भगवान् श्रीधरने समराङ्गणमें अपने उत्कृष्ट तेज और बलसे दानव बाणासुरके तेजका अपहरण करते हुए उसकी भुजाओंको चक्रसे काट डाला ॥ १२५-१२७ १/२ ॥
अलातचक्रवत् तूर्णं भ्राम्यमाणं रणाजिरे ॥ १२८ ॥
क्षिप्तं तु वासुदेवेन बाणस्य रणमूर्धनि ।
विष्णुचक्रं भ्रमत्यशु शैघ्याद् रूपं न दृश्यते ॥ १२९ ॥
रणक्षेत्रमें युद्धके मुहानेपर बाणासुरको लक्ष्य करके भगवान् वासुदेवके द्वारा चलाया गया वह चक्र वहाँ तुरंत ही अलातचक्रके समान घूमने लगा । वह इतनी शीघ्रतासे घूम रहा था कि उसका रूप दिखायी नहीं देता था ॥ १२८-१२९ ॥
तस्य बाहुसहस्रस्य पर्यायेण पुनः पुनः ।
बाणस्य च्छेदनं चक्रे तच्चक्रं रणमूर्धनि ॥ १३० ॥
संग्रामके शिरोभागमें उस चक्रने बारी वारीसे बाणासुरकी सहस्र भुजाओंको काटना आरम्भ किया ॥ १३० ॥
कृत्वा द्विबाहुं तं बाणं छिन्नशाखमिव द्रुमम् ।
पुनः कराग्रे कृष्णस्य चक्रं प्राप्तं सुदर्शनम् ॥ १३१ ॥
कटी हुई शाखावाले वृक्षकी भाँति बाणासुरको दो ही बाँहोंसे युक्त बनाकर वह सुदर्शन चक्र पुनः श्रीकृष्णके कराग्रभागमें आ पहुँचा ॥ १३१ ॥
वैशम्पायन उवाच
कृतकृत्ये तु सम्प्राप्ते चक्रे दैत्यनिपातने ।
स्रवता तेन कायेन शोणितौघपरिप्लुतः ॥ १३२ ॥
अभवत् पर्वताकारश्छिन्नबाहुर्महासुरः ।
असृङ् मत्तश्च विविधान् नादान् मुञ्चन् घनो यथा ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! दैत्योंको मार गिरानेवाला वह चक्र जब अपना काम पूरा करके श्रीकृष्णके हाथमे आ गया, तब बाणासुरके उस शरीरसे रक्तकी धारा
| ७३४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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बहने लगी, कटी हुई बाँहवाला वह महान् असुर खूनसे लथपथ होकर पर्वताकार हो गया और रक्तसे मतवाला हो मेघके समान नाना प्रकारसे गर्जना करने लगा ॥ १३२-१३३ ॥
तस्य नादेन महता केशवो रिपुसूदनः ।
चक्रं भूयः क्षेप्तुकामो बाणनाशार्थमुद्यतः ।
तमुपेत्य महादेवः कुमारसहितोऽब्रवीत् ॥ १३४॥
उसके उस महान् सिंहनादसे कुपित हुए शत्रुसूदन केशव बाणासुरका विनाश कर डालनेके लिये उद्यत हो गये। वे पुनः अपना चक्र छोड़ना ही चाहते थे कि कुमार कार्तिकेयसहित महादेवजी उनके पास आ गये और इस प्रकार बोले ॥ १३४ ॥
ईश्वर उवाच
कृष्ण कृष्ण महाबाहो जाने त्वां पुरुषोत्तमम् ।
मधुकैटभहन्तारं देवदेवं सनातनम् ॥ १३५॥
महादेवजी बोले—कृष्ण ! कृष्ण !! महाबाहो ! मैं आपको जानता हूँ, आप मधु और कैटभका वध करनेवाले सनातन देवाधिदेव पुरुषोत्तम श्रीहरि हैं ॥ १३५ ॥
लोकानां त्वं गतिर्देव त्वत्प्रसूतमिदं जगत् ।
अजेयस्त्वं त्रिभिर्लोकैः ससुरासुरपन्नगैः ॥ १३६॥
देव ! आप सम्पूर्ण लोकोंकी गति हैं; आपसे ही इस जगत्की उत्पत्ति हुई है; देवता, असुर तथा नागोंसहित तीनों लोकोंके लिये आप अजेय हैं ॥ १३६ ॥
तस्मात्संहर दिव्यं त्वमिदं चक्रं समुद्यतम् ।
अनिवार्यमसंहार्यं रणे शत्रुभयंकरम् ॥ १३७॥
अतः आप ऊपर उठे हुए अपने इस दिव्य चक्रको पुनः समेट लीजिये । रणभूमिमें इसका निवारण अथवा संहार करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, यह शत्रुओंके लिये अत्यन्त भयंकर है ॥ १३७ ॥
बाणस्यास्याभयं दत्तं मया केशिनिषूदन ।
तन्मे न स्याद् वृथा वाक्यमतस्त्वां क्षामयाम्यहम्॥१३८॥
केशिनिषूदन ! मैंने इस बाणासुरको अभयदान दे रखा है; मेरा वह वचन व्यर्थ न हो जाय इसके लिये मैं आपसे क्षमा करनेकी प्रार्थना करता हूँ ॥ १३८ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
जीवतां देव बाणोऽयमेतच्चक्रं निवर्तितम् ।
मान्यस्त्वं देवदेवानामसुरणां च सर्वशः ॥ १३९॥
श्रीकृष्ण बोले—देव ! यह चक्र मैंने लौटा लिया, अब यह बाणासुर चिरजीवी हो; आप देवताओंके भी देवता तथा सम्पूर्ण असुरोंके लिये माननीय हैं ॥ १३९ ॥
नमस्तेऽस्तु गमिष्यामि यत्कार्यं तन्महेश्वर ।
न तावत् क्रियते तस्मान्मामन्नुज्ञातुमर्हसि ॥ १४०॥
महेश्वर ! आपको नमस्कार है। अब मैं लौट जाऊँगा; बाणासुरका वधरूपी जो कार्य मुझे करना था, वह आपके अनुरोधसे अब मेरे द्वारा नहीं किया जा रहा है; इसलिये आप मुझे लौटनेकी आज्ञा प्रदान करें ॥ १४० ॥
एवमुक्त्वा महादेवं कृष्णस्तूर्णं महामनाः ।
जगाम तत्र यत्रास्ते प्रद्युम्निः सायकैश्चितः ॥ १४१॥
महादेवजीसे ऐसा कहकर महामनस्वी भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत उस स्थानपर गये, जहाँ प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध सायकोंसे बँधे हुए थे ॥ १४१ ॥
गते कृष्णे ततो नन्दी बाणमाह वचः शुभम् ।
गच्छ बाण प्रसन्नस्य देवदेवस्य चाग्रतः ॥ १४२॥
श्रीकृष्णके चले जानेपर नन्दीने बाणासुरसे यह मङ्गलमय बात कही—'बाण ! तुम प्रसन्न हुए देवाधिदेव महादेवजीके सामने चलो' ॥ १४२ ॥
तच्छ्रुत्वा नन्दिवाक्यं तु बाणोऽगच्छत शीघ्रगः ।
छिन्नबाहुं ततो बाणं दृष्ट्वा नन्दी प्रतापवान् ॥ १४३॥
अपवाह्य रथेनैनं यतो देवस्ततो ययौ ।
नन्दीका यह वचन सुनकर बाणासुर शीघ्रतापूर्वक चल पड़ा। उसकी भुजाएँ कटी हुई देख प्रतापी नन्दी उसे रथपर बिठाकर जहाँ महादेवजी थे, वहाँ ले गये ॥ १४३॥
ततो नन्दी पुनर्वाणं प्रागुवाचोत्तरं वचः ॥ १४४॥
बाण बाण प्रनृत्यस्व श्रेयस्तव भविष्यति ।
एष देवो महादेवः प्रसादसुमुखस्तव ॥ १४५॥
