भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 843

८२० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

'मैं ही सब कुछ करता हूँ' इस भावसे तत्त्वका निरूपण कर रहे हैं।) मैं ही धर्माचरण करनेवाले इस शरीरका मानसिक संकल्पसे निर्माण करता हूँ। लोकमें जो नाना प्रकारका रूप दिखायी देता है, उसकी भी मैं ही अपने मनसे सृष्टि करता हूँ। इस पार्थिव शरीरमें जो चेतना है, उसको भी मैं ही अभिव्यक्त करता हूँ ॥ ३२ ॥

त्रींश्च लोकान् प्रपद्येयं पञ्चभिर्धातुलक्षणैः । षष्ठेन च ससर्जैयं मनसा धर्मचारिणीम् ॥ ३३ ॥

मैं पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंसे तीनों लोकोंकी बातें जान सकता हूँ। छठी इन्द्रिय मनके द्वारा धर्मचारिणी वृत्तिकी रचना कर सकता हूँ ॥ ३३ ॥

सङ्गेषु भावमोहाभ्यां पश्यन्ति च समृद्धयः । विमुक्ताः सर्वसङ्गेभ्यो धारयन्ति परिग्रहान् ॥ ३४ ॥

जो समृद्धिशाली पुरुष समृद्धियोंका सङ्ग प्राप्त होनेपर भाव और मोहसे (संकल्पमात्र और भ्रमरूपसे) उन्हें देखते हैं तथा सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त हो विषय संग्रह करनेवाले मन, बुद्धि, इन्द्रिय और प्राणोंको काबूमें करते हैं, वे ही तत्त्वज्ञानके अधिकारी हैं ॥ ३४ ॥

न च विन्देत मां कश्चिन्मनसा कामरूपिणम् । पञ्चधातुनिबद्धश्च नानाभाषितचोदनः ॥ ३५ ॥

प्रायः सब लोग पाञ्चभौतिक शरीरमें बँधे रहकर नाना प्रकारके फलोंकी चर्चा करनेवाली वेदवाणीसे प्रेरित हो सकाम कर्मोंमें लगे रहते हैं, अतः कोई भी मनसे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले मुझ परमात्माको नहीं उपलब्ध कर पाता ॥

ये च विष्णुमधीयन्ते बहुधा कामविग्रहैः । ते मां पश्येयुरव्यक्तं तपसा दग्धकिल्बिषाः ॥ ३६ ॥

जो इच्छानुसार ग्रहण किये गये श्रीराम-कृष्ण आदि विग्रहोंसे उपलक्षित भगवान् विष्णुका नाम जप-कीर्तन आदिके द्वारा वारंवार स्मरण करते हैं, वे तपस्यासे अपने पापोंको दग्ध कर देनेवाले उपासक मुझ अव्यक्त परमात्माका साक्षात्कार कर सकते हैं ॥ ३६ ॥

ये च मामभिरोहेयुर्नरा धर्मपथे स्थिताः । तेऽपि स्वर्गजितः सन्तः पश्येयुर्मां गतक्लमाः ॥ ३७ ॥

जो मनुष्य धर्मके मार्गपर स्थित हो उक्त साधनसोपानके द्वारा मुझ निर्गुण ब्रह्मरूपी प्रासादपर आरोहण करते हैं, वे साधुपुरुष भी पाप-तापसे रहित हो स्वर्गपर विजय पा जाते और मेरा साक्षात्कार कर लेते हैं ॥ ३७ ॥

यश्चैव पर्वतः प्रांशुर्मेरुष्पृष्ठे व्यवस्थितः । एतमारुह्य युध्येयुः प्राणत्यागे सुनिर्मलाः ॥ ३८ ॥

मेरुपृष्ठपर जो ऊँचा पर्वत खड़ा है, उसपर आरूढ़ होकर निर्मल अन्तःकरणवाले पुरुष प्राणों (इन्द्रियों) की आसक्तिका त्याग करनेके लिये युद्ध-संघर्ष (उग्र साधना) करते हैं ॥ ३८ ॥

अप्सरोभिः समागम्य विचरेयुर्मनोजवाः । नन्दनं वनमारुह्य काम्यकं च महद्वनम् ॥ ३९ ॥

सिद्धिके पथपर बढ़नेवाले साधक मनके समान वेगशाली हो नन्दनवन और विशाल काम्यकवनमें पहुँचकर अप्सराओं-से मिलते और उनके साथ विहार करते हैं ॥ ३९ ॥

इमां विद्यां समास्थाय मद्भक्ताः पुष्करेष्विह । शरीरं क्षपयिष्यन्ति व्रतैर्बहुविधैः कृतैः ॥ ४० ॥

मेरे भक्त इस विद्याको पाकर पुष्करतीर्थमें नाना प्रकार-के व्रतोंका अनुष्ठान करके अपने शरीरको क्षीण कर देंगे ॥

सिद्धिं प्राप्य क्रमेयुस्ते कामैर्बहुविधैर्नराः । इमं लोकममुं चैव सम्पतेयुर्यथासुखम् ॥ ४१ ॥

वे मनुष्य सिद्धि पाकर नाना प्रकारकी कामनाओंसे सम्पन्न हो क्रमशः ऊपर उठते और आनन्दपूर्वक इहलोक तथा परलोकमें घूमते-फिरते हैं ॥ ४१ ॥

गौरी सिद्धेतिव्याख्याता त्रिषु लोकेषु विद्यया । प्रभावं तपसा वृत्तं दर्शयन्ती समाहिताः ॥ ४२ ॥

जब एकाग्रचित्त योगी तपस्यासे प्राप्त हुए पूर्वोक्त प्रभावको दिखाते हैं, तब विद्या (शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे प्राप्त हुए ज्ञान) से सिद्ध हुई गौरीदेवी दर्शन देती हैं, जो तीनों लोकोंमें सिद्धाके नामसे विख्यात हैं ॥ ४२ ॥

षण्णां ज्ञानाभिसंधीनामभिज्ञानात् ससंग्रहाः । भवेयुस्ते निरारम्भा धातुनिर्मुक्तबन्धनाः ॥ ४३ ॥

कर्माङ्ग, वाह्य और आभ्यन्तर भेदसे भगवन्मूर्तिके दो प्रतीक, विराट्, सूत्रात्मा और अन्तर्यामी—ये सब मिलकर छह ज्ञानाभिसंधियां (संयमके स्थान) हैं। इनका जो सम्पूर्ण रूपसे अनुभव है, उससे कामनाका अभाव हो जानेके कारण साधकोंको अक्षीण योगैश्वर्य प्राप्त होते हैं। वे किसी भी कार्यका आरम्भ नहीं करते और पाञ्चभौतिक बन्धनोंसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ४३ ॥

सहस्रगुणमप्यत्र दत्त्वा दानफलादिव । अविमानेन विप्राणां मनःशुद्धेन कर्मणा ॥ ४४ ॥ सर्वत्रैवाप्रमेयेण अत्यन्तं फलमाप्नुयुः । अमुष्मिंल्लोके धर्मज्ञाः सह सर्वकुलोद्भवैः ॥ ४५ ॥

जैसे यहाँ कोई अपराधी राजाको सहस्रगुना कर देकर उस करदानके फलसे राजाकी प्रसन्नता पाकर उस अपराधसे मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार धर्मज्ञ पुरुष सर्वत्र ही असंकुचित भावसे ब्राह्मणोंका सम्मान और शुद्धभावसे निष्काम-कर्मका अनुष्ठान एवं दान करके अपने समस्त पूर्वजोंके साथ