भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 841
८१८श्रीमद्भारते खिलभागे-[ हरिवंशे

अपने ऊँचे शिखरोंसे बिजलियोंसहित मेघोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ ३ ॥
पक्षवातोद्धतो रेणुश्चूर्णैः साञ्जनवालुकैः ।
छादयन् पर्वताग्राणि महामेघ इवावभौ ॥ ४ ॥
पंखोंकी हवासे ऊपरको उठी हुई धूल अंजन (कोयले) और बालुकासहित चूर्णोंके साथ पर्वतोंके शिखरोंको ढकती हुई महान् मेघोंकी घटाके समान जान पड़ती थी ॥ ४ ॥
मेघसंश्लिष्टशिखराः पक्षविक्षिप्तपादपाः ।
काञ्चनोद्भेदबहुलाः खे तिष्ठन्तीव पर्वताः ॥ ५ ॥
उनके शिखर मेघोंसे आलिङ्गित हो रहे थे। वे अपने पंखोंकी वायुसे वृक्षोंको बिखेर रहे थे और उनमें सोनेकी बहुत-सी खानें प्रकट हुई थीं। इस प्रकार वे पर्वत आकाशमें खड़े हुए-से प्रतीत होते थे ॥ ५ ॥
पक्षवन्तः सशिखरा हेमधातुभिरञ्जिताः ।
पवनेन समुद्धूतास्त्रासयन्ति विहङ्गमान् ॥ ६ ॥
पंखों और शिखरोंसे सुशोभित, सुवर्णमय धातुओंसे अभिरञ्जित और वायुके वेगसे प्रताड़ित हुए वे पर्वत आकाश-चारी पक्षियोंको भी भयभीत कर देते थे ॥ ६ ॥
काञ्चनाः पर्वताः सर्वे स्फाटिकैर्मणिभिश्चिताः ।
सूर्यकान्तैश्च बहुभिश्चन्द्रकान्तैश्च निर्मलाः ॥ ७ ॥
वहाँ सभी पर्वत सुवर्णमय थे। सबपर स्फटिकमणियोंकी राशि संचित थी और वे सभी बहुसंख्यक सूर्यकान्त तथा चन्द्रकान्त मणियोंके कारण निर्मल प्रभासे उद्भासित हो रहे थे ॥ ७ ॥
हिमवांश्च महाशैलः श्वेतैर्धातुभिराचितः ।
काञ्चनैः शिखराग्रैश्च सूर्यपादप्रकाशितैः ॥ ८ ॥
मणिभिश्च प्रकाशाद्भिः पक्षान्तरविनिःसृतैः ।
ताम्रपुष्पैश्च शिखरैर्दीप्यमानैः स्वतेजसा ॥ ९ ॥
महापर्वत हिमवान् श्वेत धातुओंसे व्याप्त था । उसके शिखरोंके अग्रभाग सूर्यकी किरणोंमे प्रकाशित हो सुवर्णमय दिखायी देते थे । उसके पंखोंके भीतरसे प्रकट हुई प्रकाश-मान मणियाँ उसके शिखरोंको प्रकाशित कर रही थीं। लाल रंगके फूलोंसे सुशोभित तथा अपने तेजसे देदीप्यमान शिखर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ८-९ ॥
मन्दरश्चोग्रशिखरः स्फाटिकैर्मणिभिश्चिताः ।
वज्रगर्भो निरालम्बैः स्वर्गोपम इवावभौ ॥ १० ॥
भयंकर शिखरोंवाला मन्दराचल स्फटिक मणियोंकी राशिसे सम्पन्न था । उसके भीतर वज्रमणि (हीरा) छिपी हुई थी। वह अपने निरवलम्ब शिखरोंसे स्वर्गके समान सुशोभित होता था ॥ १० ॥
सहस्रशृङ्गः कैलासः शिलाधातुविभूषितः ।
तोरणैश्चैव निबिडैः प्रांशुभिश्चैव पादपैः ॥ ११ ॥
शिलाओं और धातुओंसे विभूषित सहस्र शिखरोंवाला कैलासपर्वत फाटकोंके समान ऊँचे और घने वृक्षोंसे सुशोभित हो रहा था ॥ ११ ॥
प्रवादयद्भिर्गन्धर्वैः किन्नरैश्च प्रगायिभिः ।
देवकन्याङ्गरागैश्च प्रक्रीडाद्रिरिवावभौ ॥ १२ ॥
भाँति-भाँतिके बाजे बजानेवाले गन्धर्वों, मधुर गीत गानेवाले किन्नरों तथा देवकन्याओंके अङ्गरागोंसे शोभा पानेवाला कैलास क्रीडापर्वतके समान प्रतीत होता था ॥ १२॥
मधुरैर्वाद्यगीतैश्च नृत्यैश्चाभिनयोद्गतैः ।
शृङ्गारैः साङ्गहारैश्च कैलासो मदनायते ॥ १३ ॥
मधुर वाद्ययुक्त गीतों, अभिनयपूर्ण नृत्यों, शृङ्गारमयी क्रीड़ाओं तथा नृत्यकालमें किये गये अङ्गविक्षेपों (चटकने-मटकने आदि) से कैलासपर्वत मूर्तिमान् कामदेवके समान रसका उद्दीपक हो रहा था ॥ १३ ॥
आदित्याभासिभिः शृङ्गैर्भिन्नाञ्जनचयोपमैः ।
विन्ध्यो नीलाम्बुदश्यामो विभिन्न इव तोयदः ॥ १४ ॥
कटे हुए कोयलोंकी राशिके समान काले और सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशित शिखरोंसे युक्त विन्ध्यपर्वत नील मेघके समान श्याम कान्ति धारण किये खण्डित हुए मेघके समान प्रतीत होता था ॥ १४ ॥
धात्वर्थे सर्वभूतानां मेरुपुष्टे महाबले ।
निर्वैमुर्विमलं तोयं मेघजालैरिवोत्तमैः ॥ १५ ॥
समस्त प्राणियोंके जीवन-धारणके लिये उन सभी पर्वतों-ने महान् शक्तिशाली मेरुप्रष्ठपर उत्तम मेघसमूहोंके समान निर्मल जलकी वर्षा की ॥ १५ ॥
शिलाभिर्बहुचित्राभिर्धातुभिर्बहुरूपिभिः ।
प्रस्रवद्भिर्गुहाद्वारैः सलिलं स्फटिकप्रभम् ॥ १६ ॥
बहुत-सी विचित्र शिलाओं, अनेक रूपवाली धातुओं तथा स्फटिकके समान निर्मल जलका स्रोत बहानेवाले गुफा-द्वारोंसे उस पर्वतकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १६ ॥
ग्रीष्मान्ते वायुसंगूढा घना इव सविद्युतः ।
चित्रैः पुष्पैस्तरुगणाः शोभन्त इव भूषिताः ॥ १७ ॥
नागाः कनकसंभूतैर्विचित्रैरिव भूषिताः ।
विचित्र पुष्पोंसे विभूषित हुए वृक्षगण वर्षा ऋतुमें वायुसे आच्छादित हुए बिजलीसहित मेघोंके समान शोभा पाते थे अथवा सोनेके विचित्र अलंकारोंसे अलंकृत हुए हाथियोंके समान सुशोभित होते थे ॥ १७ ॥
विहंगमाभिलीनाश्च लतास्तरुसमाश्रिताः ॥ १८ ॥
विलम्बन्त्यः सपुष्पाश्च नृत्यन्ते वायुघट्टिताः ।