तत्पश्चात् नन्दीने पुनः बाणासुरसे पहले ही यह उत्कृष्ट बात कही—'बाण ! बाण !! तुम भगवान् शङ्करके सामने नृत्य करो, इससे तुम्हारा कल्याण होगा; यह भगवान् महादेवजी तुम्हारे ऊपर कृपा करनेके लिये प्रसन्न मुख हो रहे हैं' ॥ १४४-१४५ ॥
शोणितौघप्लुतैर्गात्रैर्नन्दिवाक्यप्रचोदितः ।
जीवितार्थी ततो बाणः प्रमुखे शंकरस्य वै ॥ १४६॥
अनृत्यद् भयसंविग्नो दानवः स विचेतनः ।
नन्दीके वाक्यसे प्रेरित हो जीवनकी इच्छा रखनेवाला बाणासुर भयसे व्याकुल और अचेत होकर रक्तसे लथपथ हुए शरीरसे भगवान् शङ्करके सम्मुख नृत्य करने लगा ॥ १४६॥
तं दृष्ट्वा च प्रनृत्यन्तं भयोद्विग्नं पुनः पुनः ॥ १४७॥
नन्दिवाक्यप्रजवितं भक्तानुग्रहकृद् भवः ।
करुणावशमापन्नो महादेवोऽब्रवीद् वचः ॥ १४८॥
नन्दीके कहनेसे भयके कारण उद्विग्न होकर वेगपूर्वक
विष्णुपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७३५
बारंबार नृत्य करते हुए उस दानवकी ओर देखकर भक्त-वत्सल भगवान् शिव करुणाके वशीभूत हो इस प्रकार बोले ॥ १४७-१४८ ॥
ईश्वर उवाच
वरं वृणीष्व बाण त्वं मनसा यदभीप्ससि।
प्रसादसुमुखस्तेऽहं प्रियोऽसि मम दानव ॥ १४९॥
श्रीमहादेवजीने कहा— बाण ! तुम अपने मनसे जो चाहते हो, वह वर मुझसे माँगो। मैं तुमपर कृपा करनेके लिये प्रसन्न हुआ हूँ। दानव ! तुम मेरे प्रिय हो ॥ १४९ ॥
बाण उवाच
अजश्चामरश्चैव भवेयं सततं विभो।
एष मे प्रथमो देव वरोऽस्तु यदि मन्यसे ॥ १५०॥
बाणासुर बोला— सर्वव्यापी देव ! मैं सदा अजर और अमर रहूँ, यदि आप स्वीकार करें तो मेरे लिये यही प्रथम वर हो ॥ १५० ॥
देव उवाच
तुल्योऽसि दैवतैर्बाण न मृत्युस्तव विद्यते ।
अथापरं वृणीष्वाद्य अनुग्राह्योऽसि मे सदा ॥ १५१॥
श्रीमहादेवजीने कहा— बाणासुर ! तुम देवताओंके तुल्य हो, तुम्हारे लिये मृत्यु नहीं है। अब कोई दूसरा वर माँगो; क्योंकि तुम सदा मेरे कृपापात्र हो ॥ १५१ ॥
बाण उवाच
यथाहं शोणितैर्दिग्धो भृशार्तो व्रणपीडितः।
भक्तानां नृत्यतां देव पुत्रजन्म भवेद्भव ॥ १५२॥
बाणासुर बोला— भगवन् ! मैं अत्यन्त आर्त, घावसे पीड़ित और खूनसे लथपथ हूँ। तथापि जिस प्रकार नृत्य कर रहा हूँ, इस तरह नृत्य करनेवाले भक्तोंके यहाँ पुत्रजन्म-का उत्सव हो ॥ १५२ ॥
श्रीहर उवाच
निराहाराः क्षमावन्तः सत्यार्जवसमाहिताः।
मद्भक्ता येऽपि नृत्यन्ति तेषामेवं भविष्यति ॥ १५३॥
श्रीमहादेवजीने कहा— जो मेरे भक्तजन निराहार, क्षमाशील तथा सत्य और सरलतासे संयुक्त रहकर एकाग्र-चित्त हो मेरी प्रसन्नताके लिये नृत्य करेंगे, उन्हें ऐसा ही फल प्राप्त होगा ॥ १५३ ॥
तृतीयं त्वमथो बाण वरं वर मनोगतम्।
तद् विधास्यामि ते पुत्र सफलोऽस्तु भवानिह ॥ १५४॥
'बेटा बाणासुर ! अब तुम कोई तीसरा मनोवाञ्छित वर माँगो, मैं उसे पूर्ण करूँगा; मेरी कृपासे तुम यहाँ सफलमनोरथ होओ ॥ १५४ ॥
बाण उवाच
चक्रताडनजा घोरा रुजा तीव्रा हि मेऽनघ।
वरेणासौ तृतीयेन शान्तिं गच्छतु मे भव ॥ १५५॥
बाणासुर बोला— निष्पाप महादेव ! चक्रके आघातसे मुझे बड़ी भयंकर एवं तीव्र वेदना हो रही है, आपके दिये हुए तीसरे वरसे मेरी वह पीड़ा शान्त हो जाय ॥ १५५ ॥
श्रीरुद्र उवाच
एवं भवतु भद्रं ते न रुजा प्रभविष्यति।
अक्षतं तव गात्रं तु स्वस्थावस्थं भविष्यति ॥ १५६॥
श्रीमहादेवजी बोले— वत्स ! ऐसा ही हो। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम्हें पीड़ा नहीं होगी। तुम्हारा शरीर घाव-से रहित और स्वस्थ हो जायगा ॥ १५६ ॥
चतुर्थं ते वरं दद्मि वृणीष्व यदि काङ्क्षसि।
न तेऽहं विमुखस्तात प्रसादसुमुखो ह्यहम् ॥ १५७॥
तात ! अब मैं तुम्हें चौथा वर देता हूँ; यदि चाहो तो माँग लो। मैं तुमसे विमुख नहीं हूँ। तुमपर कृपा करनेके लिये सदा ही प्रसन्नमुख हूँ ॥ १५७ ॥
बाण उवाच
प्रमथगणवंशस्य प्रथमः स्यामहं विभो।
महाकाल इति ख्यातिं गच्छेयं शाश्वतीः समाः ॥ १५८॥
बाणासुर बोला— प्रभो ! मैं आपके प्रमथगणोंके समुदायका प्रमुख व्यक्ति होऊँ और महाकालके नामसे मेरी नित्य निरन्तर ख्याति बनी रहे ॥ १५८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं भविष्यतीत्याह बाणं देवो महेश्वरः।
दिव्यरूपोऽक्षतो गात्रैर्नीरोगस्तु ममाश्रयात् ॥ १५९॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन् ! तब महेश्वरदेवने बाणासुर-से कहा—'बाण ! ऐसा ही होगा, तुम मेरा आश्रय ग्रहण करनेके कारण शरीरसे अक्षत और नीरोग रहोगे। तुम्हारा रूप दिव्य हो जायगा ॥ १५९ ॥
ममातिसर्गाद् बाण त्वं भव चैवाकुतोभयः।
भूयस्ते पञ्चमं दद्मि प्रख्यातबलपौरुष।
पुनर्वरय भद्रं ते यत् ते मनसि वर्तते ॥ १६०॥
'विख्यात बल और पौरुषसे युक्त बाणासुर ! तुम मेरे दिये हुए वरके प्रभावसे निर्भय हो जाओ; तुम्हे कहींसे कोई भय न रहे। अब मैं तुम्हे पुनः पाँचवाँ वर देता हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारे मनमें जैसी इच्छा हो, उसके अनुसार फिर कोई वर माँगो' ॥ १६०॥
| ७३६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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बाण उवाच
वैरूप्यमङ्गजं यन्मे मा भूद् देव कदाचन ।
द्विबाहुरपि मे देहो न विरूपो भवेद् भव ॥१६१॥
बाणासुर बोला—देव ! शङ्कर ! मेरे शरीरमें कभी कुरूपता न रहे; दो बाँहोंसे युक्त होनेपर भी मेरी देह कुरूप न प्रतीत हो ॥ १६१ ॥
श्रीहर उवाच
भविता सर्वमेतत् ते यथेच्छसि महासुर ।
