विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 844, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः [ ८२१
ब्रह्मलोकमें जाकर आत्यन्तिक दुःखका निवारण करनेवाले अक्षय फलको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४४-४५ ॥
येषामिह च सांनिध्यं यज्ञे ब्राह्मणसंकुले।
ते भूयो यजमानाद्या अभिषिच्य पुनः पुनः॥ ४६ ॥
जिन यजमानों और ऋत्विजोंका ब्राह्मणोंसे भरे हुए यज्ञमें सांनिध्य है (यज्ञाङ्ग देवता आदिमें चित्तकी एकाग्रता है), वे यजमान आदि बारंबार बहुतसे यज्ञोंमें अवभृथस्नान करके पुनः पूर्वोक्त फल प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४६ ॥
तथा तां मन्यसे गौरीं मनसा धर्मचारिणीम्।
अनुग्रहाय भूतानां तन्ममाग्रे तपोधने ॥ ४७ ॥
राजन्! तुम दान और यज्ञकी सम्पत्तिको जैसे मेरे सामने स्थित समझते हो, उसी प्रकार पूर्वोक्त गौरी (ब्रह्मविद्या) को भी यदि तुम मुझ तपोधनके समीप—मेरे सम्मुख उपस्थित मानते हो तो अबसे ऐसा न मानना; क्योंकि वे गौरीदेवी सम्पूर्ण प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये मनसे निरन्तर धर्मका आचरण करती हैं (यह बाह्य सम्पत्ति तो परिमित है, परंतु वे आन्तरिक ज्ञान-सम्पत्ति होनेके कारण अनन्त हैं।) ॥ ४७ ॥
सत्य एष परोऽविद्ये भविता नात्र संशयः।
नाफलो विद्यते धर्मश्चरितो धर्मचारिणा ॥ ४८ ॥
यह आत्मा अबाधित सत्य है; परंतु विद्यारहित पुरुषसे बहुत दूर हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। निष्काम धर्मका आचरण करनेवाले पुरुषके द्वारा आचरित हुआ धर्म कभी निष्फल नहीं होता (अतः धर्मसे भी चित्तशुद्धिके द्वारा आत्मतत्त्वका साक्षात्कार हो सकता है) ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥
अष्टाविंशोऽध्यायः
पुष्करमें श्रीविष्णु आदिकी तपस्या और उसके प्रभावका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
दिशां जिगमिषुर्विष्वग्यामुत्तरां सत्यसाधनः।
तथा स धातुनिचये पुण्ये पर्वतरोधसि ॥ १ ॥
विष्णुः परमधर्मात्मा एकपादेन तिष्ठति।
दशवर्षसहस्राणि पुष्करे पुष्करेक्षणः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सत्य ही जिनका साधन है, उन परम धर्मात्मा भगवान् विष्णुने उत्तर दिशा (सिद्धिकी पराकाष्ठा मोक्ष) को जानेकी इच्छा की। वे कमलनयन श्रीहरि पुष्करतीर्थमें धातुओंकी राशिसे परिपूर्ण एक पर्वतके पवित्र तटपर एक ही पैरसे दस हजार वर्षोंतक खड़े रहे !। १-२ ॥
आत्मन्यात्मानमाधाय तपसा ब्रह्मसम्भवः।
घटते कर्मणोग्रेण लोकमुत्थानकारणात् ॥ ३ ॥
ब्रह्माको भी जन्म देनेवाले वे भगवान् विष्णु अपने चित्तको विशुद्ध आत्मामें विचारद्वारा विलीन करके उत्थान (मोक्ष) के लिये उग्रकर्म (घोर तपस्या) करने लगे। साक्षात् परमेश्वर होकर भी उन्होंने जगत्को शिक्षा देनेके लिये ऐसा किया ॥ ३ ॥
भासुरो भस्मनाऽऽच्छाद्य गात्राणि स्वयमात्मनः।
अष्टौ वर्षसहस्राणि सहस्रं च तपोधनः ॥ ४ ॥
इसी प्रकार प्रकाशमान सोम भी स्वयं ही अपने अङ्गोंको भस्मसे आच्छादित करके आठ हजार वर्षोंतक तपस्यारूपी धनके संचयमें लगे रहे ॥ ४ ॥
तेजसा तेन ज्योतींषि विभाव्य ब्राह्मणर्षभः।
तिष्ठते नभसो मध्ये योगात्मा भावयञ्जगत् ॥ ५ ॥
तपस्याद्वारा प्राप्त हुए उस प्रसिद्ध तेजसे समस्त ग्रहनक्षत्रोंको तिरस्कृत करके योगात्मा ब्राह्मणशिरोमणि सोम सम्पूर्ण जगत्को आह्लाद प्रदान करते हुए आकाशके मध्यभागमें प्रकाशित होते हैं ॥ ५ ॥
सोमो विषयसंक्षिप्य मनसा धारयन्मनः।
युक्तः परमधर्मात्मा ब्राह्मीं सिद्धिमुपागतः ॥ ६ ॥
परम धर्मात्मा सोमने बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके विषयोंपर अधिकार कर लिया और योगयुक्त होकर वे ब्राह्मी सिद्धिको प्राप्त हुए ॥ ६ ॥
सम्प्रदृश्यत सर्वत्र दिवि भुव्यन्तरे तथा।
ज्योतिष्णु कर्म कुर्वाणो बहुरूपः स सम्पदा ॥ ७ ॥
वे प्रकाश फैलानेका कार्य करते हुए स्वर्ग, पृथ्वी और दोनोंके मध्यभाग अन्तरिक्षमें सर्वत्र दिखायी देते हैं तथा अपनी योग-सम्पत्तिसे नाना प्रकारके रसरूप बहुत-से स्वरूप धारण कर लेते हैं ॥ ७ ॥
महेश्वरोऽतिगुह्यात्मा वृषरूपेण तिष्ठति।
उद्धृत्य दक्षिणं पादं वायुभक्षः समाहितः ॥ ८ ॥
अष्टौ वर्षसहस्राणि सहस्रं शतमेव च।
महायोगी महादेवो नियमाद् ब्रह्मसम्भवः ॥ ९ ॥
अपने स्वरूपको अत्यन्त गुप्त रखनेवाले भगवान् महेश्वर