भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 842

भविष्यपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः ८१९


जिनमें पक्षी छिपे हुए थे, वे वृक्षोंके सहारे फैली और लटकी हुई पुष्पित लताएँ वायुके झोंके खाकर नृत्य सा कर रही थीं ॥ १८ ॥

पवनेन समुद्धूता महता माधवेऽहनि ॥ १९॥
मुमुचुः पुष्पसंघातं तोयं वेलेव वर्षति।
वैशाखके दिनोंमें महान् वायुसे कम्पित हुई वे लताएँ उसी प्रकार पुष्प-समूहोंकी वर्षा कर रही थीं, जैसे लहरोंसे टकरायी हुई समुद्रकी तटभूमि जलकी बूँदें बिखेरती है ॥

फलवद्भिश्च विपुलैः शाखास्कन्धावरोहिभिः।
पादपैर्र्वर्णबहुलेर्ध्रियेत च वसुंधरा ॥ २०॥
जिसमें बहुत-सी शाखाएँ, तने और वरोहें (जटाएँ) शोभा पाती हैं, ऐसे अनेक रंगवाले विशाल एवं फले हुए वृक्ष मानो वसुधाको सहारा दे रहे थे ॥ २० ॥

मधुप्रिया मधुकरा मधुमत्ता विहंगमाः।
घोषयन्तीवं गायन्तः कामस्यागमसम्भवम् ॥ २१॥
जिन्हें मकरन्द प्रिय है, वे मधुमत्त मधुकर (भ्रमर) और कोकिल आदि पक्षी कलगान करते हुए कामदेवके आगमनकी घोषणा-सी कर रहे थे ॥ २१ ॥

विष्णुर्मधोर्निहन्ता च चकार मधुवाहिनीम्।
नदीं प्रस्रवनिर्भेदां सुतीर्थां बहुलोदकाम् ॥ २२॥
अंगारवर्णसिकतां मधुतीर्थां मनोरमाम्।
विमलैरम्बुभिः पूर्णां पुष्पसंचयवाहिनीम् ॥ २३ ॥
मधु दैत्यका नाश करनेवाले भगवान् विष्णुने वहाँ मधुवाहिनी नामक नदी प्रकट की, जिसका स्रोत फूटकर बह रहा था। वह उत्तम तीर्थवाली नदी प्रचुर जलसे भरी हुई थी। उसकी वालुका अङ्गारके समान वर्णवाली थी। वह मधुतीर्थस्वरूपा नदी मनको मोहे लेती थी। उसमें निर्मल जल भरा हुआ था और वह ढेर-के ढेर फूलोंको बहाये लिये जाती थी ॥ २२-२३ ॥

विवेश पुष्करं सा तु ब्रह्मणो वाक्यनोदिता।
ऋषिभिश्चानुचरिता ब्रह्मतन्त्रनिषेविभिः ॥ २४ ॥
ब्रह्माजीके वाक्यसे प्रेरित हो उसने पुष्करमें प्रवेश किया। ब्रह्मतन्त्रसेवी ऋषि भी उसके पीछे-पीछे गये ॥ २४ ॥

धात्री कपिलरूपेण गोर्भूत्वा क्षरते पयः।
मधुरं वितते यज्ञे ब्रह्मणाऽवाप्यचोदिता ॥ २५ ॥
तदनन्तर विशाल यज्ञ चालू होनेपर ब्रह्माजीके कहनेसे पृथ्वी गायका रूप धारण करके वहाँ मधुर दूधकी धारा बहाने लगी ॥ २५ ॥

सरश्च पृथिवीभूतं संधातुं प्राप्तवन्महीम्।
शुद्धं च भजते लोकं शाश्वतं परमाद्भुतम् ॥ २६ ॥
उस दूधसे जो सरोवर परिपूर्ण हुआ, वह पृथिवीस्वरूप है। वही प्राणिसमुदायको धारण करनेके लिये भूतलपर आकर प्रतिष्ठित हुआ। वह अपने परम अद्भुत शुद्ध शाश्वतस्वरूपको भी धारण करता है ॥ २६ ॥

सरस्वत्याः समुद्भूतं ब्रह्मक्षेत्रे तमोनुदम्।
मरुतीर्थमतिक्रम्य पुष्करेषु विसर्पति ॥ २७ ॥
सरस्वतीसे प्रकट हुआ वह दुःख एवं अन्धकारका नाश करनेवाला पुण्यतीर्थ मरुतीर्थको लाँघकर ब्रह्माजीके क्षेत्रभूत पुष्करतीर्थमें फैला हुआ है ॥ २७ ॥

सुचारुरूपा धर्मज्ञा अजा रूपेण छादयन्।
रूपं कनकवर्णाभं तपोयुक्तेन चेतसा ॥ २८ ॥
परम मनोहर रूपवाली धर्मज्ञा अजन्मा सरस्वती माया-रूपसे उस तीर्थके सुवर्णोपम दिव्य रूपको ढके रहती है। आलोचनायुक्त चित्तसे ही उसके यथार्थस्वरूप चिन्मय ब्रह्म-का साक्षात्कार होता है ॥ २८ ॥

अजगन्धकृतोन्मुक्तः सम्भूतः पर्वतो महान्।
गुरुद्वारगुणप्राणः शाश्वतः सिद्धसेवितः ॥ २९ ॥
वहाँ एक महान् पर्वत प्रकट हुआ, जो स्वाभाविक सुगन्धसे युक्त एवं उन्मुक्त है। उसका द्वार बहुत विशाल है तथा गुण ही उसके प्राण हैं। (अथवा गुरु ही उस अहंकाररूपी पर्वतपर चढ़नेके लिये द्वार है। गुरुके उपदेशसे ही उसके तत्त्वका ज्ञान होता है। तीनों गुण ही उसके जीवन हैं।) वह अनादि होनेके कारण सनातन कहा गया है। सिद्ध पुरुष भी उसका सेवन करते हैं। फिर मूढ़ोंकी तो बात ही क्या है ॥ २९ ॥

वेदिकाभिः सुचित्राभिः काञ्चनाभिर्विराजितः।
पुष्कराणि परीतानि त्वष्ट्रा विपुलदक्षिण ॥ ३० ॥
प्रचुर दक्षिणा देनेवाले जनमेजय ! सुवर्णमयी विचित्र वेदिकाओंसे वह पर्वत सुशोभित होता है। पुष्करतीर्थ-विचित्र जगत्का निर्माण करनेवाले शिल्पी ब्रह्माजी (अथवा परमेश्वर) से व्याप्त है ॥ ३० ॥

महामेरोर्यथा रूपं पञ्चभिर्धातुभिर्वृतः।
चेतना याभिसम्पन्नो रूपेणाद्भुतदर्शनः ॥ ३१ ॥
जैसे महामेरुगिरिका स्वरूप पाँच धातुओंसे युक्त होता है, उसी प्रकार वह पर्वत पाँच धातुओं (भूतों) से घिरा हुआ है। रूपसे वह अद्भुत दिखायी देता है तथा जो सुप्रसिद्ध चेतना है उससे वह सम्पन्न जान पड़ता है ॥ ३१ ॥

करिष्याम्यहमप्येतन्मनसा धर्मचारिणम्।
रूपं बहुविधं लोके पार्थिवीं चेतनां तथा ॥ ३२ ॥
(अब अपनेको परमात्मासे अभिन्न मानकर