भवत्येवं न चादेयं भक्तानां विद्यते मम ॥१६२॥
श्रीमहादेवजी बोले—महासुर ! तुम जैसा चाहते हो, यह सब तुम्हारे लिये सुलभ होगा । मेरे पास भक्तोंके लिये कुछ भी अदेय नहीं है ॥ १६२ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततोऽब्रवीन्महादेवो बाणं स्थितमथान्तिके ।
एवं भविष्यते सर्वं यत् त्वया समुदाहृतम् ॥१६३॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब महादेवजीने अपने पास खड़े हुए बाणासुरसे कहा—‘वत्स ! तुमने जो कुछ कहा या माँगा है, वह सब इसी रूपमें पूर्ण होगा’ ॥ १६३ ॥
एतावदुक्त्वा भगवांस्त्रिनेत्रो गणसंवृतः ।
पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवान्तरधीयत ॥१६४॥
ऐसा कहकर अपने गणोंसे घिरे हुए त्रिनेत्रधारी भगवान् शिव समस्त प्राणियोंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १६४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि उपाहरणे बाणासुरवरप्रदाने षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१२६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें उपाहरणके प्रसंगमें बाणासुरको भगवान् शिवका वरदानविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२६ ॥
सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
अनिरुद्धका नागपाशसे छुटकारा और उनके द्वारा श्रीकृष्ण आदिकी वन्दना, नारदजीके कहनेसे उनका वीर्य-विवाह, उषाकी विदाई, सबका द्वारकाको प्रस्थान, मार्गमें श्रीकृष्णद्वारा वरुण देवतापर विजय, वरुणद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति और पूजा, श्रीकृष्णके आगमनसे द्वारकावासियोंका हर्ष, भगवान्के आदेशसे पुरवासियोंद्वारा देवताओंकी वन्दना, इन्द्रद्वारा श्रीकृष्णकी प्रशंसा और सब देवताओं तथा ऋषियों आदिका अपने-अपने स्थानको जाना
वैशम्पायन उवाच
एवं वरान् बहून् प्राप्य बाणः प्रीतमनाऽभवत् ।
जगाम सह रुद्रेण महाकालत्वमागतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार बहुत-से वर पाकर बाणासुरका मन प्रसन्न हो गया । वह महाकालत्वको प्राप्त होकर भगवान् शिवके साथ चला गया ॥ १ ॥
वासुदेवोऽपि बहुधा नारदं पर्यपृच्छत ।
क्वानिरुद्धोऽस्ति भगवन् संयतो नागबन्धनैः ॥ २ ॥
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन स्नेहक्लिन्नं हि मे मनः ।
अनिरुद्धे हृते वीरे क्षुभिता द्वारका पुरी ॥ ३ ॥
इधर भगवान् श्रीकृष्णने नारदजीसे बारंबार पूछा—‘भगवन् ! अनिरुद्ध कहाँ नागपाशमें बँधे हुए हैं, मैं इसे ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ । मेरा हृदय स्नेहसे आकुल हो रहा है। वीर अनिरुद्धका अपहरण होनेसे सारी द्वारकापुरी क्षुब्ध हो उठी है ॥ २-३ ॥
शीघ्रं तं मोक्षयिष्यामो यदर्थं वयमागताः ।
अद्य तं नष्टशत्रुं वै द्रष्टुमिच्छामहे वयम् ॥ ४ ॥
स प्रदेशस्तु भगवन् विदितस्तव सुव्रत ।
‘अतः हमलोग शीघ्र उन्हें बन्धनसे छुड़ायेंगे, जिसके लिये कि हमारा यहाँ आगमन हुआ है। अनिरुद्धका शत्रु नष्ट हो गया, अब हम उन्हें देखना और उनसे मिलना चाहते हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले भगवान् नारद ! जहाँ अनिरुद्ध हैं, वह स्थान आपको विदित है’ ॥ ४½ ॥
एवमुक्तस्तु कृष्णेन नारदः प्रत्यभाषत ॥ ५ ॥
कन्यापुरे कुमारोऽसौ बद्धो नागैश्च माधव ।
श्रीकृष्णके इस प्रकार पूछनेपर नारदजीने उत्तर दिया—‘माधव ! कुमार अनिरुद्ध कन्याके अन्तःपुरमें नागपाशसे बँधे हुए हैं’ ॥ ५½ ॥
एतस्मिन्नन्तरे शीघ्रं चित्रलेखा ह्युपस्थिता ॥ ६ ॥
बाणस्योत्तमशर्वस्य दैत्येन्द्रस्य महात्मनः ।
इदमन्तःपुरं देव प्रविशस्व यथासुखम् ॥ ७ ॥
विष्णुपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७३७
इसी बीचमें चित्रलेखा शीघ्रतापूर्वक वहाँ उपस्थित हुई और बोली—'देव ! जिसने भगवान् शङ्करको ही सर्वोपरि मानकर उनकी आराधना की है, उस दैत्यराज महात्मा बाणासुरका अन्तःपुर यही है। आप इसमें सुखपूर्वक प्रवेश कीजिये' ॥ ६-७ ॥
ततः प्रविष्टास्ते सर्वे ह्यनिरुद्धस्य मोक्षणे ।
बलः सुपर्णः कृष्णस्तु प्रद्युम्नो नारदस्तथा ॥ ८ ॥
तब बलराम, गरुड, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न और नारद —ये सब लोग अनिरुद्धको बन्धनसे मुक्त करनेके लिये बाणासुरके अन्तःपुरमें प्रविष्ट हुए ॥ ८ ॥
ततो दृष्ट्वैव गरुडं येऽनिरुद्धशरीरगाः ।
शररूपा महासर्पा वेष्टयित्वा तनुं स्थिताः ॥ ९ ॥
ते सर्वे सहसा देहात् तस्य निःसृत्य भोगिनः ।
क्षितिं समभवंस्तित्वा प्रकृत्यावस्थिताः शराः ॥ १० ॥
फिर तो गरुडको देखते ही अनिरुद्धके शरीरमें जो बाण-रूपी महासर्प उनके सारे अङ्गोंको आवेष्टित करके स्थित थे, वे सब सहसा उनकी देहसे निकलकर पृथ्वीपर गिर पड़े और साधारण बाणोंके रूपमें परिणत हो गये ॥ ९-१० ॥
दृष्टः स्पृष्टश्च कृष्णेन सोऽनिरुद्धो महायशाः ।
स्थितः प्रीतमना भूत्वा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ११ ॥
श्रीकृष्णका दर्शन और स्पर्श पाकर महायशस्वी अनिरुद्ध मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और खड़े हो हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले ॥ ११ ॥
अनिरुद्ध उवाच
देवदेव सदा युद्धे जेता त्वमसि केशव ।
न शक्तः प्रमुखे स्थातुं साक्षादपि शतक्रतुः ॥ १२ ॥
अनिरुद्धने कहा—देवाधिदेव केशव ! आप सदा ही युद्धमें विजयी हैं। प्रभो ! आपके सामने साक्षात् इन्द्र भी ठहर नहीं सकते ॥ १२ ॥
ततो महाबलं देवं बलभद्रं यशस्विनम् ।
अभिवादयते हृष्टः सोऽनिरुद्धो महामनाः ॥ १३ ॥
तदनन्तर महामनस्वी अनिरुद्धने बड़े हर्षके साथ महान् बलशाली यशस्वी बलभद्रदेवको प्रणाम किया ॥ १३ ॥
माधवं च महात्मानमभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
खगोत्तमं महावीर्यं सुपर्णमभिवाद्य च ॥ १४ ॥
ततो मकरकेतुं च विचित्रबाणधरं प्रभुम् ।
पितरं सोऽभ्युपागम्य प्रद्युम्नमभिवादयत् ॥ १५ ॥
फिर हाथ जोड़कर महात्मा माधव तथा महापराक्रमी पक्षिप्रवर गरुड़का पृथक्-पृथक् अभिवादन करके उन्होंने अपने पिता विचित्र बाणधारी सर्वसमर्थ मकरध्वज प्रद्युम्नके पास जाकर उन्हे भी प्रणाम किया ॥ १४-१५ ॥
सखीगणवृता चैव सा चोषा भवने स्थिता ।
बलं चातिबलं चैव वासुदेवं सुदुर्जयम् ॥ १६ ॥
असंख्यातगतिं चैव सुपर्णमभिवाद्य च ।
पुष्पबाणधरं चैव लजमानाभ्यवादयत् ॥ १७ ॥
तत्पश्चात् उस भवनमें रहनेवाली सखियोंसहित उषाने आकर अत्यन्त बलशाली बलराम, परम दुर्जय वासुदेव और अप्रमेय गतिशील गरुड़को प्रणाम करके पुष्पबाणधारी प्रद्युम्नको भी लज्जापूर्वक नमस्कार किया ॥ १६-१७ ॥
ततः शक्रस्य वचनान्नारदः परमद्युतिः ।
वासुदेवसमीपं स प्रहसन् पुनरागतः ॥ १८ ॥
तब इन्द्रके कहनेसे परमतेजस्वी नारदजी पुनः भगवान् श्रीकृष्णके समीप हँसते हुए आये ॥ १८ ॥
वर्द्धापयति तं देवं गोविन्दं शत्रुसूदनम् ।
दिष्ट्या वर्द्धसि गोविन्द अनिरुद्धसमागमात् ॥ १९ ॥
वे शत्रुसूदन गोविन्ददेवको बधाई देते हुए बोले—'गोविन्द ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज आप अनिरुद्ध-से मिलकर अभ्युदयको प्राप्त हुए हैं' ॥ १९ ॥
ततोऽनिरुद्धसहिता नारदं प्रणताः स्थिताः ।
आशीर्भिर्वर्द्धयित्वा च देवर्षिः कृष्णमब्रवीत् ॥ २० ॥
तब अनिरुद्धसहित वे सब लोग नारदजीके चरणोंमें प्रणाम करके खड़े हो गये; तब देवर्षिने आशीर्वादसे उन सबके अभ्युदयकी कामना करके श्रीकृष्णसे कहा—॥ २० ॥
अनिरुद्धस्य वीर्याख्यो विवाहः क्रियतां विभो ।
जम्बूलमालिकां द्रष्टुं श्रद्धा हि मम जायते ॥ २१ ॥
'प्रभो ! आप यहाँ अनिरुद्धका 'वीर्य'¹ नामक विवाह कीजिये; मुझे जम्बूलमालिका देखने और सुननेके लिये बड़ी श्रद्धा (इच्छा) हो रही है'² ॥ २१ ॥
ततः प्रहसिताः सर्वे नारदस्य वचःश्रवात् ।
कृष्णःप्रोवाच भगवन् क्रियतामाशु मा चिरम् ॥ २२ ॥
नारदजीकी यह बात सुनकर सब लोग हँस पड़े। फिर श्रीकृष्णने कहा—'भगवन् ! शीघ्र ही अनिरुद्ध और उषाका विवाह कीजिये; विलम्ब न हो' ॥ २२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तात कुम्भाण्डः समुपस्थितः ।
वैवाहिकांस्तु सम्भारान् गृह्य कृष्णं नमस्य तु ॥ २३ ॥
१. बल-पराक्रमद्वारा जीती गयी कन्याका विवाह 'वीर्यविवाह' कहलाता है।
२. वर-वधूके विवाहके समय कन्या-पक्षकी स्त्रियोंद्वारा वरपक्षकी स्त्रियोंको जो प्रेमपूर्ण परिहासके रूपमें गाली दी जाती है, उसका नाम जम्बूल है। उसकी परम्पराको जम्बूलमालिका कहा गया है। (नीलकण्ठ)
७३८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे तात ! इसी बीचमें वैवाहिक सामग्रीका संग्रह करके मन्त्री कुम्भाण्ड उपस्थित हुए और श्रीकृष्णको नमस्कार करके बोले ॥ २३ ॥ कुम्भाण्ड उवाच कृष्ण कृष्ण महाबाहो भव त्वमभयप्रदः । शरणागतोऽस्मि देवेश प्रसीदोपैषोऽञ्जलिस्तव ॥ २४ ॥ कुम्भाण्डने कहा—कृष्ण ! कृष्ण ! महाबाहो ! आप मुझे अभय प्रदान करें। देवेश्वर ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, प्रसन्न होइये ! आपके सामने ये मेरे दोनों हाथ जुड़े हुए हैं ॥ २४ ॥ नारदस्य वचः श्रुत्वा सर्वं प्रागेव चाच्युतः । अभयं यच्छते तस्मै कुम्भाण्डाय महात्मने ॥ २५ ॥ कुम्भाण्ड मन्त्रिणां श्रेष्ठ प्रीतोऽस्मि तव सुव्रत । सुकृतं ते विजानामि राष्ट्रिकोऽस्तु भवानिह ॥ २६ ॥ साक्षात्पक्षः सुसुखी निर्वृत्तोऽस्तु भवानिह । राज्यं च ते मया दत्तं चिरं जीव ममाश्रयात् ॥ २७ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण नारदजीसे कुम्भाण्डके विषयमें सब कुछ सुन चुके थे; उनकी उस बातका स्मरण करके वे महात्मा कुम्भाण्डको अभय देते हुए बोले—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मन्त्रिप्रवर कुम्भाण्ड ! तुमने जो सत्कर्म किया है, उसे मैं जानता हूँ। अब तुम्हीं यहाँके राष्ट्रपति बनो और अपने बन्धु-बान्धवोंसहित यहाँ परम सुखी तथा सन्तुष्ट रहो। मैंने तुम्हें यह राज्य अर्पित कर दिया, अब तुम मेरा आश्रय लेकर चिरजीवी बने रहो'॥ २५-२७ ॥ एवं दत्त्वा राज्यमस्मै कुम्भाण्डाय महात्मने । विवाहमकरोत् तस्यानिरुद्धस्य जनार्दनः । ततस्तु भगवान् वह्निस्तत्र स्वयमुपस्थितः ॥ २८ ॥ इस प्रकार महात्मा कुम्भाण्डको राज्य देकर श्रीकृष्णने वहाँ अनिरुद्धका विवाहसंस्कार सम्पन्न किया। उस समय भगवान् अग्निदेव वहाँ स्वयं उपस्थित हुए थे ॥ २८॥ स विवाहोऽनिरुद्धस्य नक्षत्रे च शुभेऽभवत् । ततोऽप्सरोगणश्चैव कौतुकं कर्तुमुद्यतः ॥ २९ ॥ अनिरुद्धका वह विवाह शुभ नक्षत्रमें सम्पन्न हुआ। उसमें माङ्गलिक कृत्य करनेके लिये अप्सराएँ उपस्थित हुई थीं ॥ २९ ॥ स्नातस्त्वलंकृतस्तत्र सोऽनिरुद्धः स्वभार्यया । ततः स्निग्धैः शुभैर्वाक्यैर्गन्धर्वाश्च जगुस्तदा ॥ ३० ॥ नृत्यन्त्यप्सरसश्चैव विवाहमुपशोभयन् । वहाँ अपनी पत्नीके साथ अनिरुद्धने स्नान करके अलङ्कार धारण किया। तत्पश्चात् मङ्गलसूचक स्निग्ध वचनोंद्वारा गन्धर्वगण गान करने लगे और अप्सराएँ उस विवाहकी शोभा बढ़ाती हुई नाचने लगीं ॥ ३०३ ॥ ततो निर्वर्तयित्वा तु विवाहं शत्रुसूदनः ॥ ३१ ॥ अनिरुद्धस्य सुप्रज्ञः सर्वैर्देवगणैर्वृतः । आमन्त्र्य वरदं तत्र रुद्रं देवनमस्कृतम् ॥ ३२ ॥ चकार गमने बुद्धिं कृष्णः परपुरंजयः । तदनन्तर अनिरुद्धका विवाहसंस्कार सम्पन्न कराकर समस्त देवताओंसे घिरे हुए परम बुद्धिमान् शत्रुसूदन एवं परपुरंजय भगवान् श्रीकृष्णने देववन्दित वरदायक रुद्रदेवकी आज्ञा ले वहाँसे द्वारका जानेका विचार किया ॥ ३१-३२३ ॥ द्वारकाभिमुखं कृष्णं ज्ञात्वा शत्रुनिषूदनम् ॥ ३३ ॥ कुम्भाण्डो वचनं प्राह प्राञ्जलिर्मधुसूदनम् । शत्रुसूदन श्रीकृष्णको द्वारका जानेके लिये उद्यत जान कुम्भाण्डने हाथ जोड़कर उन मधुसूदनसे कहा—॥ ३३३ ॥ बाणस्य गावस्तिष्ठन्ति हस्ते तु वरुणस्य वै ॥ ३४ ॥ यासाममृतकल्पं वै क्षीरं क्षरति माधव । तत् पीत्वातिबलश्चैव नरो भवति दुर्जयः ॥ ३५ ॥ 'माधव ! बाणासुरकी गौएँ वरुणके हाथमें हैं। जिनके थनोंसे अमृतके समान गुणकारक दूध बहता रहता है। उस दूधको पीकर मनुष्य अत्यन्त बलशाली और दुर्जय हो जाता है' ॥ ३४-३५ ॥ कुम्भाण्डेनैवमाख्याते हरिः प्रीतमनास्तदा । गमनाय मतिं चक्रे गन्तव्यमिति निश्चयम् ॥ ३६ ॥ कुम्भाण्डके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीहरिको उस समय बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने जानेका विचार एवं दृढ़ निश्चय कर लिया ॥ ३६ ॥ ततस्तु भगवान् ब्रह्मा वर्धाप्य स तु केशवम् । जगाम ब्रह्मलोकं स वृतः संभवनालयैः ॥ ३७ ॥ तदनन्तर श्रीकृष्णको बधाई देकर ब्रह्मलोकवासियोंसे घिरे हुए, भगवान् ब्रह्मा ब्रह्मलोकको चले गये ॥ ३७ ॥ इन्द्रो मरुद्गणयुतो द्वारकाभिमुखो ययौ । ततः कृष्णस्ततः सर्वे गच्छन्ति जयकाङ्क्षिणः ॥ ३८ ॥ मरुद्गणोंके साथ इन्द्र द्वारकापुरीकी ओर चल दिये। जिस ओर श्रीकृष्ण जा रहे थे, उधर ही वे सब लोग उनकी विजय चाहते हुए यात्रा करने लगे ॥ ३८ ॥ वाहनेन मयूरेण सखीभिः परिवारिता । द्वारकाभिमुखी ह्यषा देव्या प्रस्थापिता ययौ ॥ ३९ ॥ साक्षात् पार्वती देवीने उषाको विदा किया। सखियोंसे घिरी हुई उषा मयूर जुते हुए रथसे द्वारकाकी ओर चली ॥ ततो बलश्च कृष्णश्च प्रद्युम्नश्च महाबलः ।
विष्णुपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७३९
आरूढवन्तो गरुडमनिरुद्धश्च वीर्यवान् ॥ ४० ॥
तत्पश्चात् बलभद्र, श्रीकृष्ण, महाबली प्रद्युम्न और पराक्रमी अनिरुद्ध—ये चारों गरुड़पर आरूढ़ हुए ॥ ४० ॥
प्रस्थितश्च स तेजस्वी गरुडः पततां वरः।
उन्मूलयंस्तरुगणान् कम्पयंश्चापि मेदिनीम् ॥ ४१ ॥
पक्षियोंमें श्रेष्ठ तेजस्वी गरुड़ वृक्षगणोंको उखाड़ते और पृथ्वीको कम्पित करते हुए वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ ४१ ॥
आकुलाश्च दिशः सर्वा रेणुध्वस्तमिवाम्बरम् ।
गरुडे सम्प्रयातेऽभून्मन्दरश्मिर्दिवाकरः ॥ ४२ ॥
गरुड़के प्रस्थान करनेपर सम्पूर्ण दिशाएँ व्याकुल हो गयीं, आकाश धूलसे आच्छन्न-सा हो गया और सूर्यदेवकी किरणें मन्द पड़ गयीं ॥ ४२ ॥
ततस्ते दीर्घमध्वानं प्रययुः पुरुषर्षभाः।
आरुह्य गरुडं सर्वे जित्वा बाणं महौजसम् ॥ ४३ ॥
तत्पश्चात् वे सभी पुरुषप्रवर वीर अपने विशाल मार्गपर बढ़ने लगे। वे सब महाबली बाणासुरको परास्त करके गरुड़पर आरूढ़ हो द्वारकाकी ओर जा रहे थे ॥ ४३ ॥
ततोऽम्बरतलस्थास्ते वारुणीं दिशमास्थिताः।
अपश्यन्त महात्मानो गावो दिव्यपयःप्रदाः।
वेलावनविचारिण्यो नानावर्णाः सहस्रशः ॥ ४४ ॥
आकाशमें पहुँचकर वे सब लोग पश्चिम दिशाकी ओर बढ़ने लगे। उस समय उन महात्माओंने अनेक प्रकारके रूप-रंगवाली सहस्रों दिव्य गौओंको देखा, जो दिव्य दुग्ध प्रदान करनेवाली थीं। वे सब-की-सब समुद्रतटवर्ती वनमें विचर रही थीं ॥ ४४ ॥
अवध्याय तदा रूपं कुम्भाण्डवचनाश्रयात् ।
कृष्णः प्रहरतां श्रेष्ठस्तत्त्वतोऽर्थविशारदः ॥ ४५ ॥
निशाम्य बाणगावस्तु तासु चक्रे मनस्तदा ।
आस्थितो गरुडं प्राह स तु लोकादिरव्ययः ॥ ४६ ॥
कुम्भाण्डके वचनोंका स्मरण करके तत्काल उन गौओंके स्वरूपको पहचानकर प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ तथा तात्त्विक अर्थनीतिमें विशारद भगवान् श्रीकृष्णने बाणासुरकी उन गौओंको देखा और मन-ही-मन उन्हें ले लेनेका विचार किया। फिर सम्पूर्ण जगत्के आदिकारण वे अविनाशी प्रभु गरुड़पर बैठे-बैठे ही बोले ॥ ४५-४६ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
वैनतेय प्रयाहि त्वं यत्र बाणस्य गोधनम् ।
यासां पीत्वा किल क्षीरममृतत्वमवाप्नुयात् ॥ ४७ ॥
श्रीकृष्णने कहा—विनतानन्दन ! जहाँ बाणासुरकी गौएँ हैं, वहीं चलो। कहते हैं, उन गौओंका दूध पीकर मनुष्य अमरत्वको प्राप्त कर लेता है ॥ ४७ ॥
आह मां सत्यभामा च बाणगावो ममानय ।
यासां पीत्वा किल क्षीरं न जीर्यन्ति महासुराः ॥ ४८ ॥
सत्यभामाने मुझसे कहा था 'कि मेरे लिये बाणासुरकी गौएँ ले आइयेगा, जिनका दूध पीकर वे महान् असुर कभी बूढ़े नहीं होते हैं ॥ ४८ ॥
विजराश्च जरां त्यक्त्वा भवन्ति किल जन्तवः।
ता आनयस्व भद्रं ते यदि धर्मो न लुप्यते ॥ ४९ ॥
अथवा कार्यलोपो वै मैव तासु मनः कृथाः।
इति मामब्रवीत् सत्या ताश्चैता विदिता मम ॥ ५० ॥
'तथा बूढ़े प्राणी भी वृद्धावस्थाको त्यागकर अजर हो जाते हैं। नाथ ! आपका कल्याण हो, यदि धर्मका लोप न होता हो तो उन गौओंको ले आइयेगा अथवा यदि कार्यमें बाधा पड़ती हो तो उन गौओंकी ओर ध्यान न दीजियेगा' इस प्रकार सत्यभामाने मुझसे कहा था। वे बाणासुरकी गौएँ ये ही हैं, इन्हें मैंने पहचान लिया ॥ ४९-५० ॥
गरुड उवाच
दृश्यन्ते गाव एतास्ता दृष्ट्वा मां वरुणालयम् ।
विशन्ति सहसा सर्वाः कार्यमत्र विधीयताम् ॥ ५१ ॥
गरुड़ बोले—प्रभो ! ये ही तो वे गौएँ दिखायी दे रही हैं, परंतु मुझे देखकर सहसा सब-की-सब समुद्रमें समायी जा रही हैं; अतः यहाँ जो कार्य करना उचित हो, वह कीजिये ॥ ५१ ॥
इत्युक्त्वा चैव गरुडः पक्षवातेन सागरम् ।
सहसा क्षोभयित्वा च विवेश वरुणालयम् ॥ ५२ ॥
ऐसा कहकर गरुड़ने अपने पंखोंकी हवासे सहसा समुद्रको विक्षुब्ध करते हुए वरुणके निवासस्थानमें प्रवेश किया ॥ ५२ ॥
दृष्ट्वा जवेन गरुडं प्राप्तं वै वरुणालयम् ।
वारुणाश्च गणाः सर्वे विभ्रान्ताः प्राचलंस्तदा ॥ ५३ ॥
गरुड़को वेगपूर्वक वरुणालयमें आया हुआ देख वरुणके समस्त सैनिकगण तत्काल विभ्रान्त एवं विचलित हो उठे ॥ ५३ ॥
ततस्तु वारुणं सैन्यमभियातं सुदुर्जयम् ।
प्रमुखे वासुदेवस्य नानाप्रहरणोद्यतम् ।
तद् युद्धमभवद् घोरं वारुणैः पन्नगारिणा ॥ ५४ ॥
तत्पश्चात् वरुणकी अत्यन्त दुर्जय सेना नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो भगवान् श्रीकृष्णके सामने चढ़ आयी। उस समय वरुणके उन सैनिकोंके साथ गरुड़का बड़ा भयंकर युद्ध हुआ ॥ ५४ ॥
तेषामपततां संख्ये वारुणानां सहस्रशः।
भग्नं बलमनाधृष्यं केशवेन महात्मना ॥ ५५ ॥
| ७४० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
युद्धमें आक्रमण करनेवाले उन सहस्रों वरुणसैनिकोंकी उस अजेय सेनाको महात्मा केशवने मार भगाया ॥ ५५ ॥
ततस्ते प्रद्रुता यान्ति तमेव वरुणालयम् ।
षष्टिं रथसहस्राणि षष्टिं रथशतानि च ॥ ५६ ॥
वारुणानि च युद्धानि दीप्तशस्त्राणि संयुगे ।
तब वे भागे हुए सैनिक उस वरुणालयमें ही जा घुसे, इसके बाद वरुणके छाछठ हजार रथी सैनिक चमकीले अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो रणक्षेत्रमें आकर युद्ध करने लगे ॥
तद् बलं बलिभिः शूरैर्बलदेवजनार्दनैः ॥ ५७ ॥
प्रद्युम्नेनानिरुद्धेन गरुडेन च सर्वशः ।
शरौघैर्विविधैस्तीक्ष्णैर्वध्यमानं समन्ततः ॥ ५८ ॥
बलदेव, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और गरुड़—इन सभी बलवान् शूरवीरोंने नाना प्रकारके तीखे बाणसमूहोंद्वारा वरुणकी उस रथसेनाको सब ओरसे मार भगाया ॥ ५७-५८ ॥
ततो भग्नं बलं दृष्ट्वा कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ।
वरुणस्त्वथ संक्रुद्धो निर्ययौ यत्र केशवः ॥ ५९ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णके द्वारा अपनी सेनाको भगायी गयी देख वरुण देवता अत्यन्त कुपित हो उठे और घरसे निकलकर उस स्थानपर आये जहाँ श्रीकृष्ण विराजमान थे ॥ ५९ ॥
ऋषिभिर्देवगन्धर्वैस्तथैवाप्सरसां गणैः ।
संस्तूयमानो बहुधा वरुणः प्रत्यदृश्यत ॥ ६० ॥
उस समय बहुत-से ऋषि, देवता, गन्धर्व तथा अप्सराओं-के समुदाय अनेक प्रकारसे उनकी स्तुति कर रहे थे। इस रूपमें वरुणदेवका वहाँ दर्शन हुआ ॥ ६० ॥
छत्रेण ध्रियमाणेन पाण्डुरेण वपुष्मता ।
सलिलस्राविणा श्रेष्ठं चापमुद्यम्य धिष्ठितः ॥ ६१ ॥
उनके मस्तकपर सुन्दर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे जलकी बूँदें झर रही थीं। वे एक श्रेष्ठ धनुष हाथमें लेकर खड़े थे ॥ ६१ ॥
अपां पतिरतिक्रुद्धः पुत्रपौत्रबलान्वितः ।
आह्वयन्निव युद्धाय विस्फारितमहाधनुः ॥ ६२ ॥
जलके स्वामी वरुण अत्यन्त क्रोधमें भरकर अपने पुत्रों-पौत्रों तथा सैनिकोंके साथ आकर अपने विशाल धनुषको फैलाये हुए इस तरह खड़े थे, मानो युद्धके लिये ललकार रहे हों ॥ ६२ ॥
स तु प्राध्मापयच्छङ्खं वरुणः समधावत ।
हरिं हर इव क्रुद्धो बाणजालैः समावृणोत् ॥ ६३ ॥
वरुणने पहले तो शङ्ख बजाया, फिर क्रोधमें भरकर श्रीकृष्णपर उसी तरह धावा किया, जैसे रुद्रदेवने भगवान् विष्णुपर आक्रमण किया हो। उन्होंने कुपित हो अपने बाणोंके जालसे श्रीकृष्णको ढक दिया ॥ ६३ ॥
ततः प्रध्माय जलजं पाञ्चजन्यं जनार्दनः ।
बाणजालैर्दिशः सर्वास्ततश्चक्रे महाबलः ॥ ६४ ॥
तब महाबली जनार्दनने पाञ्चजन्य शङ्ख बजाकर अपने बाणसमूहोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया ॥ ६४ ॥
ततः शरौघैर्विमलैर्वरुणः पीडितो रणे ।
स्मयन्निव ततः कृष्णं वरुणः प्रत्ययुध्यत ॥ ६५ ॥
रणभूमिमें उन निर्मल बाणसमूहोंसे पीड़ित होनेपर भी मुसकराते हुए-से वरुण श्रीकृष्णके साथ युद्ध करने लगे ॥
ततोऽस्त्रं वैष्णवं घोरमभिमन्त्र्याहवे स्थितः ।
वासुदेवोऽब्रवीद् वाक्यं प्रमुखे तस्य धीमतः ॥ ६६ ॥
तब घोर वैष्णवास्त्रको अभिमन्त्रित करके युद्धस्थलमें बुद्धिमान् वरुणके सामने खड़े हुए भगवान् वासुदेव उनसे इस प्रकार बोले-॥ ६६ ॥
इदमस्त्रं महाघोरं वैष्णवं शत्रुसूदनम् ।
मयोद्यतं वधार्थं ते तिष्ठेदानीं स्थिरो भव ॥ ६७ ॥
'वरुणदेव ! मैंने तुम्हारे वधके लिये शत्रुओंका संहार करनेवाले इस महाघोर वैष्णवास्त्रको उठा रखा है, अब तुम स्थिरतापूर्वक खड़े रहो' ॥ ६७ ॥
ततोऽस्त्रं वरुणो देवो ह्यस्त्रं वैष्णवमुद्यतः ।
वारुणास्त्रेण संयोज्य विननाद महाबलः ॥ ६८ ॥
यह सुनकर महाबली वरुणदेव वैष्णवास्त्रका सामना करनेके लिये उद्यत हो उसे वारुणास्त्रसे संयुक्त करके जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ६८ ॥
तस्यास्त्रे वितता ह्यापो वरुणस्य विनिःस्रुताः ।
वैष्णवास्त्रस्य शमने वर्तते समितिंजयः ॥ ६९ ॥
वरुणके अस्त्रमें राशि-राशि जल व्याप्त था, जो तत्काल प्रकट होने लगा। युद्धविजयी वरुण उसीसे वैष्णवास्त्रको बुझा देनेके लिये उद्यत थे ॥ ६९ ॥
आपस्तु वारुणास्तत्र क्षिप्ताः क्षिप्ता ज्वलन्ति वै ।
दह्यन्ते वारुणास्तत्र ततोऽस्त्रे ज्वलिते पुनः ॥ ७० ॥
वैष्णवे तु महावीर्ये दिशो भीता विदुद्रुवुः ।
परंतु वारुणास्त्रके द्वारा फेंकी गयी जलधाराएँ जब-जब वैष्णवास्त्रपर पड़ती थीं, तब तब अग्निके समान प्रज्वलित हो उठती थीं और उनके द्वारा वहाँ वरुणके सैनिक ही दग्ध होने लगते थे। इस प्रकार महान् शक्तिशाली वैष्णवास्त्रके प्रज्वलित होनेपर वरुणके सैनिक पुनः भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगे ॥ ७० १/२ ॥
| [ विष्णुपर्व ] | सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः | ७४१ |
|---|
तद् बलं ज्वलितं दृष्ट्वा वरुणः कृष्णमब्रवीत् ॥ ७१ ॥
स्मर स्वप्रकृतिं पूर्वामव्यक्तां व्यक्तलक्षणाम् ।
तमो जहि महाभाग तमसा मुह्यसे कथम् ॥ ७२ ॥
अपनी उस सेनाको जलती हुई देख वरुणने श्रीकृष्णसे कहा—'महाभाग ! आप अपनी उस पूर्व प्रकृतिका स्मरण कीजिये, जो व्यक्ताव्यक्त स्वरूप है। तमोगुणका नाश कीजिये, आप स्वयं तमोगुणसे क्यों मोहित हो रहे हैं ? ॥ ७१-७२ ॥
सत्त्वस्थो नित्यमासीस्त्वं योगीश्वर महामते ।
पञ्चभूताश्रयान् दोषानहंकारं च वर्जय ॥ ७३ ॥
'योगीश्वर ! महामते ! आप सदा ही सत्त्वगुणमें स्थित रहे हैं, अतः पञ्चभूतोंके आश्रित रहनेवाले अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—इन पाँच दोषों तथा अहंकारको त्याग दीजिये ॥ ७३ ॥
या या ते वैष्णवी मूर्तिस्तस्या ज्येष्ठो ह्यहं तव ।
ज्येष्ठभावेन मान्यो तु किंमां त्वं दग्धुमिच्छसि ॥ ७४ ॥
'आपकी जो-जो वैष्णवी मूर्ति है, उससे मैं ज्येष्ठ हूँ।* ज्येष्ठ होनेके नाते आपके आदरका पात्र हूँ, तो भी आप क्यों मुझे दग्ध करना चाहते हैं ? ॥ ७४ ॥
नाग्निर्विक्रमते ह्यग्नौ त्यज कोपं युधां वर ।
त्वयि न प्रभविष्यामि जगतः प्रभवो ह्यसि ॥ ७५ ॥
'योद्धाओंमे श्रेष्ठ श्रीकृष्ण ! आग आगपर अपना पराक्रम प्रकट नहीं करती है, अतः क्रोधको त्याग दीजिये। आपपर मेरी प्रभुता नहीं चल सकेगी, क्योंकि आप जगत्के आदि कारण हैं ॥ ७५ ॥
पूर्वं हि या त्वया सृष्टा प्रकृतिर्विकृतात्मिका ।
धर्मिणी वीजभावेन पूर्वं धर्मे समाश्रिता ॥ ७६ ॥
'पूर्वकालमें आपने जिस प्रकृति (माया) की सृष्टि की थी, वह महत्तत्त्व आदि विकारोंके रूपमें परिणत होनेवाली है, इसलिये परिणामधर्मिणी है। वह आपसे पूर्वधर्म (जन्म-भाव)† का आश्रय लेकर अर्थात् आपसे ही उत्पन्न होकर जगत्के कारणरूपसे विद्यमान है ॥ ७६ ॥
* भगवान् विष्णुके जितने अवतार हैं, उन सबमें मत्स्यावतार प्रथम माना गया है। यह अवतार जलमें हुआ था और जलके अधिष्ठाता वरुणदेव इसके पहलेसे विद्यमान थे, अतः ये सभी अवतारोंसे ज्येष्ठ सिद्ध होते हैं। वामन-अवतारके समय भगवान् इन्द्र-वरुण आदि देवताओंके छोटे भाई बने, इसलिये भी वरुणकी ज्येष्ठता सिद्ध होती है।
† जन्म, सत्ता, परिणाम, वृद्धि, क्षय और नाश—ये छः भावविकार प्राकृत शरीरके धर्म हैं । इनमें पहला भाव या धर्म 'जन्म' है, इसलिये यहाँ 'पूर्वधर्म' का अर्थ 'जन्म' किया गया है। नीलकण्ठने ऐसा ही माना है।
आग्नेयं वैष्णवं सौम्यं प्रकृत्यैवेदमार्दितः ।
त्वया सृष्टं जगदिदं स कथं मयि वर्तसे ॥ ७७ ॥
'उक्त प्रकृतिके द्वारा आपने ही पहले इस आग्नेय, वैष्णव एवं सौम्य अस्त्रकी सृष्टि की है और आपसे ही इस सम्पूर्ण जगत्की रचना हुई है, वे जगत्स्रष्टा परमात्मा होकर आप मेरे प्रति कैसा बर्ताव करते हैं ॥ ७७ ॥
अजेयः शाश्वतो देवः स्वयम्भूभूतभावनः ।
अक्षरं च क्षरं चैव भावाभावौ महाद्युते ॥ ७८ ॥
'महाद्युते ! आप अजेय, सनातन देवता, स्वयम्भू और भूतभावन हैं, अक्षर और क्षर तथा भाव और अभाव आप-हीके स्वरूप हैं ॥ ७८ ॥
रक्ष मां रक्षणीयोऽहं त्वयानघ नमोऽस्तु ते ।
आदिकर्तासि लोकानां त्वयैतद् बहुलीकृतम् ॥ ७९ ॥
'निष्पाप श्रीकृष्ण ! आप मेरी रक्षा कीजिये ! मैं आपके द्वारा संरक्षण पानेके योग्य हूँ, आपको नमस्कार है। आप समस्त लोकोंके आदिकर्ता हैं। आपने ही इस दृश्य जगत्का विस्तार किया है ॥ ७९ ॥
विक्रीडसि महादेव बालः क्रीडनकैरिव ।
न ह्यहं प्रकृतिद्वेषी नाहं प्रकृतिदूषकः ॥ ८० ॥
'महादेव ! जैसे बालक खिलौनोंसे खेलता है, उसी प्रकार आप इस जगत्के द्वारा क्रीड़ा करते हैं, आप ही इस जगत्की प्रकृति अर्थात् कारण हैं, न तो मैं आपसे द्वेष रखता हूँ और न आपपर दोषारोपण ही करता हूँ ॥ ८० ॥
प्रकृत्या विकारेषु वर्तते पुरुषर्षभ ।
तस्या विकारशमने वर्तसे त्वं महाद्युते ॥ ८१ ॥
'महातेजस्वी पुरुषोत्तम ! अहङ्कार आदि विकारोंमें जो प्रकृति (लोभ, द्वेषादि रूप पूर्ववासना) है, उसके विकारों (चोरी, हिंसा आदि दोषों) की शान्तिके लिये आप दुष्टोंका दमन आदि कार्य करते हैं ॥ ८१ ॥
विकारो वा विकाराणां विकाराय न तेऽनघ ।
तानधर्मविदो मन्दान् भवान् विकुरुते सदा ॥ ८२ ॥
'अनघ ! अथवा वे क्रोध आदि विकार विकारों (दुष्टों) के विकार (विनाश) के लिये ही होते हैं, आपको विकृत करनेके लिये नहीं। आप सदा उन अधर्मवेत्ता मूढ पुरुषोंका ही विनाश किया करते हैं (सत्पुरुषोंका नहीं) ॥ ८२ ॥
इदं प्रकृतिजैर्दोषैस्तमसा मुह्यते यदा ।
रजसा वापि संस्पृष्टं तदा मोहः प्रवर्तते ॥ ८३ ॥
'यह जगत् जब प्राकृत दोषों, तथा तमोगुणसे ग्रस्त होकर अपना विवेक खो बैठता है अथवा रजोगुणसे संयुक्त होकर संग्रह-परिग्रहमें व्यग्र हो जाता है, तब उसपर मोह छा जाता है ॥ ८३ ॥
| ७४२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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परावरज्ञः सर्वज्ञ ऐश्वर्यविधिमाश्रितः।
किं मोहयसि नः सर्वान् प्रजापतिरिव स्वयं ॥ ८४॥
'आप स्वयं प्रजापतिके समान कार्य और कारणके ज्ञाता, सर्वज्ञ तथा ऐश्वर्यविधिको आश्रय लेकर स्थित हैं, फिर भी हम सब लोगोंको मोहमें क्यों डाल रहे हैं?'॥ ८४॥
वरुणेनैवमुक्तस्तु कृष्णो लोकपरायणः।
भावज्ञः सर्वकृद् धीरस्ततः प्रीतमना ह्यभूत् ॥ ८५॥
इत्येवमुक्तः कृष्णस्तु प्रहसन् वाक्यमब्रवीत् ।
वरुणदेवके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण जगत्के आश्रय, हार्दिक भावके ज्ञाता, सर्वस्रष्टा एवं धीर स्वभाववाले भगवान् श्रीकृष्ण मन-ही-मन उनपर बहुत प्रसन्न हुए, उनकी पूर्वोक्त बात सुनकर वे हँसते हुए उनसे इस प्रकार बोले ॥ ८५ ½ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
गावः प्रयच्छ मे वीर शान्त्यर्थं भीमविक्रम ॥ ८६॥
इत्येवमुक्ते कृष्णेन वाक्यं वाक्यविशारदः।
वरुणो ह्यब्रवीद् भूयः शृणु मे मधुसूदन ॥ ८७॥
श्रीकृष्णने कहा—भयानक पराक्रमी वीर ! तुम इस विवादकी शान्तिके लिये ये गौएँ मुझे दे दो। श्रीकृष्णके ऐसी बात कहनेपर बातचीत करनेमें कुशल वरुणदेव पुनः इस प्रकार बोले—'मधुसूदन ! पहले मेरी बात सुन लीजिये' ॥
वरुण उवाच
बाणेन सार्धं समयो मया देव कृतः पुरा।
कथं च समयं कृत्वा कुर्यां विफलमन्यथा ॥ ८८॥
वरुणने कहा—देव ! मैंने पूर्वकालमें बाणासुरके साथ एक प्रतिज्ञा की है, वह प्रतिज्ञा करके उसके विपरीत आचरण-द्वारा मैं उसे निष्फल कैसे कर सकता हूँ ॥ ८८ ॥
त्वमेव वेद सर्वस्य यथा समयभेदकः।
चारित्रं दुष्यते तेन न च सद्भिः प्रशस्यते ॥ ८९॥
प्रतिज्ञा तोड़नेवाला कैसा होता है, इन सब बातोंको आप ही सबसे अधिक जानते हैं। प्रतिज्ञा तोड़नेसे चरित्र कलङ्कित होता है और साधु पुरुष उसकी प्रशंसा नहीं करते ॥ ८९ ॥
धर्मभागिभिर्नरो नित्यं वर्ज्यते मधुसूदन।
न च लोकानवाप्नोति पापः समयभेदकः ॥ ९०॥
मधुसूदन ! धर्मात्मा पुरुष प्रतिज्ञा भङ्ग करनेवाले मनुष्यको सदाके लिये त्याग देते हैं, वह पापी उत्तम लोकोंको नहीं पाता ॥ ९० ॥
प्रसीद धर्मलोपश्च मा भून्मे मधुसूदन।
न मां समयभेदेन योक्तुमर्हसि माधव ॥ ९१॥
मधुसूदन ! प्रसन्न होइये ! मेरे धर्मका लोप न हो। माधव ! मुझे प्रतिज्ञा-भङ्गके पापसे संयुक्त न कीजिये ॥ ९१॥
जीवन्नाहं प्रदास्यामि गावो वै वृषभेक्षण।
हत्वा नयस्व मां गाव एष मे समयः पुरा ॥ ९२॥
वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले गोविन्द ! मैं जीते-जी इन गौओंको नहीं दूँगा। आप मेरा वध करके इन्हें ले जाइये। पूर्वकालमें मैंने यही प्रतिज्ञा की है ॥ ९२ ॥
एतच्च मे समाख्यातं समयं मधुसूदन।
सत्यमेव महाबाहो न मिथ्या तु सुरेश्वर ॥ ९३॥
'मधुसूदन ! महाबाहो ! यह मैंने अपनी प्रतिज्ञा कह सुनायी। सुरेश्वर ! यह सर्वथा सत्य ही है, मिथ्या नहीं है ॥
यद्येवाहमनुग्राह्यो रक्ष मां मधुसूदन।
अथवा गोषु निर्बन्धो हत्वा नय महाभुज ॥ ९४॥
महाबाहु मधुसूदन ! यदि मैं आपके अनुग्रहका पात्र हूँ, तो आप मेरी रक्षा कीजिये अथवा गौओंके लिये ही आग्रह हो, तो मुझे मारकर इन्हें ले जाइये ॥ ९४॥
वैशम्पायन उवाच
वरुणेनैवमुक्तस्तु यदूनां वंशवर्धनः।
अभेद्यं समयं मत्वा न्यस्तवादो गवां प्रति ॥ ९५॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वरुणदेवके ऐसा कहनेपर यदुवंशकी वृद्धि करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने उनकी प्रतिज्ञाको अभेद्य मानकर गौओंके लिये विवाद त्याग दिया ॥ ९५ ॥
स प्रहस्य ततो वाक्यं व्याजहारार्थकोविदः।
तस्मान्मुक्तोऽसि यद्येवं बाणेन समयः कृतः ॥ ९६॥
व्यवहारकुशल श्रीकृष्ण उस समय हँसकर बोले—'यदि आपने बाणासुरके साथ ऐसी प्रतिज्ञा कर ली है तो अब आप इस कलहसे मुक्त हैं' ॥ ९६ ॥
प्रश्रितैर्मधुरैर्वाक्यैस्तत्त्वार्थमधुभाषितैः।
कथं पापं करिष्यामि वरुण त्वय्यहं प्रभो ॥ ९७॥
फिर वे विनययुक्त मधुर वचनों तथा तात्त्विक अर्थसे युक्त मीठी बातोंद्वारा उन्हें प्रसन्न करते हुए बोले—'प्रभो ! वरुणदेव ! मैं आपके प्रति दुर्व्यवहार कैसे करूँगा ॥ ९७॥
गच्छ मुक्तोऽसि वरुण सत्यसंधोऽसि नो भवान्।
त्वत्प्रियार्थं मया मुक्ता बाणगावो न संशयः ॥ ९८॥
'वरुणदेव ! जाइये, अब आप मुक्त हैं। सत्यप्रतिज्ञ होनेके साथ ही हमारे सम्बन्धी हैं, आपका प्रिय करनेके लिये मैंने बाणासुरकी गौओंको छोड़ दिया, इसमें संशय नहीं है ॥ ९८॥
ततस्तूर्यनिनादैश्च भेरीणां च महास्वनैः।
अर्घ्यमादाय वरुणः केशवं प्रत्यपूजयत् ।